Monday, October 31, 2011

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खबर है की धारावाहिक 'तमस' [नब्बे के दशक में दूरदर्शन पर बहुत सराहा गया धारावाहिक जो की. देश के बटवारे पर आधारित भीष्म साहनी के  उपन्यास तमस पर आधरित था ] को एडिट कर चार घंटे की फिल्म में समेट कर ६ नवम्बर को प्रदर्शित किया जारहा है . अपने स्वर्णिम काल में दूरदर्शन ने जो यादगार कार्यक्रम दिए थे उनकी तुलना आज किसी भी धारावाहिक या चेनल से नहीं की जा सकती .  श्याम बेनेगल का ''भारत एक खोज '' शरद जोशी का लिखा '' ये जो है जिन्दगी '' विजय तेंदुलकर का ''रजनी '' अपनी कथा वस्तु और स्पस्ट ता के लिए आज भी याद किया जाता है . वर्तमान में टेलीविजन देखने वाली पीढ़ी को नहीं मालुम उन्हें क्या अच्छा नहीं मिला है आज तक . तमस जेसे धारावाहिक का फिल्म के रूप में प्रदर्शित होना सौभाग्य है इस पीढ़ी का . 

सबसे बड़ी बात है तमस में बंटवारे का दर्द  जेसा उपन्यास में महसूस हुआ था वेसा गोविन्द निहलानी ने टी .वी . स्क्रीन पर अनुभव करा दिया था . ऐसा बहुत कम होता है कि निर्देशक लेखक जेसी तीव्रता उत्पन्न करदे .  शब्दों को द्रश्य में बदल देना चमत्कार से कम नहीं है . ''भारत एक खोज '' पंडित जवाहर लाल नेहरु का लिखा ऐसा एतिहासिक दस्तावेज है जिसकी मिसाल दुनिया में कम ही मिलती है . पंडितजी के विचारों को द्रश्य में बदलने का भागीरथी कार्य श्याम बेनेगल ने किया था , जो की आज मूल ग्रन्थ के बराबर ही स्मरणीय है .खुशवंत सिंह के मशहूर उपन्यास ''ट्रेन टू पाकिस्तान '' पर बनी फिल्म कमाल की थी . पढना और देखना - दोनों ही दहला  के रख देता है.मारिओ पूजो के लिखे गोडफादर को  फ्रांसिस फोर्ड कोप्पोला ने जिस खूबी से परदे पर उतारा था उसका चुम्बकीय जादू आज तक कम नहीं हुआ है .
सभी लेखकों की कृतिया सफल फिल्म बन गई हो ऐसा भी नहीं है . कई कालजयी किताबे है जिन्हें उचित बर्ताव नहीं मिला . सबसे उल्लेखनीय स्व. श्रीलाल शुक्ल की लिखी '' राग दरबारी '' है . अस्सी के दशक में इस व्यंग उपन्यास पर बने धारावाहिक को ओम पूरी की मौजूदगी भी सफल नहीं करा सकी थी . अम्रता प्रीतम के देश के बंटवारे पर लिखे उपन्यास ''पिंजर '' को उस समय की सनसनी उर्मिला मार्तोंडकर और चन्द्र प्रकाश दिवेदी का पारस स्पर्श सफल नहीं करा सका था .
शब्दों को आकार देने की चुनोती बहुत कम निर्देशकों ने स्वीकारी है . आज भी भारतीय साहित्य का भण्डार  अच्छे फिल्मकारों की शिद्दत से बाट जो रहा है . 


Tuesday, October 25, 2011

डर बिकता है !! [2]

सन 2008 में राम गोपाल वर्मा '' फूंक '' लेकर आये थे . काले जादू पर आधारित फिल्म का खास चरित्र एक कोवा था . जब भी कोवा स्क्रीन पर नजर आता था दर्शक के बदन में ठंडी लहर दौड़ जाती थी . इस फिल्म ने कमाल का डर  पैदा किया था . हांलाकि फिल्म में सारे आजमाए हुए फार्मूले थे , फिर भी फिल्म अच्छा डर पैदा करने में कामयाब रही थी . यंहा राम गोपाल वर्मा की पूर्व फिल्मों की बात करना जरुरी होगा . 1991 में उन्होंने रेवती को लेकर '' रात '' बनाई थी. इस फिल्म का ओपनिंग सीन ही रीड की हड्डियों में सिहरन लाने के लिए काफी था . फिल्म का नाम रात था परन्तु डर पैदा करने वाले सभी द्रश्य दिन के थे . इस फिल्म में केमरे का काम जबरदस्त था . एक अद्रश्य कलाकार की शक्ल में केमरा नायिका का लगातार पीछा करता चलता है  . आगे चल कर राम गोपाल वर्मा ने अपनी इस खूबी को अपना ' सिग्नेचर ' ही बना लिया. अपराध पर आधारित उनकी अधिकाँश फिल्मो में केमरे के देखने के  एंगल ने फिल्म को ज्यादा आकर्षक बनाया . फिर वो ' अब तक छप्पन  ' हो या कुछ माह पूर्व आई ' नॉट ए लव स्टोरी हो ' . 

Sunday, October 23, 2011

डर बिकता है !!

बिलकुल  सही है. डर खूब बिकता है. हाल ही में अमरीका में रिलीज हुई 'परानोर्मल एक्टिविटी 3 ' ने बॉक्स ऑफिस पर अकूत धन बरसा दिया है  . महज एक हफ्ते में फिल्म ने पचास मिलियन डॉलर की कमाई कर दी है, जबकि फिल्म की लागत मात्र पांच मिलियन डॉलर रही है . अंग्रेजी डरावनी  फिल्मों के  दर्शकों  को विदित होगा कि इस फिल्म के पहले की दोनों फिल्मों क्रमश : परानोर्मल एक्टिविटी 2 , व ''परानोर्मल एक्टिविटी''  (2009)ने भी निर्माता को सोने की खान पर ले जाकर खड़ा कर दिया था .  पहली फिल्म'परानोर्मल एक्टिविटी' के निर्माता और निर्देशक गुमनाम से थे और फिल्म की कास्ट भी अनजान सी थी, मात्र पंद्रह हजार डॉलर में बनी फिल्म ने 193 करोड़ का व्यवसाय किया था . बावीस रातों में घटित घटना क्रम को घर में लगे सी. सी . टी वी . केमरे से दर्ज किया गया था . कहानी कई बार दोहराई हुई थी . पति पत्नी नए मकान में शिफ्ट होते है और पत्नी चाहती की मकान को शुद्ध किया जाए परन्तु पति को इन बातों में विशवास नहीं है . वह उस बुरी आत्मा के खिलाफ बोल -बोल कर आत्मा को क्रोधित कर देता है . आत्मा पत्नी की काया में प्रवेश कर पति को मार देती है और पत्नी को पुलिस . चूँकि कहानी कहने का अंदाज निराला था और दर्शकों को पहली बार केमरे के बजाए सी. सी . टी वी से कहानी सुनाई गई थी, सो दर्शकों का प्रतिसाद तो मिलना ही था . इस फिल्म ने डर के नए प्रतिमान खड़े किये थे . पूरी फिल्म में आत्मा ने कोई डरावनी शक्ल नहीं दिखाई . कमरे में लगे झूमर को हिला कर या फिर खुले दरवाजे को दिवार से टिका देने के अलावा उसने कोई बड़ा काम नहीं किया . और तो और दिल हिला देने वाला संगीत भी इस फिल्म से नदारद था. जेसा की होता आया है , पहले इस फिल्म को एक फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया गया फिर सकारात्मक प्रतिक्रिया आने के बाद थोड़े बहुत सिनेमा घरों में रिलीज किया गया . उडती चिड़िया के पर गिन लेने वाले खांट स्टूडियो मालिकों ने जब इस फिल्म को देखा तो उन्हें इसमें सम्भावना दिखी. मशहूर 'पेरामाउंट पिक्चर्स ' और स्टीवन स्पीलबर्ग की कंपनी' ड्रीम वर्ल्ड' ने इसके अधिकार खरीद कर पूरी दुनिया में प्रदर्शित किया . 

फिल्म की सफलता आज इतिहास का हिस्सा है. और एक ही कथानक पर लगातार तीन फिल्मों का हिट हो जाना बेमिसाल है .

Monday, October 10, 2011

एक अधूरी प्रेम कहानी : अमिताभ .

अपने जन्म दिन से ठीक  दो दिन पहले अमिताभ हनुमान चालीसा का पाठ अपनी आवाज में पेश कर चुके है . एक गुस्सेल यूवक का यूँ आस्था का पुरोधा हो जाना आश्चर्य का विषय नहीं है . अर्श से फर्श पर आकर अमिताभ ने  जीवन के प्रति अपना नजरिया बदला है . के बी सी प्रथम ने जंहा उन्हें अपनी खोई जमीन हांसिल करने में मदद की वंही धर्म के प्रति उनकी धारणा भी बदली . उज्जैन का महाकाल हो या काशी का विश्वनाथ मंदिर या दक्षिण के बालाजी या अजमेर के ख्वाजा, अमिताभ ने कंही भी सर झुकाने से गुरेज नहीं किया है . शायद यही वजह रही है कि कल का लाल आँखों वाला अमिताभ आज विनम्रता की प्रतिकृति बन गए है . 
चार दिन पहले राम गोपाल वर्मा ने एशियन एज अखबार में लिखे अपने लेख में अमिताभ बच्चन की  ढेर सारी खुबिया गिनाते हुए लिखा है कि महानायक का दर्जा उन्हें वैसे ही नहीं मिल गया है. वर्मा विजयवाडा के एक थियेटर का जिक्र करते हुए लिखते है कि उस थियेटर में अमिताभ कि फिल्म ''खुद्दार '' चल रही थी . और हिंदी भाषा से अनजान तेलगु भाषी दर्शक उनकी आँखों से संवाद अदायगी पर तालिया पीट रहे थे . बेहतरीन एक्टर को इससे ज्यादा और क्या चाहिए ?
 यह भी उतना ही सच है की जब भी आप अमिताभ की बात किसी राह चलते दर्शक से करते है तो वह उनकी फिल्मों के डायलोग दोहरा कर सुना देता है या उनके किसी फाईट सीन को विस्तार से बताने लगता है . आप अमिताभ को उनकी फिल्मों के गानों से याद नहीं करते न ही भव्य सेट का जिक्र आता है न ही किसी फोरेन लोकेशन को उनका कद बढाने के लिए याद किया जाता है . अमिताभ मात्र अपनी उपस्थिति  से एक एक फ्रेम को जीवंत बना देते है . ऐसा मेनेरिजम सिर्फ  मर्लिन ब्रांडो के साथ हुआ है . 

दस अक्टोबर रेखा का जन्म दिन हुआ करता है और ग्यारह अक्टोबर अमिताभ का . ये दो तारीखों में महज एक दिन का फासला है, परन्तु आज यह प्रेमी जोड़ा एक दुसरे से एक ही शहर में रहते हुए मीलों के फासले पर है . कुछ प्रेम कहानियों का अंत उनकी शुरुआत में ही तय हो जाता है। जंगली बहती नदी सी रेखा और हिमालयीन अमिताभ का मिलन नहीं होना था ,,,यह बरसों पहले तय हो गया था . परन्तु दोनों पर एक दुसरे का प्रभाव सतह के नीचे  महसूस किया जाता रहेगा .



Saturday, October 8, 2011

हमें आपका इन्तजार है जगजीत सिंह ....

एक मुसाफिर के सफ़र जैसी होती  है दुनिया , कोई जल्दी में है कोई देर से है जाने वाला ...... इस समय जगजीत सिंह नीम बेहोंशी  और मौत के बीच अटकी साँसों के सहारे दिन निकाल रहे है . मखमली आवाज का यूं चुप हो जाना विडम्बना है , मेरे लिए और उन सभी के लिए जिन्होंने अपने दर्द का अक्स उनकी गजलों में देखा है  . होने को तमाम उम्र मरहम लगाने वाली यह  आवाज हमारे साथ रहेगी मगर शायद जगजीत  उस नीम बेहोंशी से  लौट कर वापस नहीं आयेंगे  .
कॉलेज  के दिनों में पहली बार उनका गाया गीत '' होंठों से छु लो तुम.. मेरा गीत अमर करदो ..'' सुना था और पहली बार अपने दिल को धडकते महसूस किया था . समय के साथ जगजीत गाते रहे और हम उनकी गजलों के केसेट्स सहेजते रहे . लता मंगेशकर के साथ उन्होंने ''सजदा '' जारी किया था . मेरे मान से यह संग्रह उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने का सबब था . मेरी कस्बाई मानसिकता के चलते यह धारणा थी कि लता मंगेशकर ने एक गैर फ़िल्मी अल्बम में आवाज देकर जगजीत सिंह की हेसियत को माना है . समय के साथ मेरी इस सोंच में निखार आया और मेने  दोनों के विराट व्यक्तिव के बारे में अपनी धारणा बदली . बहरहाल , '' सजदा '' की सभी गजले आज भी बेमिसाल है . खास कर '' हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी , फिरभी तन्हाइयों का शिकार आदमी , बरसों बाद भी हवा में तैरती सी नजर आती है  . जीवन दर्शन समझने के लिए या तो ढेर सारे ग्रन्थ पढ़ लिए जाए या जगजीत की कोई गजल सुन ली जाए , एक ही बात है .
बरसों पहले मौन हो चुकी चित्रा सिंह आज जगजीत के सिरहाने बेठ कर उनके लौटने का इन्तजार कर रही है . जगजीत की यह ख़ामोशी एक गजल के बाद दूसरी गजल के शुर्रू होने का अंतराल भी हो सकती है या फिर कभी न भरने वाला शुन्य ...... 

मैडम तुसाद में एक लड़की भीगी भागी सी

'' एक धूप का टुकड़ा हमे थोड़ी देर के लिये उधार दिया गया था " अरुंधति रॉय के बुकर विजेता उपन्यास की यह लाइन मधुबाला के ...