Monday, August 15, 2011

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों


भारतीय राष्ट्रीयता के केलेंडर में कुछ ख़ास तारीखों को ' सात '(7 ) के अंक के साथ जुड़ने की विशेष आदत रही है .1757 को हुआ प्लासी का युद्ध भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की सांकेतिक शुरुआत मानी जाती है . इसी तरह 1857 का साल साम्राज्यवाद के खिलाफ हिंसक चुनोती के प्रयास के रूप में याद किया जाता है .इतिहास कभी भी निर्धारित रास्तों पर नहीं चलता उसकी अपनी तासीर होती है . अगर ऐसा ही होता तो भारत को आजादी 1957 में मिलना थी परन्तु वह दस बरस पहले1947 में मिल गई . परन्तु शायद इतिहास को 1957 पर भी अपनी छाप छोड़ना थी . इसलिए महबूब खान ने अपनी कालजयी फिल्म ' मदर इण्डिया' इसी सन में प्रदर्शित की. इस फिल्म का देश भक्ति और राष्ट्रीयता से कुछ लेना देना नहीं था . परन्तु इस फिल्म की बात किये बगैर हम हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम इतिहास को अधुरा छोड़ देते है . फिल्म की कहानी एक किसान की पत्नी के इर्द गिर्द बुनी गई है .देश आजाद होने के साथ ही राधा ( महान नर्गिस ) का विवाह होता है . इस तरह उसकी नियति भी युवा भारत देश के साथ जुड़ जाती है . राधा की सास ने गाँव के साहूकार से उसके विवाह के लिए कर्ज लिया था .परन्तु नियति अपना खेल खेलती है और राधा के पति , सास और छोट बेटे की मौत के साथ राधा पर दुखों का पहाड़ टूट पढता है . कर्ज के जाल में नए जीवन की शुरुआत करने वाली राधा अपना खेत तक खो देती है परन्तु अपना निश्चय नहीं खोती और अपने बेटों को बड़ा करती है . एक दिन एक बेटा साहूकार को मार देता है . राधा अपने खुनी बेटे को महज इसलिए जान से मार देती है कि उसकी नजर में किसी कि जान लेना अनेतिक है , ठीक आदर्शों से भरे युवा देश की तरह . राधा नए देश के आदर्शों के प्रति समर्पित है . फिल्म के अंत में वह गाँव में आने वाली नहर का उदघाटन करती है . सब कुछ खो देने के बाद भी सर्वजन हिताय , सर्वजन सुखाय, भावना के साथ.
देश भक्ति से औत -प्रोत फिल्मों की शुरुआत का सफ़र शुरू होता है चेतन आनंद की ' हकीकत ' से .1962 में चीन से मिली शिकस्त और पंडित नेहरु के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाले समय में चेतन आनंद 1965 में 'हकीकत ' लेकर आये. यह सही मायने में एक 'युद्ध ' फिल्म थी . धर्मेन्द्र इस फिल्म में अपने जीवन के सर्वोत्तम रोल में नजर आये थे . इस फिल्म के लिए कैफ़ी आजमी के रचे गीत ''कर चले हम फ़िदा जान ओ तन साथियों , अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों , को बजाये बगैर आज भी कोई राष्ट्रीय त्यौहार पूर्ण नहीं होता है . यही समय था जब संघर्ष कर रहे मनोज कुमार को दिशा मिली . भगत सिंह के जीवन पर आधारित 'शहीद ' ने उन्हें उंचाई पर ला बैठाया. महेंद्र कपूर की आवाज में '' मेरा रंग दे बसंती चोला '' सुनकर बच्चे और बड़े आज भी जोश से भर जाते है . यही फिल्म थी जिससे प्रेरणा लेकर चालीस बरस बाद राकेश ओम प्रकाश महरा ने आमिर खान को लेकर ' रंग दे बसंती ' बनाई .
अफ़सोस की बात है गुजिश्ता पेंसठ वर्षों में हमारे फिल्मकार महज पंद्रह सोलह फिल्मे ही देश भक्ति पर बना पाए. जबकि इस विषय पर बनी लगभग सभी फिल्मों ने अच्छी कमाई की है .उल्लेखनीय , सरफ़रोश , लगान , स्वदेस ,कारगिल एल ओ सी , पूरब और पश्चिम ,उपकार ,बोर्डर , ग़दर , क्रान्ति , मंगल पांडे , इत्यादि .

Monday, August 8, 2011

क्षितिज पर उभरते दो सितारे !!

''स्लम डॉग मिलिनियर '' से चर्चा में आई भारतीय मूल की अभिनेत्री 'फ्रीडा पिंटो ' के लिए अच्छा समय फिर से शुरू होने के आसार लग रहे है . उनकी ताजा फिल्म 'द राइस ऑफ़ द प्लेनेट्स ऑफ़ एप्स' ' ग्लोबल बॉक्स ऑफिस पर धूम मचाते हुए कमाई के मामले में पहले नंबर पर चल रही है . 2008 में आई 'स्लम डॉग मिलिनियर के बाद फ्रीडा की तीन फिल्मे आई थी परन्तु उनसे उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ था. शारीरिक पैमानों के आधार पर सुन्दरता के शिगूफे छेड़ने वाले अमेरिकन मिडिया में वे अवश्य ही चर्चा में रही थी , परन्तु इस फिल्म में उन्हें गंभीरता से लिया जारहा है . ठीक इसी तरह के हालात फिल्म के नायक जेम्स फ्रेंको के साथ गुजरे है .'' स्पाइडर मेन'' फिल्मों में टोबी मेग्वायर की मासूमियत के सामने उनका कद दब सा गया था . स्लम डॉग ...के निर्माता डेनी बोयेल की ''127 अवर '' ने जेम्स को पहली बार अंतर्राष्ट्रीय लोकप्रियता दिलाई है . आत्म कथा पर बनी '127 अवर' में जेम्स ने एक साहसी पर्वतारोही का किरदार बखूबी निभाया है . उल्लेखनीय है कि इस फिल्म का संगीत भी ए. आर . रहमान ने ही बनाया है .



1 .8 करोड़ डॉलर के बजट में बनी फिल्म ने लागत का चार गुना कमाया है . इस छे अकादमी पुरुस्कारों के लिए नामांकित किया गया था .
1958 कि फिल्म का रीमेक ' द राइस ऑफ़ द प्लेनेट्स ऑफ़ एप्स' में जेम्स ने एक दयालु वैज्ञानिक का किरदार जिया है .

Saturday, August 6, 2011

बोलीवुड की समस्या ?

सलमान खान की हिट फिल्मो और सिंघम की शानदार सफलता ने बोलीवुड की हरियाली को विस्तार दिया है . फिल्मों का हिट होना फिल्म इंडस्ट्री के लिए ही नहीं वरन अर्थ -व्यवस्था के लिए भी अच्छा शगुन है . बोलीवुड फिलहाल साठ हजार लोगो को सीधे तौर पर रोजगार देता है . इसमें दक्षिण के सिनेमा उद्योग को और जोड़ दिया जाए तो आंकड़े और ज्यादा लुभावने हो जाते है . यंहा यह और स्पष्ट हो जाना चाहिए कि दक्षिण भारत में देश के उनसाठ प्रतिशत सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर है . प्राइज वाटर कूपर और फिक्की ने अपनी रिपोर्ट में फिल्म उद्योग को 9 .3 प्रतिशत की दर से बढने की धारणा व्यक्त की है , परन्तु बावजूद हालिया फिल्मो की सफलता के - द्रश्य सुहावना नहीं है . बोलीवुड अपने बड़े भाई होलीवुड की तरह नकारात्मक प्रगति दर्ज करा रहा है . यधपि गिरावट चिंतनीय नहीं है .पिछले वर्षों के आंकड़े इस छोटी सी चिंता की सही तस्वीर बयान कर देते है . सन 2009 /10 में फिल्मो के राजस्व में तीन प्रतिशत की कमी आई है . इस दौरान टिकटों की कुल बिक्री 8 .28 करोड़ रही . जबकि इसे 9 करोड़ के आंकड़े को पार कर जाना था . ठीक इसी तरह अकेले अमरीका के सिने दर्शकों के आंकड़े देखे जाए तो वह भी माथे पर शिकन ला दते है . वंहा टिकिटों की बिक्री ने 1 .22 अरब के आंकड़े को छुआ है जो की पिछले वर्ष से आधा प्रतिशत कम है . आर्थिक मंदी ने जंहाँ हरेक वर्ग को अपने प्रभाव में लिया है वही ऐसे भी शेत्र है जो इस प्रभाव से अछूते रहे है . इस अवधि में टेलीविजन ने बारह प्रतिशत , अखबार ने छे प्रतिशत , रेडियों ने ग्यारह प्रतिशत ,और संगीत ने पांच प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है .इन दोनों रिसर्च कंपनियों की रिपोर्ट सावधानी से चिंतन करने को प्रेरित करती है . बोलीवुड को अपना दायरा बढाने के लिए गंभीरता से कदम उठाने होंगे .यह सही है की भारतीय फिल्मे दुनिया भर के देशों में सराही जारही है परन्तु अगल बगल में पकिस्तान और बांगला देश में आज भी प्रतिबंधित है . सोनिया गांधी की हालिया यात्रा के बाद बांगला देश ने जरुर हमारी कुछ फिल्मों को प्रदर्शन की अनुमति दी है . परन्तु यह काफी नहीं है . दोनों देशों में बरसों से पायरेटेड रास्ते से फिल्मे प्रवेश कर रही है . अगर यही प्रवेश सही तरीके से हो तो अच्छे व्यवसाय की उम्मीद की जा सकती है.
बोलीवुड को एक और महत्वपूर्ण बात की और ध्यान देना होगा , जिस तरह रजनीकांत की 'रोबोट' तीन भाषा में रीलिज होकर '3 इडियट' से ज्यादा व्यवसाय कर गई ,

होलीवुड की फिल्मे हिंदी समेत शेत्रिय भाषाओ में डब होकर पहले हफ्ते में ही अपनी लागत निकाल देती है , उसी तरह हिंदी फिल्मो को भी शेत्रिय भाषाओ में डब होकर अपना दायरा बढाना होगा . 3 इडियट , ऐ वेडनेसडे , मुन्नाभाई सीरिज की फिल्मे , आदि आसानी से बोलीवुड को इस क्षेत्र में शुरुआत करने पर प्रेरित कर सकती है .

वो मसीहा आएगा : james bond

जासूसी साहित्य में जो स्थान शेरलॉक होम्स का है सिनेमा के परदे पर वही जगह जेम्स बांड की है। इन दोनों काल्पनिक पात्रों ने लोकप्रियता की वह ऊं...