Wednesday, May 25, 2011

Osama bin laden movie

वे दिन गए जब सिर्फ अच्छे काम करने से ही नाम होता था . गत दशक में मजबूत होते मिडिया ने जब चाहा तिल का ताड़ बनाया है . जिसे चाहा उसे सर पर बिठा दिया , ब- शर्ते उसमे खबर पैदा करने का माद्दा भर होना चाहिए . इस शर्त को पूरा करने वाला तिनका भी नेशनल लेवल की हस्ती बन जाता है . भारतीय टीम की ''फायनल'' जीत पर निर्वस्त्र होने का एलान करने वाली अनजान सी मोडल पूनम पांडे रातो -रात मशहूर हो गई थी. हांलाकि बाद में वह अपनी बात से पलट गई , परन्तु अपनी प्रसिद्धि की एवज में उन्हें''खतरों के खिलाड़ी '' में मोटी रकम दे कर अनुबंधित कर लिया गया .
अन्तर्रष्ट्रीय मुद्रा कोष के डायरेक्टर न्यूयोर्क की एम्पायेर नामक जिस बिल्डिंग के अपार्टमेन्ट में नजरबन्द है वह इस समय न्यूयोर्क की सबसे ज्यादा देखी जाने वाली जगह में शुमार हो गई है .ग्राउंड जीरो ( जंहा पहले ट्विन टॉवर थे) देखने जाने वाले पर्यटक अब बलात्कारी स्ट्रास काहन का घर देखने के लिए आरहे है . रोजाना पांच हजार से ज्यादा लोग इस बिल्डिंग को देखकर जाते है परन्तु किसी को भी काहन नजर नहीं आते . पर्यटक उनकी चोकसी में रखे गार्ड के साथ ही फोटो खिंचवा कर खुश हो रहे है . डोमिनिक स्ट्रास काहन को दस दिन पहले कोई नहीं जानता था. परन्तु अब वे न्यूयोर्क के टूर गाइड और ट्रेवल एजेंसियों की अतिरिक्त आय का जरिया बन गए है . फ़्रांस के राष्ट्रपति पद की दौड़ में सबसे आगे चल रहे शख्स का यु इस कदर बर्बाद हो जाना फिल्म की कहानी सा लगता है . सच है, अफ़साने कभी कभी हकीकत में उतर आते है .
वास्तविक घटनाओ पर आधारित फिल्मो को हमेशा हाथों हाथ लिया गया है . जेम्स केमरून की 'टाइटेनिक 'हो या ओलिवर स्टोन की ''जे ऍफ़ के ''( जॉन ऍफ़ केनेडी के जीवन पर आधारित ) या हमारे यहाँ की 'नो वन किल्ड जेसिका ' . प्रयोग धर्मी और बंधी बंधाई लिक से अलग हट कर काम करने वाले फिल्मकारों को बॉक्स ऑफिस पुरुस्कृत करता रहा है .
आतंक का पर्याय रहे ओसामा के खात्मे के बाद इस विषय पर फिल्म की घोषणा बिलकुल तय थी . 2010 में अपनी फिल्म ''हर्ट लाकर '' के लिए( बेस्ट डायरेक्टर का ) ओस्कर जीत चुकी केथरीन बिगेलो सन 2008 से इस विषय पर काम कर रही थी .
पत्रकार से स्क्रीन रायटर बने मार्क बोएल और केथरीन बिगेलो इराक के बम निष्क्रिय दस्ते पर फिल्म 'हर्ट लोंकर' बनाकर अपनी शेली और काबलियत का परचम फहरा चुके है . उम्मीद की जानी चाहिए की तोरा बोरा की पहाडियों से अबोताबाद तक का ओसामा का सफ़र इमानदारी से देखने को मिलेगा . कोलंबिया पिक्चर द्वारा फिल्म के वितरण के अधिकार अभी से खरीद लिए जाने से इस बात की तो तस्सली है की 2012में यह फिल्म अवश्य देखने को मिलेगी .

Thursday, May 19, 2011

एक चिंतन ...फुर्सत में !!

सिनेमा हाल में कदम रखते ही गौर करे !! लोग मिलेंगे जो अपने दोस्तों के साथ आये हुए है .ऑफिस में काम करने वाले सहयोगी मिलेगे . किशोर बच्चे मिलेंगे जो अपने ढेर सारे दोस्तों के साथ आये हुए है . यूवा लड़कियों का झुण्ड मिलेगा . प्रेमी जोड़े मिलेंगे . नहीं मिलेगा तो सिर्फ परिवार .........है ना आश्चर्य की बात ? एक समय था जब सिनेमा हाल सिर्फ परिवारों से भरे होते थे . यह द्रश्य अस्सी नब्बे के दशक में आम हुआ करता था . लेकिन जिस रफ़्तार से एकल परिवारों की संख्या बदने लगी है और सामजिक ढांचा बदलने लगा है , लोगों की सोंच और जीवन शेली में जबरदस्त परिवर्तन आया है .
अब जरा परदे पर गौर करे ...फिल्मो के कथानक से परिवार नामक संस्था लुप्त होने लगी है . हर तीसरी -चोथी फिल्म के कथानक में माँ - बाबूजी , पापा , बहन का किरदार नहीं होता है . परिवार होता भी है तो बिखरा सा , अधुरा सा होता है .
देश में सिंगल स्क्रीन सिनेमा घर शोपिंग काम्प्लेक्स में बदलते जा रहे है , मल्टीप्लेक्स बड़ते जारहे है . टिकिट दर आसमान पर जा रही . जितने में तीन लोग बालकनी में बेठा करते थे उतना पैसा पार्किंग वाला ले लेता है ...बावजूद इसके अँधेरे में चुनचुनाती रौशनी का जादू बरकरार है .फिल्मो के समाज शास्त्रीय अध्यन की सख्त दरकार है .

Monday, May 16, 2011

दिल तो बच्चा है

दस बारह साल की उम्र में देखी एक फिल्म ने १३ मई को अपनी रिलीज के चालीस साल पूर्ण किये . फिल्म हे राजेश खन्ना की'' हाथी मेरे साथी ''. इस फिल्म ने उस दौर में रिकार्ड तोड़ सफलता हासिल की थी.

सलीम -जावेद की लिखी यह पहली फिल्म थी .इस फिल्म ने राजेश खन्ना से बड़ा सितारा रामू हाथी को बना दिया था . सही अर्थ में यह बच्चो की फिल्म थी , और कथानक इतना सटीक था की रामू हाथी की मौत पर बच्चो के साथ बड़ो ने भी आंसू बहाए थे . इस फिल्म के कथा तत्त्व का आकलन करने बेठा हु तो बहुत सारी ऐसी बाते नजर आरही है जो दिमाग और दिल दोनों को द्रवित कर रही है . एक अनाथ बच्चे को जानवरों का साथ मिलता है और समय के साथ वे लोग भावनात्मक रूप से इस कदर जुड़ जाते है की एक दुसरे के लिए जान भी देने को तेयार रहते है .
बाल मन कोमल और निस्वार्थ प्रेम से भरा होता है . हमारी उम्र बढने के साथ इन कोमल भावनाओं पर कठोरता हावी होती जाती है और एक समय ऐसा आता है जब याद ही नहीं रहता कि कभी हम भी बच्चे ही थे . यंहा पर फिल्मे अपना काम करती है . फिल्मे हमें याद दिलाती है कि जिन्दगी के मासूम लम्हे हमारे साथ थे और समय उन पर कठोर व्यावहारिकता के साथ जिन्दगी की आप धापी को भी चस्पा करता जा रहा है . हाथी मेरे साथी आदमी ही नहीं वरन जानवरों के प्रति भी स्नेह जगाने का प्रयास करती है.
इसी तरह की एक और फिल्म है जो इस समय धूम मचाये हुए है . यह फिल्म है वाल्ट डिज्नी के बेनर में बनी' टॉय स्टोरी- 3 ' . फिल्म की कथा कल्पना कमाल की है . माना की बोलीवूड की फिल्मो में गुणात्मक सुधार हो रहा है , परन्तु होलीवूड अब भी कही बहुत आगे है- यह बात यह फिल्म पुरजोर ढंग से लागु करती है .एक किशोर कोलेज जाने को हे और और जिन खिलोनो को खेलकर वह बड़ा हुआ है , उन्हें छोड़ कर जाने वाला है . वे इस बात को लेकर उदास . उन्हें इस बात का भी अफ़सोस है की उन्हें या तो ' रि- साइकिल ' कर दिया जाएगा या किसी डे - केयर सेंटर को दान कर दिया जाएगा . ......

खिलोनो में जान नहीं होती . यह हम बड़े जानते है . बच्चे जो इनके साथ खेलते है - उन्हें तो इन में भरपूर जिन्दगी नजर आती है . मासूमियत चेहरे वाले खिलोने बचपन को क्रूर होने से बचाए रखते है . यह बात बड़े होने के काफी बाद समझ आती है .फिल्मे सिर्फ मनोरंजन ही नहीं करती , कतरा , कतरा लुप्त होती संवेदना को संजोय रखने का काम भी करती है .

मैडम तुसाद में एक लड़की भीगी भागी सी

'' एक धूप का टुकड़ा हमे थोड़ी देर के लिये उधार दिया गया था " अरुंधति रॉय के बुकर विजेता उपन्यास की यह लाइन मधुबाला के ...