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Wednesday, June 6, 2018

मुखोटे के पीछे छुपा आदमी

एक ही मिजाज की दो खबरे है। 2016 -17 में रेलवे के आरक्षित डिब्बों में यात्रा करने वाले कुछ यात्री  कम्बल , मग ,तकिया , खिड़की की फ्रेम तक अपने साथ ले गए। इस छुटपुट चोरी से रेलवे को कुल तीन करोड़ रूपये का फटका लगा है। आम धारणा है कि आरक्षण करा कर यात्रा करने वाले लोग पढ़े लिखे और संपन्न होते है। दूसरी कहानी बेहद शिक्षित और उच्च संपन्न वर्ग के लोगों की है जो ' कोबरा पोस्ट 2  ' के स्टिंग ऑपरेशन में बेनकाब हुए।  दोनों ही परिस्तिथियों में पकडे जाने पर  किसी भी पक्ष ने अपनी पृष्ठ्भूमि पर आने वाली आंच की परवाह नहीं की। लालच ने तर्कशील लोगों के विवेक को हर लिया। टी इस लुइस ने कही कहा है ' जब कोई नहीं देख रहा हो तब भी आप संयंत व्यवहार रखते है तो इसे ईमानदारी कहा जा सकता है ' .. शॉपिंग मॉल , ऑफिस और रिहाइशी इलाकों में स्पस्ट नजर आने  वाले बोर्ड के माध्यम से याद दिलाया जाता है कि प्लीज् अपनी हद में रहिये- आप सी सी टी वी की हद में है। भले ही केमेरे चालू अवस्था में न हो परन्तु उनकी चेतावनी आम आदमी पर मनोवैज्ञानिक असर करती है। अक्सर इस प्रश्न को अरसे से तलाशा जा रहा है कि भला आदमी मौका मिलते ही क्यों स्तरहीन हरकत कर गुजरता है ? यहाँ मनोविज्ञान ही इस गुत्थी को समझने सुलझाने में मदद के लिए आगे आता है। मानवीय व्यवहार का अध्ययन करने वाले अधिकाँश चिंतकों ने मनुष्य के व्यक्तित्व को दो रंगो में बांटा है। सफ़ेद व घुसर काला। सफ़ेद रंग व्यक्ति की सरलता , रचनात्मकता , सादगी और ईमानदारी को दर्शाता है वही काला ठीक विपरीत विशेषणों को बताता है। मजबूत इच्छा शक्ति वाले लोग अपने सफ़ेद रंग को बचा लेते है परन्तु थोड़े से भी कमजोर विश्वास वाले घुसर प्रभावों के शिकार बन जाते है। उसने गलत किया तो में भी कर सकता हु ' या सब कानून तोड़ते है तो में क्यों न तोडू ? का भाव अच्छे भले आदमी को छोटा मोटा अपराध करा देता है। यही नहीं भीड़ में यही बात सामूहिकता का रूप लेकर और अधिक विकराल हो जाती है। किसी बड़े  व्यवसायी के टेक्स चोरी , किसी फिल्म स्टार की बदचलनी या किसी नामचीन  खिलाड़ी के नशे की लत के समाचार आम आदमी के अवचेतन में ' ग्लोरिफाइएड ' होकर धधकते लावा की तरह बहते रहते है।  जब भी इसे  रिसाव को मौका मिलता है यह भले आदमी से स्तरहीन आचरण करा देता है। अवचेतन की यह धारा और अधिक  ताकतवर तब हो जाती है जब टीवी स्क्रीन या बड़े परदे की छवियाँ अतृप्त इच्छाओ और आकांशाओ को ' जस्टिफाई ' करने लगती है।  रियलिटी टीवी शो ' बिग बॉस ' की लोकप्रियता का आधार ही उसके प्रतियोगियों का घटिया और स्तरहीन व्यवहार था। इस शो ने साबित किया कि बहुसंख्य दर्शक नकारात्मकता पसंद करते है। और कोई वजह नहीं कि पिछले दो तीन दशकों में  बड़े परदे पर खलनायकों के लिए विशेष भूमिकाए लिखी गई और वे पात्र नायक से ज्यादा  टिकाऊ लोकप्रियता को प्राप्त हुए।  शाकाल ' मोगेम्बो ' गब्बर - नकारात्मकता की खदान के नायब नमूने है। फिल्मों में नायक की लंबी पारी खेल चुके शीर्ष अभिनेताओं में भी ' ग्रे शेड्स ' की भूमिकाओं के लिए खासा रुझान रहा है। 
राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन को एक पटकथा पढ़ने के लिए दी।  संयोग से अमिताभ दिल्ली जा रहे थे।  समय  बिताने के लिए उन्होंने वह पटकथा साथ  रख ली। कहानी इतनी  रोचक थी कि  मुंबई से  दिल्ली के सफर का पता ही नहीं चला। एयरपोर्ट पर उतरते ही बच्चन जी ने  राकेश को फ़ोन लगाया कि वे यह फिल्म कर रहे है।  इस  तरह ' अक्स ' (2001 ) परदे पर आई।  अमिताभ को  इस फिल्म के लिए ' फिल्म फेयर बेस्ट एक्टर ' का अवार्ड मिला। बुरे आदमी ( मनोज बाजपाई ) की आत्मा  अच्छे आदमी के शरीर में प्रवेश कर क्या गुल खिला सकती है इस फिल्म का कथानक था।  
सुदूर अफ़्रीकी जन जातियों में आज भी अपने घर के प्रवेश द्धार पर डरावने मुखोटे टांगने की परंपरा है। आगंतुक को स्मरण कराने के लिए कि वह अपनी बुराई और नकारात्मकता घर के  बाहर ही छोड़ आये। 


Friday, December 29, 2017

कोई देख रहा है !

ताकझांक करना स्वाभाविक मानवीय कमजोरी है। किसी पर नजर रखना रोमांचक होता है। परन्तु दूसरों की जिंदगी में झांकना एक अशिष्ट आचरण माना जाता है। आवरण के पीछे का सच जानना कौतुहल पैदा करता है।  किसी के निजी पलों की तहकीकात करने का स्वभाव लगभग हर तीसरे व्यक्ति की आदत होती है। शिक्षा , संस्कृति ,और भौगोलिक विभिन्नताओं के बावजूद यह मनोविकार हर आयु वर्ग के लोगों में पाया जाता है।  कही थोड़ा - कही ज्यादा। रियलिटी टीवी शोज ने दर्शक के मन में खींची निजता लांघने की लक्ष्मण रेखा को विलीन कर दिया है। यह अब सहज स्वीकार्य संस्कृति बन चुकी है। हिंदी अंग्रेजी के प्रमुख अख़बारों ने एक नए चलन की शुरुआत की है। फ़िल्मी गपशप के साथ ये अखबार अब सेलिब्रिटी के एयरपोर्ट पर आने जाने के फोटो प्रकाशित करने लगे है। सुचना और समाचार का कौनसा उद्देश्य इस निजता के उल्लंघन से सार्थक हो रहा है ? शायद वे ही इसका बेहतर जवाब दे सकते है। लोकप्रिय और प्रसिद्ध व्यक्ति के छुप कर लिए फोटो अखबार के पाठक के अवचेतन में सुप्त पड़े ताका झांकी के भाव को हवा देने का ही काम करते है।  हॉलीवुड ने इस मानवीय कमजोरी को अवसर में बदलने का काम किया है। ताकझांक ने टेलीविज़न और वेबसाइट के पोर्टल्स को एक नए बाजार से परिचित कराया है। अमेरिका का टी एम् जी टीवी चैनल सिर्फ ताकझांक और गॉसिप के बल पर इस विधा का सिरमौर बना हुआ है। पॉप स्टार माइकल जैकसन की मृत्यु की खबर सबसे पहले इसी ने प्रसारित कर दुनिया में हंगामा मचा दिया था। 
1949 में ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने अपने राजनैतिक उपन्यास '1984  ' ( नाइनटीन एटी फोर ) में एक ऐसे देश का व्यंगात्मक वर्णन किया था जहाँ शासक अपनी अवाम की हरेक गतिविधि पर नजर रखता है। शासक को लोग ' बिग ब्रदर ' के नाम से जानते है। देश का कोई भी व्यक्ति अपने तय शुदा व्यवहार से भटकता है तो उसके साथी उसे सचेत करते है '' सावधान ! बिग ब्रदर तुम्हे देख रहा है ' . इस उपन्यास से प्रेरित होकर अमेरिकी टीवी चैनल सी बी एस ने सन 2000 में पहला रियलिटी टीवी शो ' बिग ब्रदर ' प्रसारित किया था। शो के प्रतियोगियों को एक घर में रखा जाता है। इस घर में अखबार , टीवी , इंटरनेट और फ़ोन जैसी सुविधाए नहीं होती। घर के हरेक हिस्से को हाई रिजोलुशन केमेरे की जद में ला दिया जाता है। प्रतियोगियों की समस्त हरकत - चीखना चिल्लाना , गाली , गुस्सा ,साजिश कैमरे पर रेकॉर्ड होती रहती है जिसे बाद में टीवी पर प्रसारित कर दिया जाता है। ' बिग ब्रदर ' सत्रह वर्षों में उन्नीस बार टेलीविज़न पर दिखाया जा चूका है।  इसका 20 वां सीजन 2018 में आरम्भ होगा। बिग ब्रदर की प्रेरणा से भारत में ' बिग बॉस ' अस्तित्व में आया है। बिग बॉस की लोकप्रियता में समय समय पर उतार चढ़ाव आते रहे है। वर्तमान में इसका ग्यारवां सीजन ' कलर टीवी ' पर चल रहा है। मौजूदा समय में ' नकारात्मकता ' की मांग कुछ इस कदर बढ़ रही है कि बिग बॉस को क्षेत्रीय भाषाओ में भी बनाया जा रहा है। यह अकेला ऐसा शो है जहाँ प्रतियोगी जितनी घटिया और निम्न स्तरीय हरकत करते है उतना ज्यादा बिग बॉस की लोकप्रियता में  उछाल आता है !
ताकझांक को केंद्र में रखकर ' मास्टर ऑफ़ सस्पेंस ' अल्फ्रेड हिचकॉक ने एक मास्टरपीस फिल्म ' रियर विंडो ' बनाई थी।  1954 में बनी इस टेक्नीकलर फिल्म का नायक जेफ़ ( जेम्स स्टुअर्ट )  प्रोफेशनल फोटोग्राफर है। एक दुर्घटना में वह अपनी टांग तुड़वा बैठा है। फिलवक्त प्लास्टर बंधा होने से वह अपने अपार्टमेंट में कैद है। जेफ़ की सुंदर प्रेमिका लिसा ( ग्रेस केली ) उससे अक्सर मिलने आती है। जेफ़ खाली वक्त में अपने कैमरे से सामने वाले अपार्टमेंट में ताकझांक करता रहता है। रोज रोज यही करते हुए वह एक अपराध के होने की संभावना भांप लेता है। 1942 में एक जासूसी पत्रिका में छपी इस कहानी ने हिचकॉक को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इसके लेखक को ढूंढकर पंद्रह हजार डॉलर में कहानी खरीद ली। 
'रियर विंडो ' आज भी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 100 फिल्मों में 42 वे क्रम पर आती है। 
भले ही सभ्य समाज में ताका झांकी अब भी निम्न स्तरीय आदत मानी जाती हो परन्तु इस तथ्य को भी स्वीकारना ही पड़ेगा कि इसकी वजह से सिनेमा , साहित्य और टेलीविज़न को एक अनूठा विषय मिला है। 




दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...