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Tuesday, July 26, 2011

जिंदगी न मिलेगी दोबारा.

यह सिर्फ संयोग है . ताजा फिल्म '' जिंदगी न मिलेगी दोबारा '' और चेतन भगत के उपन्यास '' वन नाईट एट कॉल सेंटर'' के क्लाइमेक्स में एक समानता है .'' जिंदगी ..........के पात्र अपने जीवन और तनावों से परेशान है है . उन्हें राह मिलती है , जब वे रोमांचक और खतरनाक खेलों का हिस्सा बनते है . मौत और जीवन के मध्य जब चंद साँसों का फासला रह जाता है तब उन्हें अपने डर छोटे लगने लगते है और जिंदगी जरुरी . इसी पल उनकी सोंच बदलती है और वे वह फैसला करते है जिससे आँख चुरा रहेथे . फिल्म क्लासिक की श्रेणी में नहीं जाती है वरन अच्छा मनोरंजन करती है .
इसी तरह चेतन के उपन्यास'' वन नाईट एट कॉल सेंटर'' के छे पात्र (तीन लड़के और तीन लड़कियां ) अपनी अनिश्चित जिंदगी , और टूटते सपनो से परेशान है . एक रात ये लोग अपने काल सेंटर से चंद घंटों के लिए क्वालिस में घुमने निकलते है और अपने को एक निर्माणाधीन बिल्डिंग के बेसमेंट में फंसा पाते है . मोबाइल फोन का नेटवर्क नहीं मिलता , और न ही कोई चीख पुकार सुनकर बचाने आता है . उसी वक्त एक मोबाइल पर' भगवान्' की कॉल आती है . भगवान् उन्हें उनकी कमियों और अच्छाइयों के बारे में बताते है . हरेक पात्र अपने बारे में बताता है और खुद ही अपनी मदद करने का वचन देता है . मौत के मुंह से निकलने के बाद उनकी सोंच और दिशा बदल जाती है .
चेतन के उपन्यास भी 'साहित्यिक ' श्रेणी के नहीं है .परन्तु उनकी भाषा शेली अवश्य ही लुभाती है . यही कारण है की वे इस समय भारत के पहले ' बेस्ट सेलर ' है .
जेसा मेने शुरुआत में कहा दोनों क्लाइमेक्स का एक सामान होना महज संयोग है . '' जिंदगी .... की पटकथा में जोया अख्तर और रीमा कागती की मेहनत को कम करके नहीं आँका जा सकता है .

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

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