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Thursday, March 14, 2019

कल्पना के रेशों में भविष्य के संकेत



ऑक्सफ़ोर्ड शब्दकोष  के अनुसार इंसिडेंट ( घटना ) का मतलब -कुछ हो रहा है या कुछ हुआ है , है। घटनाए मनुष्य के साथ जुडी हुई है , एक तरह से वे जीवन का अंग बन चुकी है।  तमाम सावधानियों के बाद भी वे घटती रहती है। जिन घटनाओ के कारणों का समाधान मिल जाता है वे संदर्भो के रूप में इतिहास में जोड़ दी जाती है और जो अनसुलझी रह जाती है वे समय बीतने के बावजूद भी  शीतकाल की धुंध की तरह रहस्यमयी आवरण लपेटे रहती है। 
ठीक पांच वर्ष पूर्व मलेशिया एयरलाइन के जहाज एम् एच 370 का अपने 189 यात्रियों सहित अचानक से गुम हो जाना तकनीक के शिखर पर खड़े विश्व की असफलता का बिरला उदहारण है। ऐसी घटना जिसकी कल्पना सिर्फ आभासी दुनिया में ही संभव है - एक बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह बनकर आधुनिक विकास के दंभ को चुनौती दे रही है। 
                  दर्शनशास्त्र के विद्धानों का मानना है कि हमेशा से ही अनगिनत विचार हमारे आसपास के वातावरण में मौजूद रहे है।  मस्तिष्क की तरंगो की हद में आते ही ये विचार मनुष्य की कल्पना को जाग्रत करने का काम करते है। इन्ही विचारो को विस्तार देकर रचनात्मक माध्यमों से लेखन नाटक शिल्प जैसे अभिव्यक्ति के साधन  साकार होते है। सुनने में अजीब लग सकता है कि ' टाइटेनिक ' के दुर्घटना ग्रस्त होने के दो दशक पूर्व ही एक अंग्रेज पत्रकार डब्ल्यू टी स्टेड ने अपने काल्पनिक उपन्यास ' द सिंकिंग ऑफ़ मॉडर्न लाइनर (1886) में टाइटेनिक के साथ हुए हादसे और परिस्तिथियों का सटीक वर्णन कर दिया था। स्टेड के  उपन्यास में जहाज लिवरपुल से न्यूयोर्क के सफर पर ढाई हजार यात्रियों को लेकर रवाना होता है।  जहाज का वजन , लम्बाई चौड़ाई , लाइफ बोट्स की संख्या ,लगभग समान थी। 1898 में अमेरिकी लेखक मॉर्गन रॉबर्ट्सन का लिखा ' द रेक ऑफ़ द टाइटन ' और मॅकडॉनेल बेड किन के लिखे उपन्यास ' द शिप्स रन्स
(1908) ने जहाज की गति 22 नॉट बताई थी जो  एकदम सटीक थी।  इन तीनो ही कहानियों में जहाज उतरी अटलांटिक सागर में ही डूबता बताया था। डब्लु टी स्टेड ने तो एक तरह से अपने कहानी से अपनी नियति तय कर दी थी। 1912 में टाइटेनिक हादसे के शिकार मृतकों में उनका भी नाम था ! 
नाइजेरियन धर्मगुरु टी बी जोशुआ ने 2013 में भविष्यवाणी की कि एक एशियाई देश का विमान अपने यात्रियों के साथ गायब हो जाएगा। उस समय उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया गया।  शायद उनका इशारा एम् एच 370 की और ही था। आज भी यह पूरी तरह से स्पस्ट नहीं हुआ है कि  विमान में सवार  उन जिंदगियों का क्या हश्र हुआ है। विमानन नियमों के अनुसार जब तक किसी विमान का मलबा नहीं मिलता तबतक उसे गुमशुदा ही माना जाता है !
विकटतम परिस्तिथियों में भी जीवन की आस नहीं छोड़ना मनुष्य की बुनियादी प्रवृति है। इतिहास साक्षी है कि दुर्गम वातावरण में भी मानव जाति ने खुद को बचाए रखा है। मनुष्य की  इस जीवटता को केंद्र में रखकर रोबर्ट ज़ेमेकिस ने अदभुत फिल्म बनाई ' कास्ट अवे (2000) नायक थे टॉम हेंक। एक अकेले व्यक्ति के प्लेन क्रैश के बाद  एक वीरान द्धीप पर चार साल तक फंसे रहने और जीवित रहने के संघर्ष की यह प्रेरणा दायी कहानी भविष्य में होने वाली घटनाओ के पूर्वानुमान लगाने के लिए मानस तैयार कर देती है।कास्ट अवे ' सिर्फ अपने कथानक के लिए ही नहीं वरन अन्य बातों के लिए भी सराही जाती है। एक सौ तैतालिस मिनिट अवधि की इस फिल्म में आधे घंटे तक एक भी संवाद नहीं है। इस फिल्म का अंतिम द्रश्य  सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ दस द्रश्यों में शामिल किया गया है। 
 कास्ट अवे ' की भव्य सफलता ने इसी विषय पर टीवी धारावाहिक ' लोस्ट ' (2004 से 2010 ) का मार्ग प्रशस्त किया। स्क्रीन राइटर जेफ्री लाइबर फिल्मकार जैकब अब्राम और डेमोन लिंडेलोफ ने एक सुनसान द्धीप पर एक यात्री विमान के क्रैश होने  और बचे हुए यात्रियों की जद्दोजहद की काल्पनिक कहानी बुनी। अमेरिकी टेलीविज़न पर प्रसारित  इस धारावाहिक में अनोखी बात यह थी कि इसके हरेक पात्र की एक बैकस्टोरी थी जिसे ' फ़्लैश इन 'तकनीक से दर्शाया गया था। 
                        मनुष्य की कल्पना को ज्योतिष विज्ञान ने मान्यता नहीं दी है। परन्तु अघटित घटनाओ को फिल्मों के  विषय बनाना भविष्यवाणी करने जैसा ही है। 

Thursday, November 8, 2018

रोमांचक सफर पर ले जाती ' टाइम मशीन '


खबर हॉलीवुड से है।  ' टाइटेनिक ' फिल्म से दुनिया भर में पहचान बना चुके लेनार्डो डी कैप्रिया विख्यात साइंस कहानी  लेखक एच जी वेल्स के कालजयी उपन्यास ' टाइम मशीन ' पर फिल्म निर्माण कर रहे है। लेनार्डो इस फिल्म के माध्यम से खुद को एक फिल्म मेकर के रूप में प्रस्तुत करने जा रहे है।  फिल्म का निर्देशन मशहूर निर्देशक एंडी मशेती करेंगे। फिल्म कितनी बड़ी होगी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस फिल्म को हॉलीवुड के दो बड़े स्टूडियो , वार्नर ब्रदर्स और पैरामाउंट मिलकर बना रहे है। 
टाइम ट्रेवल सिनेमा के आगमन से पहले से ही जन समुदाय में उत्सुकता का सबब रहा है। ब्रिटिश विक्टोरियन युग में लिखे  गये   उपन्यास ' टाइम मशीन ' ने अनदेखे अनजाने भविष्य को लेकर जो कौतुहल जगाया था उसे सिनेमा को तो अपनी गिरफ्त में लेना ही था। टाइम  ट्रेवल पर जॉर्ज पाल द्वारा निर्मित पहली फिल्म ' टाइम मशीन ' 1960 में बनाई गई थी।  यह फिल्म एच जी वेल्स के उपन्यास का हूबहू सिनेमैटिक अवतार थी। ट्रिक फोटोग्राफी और स्टूडियो निर्मित भव्य सेट्स के अलावा इस फिल्म की एक और उल्लेखनीय विशेषता थी , इस फिल्म में एच जी वेल्स के पोते ने समय यात्रा पर जा रहे वैज्ञानिक के दोस्त की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म के बाद जितनी भी फिल्मे और टीवी धारावाहिक इस विषय पर बने उनमे वेल्स को तो क्रेडिट दिया परन्तु कथानक में निर्माता ने अपनी कल्पनाशीलता का भरपूर उपयोग किया। अधिकांश अमेरिकी टीवी धारावाहिकों ने इस उपन्यास के तथ्यों और घटनाक्रम को विस्तार देकर घर बैठे दर्शक को भी टाइम ट्रेवल के रोमांच से सरोबार किया। 2010 में  ए बी सी चैनल पर प्रसारित लोकप्रिय धारावाहिक ' लॉस्ट ' का अंतिम छठा सीजन टाइम ट्रेवल पर ही केंद्रित रहा था। 
2002 में अमेरिकन और ब्रिटिश सहयोग से बनी गाय पियर्स अभिनीत  ' टाइम मशीन ' ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत का पंद्रह गुना धन कमाया परन्तु अपने कंप्यूटर जनित दृश्यों की भरमार और प्रेम कहानी के एंगेल की वजह से सिने  समीक्षकों और आलोचकों को प्रभावित नहीं कर सकी। एक दुर्घटनावश समय में आठ लाख वर्ष आगे निकल गए नायक के सामने कबीलाई युग में पहुँच गई  मानव सभ्यता को शिक्षित करने और नरभक्षी ' मार्लोक ' प्राणियों से मानव जाति को बचाने की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है फलस्वरूप उसकी टाइम मशीन नष्ट हो जाती है और वह भविष्य में ही  रह जाता है। 
  टाइम ट्रेवल पर रोबर्ट ज़ेमिकिस निर्देशित  हलकी फुल्की कॉमेडी  ' बैक टू द फ्यूचर ' विशेष उल्लेखनीय फिल्म है। 1985 में निर्मित इस फिल्म का हाई स्कूल का छात्र  नायक अपने बुजुर्ग इलेक्ट्रिक इंजीनियर  मित्र की कार में बैठकर तीस साल पीछे 1955 में चला जाता है। जहाँ उसकी मुलाक़ात हाई स्कूल में ही पढ़ रहे अपने माता पिता से होती है। फिल्म में 1955 का माहौल रचने के लिए  बारीक से बारीक बातों  का ध्यान रखा गया था।  ' बैक टू द फ्यूचर ' बहुत थोड़े बजट में बनी अमेरिका की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्मों की सूची  में स्थान रखती है। इस फिल्म की छप्पर फाड़ सफलता ने  बैक टू द फ्यूचर 2 और  बैक टू द फ्यूचर 3 बनाने की राह आसान की थी। शेष दोनों  भाग भी काफी सफल रहे थे। 
 इस विषय पर हिंदी सिनेमा की हिचकिचाहट समझ नहीं आती। एक जैसे कथानक और एक  ढर्रे पर फिल्म बना रहे फिल्मकारों को काल यात्रा पर फिल्म बनाने का विचार क्यों नहीं आया , समझा जा सकता है। अधिकाँश लोग यह सोंचकर नए विषय को हाथ नहीं लगाते कि किसी और को प्रयास कर लेने दो अगर वह सफल हो गया तो हम भी कूद पड़ेंगे। 2010 में विपुल शाह ने अक्षय कुमार और ऐश्वर्या रॉय को लेकर ' एक्शन रीप्ले ' बनाई थी। बकवास स्क्रिप्ट और बेदम कहानी को सफल नहीं होना था और ऐसा ही हुआ भी। बस उसके बाद हिंदी सिनेमा में टाइम ट्रेवल की कोई बात नहीं करता। 
बॉलीवुड से इतर दक्षिण की क्षेत्रीय फिल्मों ने जरूर हॉलीवुड के सामने खड़े होने का साहस दिखाया है। तमिल , तेलुगु और कन्नड़ में पिछले  कुछ वर्षों में नए सब्जेक्ट पर शानदार फिल्मे बनी है। विडंबना यही है कि क्षेत्रीयता और भाषाई अवरोधों के कारण वे एक बड़े दर्शक वर्ग तक नहीं पहुँच पाती। 2015 में बनी तमिल फिल्म ' इन्द्रू नेत्रु नालाई ' टाइम ट्रेवल पर भारत में बनी मौलिक और बेहतरीन फिल्म है। इसी तरह मलयालम में सूर्या अभिनीत ' टाइम मशीन और कन्नड़ में अभिनेता अजित अभिनीत टाइम मशीन भी दर्शनीय फिल्मे है। 
भविष्य और अतीत की कांच की दीवारों के बीच वर्तमान फंसा हुआ है। न आप इधर जा सकते है न उधर। परन्तु  अपनी फंतासियों में मनुष्य ने इन दोनों ही अवरोधों को पार किया है और आभासी अनुभव का अहसास दिलाने में फिल्मे बड़ी मददगार साबित हुई है। 

Friday, July 25, 2014

LOST airliner

सिडनी ऑस्ट्रेलिया से oceanic Airline की फ्लाइट 815 लोस ऐंजलस के लिए उड़ान भरती  है . इस विमान में 324 यात्री सवार है। दक्षिण प्रशांत सागर के ऊपर उड़ते हुए विमान में कोई तकनीकी खराबी आई और  वह दो टुकड़ो में एक द्वीप पर क्रैश हो गया। एक टुकड़ा जिसमे 254 यात्री सवार थे प्रशांत महासागर में विलीन हो गया , दूसरे टुकड़े के सवार 70 लोग भाग्यशाली थे जो किनारे पर गिरे और समुद्र में डूबने से बच गए।

                    इन survivor को जीवन तो मिला परन्तु शेष दुनिया से उनका कोई संपर्क नहीं बचा। उनके सामने एक विशाल रहस्य्मयी द्वीप मौजूद था। यह एक ऐसी जगह थी जहाँ से न तो विमान गुजरते है न ही जहाज। जब तब एक रहस्य्मयी धुँआ ( smoke ) और एक सफ़ेद अरबी घोडा नजर आ जाता है। हर कदम पर एक नया रहस्य survivors के सामने आता है। एक लॉटरी विजेता , एक सर्जन , एक अपराधी , डांस टीचर , कस्ट्रक्शन वर्कर , और भी इसी तरह के पात्रो से सजा अमरीकी टेलीविजन धारावाहिक '' लॉस्ट ''lost अपनी शुरुआत 2004 से लेकर 2010 तक 6 सीजन में अपना जादू बिखेरते हुए दुनिया के  'टॉप टेन ' सीरियल्स मेंशामिल हो गया। पात्रो के चरित्र चित्रण में ' फ़्लैश इन ' तकनीक का प्रयोग इस धारावाहिक में इतनी बार किया गया कि यह ट्रिक विधा बन गई। अधिकांश पात्र  इस तकनीक की वजह से किंवदंती बन गए।
                                   इस धारावाहिक में भारतीय मूल के अभिनेता नवीन  एंड्रू ने भी समस्त सीजन में अपनी छाप छोड़ी थी।  नवीन ब्रिटिश नागरिक है और धारावाहिक में उनका  किरदार इराकी सैनिक का था जो अपने  कड़वे अतीत से छुटकारा पाने के लिए अमेरीका का रुख करता है।
                          इसी साल जब 8 मार्च को मलेशियाई विमान लापता हुआ तो lost का कथानक याद आगया। निश्चित तौर पर हम इस विमान हादसे को lost धारावाहिक से जोड़ कर नहीं देख सकते। सिर्फ कामना कर सकते है की काश वे लोग भी सुरक्षित हों और   oceanic 815 के यात्रियों की तरह दुनिया से संपर्क नहीं कर पा रहे हों . दुनिया की सबसे लम्बी और महंगी खोज की असफलता ने उम्मीद की एक किरण को जलाए रखा है।
इस  सीरियल को देखने के लिए www.watchseries.it/series/lost
पर log in किया जा सकता है।
photo courtsey:: google image
                      

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...