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Saturday, April 28, 2018

एक धागे में बंधी फिल्मे

अमेरिकन फिल्म ' मेमेंटो (2000 ) स्पेनिश फिल्म ' इर्रिवर्सिबल ' ( 2002 ) तमिल फिल्म 'गजनी ' ( 2005 ) हिंदी फिल्म ' गजनी ' (2008 ) में क्या बात कॉमन है ? जिन दर्शकों ने इन चारों फिल्मों को डूबकर  देखा है उनकी स्मृति में तुरंत इस सवाल का जवाब उभर सकता है।  चारो ही फिल्मे एक ही विचार के विस्तार का  परिणाम है। साधारण से विचार में भी अनगिनत अद्रश्य तंतु निकले हुए होते है जिनको थामकर  कई कालजयी रचनाओं का सृजन किया जा सकता है। इस तरह के प्रयासों में समानताए होने के बाद भी उन्हें मौलिक ही  माना जाता है। 
मेटाफ़िज़िक्स दर्शनशास्त्र की शाखा है जो मस्तिष्क में उठने वाले आधारभूत प्रश्नों के जवाब खोजने का प्रयास करती है। किसी अवधारणा की प्रकृति क्या है या मनुष्य के होने , उसके अस्तित्व और यथार्थ ,अनजाने भविष्य  जैसी  गूढ़ और दुरूह  लगने वाली बाधाओं के समाधान प्रस्तुत  करती है। 
अमेरिकन निर्माता निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन ने इस तरह के उबाऊ लगने वाले विषयों पर दिलचस्प और सफल फिल्मे बनाई है। उनकी एक फिल्म ' इन्सेप्शन ' में नायक खलनायक के सपनों में प्रवेशकर षड़यंत्र को रोकता है। नोलन की ही ' मेमेंटो ' का नायक ' एन्डरग्राड  एम्नेसिआ ' से पीड़ित है जिसकी वजह से उसकी  स्मृतियाँ पांच मिनिट से ज्यादा नहीं रह पाती। यह बिमारी उसे एक प्राणघातक चोंट की वजह से लगी है। नोलन ने दर्शको को नायक की मनोस्तिथि बताने के लिए ब्लैक एंड वाइट एव कलर दृश्यों की सीक्वेंस का सहारा लिया था। जब भी उसकी याददाश्त जाती है द्रश्य ब्लैक एंड वाइट में बदल जाता है। इस दौरान वह जो भी कुछ करता है उसे याद नहीं रहता। और यही द्रश्य सबसे  पहले आता है।  मेमेंटो से प्रेरित होकर फ्रेंच डायरेक्टर गॉस्पेर नोए ने अनूठा प्रयोग किया।  उन्होंने मात्र तेरह द्रश्यों की सहायता से क्राइम थ्रिलर ' इर्रिवर्सिबल ' बनाई। यह पूरी फिल्म ही रिवर्स में चलती है। मतलब फिल्म का अंतिम तेरहवाँ  द्रश्य सबसे पहले दिखाया जाता है फिर बारहवा फिर ग्यारवा। यह फिल्म नग्नता , हिंसा और  क्रूरता से भरपूर थी। गॉस्पेर ने कैमरे के साथ भी प्रयोग किया। पूरी फिल्म में कैमरा एक जगह भी स्थिर नहीं रहता वह लगातार घूमता रहता है।  सिर्फ दुष्कर्म के नो मिनिट के सीन में एक ही जगह  ठिठक कर रुक जाता है।जैसे दशहत भरा कोई व्यक्ति टकटकी लगाए अपराध होते देख रहा है। ।  इसी तरह मर्डर के एक मिनिट के  सीन में भौंचक हो ठिठक जाता है। ।यह ऐसी फिल्म है जो हर कोई नहीं देखना चाहेगा।  दोनों ही फिल्मों में पात्रों की भावनाओ  और परिस्तिथियों की वजह से उनकी असहाय स्थिति का बेहतरीन चित्रण है। आम आदमी परिस्तिथिवश किस तरह बदल जाता है यही बात  ये फिल्मे बगैर लाग लपेट के दर्शाती है। तमिल निर्देशक मुरुगदास ने मेमेंटो के नायक की शार्ट टर्म मेमोरी  को प्रेमकहानी में डुबाकर  'गजनी ' बनाई जो बेहद सफल रही। इसे तेलुगु में भी बनाया गया और हिंदी में भी। इन तीनो ही फिल्मों की  नायिका ' असिन ही रही और निर्देशक मुरुगदास रहे। यद्धपि उस दौर में आमिर खान पर आरोप लगे थे कि वे किसी हॉलिवुड फिल्म की नक़ल कर रहे है परन्तु गजनी की सफलता ने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए थे ।
ये सभी फिल्मे इस बात पर फोकस करती है कि हमें अगर भविष्य पूरी तरह ज्ञात हो जाए तो जीवन असहनीय हो जाएगा। जीवन का आनंद उसकी निर्दोष अज्ञानता में ही निहित है। यद्धपि यह सच इन फिल्मों ने बहुत ही हिंसक और क्रूर तरीके से दर्शाया है। 
सुजॉय घोष ने ' इर्रिवर्सिबल ' के राइट्स खरीद कर उसे हिंदी मे अमिताभ बच्चन और तापसी पुन्नू के साथ बनाने की घोषणा की है। 


Friday, October 17, 2014

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, फिर जिंदगानी कहाँ ....

जे आर टोल्किन ने लिखा है '' वे सभी जो नहीं भटकते है गुम  जाते है '' (“Not all those who wander are lost.” ) यात्राओ पर इससे बेहतर टिप्पणी नहीं हो सकती। यात्राऐ शानदार अनुभव है। दिखती ये एकतरफा है परन्तु होती दो तरफ़ा है। अपना शहर छोड़ आप एक अनजान नए वातवरण में कुछ पल गुजारते है। यह बाहरी दुनिया से साक्षात्कार होता है। इन पलों का हिसाब  किताब कही अवचेतन में आरम्भ हो जाता है और यात्रा ख़त्म होने के बाद आपकी अंदर की यात्रा आरम्भ हो जाती है। पहाड़ या प्रकृति या फिर नया शहर आपको अपने दायरे से बाहर निकालता है और अपनी क्षण भंगुरता का अहसास दिलाता है। सुनने में थोड़ी दार्शनिकता लग सकती है परन्तु बाहर जाकर ही हम अपने अंदर जाते है।
                      कुछ वर्षों से इस दुरूह विषय पर हिंदी फिल्मकारों का ध्यान जाने लगा है। हिंदी फिल्मो की नयी पीढ़ी के निर्देशकों में इम्तियाज अली ने इस विषय पर ख़ासा जोर दिया है। उनके पात्र हमेशा यात्रा  पर रहते है और अंत में खुद को पाते है। ' जब वी मेट ' रॉकस्टार ' लव आजकल ' हाईवे , उनके  इस यात्रा जूनून को सही रेखांकित करती है।
                       जावेद अख्तर की प्रतिभाशाली बेटी ने अपनी दूसरी सबसे सफल फिल्म ' जिंदगी ना मिलेगी दोबारा ' में सड़क यात्रा को अपना कथानक बनाया।  इस फिल्म के पात्र एक शहर से दूसरे शहर नहीं वरन एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप की यात्रा करते है। इन पात्रो को अपने मन के बोझ से मुक्ति इस यात्रा के दौरान ही मिलती है।
                       यात्रा सिर्फ व्यक्ति को ही नहीं बदलती , कभी कभी पुरे देश को ही बदल डालती है। लेटिन अमरीकी क्रांतिकारी चे गुवेरा ( Che Guevara ) को भला कौन नहीं जानता। मेडिकल  पढाई ख़त्म करने के बाद चे  अपने एक मित्र के साथ मोटर साइकिल पर भ्रमण के लिए निकलते है और लातिन अमरीकी किसानों की दशा देख द्रवित हो उठते है। 14000 किलोमीटर का यह सफर चे  को बदल देता है और वे अपना डॉक्टर बनने का सपना छोड़ क्रांतिकारी बन जाते है। उनके  इस सफर  के संस्मरणों पर आधारित फिल्म ' मोटर साइकिल डायरीज़ ' 2004 में रिलीज हुई थी।  स्पेनिश भाषा में बनी इस फिल्म ने दुनिया भर के दर्शकों को प्रभावित किया था। इस फिल्म से प्रभावित हो कर आमिर खान ने 2011 में अपनी पत्नी किरण के निर्देशन में ' धोबी घाट ऐ मुंबई डायरी ' का निर्माण किया था।  आमिर पर इस फिल्म का कितना प्रभाव था यह इस बात से पता चलता है कि ' उन्होंने मोटर साइकिल डायरीज़ ' के संगीत निर्देशक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गुस्ताव अल्फ्रेडो सेंताओलाला' को अपनी फिल्म धोबी घाट के लिए अनुबंधित किया था।
                           गांधी का महात्मा बनने का सफर भी उनकी देशभर में की गई यात्राओ का परिणाम है।  दक्षिण अफ्रीका से भारत आने के बाद अगर बापू भारत को समझने के लिए यात्रा नहीं करते तो शायद आज देश की किस्मत कुछ और होती। '' गांधी '' फिल्म के लिए स्वयं रिचर्ड एटनबरो ने बीस साल तक भारत की अनेक यात्राए की और गांधी को एक बार फिर सम्पूर्ण दुनिया से मिलाया।









photo courtesy google images 

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...