Thursday, March 30, 2017

एक थी अमृता एक थी कमला

 ' माय स्टोरी ' कमला दास की आत्मकथा का नाम है और इस हफ्ते दो फिल्मों की घोषणा हुई है जो इस आत्मकथा पर आधारित है।  अंग्रेजी और मलयालम में बंनने वाली ये फिल्मे कमला दास के जीवन पर बनेगी।  हिंदी पाठकों के लिए कमला दास का नाम जाना पहचाना नहीं है।  अंग्रेजी साहित्य को पसंद करने वाले इस खबर पर उत्साहित हो सकते है। कमला दास मलयालम और अंग्रेजी की शीर्ष लेखिका रही है। उनकी हैसियत का कयास इसी बात से लगाया जा सकता है कि साहित्य अकादमी पुरूस्कार के अलावा उन्हें कई अंतराष्ट्रीय पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया है।  उनकी कविताये एम् पी बोर्ड , सी बी एस इ , और एन सी आर टी, के पाठ्य क्रमो में शामिल है। 
 फिल्मकारों की दिलचस्पी कमला के लेखन में नहीं वरन उनकी निजी जिंदगी में है । । अपनी आत्मकथा में उन्होंने बेबाक  ढंग  से अपने  बारे में लिखा है। महज पंद्रह वर्ष की उम्र में ब्याह दी गई कमला ने स्वीकारा है कि उनके अन्य पुरुषों से भी संबंध थे। 
इसी तरह का एक उदाहरण अमृता प्रीतम का भी है।  पंजाबी की इस ख्यात लेखिका को ज्ञानपीठ पुरूस्कार से सम्मानित किया गया है। अमृता की आत्मकथा ' रसीदी टिकिट ' भी साहित्य और साफगोई का बिरला मोती है। वर्षों तक पेंटर इमरोज के साथ लिव इन रिलेशन में रही अमृता गीतकार साहिर लुधियानवी की भी प्रेमिका रही। यह बात उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में अपनी आत्मकथा में स्वीकारी है। साहिर के लिखे अधिकांश फ़िल्मी गीतों में अमृता की उपस्तिथि को महसूस किया जा सकता है।  अमृता के जीवन पर भी एक फिल्म की घोषणा हो चुकी है। 
कहने को बॉलीवुड में दुनिया की सबसे ज्यादा फिल्मे बनती है परंतु उनका स्तर दोयम दर्जे का ही होता है। बायोपिक या आत्मकथ्य पर बनने वाली फिल्मो में जिस समझदारी और गंभीरता की जरुरत होती है उस तथ्य का बॉलीवुड में सर्वथा अभाव रहा है।  अमृता या कमला अपने समय से आगे जीने वाली लेखिकाएं  थी। इनके चरित्र के साथ पूरा न्याय होना चाहिए। सनसनी और उत्तेजना का आदि हो चूका भारतीय दर्शक इन फिल्मों में वही तलाशेगा जो उसे नहीं तलाशना चाहिए।  

Thursday, March 23, 2017

पाकिस्तानियों को परेशान करने वाले हिंदुस्तानी

भारत पाकिस्तान के रिश्तों में नफरत और महोब्बत साथ चलती है । यह विचित्रता  दुनिया में कही और नहीं पायी जाती । संभवत इस लक्षण की वजह इनका डी एन ए है जो सरहद के दोनों और के लोगों में सामान रूप से पाया जाता है । कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो दोनों और के कलाकारों को एक दूसरे के मुल्क में भरपूर सम्मान और स्नेह  मिला है । तमाम पूर्वाग्रहों के बावजूद गुलाम अली और नुसरत फ़तेह अली को चाव से इस तरफ सुना जाता है । वही लता मंगेशकर और हिंदी फिल्में उस तरफ पसंद की जाती है । 
राजनीतिक मजबूरियों के चलते रिश्तो में  कड़वाहट मुमकिन है परंतु दोनों और ऐसे तत्व भी है जो इस नफरत को हवा देते रहते है। हेडिलबर्ग यूनिवर्सिटी के असिस्टेन्ट प्रोफेसर जुरगेन शफलकमर ने पकिस्तान में रहकर  एक दिलचस्प रिसर्च की है।The Conversation वेब साइट पर छपी उनकी रिसर्च सिद्ध कर देती है की दोनों तरफ की सरकारे कड़वाहट कम करने के कितने ही जतन करले परंतु कभी सफल नहीं होंगी।  उनकी यह रिसर्च गैर साहित्यिक उपन्यासों पर आधारित है। रेलवे स्टेशनों और सड़क किनारे बिकने वाली किताबो या सनसनी फैलाने वाली इन डाइजेस्ट में छपी कहानियों में खलनायक का किरदार आमतौर पर हिन्दू निभाते है। 30 से 50 हजार की संख्या में छपने वाली ये किताबे पाकिस्तान के सभी प्रमुख शहरों में पढ़ी जाती है।  हॉरर और जासूसी कहानियों से भरी इन किताबों में बुरे काम करने वाले सभी पात्र भारतीय या हिन्दू होते है।  मोहन, शंकर , निशा , महेंद्र आदि नाम के पात्र मुसलमानों का परेशान करते है या जिन्न , भूत चुड़ैल बनकर लोगों को तंग करते है।  इन लोंगो को मारने वाला इस्लाम का नेक फरिश्ता होता है जो अमन और मोहब्बत का पैगाम सारी दुनिया में फैलाता है। 
भारत-पाकिस्तान दोनों के बीच रिश्तों में इतने बड़े उतार चढ़ाव आ चुके है कि इस ' लुगदी साहित्य ' पर चर्चा की गुंजाइश शायद ही कभी आये। नफरत और चरित्र  ह्त्या का सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा।जावेद अख्तर , जगजीत सिंह और गुलजार को सुनने वाले लोग भारतीयों से बिला वजह नफरत करते रहेंगे .  हिंदुस्तानी कभी नहीं जान पाएंगे कि आखिर आम पाकिस्तानी उनसे इतनी दुश्मनी क्यों रखता है ?

Saturday, March 18, 2017

बुरके में लिपस्टिक



' जब खुला आसमान आँगन में झांकता हो तो खिड़कियों पर कितने ही मोटे  परदे लगा दो , उजाला कमरे में प्रवेश कर ही जाएगा '' ऐसी ही हिमाकत भारतीय सेंसर बोर्ड इन दिनों कर रहा है। समाज के सांस्कृतिक उत्थान की जितनी चिंता सेंसर बोर्ड को है उतनी शायद किसी को भी नहीं है। ' हर - हर  मोदी , घर -घर मोदी ' का नारा देने वाले पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड चेयरमैन का पद इस एक नारे की बदौलत मिला है।  तभी से वे हर फिल्म को सर्टिफिकेट देने में विवादों में घिरते आये है। निहलानी साहब का मानना है कि भारतीय संस्कृति का बचाव करना उनकी जिम्मेदारी है , जिसे फिल्मे दूषित कर रही है।  वे इस तथ्य को भूल जाते है कि  ' कामसूत्र ' भारत में ही लिखा गया है और खजुराहों के शिल्प भी हमारे ही किन्ही पूर्वजों के हाथ से ही तराशे गए थे। बावजूद इसके हमारी संस्कृति असहिष्णु रही है। 
पिछले दो सालों में बहुत सी फिल्मों को सेंसर बोर्ड के नश्तर का शिकार होना पड़ा है।  इसमें  ग्लोबल अपील  वाली जेम्स बांड की फिल्म ' स्काई फाल ' भी शामिल है। ' गंगा जल ' अपहरण ' आरक्षण ' और ' राजनीती ' जैसी फिल्मे प्रोड्यूस करने वाले प्रकाश झा की ताजा फिल्म ' लिपस्टिक अंडर माय बुरक़ा ' इन दिनों सेंसर बोर्ड में अटकी पड़ी है। टोक्यो और मुम्बई फिल्म फेस्टिवल में यह फिल्म पुरूस्कार जीत चुकी है और अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराही जा रही है।  भोपाल की चार महिलाओं के जीवन पर आधारित इस फिल्म को निर्देशित भी एक महिला - अलंकृता श्रीवास्तव ने किया है।  स्क्रीनिंग कमेटी  का मानना है कि फिल्म की विषय वस्तु काफी ' बोल्ड ' है और डायलॉग भी अश्लील है। निहलानी साहब का सोच है कि भारतीय नारी की ' फंतासी ' इतनी उड़ान नहीं भर सकती जितनी इसके पात्र दर्शाते है। गौर करने लायक तथ्य है कि देश के 35 प्रतिशत मोबाइल धारी इंटरनेट से जुड़े हुए है और महज एक ' क्लिक ' से  पोर्न की दुनिया में प्रवेश करने में सक्षम है। यही नहीं , अमेरिकन टेलीविज़न के सर्वाधिक चर्चित टीवी शो ' गेम ऑफ़ थ्रोन ' ब्रेकिंग बेड ' टू एंड हाफ मैन '(सेक्स , हिंसा , नग्नता , से लबरेज ) पाइरेटेड साइट्स पर आसानी से डाउनलोड हो कर देखे जा रहे है।   
इंटरनेट  खुले आसमान से हँमारे घरों में झाँक रहा है और हम ब्रिटिश कालीन सेंसर बोर्ड से संस्कृति की रक्षा कर रहे है। यह डबल स्टैण्डर्ड हमें कहीं नहीं ले जाएगा। 

Thursday, March 9, 2017

एक लेखक की मौत

वेद प्रकाश शर्मा का निधन हो गया। अस्सी के दशक में युवा हुई पीढ़ी इस नाम से भलीभांति परिचित होगी। इंटरनेट से पोषित पीढ़ी के बारे में मै दावे से कुछ नहीं कह सकता। यह पीढ़ी बाल साहित्य ( पराग , नंदन ,इंद्रजाल कॉमिक्स , ) पढ़ कर युवा हुई थी। इन लोगों को पढ़ने की भूख लग चुकी थी जिसे शांत करने की जवाबदारी उस दौर में कस्बे नगरों में मौजूद किराये पर उपन्यास उपलब्ध कराने वाली लाइब्रेरीयो के जिम्मे थी।  जिसे वे बखूबी निभ्रा रही थी। टेलीविज़न नाम का अजूबा अभी कुछ वर्षों की दुरी पर था और टॉकीज़ में लगने वाली फिल्मे महीनो नहीं बदलती थी। उस दौर के युवा जासूसी उपन्यास पढ़ते थे। 
कर्नल रंजीत, सुरेंद्र मोहन पाठक ,जेम्स हेडली चेस ,के जासूसी उपन्यासों  की फेहरिस्त में वेद प्रकाश शर्मा का नाम भी था। होने को गुलशन नंदा भी थे परंतु उनके उपन्यासों का केंद्रीय भाव  ' प्रेम ' होता था। गुलशन नंदा काफी ऊंचाई हासिल कर चुके थे और फिल्मों के लिए भी लिखने लगे थे। राजेश खन्ना के लिए उन्होंने कई फिल्मे लिखी थी।  राजेश खन्ना का मतलब होता था ' भावुक -रुमानियत - आदर्शवादी प्रेम।  ऐसे ही गुलशन नंदा के नावेल थे। 
जासूसी उपन्यासों में शीर्ष पर थे कर्नल रंजीत उसके बाद सुरेंद्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा को पढ़ा जाता था। यह समय दोनों के लिए संघर्ष का था क्योंकि  ' 'इब्ने सफी की जासूसी दुनिया ' कही ज्यादा डिमांड में थी।  सुरेंद्र मोहन पाठक जेम्स हेडली चेस के उपन्यासों का हिंदी अनुवाद कर पहचान बना रहे थे और वेद प्रकाश शर्मा अपनी ' जगत सीरीज ' से पैर  जमा रहे थे।  बहरहाल एक -एक कर वेद प्रकाश शर्मा ने 176 उपन्यासों का संसार रचा।  1986 में उनके उपन्यास ' वर्दी वाला गुंडा ' की पहले ही दिन 15 लाख प्रतियां बिकी थी जो एक रेकॉर्ड है। उनके समस्त उपन्यासों की अब तक आठ करोड़ प्रतियां बिक चुकी है। वेद प्रकाश शर्मा ने भी फिल्मों के लिये लिखा है। अक्षय कुमार की खिलाड़ी नाम से आयी सभी फिल्मे वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों का ही  विस्तार है। 
मेरे  ' पढ़ाकू ' सफर में वेद प्रकाश शर्मा भी  पड़ाव बनकर आये जो  जासूसी कहानियों की ललक में  शरलॉक होम्स और अगाथा क्रिस्टी के बाद आज भी जारी है। उनका अवसान मेरे जैसे लाखों पाठकों के लिए व्यक्तिगत क्षति है। मेरा यह लेख उनके लिए विनम्र आदरांजलि है। 
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Tuesday, March 7, 2017

दानी मुख्यमंत्री ?

इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के निर्यात से समृद्धि के ढेर पर बैठे नए नवेले राज्य तेलंगाना के मुख्य मंत्री इन दिनों अलग वजह से सुर्खियां बटोर रहे है । चंद्रशेखर राव ( उनके मित्र और नजदीकी उन्हें स्नेह से सी के आर पुकारते है ) काफी धार्मिक प्रवृति के इंसान है । उनके धार्मिक होने से किसी को ऐतराज नहीं है । धर्म व्यक्ति की निजी पसंद है ।परंतु अति धार्मिकता में व्यक्ति तार्किक न होकर अंधविश्वासी ज्यादा हो जाता है । यही बात मुख्य मंत्री के साथ हो रही है । तेलंगाना के गठन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद उसका प्रमुख बनने तक सी के आर ने काफी संघर्ष किया है ।उन्हें जो कुछ भी हासिल हुआ उसे वे भगवान् की देन मानते है । और कही कोई गड़बड़ न हो जाए इसलिए चोटी के ज्योतिषियों की राय लेते रहते है । यह विचित्र विरोधाभास है कि जिस हैदराबाद को बिल गेट्स ने भारत की सिलिकॉन वेली कहा था उस राज्य का प्रमुख इस कदर अंधविश्वासी व्यक्ति बना ।सत्ता सँभालते ही उन्हें सलाह दी गई कि उनके सरकारी निवास का वास्तु दोषपूर्ण है , लिहाजा रेकॉर्ड समय में एक विशाल मुख्य मंत्री आवास का निर्माण किया गया । 
भगवान का आभार मानने के लिये सी के आर समय समय पर आंध्र प्रदेश के मंदिरो में मुक्त हस्त से दान देते है । सिर्फ अखबार में छपे आंकड़ों पर विश्वास किया जाय तो यह रकम 11 करोड़ के आस पास बैठती है । इस बात पर भी किसी को आपत्ति नहीं है ।स्वतंत्र देश का नागरिक किसी भी मंदिर या धर्मस्थल को चाहे जितना दान दे सकता है । 
लेकिन आपत्ति है चंद्रशेखर राव की नीयत से । उन्होंने यह समस्त दान सरकारी खजाने से किया है । हाल ही में उन्होंने तिरुपति बालाजी को 5 करोड़ के स्वर्ण आभूषण चढ़ाये । यह रकम भी राज्य सरकार के खाते से भुगतान की गई । सी के आर की भक्ति पर सभी मौन है । वे भी जिन्होंने काले धन के मसले पर आसमान सर पर उठा लिया था । सार्वजनिक सफ़ेद धन के दुरुपयोग का ऐसा विलक्षण उदाहरण शायद ही दूसरा हो । समस्त दलों की चुप्पी भी मज़बूरी दर्शाती है । विरोध में उठने वाली आवाज को नास्तिक और अधार्मिक  मान लिया जायगा ।यह ऐसा जोखिम है जिसे  फिलवक्त कोई भी राजनेतिक दल नहीं लेना चाहेगा ।
सत्तर के दशक में डाकुओ पर बनी फिल्मो  में डाकू लुटे हुए धन को देवी माँ के चरणों में अर्पित करते हुए दर्शाये जाते थे । सी के आर उन्ही के मॉडर्न वर्शन लगते है ।

बाबा मुक्त भारत : एक सपना

भारत  के औसत नागरिकों में  एक बात कॉमन है , अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए बाबाओ की शरण मे जाना । राम रहीम के पतन ने एकाएक दुनिया का ध्य...