Saturday, June 25, 2011

Timeless beauty

सिमी गरेवाल फिलहाल किसी प्रोडक्ट के लिए विज्ञापन नहीं करती है .उम्र को पीछे धकेलने वाले कास्मेटिक के लिए वे बेहतरीन चुनाव हो सकती है . उम्र के जिस मुकाम पर आज वह खड़ी है वह आम तौर पर जीवन की शाम का वक्त कहा जासकता है . जीवन के साठ बसंत देख चुकी सिमी अपने नए टाक शो ''india's most desirable'' से पुनह टेलीविजन पर अवतरित हुई है . अफ़सोस की बात है उनका ताजा शो दर्शकों की अपेक्षा पर इस बार खरा नहीं उतरा है . परन्तु वे आज भी उतनी ही त्ताजगी से भरी है जितनी दस वर्ष पूर्व' rendezvous with simi garewal ' के प्रसारण के वक्त थी .समय की खासियत है कि वह हरेक जीवित प्राणी पर अपने निशाँ छोड़ता जाता है . सौभाग्य से सिमी गरेवाल समय के पंजो से खुद को बचाए हुए है . 'कालातीत ' शब्द शायद ऐसी ही शख्सियतों के लिए बना है .

एक और महिला का जिक्र करना यहाँ जरुरी है . ये है दिवंगत अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की बेटी पेटी डेविस . सिमी गरेवाल की ही तरह इनपर भी गुजिश्ता वक्त का असर नहीं पड़ा है . इन्होने अपनी बात कहने के लिए किताबों का सहारा लिया है . व्यक्तिव विकास पर इनकी लिखी अब तक आठ किताबें प्रकाशित हो चुकी है . सन 1994 में इन्होने'' प्ले बॉय '' पत्रिका में अपने निर्वस्त्र फोटो छपवा कर सनसनी फेला दी थी . सनसनी की वजह सिर्फ यह नहीं थी कि वे अमरीकी राष्ट्रपति कि बिटिया की तस्वीरे है , बल्कि वजह यह थी कि उस समय पेटी डेविस कि उम्र बन्यालिस वर्ष थी . जो की 'प्लेबॉय' की मोडलों की निर्धारित उम्र से दुगनी थी . पेटी का सन्देश था कि बदती उम्र में भी शरीर


को संतुलित रखा जासकता है . जून माह में पेटी ने पुनह धमाका करते हुए अपनी अनाव्रत तस्वीरे इस बार ''मोर मैगज़ीन '' में एक लेख के साथ छपवाई है . इस समय पेटी कि उम्र साठ के करीब है . हांलाकि वे अपनी पुरानी बात पर कायम है परन्तु आज उनका मानना है कि दुनिया में ऐसी कोई कसरत नहीं है जो शरीर में मोजूद जेविक घडी को रोक सके . उनका मानना है कि प्लेबॉय में छपे फोटो और सत्रह साल के अंतराल से मोर मैगज़ीन में छपे फोटो में सिर्फ इतना अंतर आया है कि उनकी कुहनियों कि त्वचा पर उम्र ने असर किया है .

सुन्दरता के लिए लकदक गहनों और मेकअप कि परतों कि जरुरत नहीं होती . कम से कम सिमी , और पेटी को देखकर तो यही महसूस होता है .

Tuesday, June 14, 2011

हिंदी फिल्मो में विदेशी !!!!!!

जो लोग इतिहास पढते है वे जानते है की भारत ने सदियों से विदेशी शासको और आक्रमण कारियों को आकर्षित किया है . भारत के सोने और ज्ञान की तलाश में बरसों से विदेशियों का आना जारी रहा है .मौजूदा दौर निश्चित तौर पर ऐसा नहीं है परन्तु हमारी फिल्म इंडस्ट्री में यह ट्रेंड साफ़ दिखाई देता है . यह भी सच है कि गुणवत्ता के मान से हमारी दो -चार फिल्मे और दो -चार फिल्मकार ही ओस्कर के लेवल तक जा सकते है . कांस फिल्मो के प्रतियोगी खंड तक हमारी फिल्मे पहुच नहीं पाती .(ऐश्वर्या रॉय अवश्य ही बीला-नागा दस साल से भारत का नाम काँस में रोशन कर रही है - वजह उनका एक अंतर्राष्ट्रीय कास्मेटिक ब्रांड के साथ करार होना है ) परन्तु बावजूद इन सबके , विदेशी या विदेशी मूल के भारतीयों को बोलीवूड जबरदस्त लुभाता है . अब एक्टर अपने देश की नागरिकता छोड़े बगेर वर्किंग वीसा के माध्यम से फिल्मो में प्रवेश कर रहे है . इस समय शीर्ष की अभिनेत्रियों में शुमार केटरीना कैफ ब्रिटेन निवासी है . पिछले दस सालों में उन्होंने अपनी अलग पहचान और जगह बना ली है . अब वे अपनी बहनों को लांच करने की तेयारी कर रही है . हांलाकि उनकी हिंदी आज भी माशा -अल्लाह है . परन्तु इससे उनकी सफलता पर कोई असर नहीं पड़ा है .
पड़ोस में रहने वाली लड़की जैसी दीप्ति नवल की पैदाइश यु तो पंजाब की है . परन्तु पदाई के लिए अमरीका जाकर बसने और नागरिकता हासिल करने के बाद जब उन्होंने भारत के बारे में सोंचा तो सबसे पहले उनके जेहन में हिंदी फिल्मे ही आई . कुछ समय के लिए प्रकाश झा से विवाह करने वाली दीप्ति आज 75 फिल्म पुरानी हो चुकी है . सार्थक फिल्मो के लिए याद रखी जाने वाली दीप्ती निर्देशक भी बन गई है . उनकी फिल्म दो आने की धुप चार आने की बारिश प्रदर्शन के लिए तैयार है .
भले ही पाकिस्तान की सरकार और अवाम भारत को पानी पी पी कर कोसे परन्तु वहां के कलाकार भारतीय फिल्मो से जुड़ने का कोई मौका नहीं गंवाते है . अदनान सामी , राहत फ़तेह अली खान , जेबा बख्तियार , वीना मालिक , मीरा , सलमा आगा , साफ़ तौर पर मानते है कि हिंदी फिल्मे शोहरत और दौलत का प्रवेश द्वार है . मुंबई में ठाकरे सल्तनत की नाक के नीचे रहने के बावजूद इन्हें भारतीय फिल्मो का वातावरण उत्साहजनक और प्रेरणा दायक लगता है .

जर्मन बाला क्लाडिया सिसला (बिग बॉस 3 ) चेकोस्लाविया की याना गुप्ता , नोर्वे की निगार खान , और एक समय सैफ अली की बेगम बनते -बनते बची इटली की रोजा केट्लिना, कोई शसक्त पहचान नहीं बना पाई . परन्तु दाल रोटी लायक काम इन्हें आज भी मिल रहा है .(निगार खान को वीसा ख़त्म होने पर नोर्वे भेजा जा चूका है )सिर्फ एक फिल्म में जलवा बिखेर कर अपने मुल्क वापस लौट चुकी अभिनेत्रियों की तादात भी कम नहीं है ,एलिस पेटन-रंग दे बसंती , कायली मिनोग -ब्लू , बारबरा मोरी -काईट , उल्लेखनीय है .
श्रीलंकाई सुंदरी जेक्लिन फर्नांडिस को लम्बी रेस की दावेदार माना जा सकता है . वेसे तो उनके खाते में कोई बड़ी हिट नहीं है परन्तु हाल ही में उन्होंने मर्डर 2हासिल कर भट्ट केम्प में प्रवेश हासिल किया है.
वर्किंग -वीसा पर भारत आने वाले एक्टर एक और रोचक ट्रेंड बना रहे है . फिल्म इंडस्ट्री में इन लोगो की सफलता में महिला कलाकारों का प्रतिशत पुरुषों के बनिस्बत बहुत ज्यादा है . पुरुषों में , कुछ दिन पूर्व दिवंगत हुए बोब क्रिस्टो और नफासत से हिंदी बोलने वाले टॉम अल्टर को छोड़ कर तीसरा नाम याद नहीं आता है .


ऑस्कर की तलाश में न्यूटन

अमूमन हर वर्ष लगभग सितम्बर माह के अंतिम हफ्ते में भारत की और से  ऑस्कर समारोह में हिस्सा लेने के लिए एक भारतीय  भाषाई फिल्म का चयन किया जा...