Friday, July 18, 2014

The Godfather Dialogues


                                          14  Dialogues  from movie  ''the godfather ''
                                         

1 Friendship is everything. Friendship is more than talent. It is more than the government. It is almost the equal of family.
( मित्रता सबकुछ है। मित्रता प्रतिभा से भी बड़ी है। यह हुकूमत से भी कही अधिक मायने रखती है। यह लगभग परिवार के समान है। )
2 Great men are not born great, they grow great . .
(महान लोग महान पैदा नहीं होते वे महानता विकसित करते है)
3 Never hate your enemies. It affects your judgment.”
(अपने शत्रुओ  से कभी नफरत मत करो। यह आपके निर्णय को प्रभावित करती है।)
4 Revenge is a dish that tastes best when served cold.”
(प्रतिशोध एक ऐसा भोजन है जो ठंडा परोसे जाने पर उत्तम स्वाद देता है।)
 5 A friend should always underestimate your virtues and an enemy overestimate your faults”
(एक मित्र को आपके गुणों का कम  अंदाजा होना चाहिए और एक दुश्मन को आपकी गलतियों का अधिक अंदाजा।)
6You cannot say 'no' to the people you love, not often. That's the secret. And then when you do, it has to sound like a 'yes'. Or you have to make them say 'no.' You have to take time and trouble.”
(आप जिनसे प्रेम करते है उन्हें ' ना ' नहीं कह  सकते। यह एक राज है। और जब आप ऐसा करते है तो उसकी ध्वनि 'हाँ ' में होना चाहिए।  या आप उनसे ना कहलवाए। आपको समय और तकलीफ दोनों ही लेना पड़ेगी।)
7 The lawyer with the briefcase can steal more money than the man with the gun.
 ( एक ब्रीफ़केस की मदद से एक वकील ज्यादा पैसा लूट सकता है बजाय बन्दुक की  मदद से एक आदमी .)
8 A man who doesn't spend time with his family can never be a real man.”
(जो व्यक्ति अपने परिवार के साथ समय नहीं बिताता है वह कभी भी वास्तविक इंसान नहीं बन सकता।)
9 Italians have a little joke, that the world is so hard a man must have two fathers to look after him, and that's why they have godfathers.”
(इतालवी लोगो के पास एक नन्हा सा मजाक है कि दुनिया इतनी निष्ठुर है की एक आदमी के लालन पोषण के लिए दो पिता आवश्यक है। और इसीलिए वहां ' गॉडफादर ' होते है)
10 Accidents don't happen to people who take accidents as a personal insult.”
(इत्तेफाक ( संयोग) उन लोगों के साथ नहीं घटते जो उन्हें व्यक्तिगत मानहानि के तौर पर लेते है। )
11 Many young men started down a false path to their true destiny. Time and fortune usually set them aright.”
(कई युवा लोगों ने अपनी किस्मत के लिए गलत रास्तों से शुरुआत की परन्तु समय और भाग्य ने उन्हें सही रास्ते पर ला  दिया। )
12 Keep your friends close and your enemies closer.”
(अपने मित्रों को अंतरंग रखो और अपने दुश्मनों को नजदीक।)
 13 Behind every successful fortune;There is Crime.”
(हर सफलता के पीछे एक अपराध है।)
14 Time erodes gratitude more quickly than it does beauty!”
(समय कृतज्ञता को सुंदरता से पहले नष्ट कर देता है।)

photo courtesy google image

Friday, July 11, 2014

एक हार के बहाने ......excuse for a defeat...

germay के हाथों brazil के शिकस्त की सुनामी वहां के राष्ट्रपति आवास तक पहुँच चुकी है। इस ऐतिहासिक हार के बाद राष्ट्रपति डिलिमा रोसेफ CNN को बता रही थी की इस हार ने कई सपनो को बिखेर दिया है। गौर तलब है की आगामी अक्टूबर माह में बाजिल में आम चुनाव होने जा रहे है।
.  फुटबॉल के लिए इस देश के जूनून को हम भारत वासी नहीं समझ सकते।  मेजर ध्यानचंद ने इस जज्बे को हॉकी से जगाया था परन्तु हम क्रिकेट की चकाचौंध में ऐसे उलझे कि उस इतिहास पुरुष को ही भूल बैठे और एक क्रिकेटर को भारत रत्न  बना बैठे। इन क्रिकेटर महोदय ने पैसा बनाने के लिए पानी से लेकर च्यवन प्राश तक बेचने में गुरेज नहीं किया। ऊपर से तुर्रा यह कि जब  एक अंतर्राष्ट्रीय टेनिस  खिलाड़ी ने इस महापुरुष को पहचानने से इंकार किया तो आधे देश को बुरा लग गया।
                    हमारे देश में खेल और खिलाड़ियों पर गिनती की फिल्मे बनी है। पिछले तीन दशक के बही खाते टटोले जाए तो कुल पांच छे फिल्मे हाथ आती है जिनमे ' फूटबाल ' एक किरदार के रूप में मौजूद है। उलेखनीय फिल्मों में प्रकाश झा  की ' हिप हिप हुर्रे ' गुरिंदर चड्ढा की  'बेंड इट  लाइक बेकहम ' महत्वपूर्ण है।
         
  1984 में प्रकाश झा ने अपने निर्देशकीय कॅरियर की शुरुआत '  हिप हिप हुर्रे ' से की थी।  इस फिल्म की पटकथा गुलजार ने लिखी थी और संगीत वनराज भाटिया का था जो उस समय दूरदर्शन के अधिकाँश धारावाहिकों को संगीत देकर प्रसिद्धि के शिखर पर विराजित  थे। फिल्म में यशुदास की आवाज में एक अच्छा गीत था '' एक मोड़ पर मेने कहा उसे रोककर , आँख मिला के बात कर ए जिंदगी ''  यह एक मात्र ऐसी फिल्म थी जिसका कथानक फूटबाल के खेल के आस पास बुना गया था। राज़ किरण और दीप्ती  नवल की जोड़ी ने भी फिल्म को दर्शनीय बना दिया था। यह बात जरूर है की उस समय ध्वनि संयोजन और फोटो ग्राफी  पर   इतना ध्यान नहीं दिया जाता था परन्तु गुलजार का कहानी कहने का अंदाज फिल्म में उत्सुकता बनाये रखता है। फिल्म youtube पर मौजूद है जब चाहे देखी  जा सकती है।
           कोई भी घटना को पकड़कर उसका  तेल निकाल देने वाले हमारे न्यूज़ चैनल  इस विश्व कप की   इस तरह रिपोर्टिंग  कर रहे है मानो साओ पोलो हरियाणा में कही है। पता नहीं खेलों में  हमारे कब अच्छे दिन आएंगे ?

                     

Friday, June 27, 2014

Biography of an extraordinary man

'' All of us face hard choices in our lives''  हम सभी अपने जीवन में  कठिन विकल्पों का सामना करते है - कहते हुए श्रीमती हिलेरी क्लिंटन ने अपने चार साला कार्यकाल ( अमेरिकी विदेश मंत्री ) की स्मृतियों को एक किताब की शक्ल  दी है। ' हार्ड चोइसेस ' ( HARD CHOICES ). किताब उनकी आत्मकथा नहीं कही जा सकती , अगर वे आत्मकथा लिखती तो निश्चित तौर पर कुछ खंड उनके पति , पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को लेकर भी होते , अमेरिकी मीडिया का मानना है कि यह किताब उनके अगला  राष्ट्रपति  चुनाव लड़ने की  तैयारियों का आगाज है। और ऐसे में भला वे क्यों कर बिल  क्लिंटन की परछाइयों को गले लगाएगी ?
बहरहाल मीडिया ने उनकी किताब को भरपूर सकारात्मक बताया है।
 अवाम को अफसानों  और हकीकत का फर्क मालूम है।  हकीकत ,  भले ही वह फिर कितने ही आवरण में सामने आये , उसके लिए लोग अखबार का इन्तजार करते है।  परन्तु भोगे यथार्थ  की कहानियाँ सदेव उत्सुकता जगाती है , इसलिए किताबो का सहारा लेना जरुरी हो जाता है . अखबार तो कल को रद्दी की भेंट चढ़ जाएगा।  किताबे पीढ़ियां के काम आएगी।

इसी माह अभिनय सम्राट दिलीप कुमार पर उनकी पत्नी ने उदय तारा नायर के सहयोग से आत्म कथा '' SUBSTANCES AND SHADOW '' जारी की है। उल्लेखनीय है कि दिलीप कुमार पर अब तक चार किताबे आ चुकी है। निसंदेह उदय तारा ने बहुत अच्छा  लिखा है परन्तु दिलीप कुमार स्वयं अपने मन की गाँठ खोलते  तो बेहतर होता। पुरुस्कारों और प्रोत्साहनों से लदे उनके साठ  साल के फ़िल्मी सफर की दास्तान उनकी ही जुबानी सुनना हरेक फिल्म प्रेमी की कामना थी। परदे पर जो कुछ घटा वह तो सर्वव्याप्त हो गया  . परन्तु  परदे के पीछे उनके समकालीन, उनकी आसमानी सुंदरता से लबरेज नायिकाए , उनका जूनून , ईर्ष्या , होड़ , सब कुछ अनकहा रह गया  है।   फिल्म के हरेक फ्रेम को जीवंत कर देने वाले मुखर कलाकार का यूँ अपने जीवन की शाम में स्मृति शुन्य हो जाना एक बड़ी त्रासदी है।



Thursday, June 26, 2014

टेलीविज़न की ताकत

मोदीमय ख़बरों के बीच एक छोटी सी उत्साह जनक खबर आकर गुजर गयी। आमिर खान के संचालन में प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचे। '' सत्य मेव जयते '' के अधिकार चीन के एक फिल्म निर्माता ने ख़रीदे है। यह पहली बार हुआ है कि किसी किसी भारतीय टेलीविज़न कार्यक्रम ने सरहद पार भी लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। इस रियलिटी शो के निर्माता स्टार टीवी इंडिया व फॉक्स टीवी के मालिक जेम्स मर्डोक ने करार को असाधारण घटना बताया है। जेम्स मीडिआ मुग़ल रूपर्ट मर्डोक के पुत्र है।
अभी तक भारत में जितने भी रियलिटी शो लोकप्रिय हुए है उनकी मूल अवधारणा एवं अधिकार सात समुन्दर पार से ही आये थे। कौन बनेगा करोड़पति , दस का दम , बिग बॉस ,क्या आप पांचवी पास से तेज है , बिंगो , सच का सामना , नच  बलिए , इंडिया गोट टैलेंट ,आदि इत्यादि।
तात्कालिक परिस्थितियों में चीन भारत की तुलना में अधिक आर्थिक सम्पन्न व ताकतवर है। परन्तु दोनों देश का युवा और मध्यम वर्ग  एक जैसी समस्याओं से दो चार हो रहा है। भ्रष्टाचार  और समाज में बढ़ती खाई वहां भी उतनी  ही चिंता का विषय है जितनी  यहां।अगर चीन ' सत्य मेव जयते ' से कुछ उम्मीद पाल रहा है तो यह हमारे लिए फक्र की बात है। यूँ तो चीन सरकार ने इंटरनेट को अपने जूतों तले  दबाया हुआ है और अभिव्यक्ति की  आजादी वहां दूर की कोड़ी है।  परन्तु वैचारिक व  सांस्कृतिक   आदान प्रदान रिश्तों में जमी बर्फ पिघलाता है तो यह बड़ी बात होगी।
इन दिनों देश के कुछ महानगरों में पाकिस्तानी टीवी धारावाहिक चाव से देखे जा रहे है। ये धारवाहिक अपनी मौलिकता और अनूठे कथानक के कारण बड़े वर्ग द्वारा सराहे जा रहे है।  यह बात दीगर है कि पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री को अपने पैरों पर खड़ा न होने देने में भारतीय फिल्मों का बड़ा योगदान है।
गौर करने लायक बिंदु यह है कि कहानियाँ और विचार कभी सरहदों के मोहताज नहीं रहे है। पूर्वाग्रह से ग्रस्त राजनेताओ के बनिस्बद्  साहित्य और फिल्मे वैश्विकरण की अवधारणा( concept of globalization)को सफल बनाने में बेहतर काम कर सकते है।

Saturday, June 21, 2014

Amazing facts :CID : मजेदार तथ्य !!

मुझे जासूसी उपन्यास और टीवी सीरियल काफी पसंद है। जिस जमाने में बच्चे चन्दामामा , पराग और लोटपोट पढ़ रहे थे -मेने कर्नल रंजीत , और ओम प्रकाश शर्मा का लिखा सब कुछ पढ़ लिया था। फिर इसी लत का मेरा अगला पड़ाव जेम्स हेडली चेस था।  वह भी हो गया तो सुरेन्द्र मोहन पाठक के सुनील सीरीज के लगभग सारे उपन्यास में आत्मसात कर चूका था।  इन लोगों का लिखा पढ़ने के दौरान  टीवी का विस्तार हो रहा था   और व्यस्तता के चलते पढ़ना थोड़ा काम हुआ ,परन्तु जासूसी कहानियों  की वह प्यास बनी  हुई थी लिहाजा इंटरनेट का सहारा लिया और चुन चुन कर अमेरिकी डिटेक्टिव सीरियल देख डाले। '' monk ''   'criminal mind ', castle के सभी एपिसोड मेरे संग्रह में है। यहां अगर मेने शरलॉक होम्स का जिक्र नहीं किया तो मेरी यात्रा अधूरी रहेगी . इस दौरान सत्रह वर्षों से चल रहा CID भारतीय टेलेविज़न का इकलौता जासूसी ( ?) धारावाहिक कई बार देखने में आया।  जो समंदर में देख चूका था उसके मुकाबले यह एक तलैया साबित हुआ है।  इसे देखने के दौरान मेने कुछ मजेदार fact नोट किये है।  आपने भी गौर किया होगा कि इसे कितनी लापरवाही एवं  कंजूसी से produce किया जा रहा है। कुछ बानगी पेश है।
1 CID के ऑफिस में सभी लोगों के बैठने के लिए कुर्सियां नहीं है।
2 लगभग सभी एजेंट एक साथ बाहर निकलते है और एक साथ ही वापस लौटते है।
3 चपरासी या चाय पिलाने वाला कभी नजर नहीं आता।
4 कोई भी एजेंट कभी कुछ भी खाते पीते नजर नहीं आता है।
5 एजेंट जिस जेब से गन निकालते है उसी जेब से थोड़ी देर बाद सफ़ेद दस्ताने निकाल लेते है।
6 कोई भी जानकारी या सुचना कागज़ पर नोट नहीं की जाती है।
7 फॉरेंसिक लेब में डेड बॉडी किस दरवाजे से लाइ लेजाई जाती है  और उसे स्ट्रेचर पर लाने ले जाने वाले कभी नजर नहीं आते।
8 सालुंके साहब हमेशा थ्री पीस सूट में काम करते है।
9 ACP कभी अपने सीनियर से बात नहीं करते।
10 सबुत ढूंढते वक्त सिर्फ एक एजेंट को सबूत मिलता है और सारे एजेंट उसके आसपास भीड़ लगा   देते है।  यह सबूत कभी अदालत में पेश नहीं किया जाता।
11 कभी कोई केस अदालत नहीं पहुचता।
12 CID कभी पुलिस की मदद नहीं लेती।
13 सारी दुनिया CID से खौफ खाती है।  जैसे ही कोई एजेंट अपना परिचय देता है सामने वाले का खून सूख जाता है।
14 महिला एजेंट हमेशा  टाइट जीन्स पहनती है। इस जीन्स की जेब से वे गन , दस्ताने , मोबाइल , खट  से निकाल लेती है .
15 ACP अपने हाथ को कंधे तक उठाकर हवा में अपनी उँगलियों से दो बार शुन्य बनाते हुए एक डायलॉग अवश्य बोलते है  '' कुछ तो गड़बड़ है ''
16 CID हमेशा मर्डर के केस ही सुलझाता है।
 17  कभी किसी पुलिस वाले को आज तक CID ने अपने पास नहीं फटकने दिया है .
 18 पुरे डिपार्टमेंट के पास सिर्फ एक कार है।
19 खाली घर में घुसने के बाद सभी एजेंट अपनी गन निकाल लेते है - दर्शक समझ जाता है कि इन्हे यहां कुछ नहीं मिलने वाला है।
20 सबुत के लिए कभी फिंगर प्रिंट नहीं उठाये  जाते न ही मौका ए वारदात के फोटो लिए जाते है।
21 दया ने  जितने दरवाजे आज तक तोड़े है वह एक विश्व रिकॉर्ड है .

अगर आप को लगता है कि कुछ तथ्य छूट गए है तो अवश्य ही लिख भेजिए . वे तथ्य आपके नाम के साथ इस ब्लॉग में शामिल  कर लिए जाएंगे .

Monday, June 9, 2014

ठगों की मदद करते फ़िल्मी सितारे


फिल्म नगरी मुंबई की चुनचुनाती रौशनी के अपने स्याह अँधेरे है। यंहा आने वालों का दिल खोल कर स्वागत किया जाता  है और जाने वालों के लिए बिदाई संगीत भी नहीं बजाया जाता , जितनी जल्दी हो सके उन्हें विस्मृत कर दिया जाता  है। अस्त होते सितारे की त्रासदी जानने की किसे फुर्सत है।  सफलता में यंहा भीड़ होती है और कॅरियर की शाम यादों की जुगाली।
अस्त होते सितारों को जब समझ आता  है कि उनका समय गुजर गया है तब वे रौशनी की छोटी गलियों में दौड़ लगाने  लगते है। इन   गलियों  को विज्ञापन कहा जाता है।  टीवी चैनलों के विस्फोट के बाद इन्हे इतना काम तो मिलने लगा है कि कैसे भी रोजी रोटी कमा  सके। फिर इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि ये विज्ञापन किस स्तर के है। ये विज्ञापन घर में समृद्धि लाने का भरोसा दिलाने वाले  श्री यंत्र का  भी हो सकता या बरसों से जान निकाल रहे घुटने के दर्द का भी। इन विज्ञापनों में तात्कालीन मंत्री स्मृति ईरानी से लेकर गोविंदा  , जेकी श्रॉफ , आलोक नाथ , मनीषा कोइराला ,जरीना वहाब , दीपक पाराशर , गाहे बगाहे नजर आते रहे है।  स्मृति ईरानी जैसी किस्मत सभी की नहीं रही है। एक अनजान से प्रोडक्ट के साथ अपना नाम जोड़ना इन्हे एक बार तो मोटी रकम दिला  देता है परन्तु इनके बहकावे में प्रोडक्ट खरीद बैठा उपभोक्ता इन्हे पानी पी पीकर कोसत्ता  रहता है इसकी ये परवाह नहीं करते या जानबूझ कर अनजान बने रहते है।
वैसे तो 30 सेकंड की एक विज्ञापन फिल्म किस्मत बदल देती है परन्तु ये सितारे जिन विज्ञापनों में काम करते है वह अक्सर रात बारह बजे बाद प्रादेशिक और राष्ट्रीय चैनलों पर देर तक दिखायी जाती है। देर रात तक जागने वाले दर्शक इनके शिकार होते है। एक जमाने में फिल्म निर्माता सुभाष घई की खोज कही जाने वाली महिमा चौधरी ने महज दो लाख रूपये के लिए मध्य प्रदेश के एक छोटे से शहर शुजालपुर में आकर एक चिट फण्ड कंपनी को प्रमोट किया था।
हाल ही में,  सभी महानगरों में अपनी शाखा होने का दावा करने वाली एक लैबोरेटरी ने देश के सभी बड़े अखबारों में एक विज्ञापन जारी किया है. जिसमे उन्होंने गुजरे जमाने की सनसनी दीपक पाराशर ( निकाह ) और ज़रीना वहाब (चितचोर ) को अपनी बीस वर्ष पुरानी अवस्था में प्रस्तुत किया है। सीधा  सा मतलब है कंपनी को कोई नया चेहरा नहीं मिला लिहाजा पुरानी पीढ़ी को पुरानी शक्ल दिखा कर ही आकर्षित किया जाए।
यंहा बेरोजगार और उम्रदराज अभिनेताओं के ताजा अवसरों पर कोई आक्षेप नहीं है। प्रश्न यह है की ये लोग ठगी में मदद करने के परोक्ष माध्यम  नहीं बनते जा रहे है ?


Sunday, June 1, 2014

एक ऐतिहासिक फिल्म



उनके पास पैसा  नहीं था।  वे सिर्फ एक डॉक्टर थे।  फिल्मे उन्हें आकर्षित करती थी। अचानक नियति ने उन्हें एक शौकिया लेखक से मिलाया।  दोनों ने मिलकर छोटी छोटी फिल्मे बनाकर प्रदर्शित करना आरम्भ किया। फिल्म समारोहों में उनकी फिल्मे पुरूस्कार जीतने लगी। चूँकि वे डॉक्टर थे और कार दुर्घटनाओ में घायल लोगों का इलाज करते थे लिहाजा उन्हें अपनी पहली फीचर फिल्म की  कहानी का प्लाट भी अस्पताल  से ही मिला।
में बात कर  रहा हूँ   जॉर्ज मिलर की।  1971 से लेकर 1978  तक उन्होंने एक कहानी पर काम किया।  इस आठ साल का नतीजा रही '' मैड मेक्स ''. मैड  मैक्स कई  मायनो में पहली फिल्म बनी। यह ऑस्ट्रेलिया की पहली फिल्म थी जिसने सबसे ज्यादा व्यवसाय किया था । पहली बार किसी फिल्म को एनामोर्फिक वाइड स्क्रीन पर साधारण 35 एम एम केमेरे से शूट किया गया था।  इस  तकनीक में कैमरा आउट ऑफ़ फोकस हो चुके बिखरे दृश्यों को पुनः संयोजित कर लेता है। सिनेमा स्कोप में भी कुछ इसी तरह का उपयोग होता  है। कम बजट में अधिक  मुनाफा कमाने के लिए इसे ' गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में बीस सालों तक पहले स्थान  पर रहने  के लिए याद किया जाता है। यही नहीं , ऑस्ट्रेलियाई   फिल्मों के लिए अन्तराष्ट्रीय बाजार के दरवाजे खोलने का श्रेय भी'  मैड मेक्स' के ही नाम पर है। फिल्म के नायक   'मेल  गिब्सन ' का  हॉलीवुड से परिचय भी इसी फिल्म ने कराया था।
फिल्म की कहानी ऐसे भविष्य  का चित्रण करती है जहां दुनिया में तेल के भण्डार समाप्त होने की स्थिति में है।  इस वजह से फैली अराजकता को रोकने के लिए  मेन  फ़ोर्स पेट्रोल के दस्ते सड़कों और शहरों में गश्त कर रहे है। मोटर साइकिल सवारों की एक गैंग ने पुरे क्षेत्र में अपना आतंक बरपा रखा है। ऑफिसर मेक्स ने अपने सहयोगी गुस के साथ इस गैंग के सदस्य जॉनी को गिरफ्तार किया है जिस पर बलात्कार का आरोप है।  परन्तु गुंडों के आतंक के चलते जॉनी के खिलाफ कोई गवाह सामने नहीं आता है। मैक्स की इस हरकत से खुन्नस खाकर गैंग का लीडर बुबा मेक्स की पत्नि और बच्चे की हत्या कर देता है।  यही से आरम्भ होता है मेक्स का  प्रतिशोध।  अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा देकर मेक्स निकल पड़ता है इन अपराधियों को ठिकाने लगाने।
ऑस्ट्रेलिया के मीलों लम्बे सुनसान राजमार्ग  और रफ़्तार से भागती कार के द्रश्य इस फिल्म की खूबसुरती है.  अन्तराष्ट्रीय दर्शकों को ध्यान में रखकर इस फिल्म को अमेरिकन इंग्लिश  में डब  किया गया था। इसकी सफलता के बाद इसी श्रंखला की दो और फिल्मे (1981 ) व (1985 )  प्रदर्शित की गई  थी।
महज चार लाख  डॉलर में  बनी इस  फिल्म ने  216 लाख डॉलर का व्यवसाय किया  था।अगर अभी तक यह फिल्म आप से बची रही है तो  इसे  अवश्य ही देखा जाना चाहिए।

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...