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Saturday, February 9, 2019

बेगानी शादी का ऑस्कर


कई दशकों तक हम फिल्मे देखने वालों को ' ऑस्कर ' से लगाव नहीं था।  हम हमारे ' फिल्म फेयर ' से खुश थे। परन्तु 2001 में ' लगान ' का ऑस्कर की विदेशी भाषा श्रेणी में चयन होना हमारी महत्वकांक्षाओ को पंख लगा गया। यद्धपि ' लगान ' पिछड़ गई परन्तु हमारे फिल्मकारों को एक सुनहरा सपना दिखा गई। न सिर्फ फिल्मकार वरन आम दर्शक भी यही चाहने लगा कि लॉस एंजेलेस के कोडक थिएटर के रेड कार्पेट पर भारतीय अभिनेताओं को चहल कदमी करता देखे। इस दिवा स्वप्न के आकार लेने की एकमात्र वजह थी भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्वीकार्यता मिलती देखने की लालसा क्योंकि भारत आज भी हर वर्ष  दुनिया भर में बनने वाली कुल फिल्मों की संख्या की आधी फिल्मे बनाता है। अगर संख्या के आधार पर ही ऑस्कर मिलता तो हम निश्चित रूप से सबसे आगे होते , बदकिस्मती से ऐसा संभव नहीं है। 
हमारे लिए यह जानना जरुरी है कि ' ऑस्कर ' सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी फिल्मों के लिए है। 1929 से आरम्भ हुए इस  फ़िल्मी पुरूस्कार में विदेशी भाषा की फिल्मों को शामिल करने की शुरुआत 1956 में हुई थी।  ठीक इसी के आसपास भारत में फिल्म फेयर अवार्ड्स शुरू हुए थे। 1958 में ' मदर इंडिया ' पहली भारतीय फिल्म बनी जिसे विदेशी भाषा श्रेणी में पुरुस्कृत होने का गौरव मिला था।  चूँकि नब्बे के दशक के आते आते टेलीविज़न ने सेटेलाइट के जरिये  अपना दायरा फैलाना आरम्भ कर दिया था तो ऑस्कर समारोह का प्रसारण अमरीकी महाद्वीप से निकलकर खुद ब खुद पूरी दुनिया को मोहित करने लगा था। भव्यता , अनूठापन , ताजगी और चकाचौंध से लबरेज यह समारोह दुनिया के साथ भारत को भी अपने आकर्षण में बाँध चूका था। देश में ऑस्कर को लेकर जूनून बढ़ने की एक वजह यह भी थी कि  नब्बे के दशक आते आते ' फिल्म फेयर ' अपनी साख गंवाने लगे थे। नए टीवी चैनल खुद अपने ही अवार्ड्स बांटने लगे थे। प्रतिभा और गुणवत्ता की जगह चमक धमक शीर्ष पर आगई थी। रेवड़ियों की तरह बटने वाले पुरुस्कारों ने फ़िल्मी पुरुस्कारों की विश्वसनीयता को धरातल पर ला दिया था। फिल्म फेयर की साख 1993 में उस समय रसातल में चली गई थी जब स्टेज पर  डिम्पल कपाड़िया ने बगैर लिफाफा खोले अनिल कपूर को बेस्ट एक्टर घोषित कर दिया था जबकि कयास आमिर खान के लगाए जा रहे थे।
   यद्धपि हालात आज भी ज्यादा नहीं बदले है। आज भी इन पुरुस्कारों को इतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जितनी उत्सुकता से ऑस्कर का इंतजार किया जाता है। भारत की और से अभी तक 50  फिल्मे इस समारोह में हिस्सा ले चुकी है। 2019 के लिए भारत की और से भेजी गई असमी भाषा की फिल्म ' विलेज रॉकस्टार ' इस क्रम में इक्क्यावनवी फिल्म थी जो अगले राउंड में जाने के लिए उपयुक्त वोट हासिल न कर सकी और बाहर हो गई। भारत की और से इस श्रेणी में भेजी जाने वाली फिल्मों का चयन भी उनके फ़ाइनल में न पहुँचने की बड़ी वजह रहा है। पक्षपात और अपनों को  उपकृत करने के खेल ने कई अच्छी फिल्मों को ऑस्कर नहीं पहुँचने दिया है। 
ऑस्कर के लिए भारत से भेजी जाने वाली फिल्मों का चयन फिल्म फेडरेशन ऑफ़ इंडिया द्वारा नियुक्त एक स्वतंत्र जूरी करती है जिसमे ग्यारह सदस्य है। यह जूरी कब फिल्मे देखती है और कब उनका चयन करती है यह बहुत बड़ा रहस्य है। क्योंकि फ़िल्मी दुनिया के वरिष्ठ और धाकड़ लोगों को भी ठीक ठीक पता नहीं है कि इस जूरी में कौन कौन लोग है। अतीत में जिस तरह की फिल्मे ऑस्कर के लिए भेजी गई है उससे इस चयन प्रक्रिया पर ही सवाल उठते रहे है। 1996 में इंडियन ' 1998 में ऐश्वर्या अभिनीत ' जींस ' 2007 में ' एकलव्य ' 2012 में ' बर्फी ' जैसे कुछ उदहारण है जो बताते है कि राजनीति और भाई भतीजावाद की भांग यहाँ भी घुली  हुई है। 
आगामी 24 फ़रवरी को जब समारोह पूर्वक ये पुरूस्कार वितरित किये जाएंगे तब हम सिने प्रेमी ' बेगानी शादी ' में ताकझांक करते शख्स की तरह टीवी पर नजरे गढ़ाए आहे भर रहे होंगे। हम और कर भी क्या सकते है ! 

Sunday, March 4, 2018

एक नायिका की मौत का उत्सव मनाता मीडिया

समय से पहले होने वाली किसी की भी मृत्यु प्रायः हमें स्तब्ध कर जाती है। इस देश में क्रिकेट और फिल्मों  के लिए जुनूनी हद तक जूनून है। ये दोनों ही क्षेत्र ऐसे है जिनके नायको की हर गतिविधि  पर अवाम की निगाहें उत्सुकता से जमी रहती है। यहाँ होने वाली सामान्य गतिविधि का भी  कैमरे  की नजर से गुजरना रस्म माना जाता है। सुपर सितारा श्रीदेवी का आकस्मिक अवसान सामान्य घटना नहीं थी। ऐसे में टीवी मीडिया का इस घटना पर टूट पड़ना स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। परन्तु मीडिया ने खबर को इस तरह से ट्रीट किया मानो यह ब्रम्हांड की इकलोती घटना हो। बाथटब में बैठा एंकर या स्टूडियों में बाथरूम के दृश्य कल्पना से परे थे।  श्रीदेवी के अपने सौतेले पुत्र से कैसे सम्बन्ध थे या उनका पुनर्जन्म हो चूका है जैसी खबरे हैडलाइन में आ रही थी। 
आम लोगों की आलोचना में आये समाचार  प्रसारण का यह पहला वाकया नहीं था। समाचार के नाम पर ' भुत  प्रेत ' रावण की लंका ' दो हजार के नोट में लगी माइक्रो चिप ' जैसे एक्सक्लूसिव पर दिन भर ख़बरों का स्क्रॉल चलाने वाला मीडिया आखिर हमें कहाँ ले जाना चाहता है ? जिन लोगों की स्मृति में अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े आतंकी हमले ' ट्विन टावर ' के ध्वस्त होने की यादे बरकरार है उन्हें उस वक्त के अमेरिकी टीवी प्रसारण की क्वालिटी और कंटेंट भी याद होंगे। 9 /11 के नाम से चर्चित इस हादसे ने लगभग तीन हजार जीवन लील लिए थे। उस समय अमेरिकी टीवी चैनलों ने लगातार 48 घंटे तक बगैर एक भी कमर्शियल ब्रेक लिए प्रसारण किया था। किसी भी मृतक का फोटो उसकी राष्ट्रीयता , जाति पर कोई बहस नहीं हुई। किसी भी न्यूज़ रीडर या एंकर ने इस्लाम या मुसलमानों के खिलाफ नफरत का एक शब्द नहीं कहा जबकि घटना के कुछ घंटों बाद ही लादेन का नाम सामने आगया था। यह भी तब जबकि अमेरिकी सरकार  ने उन्हें किसी प्रकार का निर्देश नहीं दिया था। अपने देश और समाज के लिए अमेरिकी टीवी मीडिया की इस जिम्मेदारी की सराहना आज भी की जाती है। विकट  विपरीत परिस्तिथि में मीडिया का शालीन व्यवहार मिसाल बनता है।  अफ़सोस भारतीय मीडिया इस कसौटी पर खरा नहीं उतरा। 
एक दो अपवादों को छोड़ कर फटाफट न्यूज़ और सास बहु के किस्सों और धारावाहिकों की अनर्गल गॉसिप से पटा टीवी शायद ही कभी अपने क्वालिटी कंटेंट पर फोकस करता नजर आया है। अधकचरे ज्ञान से लबरेज रंगी पुती मशीनी एंकर समाचार के नाम पर सनसनी ज्यादा परोसती है। रेडियो के दौर में देवकीनंदन पांडे और बीबीसी के मार्क टूली को सुन चूका दर्शक कैसे इस तरह के अत्याचार को सहन कर रहा है, कल्पना ही की जा सकती है। समाचारों की हैडलाइन के भी प्रायोजक ढूंढ लेने वाले चैनल क्यों नहीं अपने कुछ संवाददाताओं को भारत भ्रमण पर भेज देते ? उन्हें वे खबरे मिलेगी जो इस अविश्वश्नीय भारत के कोने कुचाले में रोज घटती है। जिन्हे कोई  माध्यम नहीं मिल पाता। टीवी को   वे वास्तविक  लोग मिलेगें जो महानगर की आभासी जिंदगी से उलट जीवन की हकीकतों का रोजाना सामना कर रहे है। नैतिकता और सदाचारिता की वे नजीर मिलेगी जो किसी किताब तक अब तक नहीं पहुंची है। 
श्री देवी का यु अचानक चले जाना दुखद है।  हम उनके बारे में जानना चाहते है। हम उनके फोटो देखना चाहते है , उस तरह नहीं जिस तरह दिखाए गए। हम खबर देखना चाहते है  परन्तु उस दिन की यह अकेली खबर नहीं होगी जो दिन रात हमारा पीछा करे। हम चाहेंगे की हमारे न्यूज़ चैनल भी बीबीसी और सीएनएन की तरह गंभीर और व्यापक हो , जो हमें दृश्य के साथ विचार भी दे सके। वाशिंगटन पोस्ट जब हमारे मीडिया के बारे में लिखता है कि ' भारत में एक नायिका के साथ मीडिया की भी मौत हो गई ' या कोई मित्र जब फेसबुक पर स्टेटस डालता है कि ' देश में गिद्ध लुप्त नहीं हुए वे मीडिया में बदल गए है ' तो   यकीन  मानिये बहुत शर्म आती है यह सुन देख कर।

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...