Sunday, April 24, 2016

Spice and Salt : स्मिता पाटिल , शनि शिगनापुर , मिर्च मसाला

तीखे नैन नक्श और  साँवले रंग वाली प्रतिभा सम्पन्न अभिनेत्री स्मिता पाटिल को गुजरे तीन दशक हो चुके है। अगर वे आज हमारे बीच होती तो साठ  बरस की हो चुकी होती। एक दशक के उनके फ़िल्मी सफर में तकरीबन 70 फिल्में दर्ज है। इन फिल्मों में कुछ फिल्में ऐसी है जो उन्हें सदैव अमर रखेगी। 2013 में forbes पत्रिका ने सिनेमा की शताब्दी के अवसर पर स्मिता को विश्व की 25 सर्वश्रेष्ट अभिनेत्रियों में शामिल किया था।
         सिनेमा और साहित्य की दुनिया में वे ही कृतियाँ कालजयी होती है जो अपने समय से आगे देखने का प्रयास करती है और जिनमे भविष्य के संकेत गुंथे हुए होते  है। ऐसी फिल्मों के कथानक कभी बासी नहीं होते। फिर वह चाहे मारिओ पूजो रचित  godfather हो या अकिरो कुरोसावा की seven samurai हो या सत्यजित रॉय की पाथेर पांचेली। 
               
पिछले दिनों शनि शिगनापुर में महिलाओं को शनिदेव की पूजा अर्चना की  अनुमति के लिए लम्बी जद्दो जहद ने स्मिता की एक फिल्म को स्मरण करा दिया। यह फिल्म थी केतन मेहता की  मिर्च मसाला -  इस फिल्म के अविस्मरणीय पात्रों की फेहरिस्त लम्बी है- नसीरउद्दीन शाह , सुरेश ओबरॉय , दिप्ती नवल, रत्ना शाह पाठक , बेंजामिन गिलानी , परेश रावल , राजबब्बर , आदि का अभिनय कमाल का था परन्तु इतना ही पॉवर फूल रोल स्मिता पाटिल का भी था।
फिल्म का कथानक ब्रिटिश कालीन भारत के 1940 के पूर्व का है। सूखे की मार झेल रहा गाँव क्रूर सूबेदार के रहमों करम पर है। अंग्रेजी राज की एक त्रासदी यह भी रही है कि अंग्रेज हुक्मरानों के मातहत काम करने वाले भारतीयों ने अपने आकाओ की नजरों में चढ़ने के लिए हिन्दुस्तानी रिआया पर डट कर जुल्म किये।  सूबेदार लगान वसूलने के साथ गाँव की स्त्रियों पर भी हाथ डालने लगता है। गाँव के मर्द सिर्फ घर तक ही मर्द है।  वे पंचतंत्र की कहानी ( जंगल के जानवर शेर के आतंक से बचने के लिए रोज एक जानवर को शेर के भोजन के लिए भेजते है )  की तरह अय्याश सूबेदार के  पास महिलाओ को भेजते है।एक दिन सूबेदार की नजर सोनबाई पर पड़ती है और वह उसे हासिल करने के लिए पूरी ताकत लगा देता है।
                       यह फिल्म एक महिला के पुरुष समाज की नाजायज मांग को ठुकराने और अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए जान जोखिम की हद तक जाने की जिजीविषा को व्यवहारिक ढंग से रेखांकित करती है।
                   
 सोन बाई के खिलाफ पूरा गाँव एकजुट हो जाता है कि वह सूबेदार के सामने आत्म समर्पण करदे। शनिशिग्नापुर का ट्रस्ट और शंकराचार्य महिलाओ से आव्हान करते है कि वे अपनी पूजा अर्चना की जिद छोड़ दे। न सोन बाई झुकती है न महाराष्ट्र की वे अनाम महिलाए -झुकना पड़ता है पुरुष समाज को।
महिला सशक्तिकरण को उभारती मिर्च मसाला हर दौर में प्रासंगिक है। 

Monday, April 18, 2016

great indian fat wedding !!












इंडिया में अगर शादिया न हो तो लाइफ बिलकुल बोरिंग हो जाए।  economist का कहना है कि महँगी शादियां indian economy को चलाने में बहुत help करती है। 

Monday, April 11, 2016

Let's Get Romantic :चल थोड़ा सा रूमानी हो जाए


थोड़ी देर के लिए कल्पना करे कि देश में न्याय पालिका न हो तो क्या हो ? मनुष्य जिस तेजी से संवेदना शुन्य हो कर अपनी ही प्रजाति को नष्ट करने पर तुला है उसकी तुलना आदिम समाज और जानवरों से भी नहीं की जा सकती। चुनी हुई सरकारें अवाम को अपने हासिल वोट प्रतिशत से ज्यादा तव्वज्जो नहीं देती , उन्हें मालुम है कि अगले चुनाव पांच साल बाद आने वाले है और लोगों की स्मरण शक्ति बेहद कमजोर है।
देश के नौ राज्यों में सूखा अपने चरम पर है परन्तु जिम्मेदार आँख मूंदे हुए है। आत्म मुग्धता का यह आलम है कि कल तक जो जनता की परेशानियों पर तड़प जाया करते थे उन्हें आज अपने सिवाय और कुछ नजर नहीं आ रहा।  इन   हालात में supreme court का स्वयं संज्ञान लेकर हरकत में आना सुकून देता है। महाराष्टृ  के कुछ क्षेत्रों में सूखे के  कहर ने गजब ढाया  है। पीड़ित किसानों की आत्म ह्त्या की ख़बरें लम्बे समय से सुर्ख़ियों में है परन्तु कहीं ऐसा नहीं लगता कि अवाम की संवेदनाओ में उसे लेकर कही कोई  स्पंदन है। विदर्भ , मराठवाड़ा , लातूर, पंढरपुर कुछ ऐसे क्षेत्र है जहाँ प्रकृति का कहर पुरे शबाब पर है। ऐसे हालात में मीडिया और कोर्ट ने जब आईपीएल के मैचों में पानी की बर्बादी पर सवाल उठाया तो सारे देश की नजर में यह बात आयी।
        इन विकट  हालातों में भी कुछ लोग है जो बगैर किसी शोशेबाजी के सूखा पीड़ितों के लिए लम्बे समय से काम कर रहे है। फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर इन्ही लोगों में प्रमुख है। स्वभाव से अक्खड़ , मनमौजी , और बगैर लॉग लपेट के बात करने वाले नाना का जुड़ाव सामाजिक सरोकारों से बहुत पुराना है। नर्मदा आंदोलन के शीर्ष पर बाबा आमटे और मेघा पाटकर के साथ जमीन पर बैठकर पीड़ितों को ढांढस बंधाते उन्हें सभी ने देखा है। तारीफ़ की बात यह कि इस सक्रियता को उन्होंने कभी अपने पक्ष में नहीं भुनाया।
                       1990 में दूरदर्शन और NFDC ने एक अलग तरह की फिल्म को produce किया था '' थोड़ा सा रूमानी हो जाए '' इस फिल्म के डायरेक्टर अमोल पालेकर थे। फिल्म की केंद्रीय भूमिका में नाना पाटेकर के साथ अनिता कँवर थी ( बुनियाद ). नाना ने इस फिल्म में एक ऐसे ठग का किरदार निभाया था जो अपनी बातों से निराश लोगों में उम्मीद जगाता   है। द्रष्ट धूम नीलकंठ बारिशकर नाम का यह ठग ऐसे इलाकों में जाता है जहां लंबा सूखा पड़ा है। यह लोगों को समझाता है कि वह बारिश करा सकता है। बहुत थोड़े बजट में बनी यह फिल्म नाना के काव्यात्मक डॉयलॉग के लिए आज भी याद की जाती है।
                                 आज नाना यही काम वास्तविक जीवन में  चुपचाप और निस्वार्थ भाव से कर रहे है। अपने हालात से निराश हो चुके लोगों को इस फिल्म के गीत की यह पंक्ति अवश्य गुनगुनानी चाहिए कि '' मुश्किल है जीना , उम्मीद के बिना , चल थोड़ा सा रूमानी हो जाए। 

Tuesday, April 5, 2016

Love of Superstitions :यह ब्लॉग आपको पसंद नहीं आएगा


 जीवन की व्यवहारिक समस्याऐ सुलझाने के लिए इन दिनों एक बड़ा और प्रभावशाली वर्ग तैयार हो गया है।   यह वर्ग है - बाबाओ , ज्योतिषियों , तांत्रिकों ,तथाकथित गुरुओ और भविष्य वक्ताओं का। नौकरी , वैवाहिक दिक्कतें ,प्रेम , रिश्तों में टूटन ,असाध्य बिमारी जैसी सर्वकालिक परेशानियों का तर्कसंगत हल स्वयं के प्रयासों से या मेडिकल साइंस की बदौलत ढूढा जासकता है।अफ़सोस ! ऐसा हो नहीं  रहा। पिछले दो दशकों में अखबार और टेलीविज़न अंधविश्वास फैलाने के  बड़े सटीक माध्यम बन गए है। नियमित छपने वाले राशिफल लगभग समस्त राष्टीय और स्थानिय अखबारों की जरुरत बना दिए गये है।

 हरेक चैनल का अपना एक सिद्ध पुरुष है जिसके पास हर समस्या का हल है। चटकीले कुर्ते और गले में ढेर सारे रुद्राक्ष वाला  यह शख्स किसी की भी कुंडली ' ऑन एयर ' बांच देता है।  कुछ अंतर्यामी टाइप के लोग डायबिटीज दूर करने के लिए हरी चटनी के साथ समोसा खाने का आग्रह करते है , तो कुछ एक विशेष  रंग की किताब से दुखों को मुक्त करने की मार्केटिंग करते है। व्यापार में प्रगति के लिए श्री यन्त्र है तो किसी को अपने प्रेम में गिरफ्त करने के लिए तावीज है , समस्त ग्रहों को महज कुछ रंगीन रत्नो से काबू करने के लिए अंगूठियों का संसार भी है। यह सब उस टेलीविज़न पर हो रहा है जिस पर Discovery और National geographic देख कर जीवन में तार्किकता के साथ अंधविश्वास को नकारा जा सकता है।
परालौकिक शक्तियों से संवाद करने का दावा करने वाले ये मध्यस्थ आम जीवन में ही नहीं वरन राजनीति के गलियारों और फ़िल्मी दुनियां में भी अपनी जड़े गहरे जमाये हुए  है। धीरेंद्र ब्रह्मचारी , चंद्रा  स्वामी , का जलाल सभी को याद होगा। महा नायक अमिताभ भी इनके  प्रभाव से बच नहीं  सके , जबकि एक  समय अपनी फिल्मों ' जादूगर '  और  ' शान ' में उन्होंने इस पाखंड की डट कर खिल्ली उड़ाई थी। यह विडम्बना ही है कि फिल्मों और टेलीविज़न के सब्जेक्ट आधुनिक होते है पर उन्हें बनाने वाले लोग ही  ज्यादा अंधविश्वासी होते है ,फिर वे एकता कपूर हो या राजकपूर का घराना या खान तिकड़ी।
चूँकि मीडिया ने पाखण्ड और अंधविश्वास को फैलाने में अहम भूमिका अदा की है तो उसे ही इसकी सफाई के लिए आगे आना होगा। बेहद  सफल फिल्म ' स्पीड ' के खलनायक हॉवर्ड पायने का डॉयलॉग याद रखिये ''  टेलीविज़न भविष्य का हथियार है ''- अगर सम्भाल कर नहीं चलाया तो भस्मासुर साबित होगा


Friday, April 1, 2016

Discovery of India :who is patriot ?

देश में एक मुद्दा क्षितिज पर पहुँचता नहीं उसके पहले नया सतह पर आजाता है। ' भारत माता की जय ' कभी विवादों में घसीटा जाएगा , कल्पना नहीं थी। सोशल मीडिया पर मौजूद भीड़ ने पहले तिल का ताड़ बनाया  , ताड़ को रबड़ बनाया और इस काम में उनकी मदद की  राष्ट्रीय नेताओ ने। यह सब बगैर सोंचे  समझे और जाने कि देशभक्ति से कही अधिक इस नारे में भारतीय होने पर गर्व महसूस किया गया है।
                    गौरतलब है कि 1946 में पंडित नेहरू ने अपनी कालजयी पुस्तक Discovery of India प्रकाशित की थी।  भारत के पांच हजार बरस के इतिहास की इससे बेहतर मीमांसा कही और उपलब्ध नहीं है। 1988 में दूरदर्शन की पहल पर संजीदा फिल्मकार श्याम बेनेगल ने इस भव्य पुस्तक पर आधारित धारावाहिक '' भारत एक खोज '' बनाया था। जिन लोगों को इस ग्रंथ को पढ़ने का सौभाग्य मिला है ( हांलाकि यह पुस्तक लगभग  सर्वत्र उपलब्ध है , बस निर्भर करता है कि पढ़ने वाले की रूचि व्यापक है या नहीं ) वे जानते है कि विचारों को दृश्यों में बदलना कितना दुरूह काम है। आज तीन दशकों बाद भी यह धारावाहिक अपने विशाल कैनवास , अभिनेताओं के चयन ( रोशन सेठ , ओम पुरी , इला अरुण , पल्लवी जोशी ) दृश्य संयोजन ( वी के मूर्ति ) और संगीत ( वनराज भाटिया )  के लिए याद किया जाता है। इस धारावाहिक के  पहले  एपिसोड का जिक्र  करना यहां इसलिए जरुरी है कि इस एपिसोड में ' भारत माता की जय ' के बारे में विस्तार से बताया गया था। पंडित नेहरू ( रोशन सेठ ) ग्रामीणों को उर्दू मिश्रित हिंदी में  समझाते है कि भारत माता सिर्फ धरती , खेत , वन , पर्वत नदिया मात्र नहीं है वरन इस सरजमीं पर मौजूद सम्पूर्ण अवाम है  . जब आप भारत माता की जय बोलते है तो तो इसमें शामिल भारत के सभी लोगों की जय बोलते है।
                      अपने मित्रों की सुविधा के लिए इस धारावाहिक की वीडियो लिंक  शेयर कर रहा हु।  हो सकता है आपका इतिहास बोध जाग्रत हो जाए और आप  समस्त  53 एपिसोड देख डाले।
https://youtu.be/-X5iE-hatiw
?

मैडम तुसाद में एक लड़की भीगी भागी सी

'' एक धूप का टुकड़ा हमे थोड़ी देर के लिये उधार दिया गया था " अरुंधति रॉय के बुकर विजेता उपन्यास की यह लाइन मधुबाला के ...