''भेड़िये कानून के नियमों का पालन नहीं करते। वे कुछ भी कर गुजर सकते है। भेड़ियों के समाज में किसी बात की पाबंदी नहीं है . भेड़िया नीति तब ही संकट में आती है जब वे पकडे जाते है '' - रिचर्ड केली होस्किन्स
फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध में बहुत से स्याह पहलु अक्सर दबे रह जाते है। इनकी चर्चा भी नहीं होती। पीड़ित शोषित की आप बीती सुनने की फुर्सत कौन निकालेगा भला। आम तौर पर बाहर से देखकर पता नहीं चलता कि कोई सफल व्यक्ति कितने लोगों के हक़ छीन कर शिखर पर पहुंचा है। मेरे एक मित्र( सत्येन ) इन दिनों फिल्म नगरी मुंबई में संघर्षरत है। बहुत अच्छा लिखते है लिहाजा उन्हें टीवी सीरियल के डायलाग लिखने के अवसर भी मिलते रहते है। कलात्मकता के साथ उनमे रचनात्मकता(Artistry with creativity ) भी है जिसकी वजह से उन्हें सेट डिजाइनिंग का मौका भी मिलता रहता है . इस कहानी का सिर्फ यही positive पहलु नहीं है।सत्येन इन दिनों खासे परेशान है। परेशानी की वजह पैसा नहीं है। नाम है। उनसे जो भी काम करवाया जाता है उसका उन्हें पैसा तो मिल जाता है , क्रेडिट नहीं मिलता। उनके लिखे को दूसरे चर्चित लेखक के नाम से पेश कर दिया जाता है। यह समस्या सिर्फ सत्येन की नहीं है न ही अकेले फ़िल्मी दुनिया की है। लगभग हर क्षेत्र में बड़ी मछली छोटी को निगलने की फिराक में है. ताकत की सत्ता में अक्सर प्रतिभाओ का मरण होता रहा है।
यह एक ऐसी लाइलाज बिमारी है जिससे हरेक कोई पीड़ित है। हर कोई इससे छुटकारा पाना चाहता है परन्तु समाधान किसी के पास नहीं है।
कुछ वर्षों पूर्व एक टेलीविजन चैनल ने एक स्टिंग ऑपरेशन '' कास्टिंग काउच '' के खिलाफ किया था। युवा लड़कियों और महिलाओं को फिल्म में एक छोटे से रोल के लिए किस हद तक मजबूर किया जाता है यह बात पहली बार घोषित रूप से सामने आई थी। इस धमाके के बाद इस तरह की घटनाए होना निश्चित रूप से बंद नहीं हुई होगी। जरुरत है आवाज उठाने की। भले ही उससे कुछ हासिल न हो।विरोध तो दर्ज करना ही है। भेड़ियों के पास यह सन्देश जाना जरुरी है कि भेड़ों ने अब सर झुका कर चलना छोड़ दिया है।
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