Tuesday, February 28, 2012

उनका ओस्कर और हम !!

चूँकि  चोरासिवे ओस्कर समारोह बीत चुके है है और उसकी चकाचौंध कुछ दिनों तक दर्शकों के जेहन में तेरती रहेगी , लिहाजा इसी बहाने ओस्कर  पुरुस्कारों की बात करना प्रासंगिक है . लेकिन पहले विदेशी फिल्म श्रेणी के लिए चयन प्रक्रिया समझ ली जाए . क्योंकि यही एक श्रेणी है जहा हमारे लिए गुंजाइश बनती है , वर्ना ओस्कर तो सिर्फ और सिर्फ अमेरिकेन फिल्मों के लिए है . ओस्कर अकादमी द्वारा समस्त फिल्म निर्माण करने वाले देशों को विधिवत निमंत्रण भेजे जाते है . उनसे आग्रह किया जाता है कि 3 ओक्टोबर के पहले अपनी फिल्म की प्रविष्टिया ओस्कर समिति को भेज दे साथ ही फिल्म का उससे पूर्व उस देश में प्रदर्शन जरुरी होता है . ओक्टोबर से लेकर जनवरी तक समस्त भेजी गई फिल्मों को ओस्कर अकादमी के तक़रीबन छे हजार सदस्यों द्वारा देखा जाता है . सर्वश्रेष्ठ पांच  फिल्मों को प्रतियोगिता खंड के लिए भेजा जाता है जिसमे से  सदस्य वोटिंग के माध्यम से एक को चुनते है ..
 इस बरस मात्र तिरसठ देशों ने अपनी फिल्मे ओस्कर के लिए भेजी थी .  भारत की और से मलयालम फिल्म ''अबू  , सन ऑफ़ अडम'' भेजी गई थी परन्तु उसके लिए भारत की और से कोई प्रयास नहीं किये गए . इसलिए यह फिल्म चर्चा में भी नहीं आई और न हीं नामांकन प्राप्त कर सकी . चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता बेमिसाल है . इसका सबसे सुन्दर उदाहरण इरानी फिल्म '' सेपरेशन '' का ओस्कर जीतना है. राजनेतिक स्तर पर अमेरिका और इरान के बीच परमाणु मसले पर तलवार खींची हुई है . ऐसे में दुश्मन देश की फिल्म को सर्वश्रेष्ठ चुनना अकादमी के निष्पक्ष सोच को रेखांकित करता है.  प्रतियोगी देश अपनी फिल्मो के लिए जबरदस्त लोबिंग करते है . इसका भी बस इतना फायदा होता है कि चयन समिति के सदस्यों को फिल्म और कथानक की विस्तार से जानकारी हो जाती है . फिर भी उस फिल्म को वोटिंग से तो गुजरना ही पड़ता  है. हमारे देश के लिए बस एक मात्र उपलब्धि इस बार उधोगपति अनिल अम्बानी का रेड कारपेट पर चलना था . अनिल चूँकि स्टीवन स्पीलबर्ग की कंपनी ड्रीम वर्ल्ड के साझेदार है और ड्रीम वर्ल्ड की तीन फिल्मों को ग्यारह  नामांकन मिले थे लिहाजा किसी भारतीय शक्ल को कोडक थियेटर में देखना लाजमी था . ( इस कंपनी की बनाई एक फिल्म -'' हेल्प''  के लिए सहायक अभिनेत्री  का ओस्कर मिला है )
सोने के पत्रे में ढली साढे तीन किलो की इस  ओस्कर प्रतिमा का अपना जादू है और इसके समारोह की भी अपनी एक शेली है . समारोह में भाग लेने वाले पुरुषों को जेकेट पहनना अनिवार्य है . अगर आप टेक्सिदो पहन कर आते है तो यह आपकी शान के साथ आपकी हेसियत भी जाहिर करता है . महिलाओं के लिए गाउन पहनना अनिवार्य है . इसी तरह के दिशा निर्देश बोल चाल की भाषा के लिए भी तय है .  
 ओस्कर का जादू हमारे देश के फिल्मकारों पर सर चढ़ कर बोलता है . सारी उम्र हिंदी फिल्मो से दाल  रोटी  खाने  वाले  हमारे  फिल्मकार टेलीविजन या सार्वजनिक जगह पर हमेशा  अंग्रेजी  बोलते है. यही नहीं हमारे फ़िल्मी पुरुस्कारों में भी आयातित लाइने ( कृपया ओस्कर की फूहड़ नक़ल पढ़े )  हुबहू  दोहराते नजर आते है ..एंड द अवार्ड गोस टु.... ओसकर ने अपनी मौलिकता बनाई है. हम न जाने कब अपनी पहचान बनायेगे ?






Thursday, February 16, 2012

एक आदमी का अखबार बन जाना

अमिताभ बच्चन इस समय अपनी पेट की सर्जरी को लेकर बम्बई के एक पञ्च सितारा अस्पताल में इलाज करा रहे है . और हमेशा की तरह उनकी दुगनी ताकत से लोटने की 'प्रतीक्षा. में ही नहीं वरन देश भर में बाट जोही जा रही है . यह बात में केवल उनके प्रशंशक की हेसियत से नहीं कह  रहा हूँ , वरन इतिहास गवाह है कि हर मुश्किल दौर के बाद उन्होंने अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है                    
फिर चाहे उनका सर्वकालिक प्रसिद्ध'कुली' वाला एक्सीडेंट रहा हो या गांधी   परिवार  से दूरियाँ बढाने  वाला बोफोर्स   रहा हो . या अर्श से फर्श  पर लाने वाली विश्व सुन्दरी प्रतयोगिता हो. एक समय मीडिया से दुरी बनाने वाले अमिताभ आज स्वयं 'मीडिया' होगये है  . पिछले तीन सालों से उनका ब्लॉग किसी राष्ट्रीय अखबार कि तरह पंद्रह से बीस लाख लोगों द्वारा रोजाना पढ़ा  जा रहा है. यही हाल उनके ट्विटर अकाउंट का है . इस समय दुनिया भर में  तक़रीबन बीस लाख लोग उन्हें  ट्विटर  पर फालो कर रहे है . आंकड़े बता रहे है कि गुजरात में पर्यटन को बढावा देने वाला उनका  विज्ञापन भारत सरकार के ' अतुलनीय इंडिया ' को पीछे छोड़ चूका है . कभी ''आकाश वाणी '' से नकारी उनकी आवाज को आज ' शगुन   ' की तरह सम्मान दिया जा रहा है . खबर है की मलयालम की सुपर हिट मोहनलाल अभिनीत'' प्राणायाम ''  फिल्म के हिंदी रिमेक के लिए  उन्हें अस्पताल में ही अनुबंधित किया गया है . 

Thursday, February 9, 2012

अशोक अमृतराज : टेनिस से फिल्मों के शतक तक .

चेन्नई में जन्मे पूर्व टेनिस खिलाडी अशोक अमृतराज फिलहाल भारत में है . यंहा वे अपनी नई फिल्म'घोस्ट राइडर -स्पिरिट ऑफ़ वेंजेंस ' का प्रचार के लिए आये हुए है . 1980 के दशक में  टेनिस की दुनिया में भारत का नाम चमकाने वाले अमृतराज बंधू आज होलीवूड में भारत का नाम रोशन कर रहे है . आज की तरह उस दौर में भी टेनिस एक अकेला खेल हुआ करता था जहां पैसा बरसता था . उस समय के चोटी के खिलाडी जब जुआं घरों में पैसा लगा रहे थे , अपने लिए द्वीप खरीद रहे थे तब अशोक अमृतराज ने फिल्मों में पैसा लगाया . 1984 से फिल्म प्रोडूसर के रूप में  शुरू उनका सफ़र आज 103 फिल्मों तक आ चूका है . 
अशोक अमृतराज ने 1998 में ऐश्वर्या रॉय को लेकर खुबसूरत फिल्म 'जींस ' (तमिल और हिंदी ) में बनाई थी जिसे आज के 'रोबोट ' फेम शंकर ने निर्देशित  किया था . हांलाकि इस से पूर्व ऐश्वर्या की मणि रत्नम निर्देशित ' इरुवर 'आचुकी थी परन्तु दुनिया भर के  सिनेमा  दर्शकों ने पहली बार उनकी सुन्दरता को 'जींस' के माध्यम से ही जाना था .
गुजरे जमाने में  ''मेंद्रक द मेजिशियन'' (जादूगर मेंद्रक ) और ''द फेंटम'' (वेताल )  पढने वालों .के लिए भी अशोक अमृतराज के पास अच्छी खबर है . दोनों कोमिक्स के पात्रो को हालिया फिल्म के बाद परदे पर  3 डी में उतारा जायेगा .

Friday, February 3, 2012

एक कालजयी फिल्म : पुष्पक


इस बरस होलीवूड में बनी फिल्म ''आर्टिस्ट'' को ओस्कर के लिए  दस श्रेणियों में नामांकित किया गया है. जहाँ इस साल इस मूक फ़िल्म का जलवा है वहीं भारत में बनी मूक फ़िल्म 'पुष्पक' भी इस साल रिलीज़ के 25 साल पूरे कर रही है.फ़िल्म पुष्पक में भले ही डायलॉग ना रहे हों लेकिन फ़िल्म की शुरुआत में दिए जाने वाले टाइटल को भाषा के हिसाब से बदलकर कुल छह भाषाओं में रिलीज़ किया गया.1987 में आई फ़िल्म पुष्पक में कमल हासन ने काम किया था और इस फ़िल्म को सिंगितम श्रीनिवासा राव ने निर्देशित किया था.
आपको ये जानकर हैरानी होगी कि श्रीनिवासा राव को ऐसी फ़िल्म बनाने का विचार नहाते वक्त आया था. ऐसे समय में जब फ़िल्मों में गानों और संवाद का बोलबाला था तो इस तरह की मूक फ़िल्म के बारे में सोचना एकदम अलग सोच थी. और इस सोच को 1987 में राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में संपूर्ण मनोरंजक फ़िल्म का पुरस्कार भी मिला.भले ही फ़िल्म पुष्पक संवादरहित थी लेकिन इस फ़िल्म में स्थिति के हिसाब से बैकग्राउंड साउंड का इस्तेमाल बड़ी ही खूबी से किया गया और फ़िल्म का स्क्रीनप्ले ही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता थी.गाली गलोच और हिंसा के अतिरेक से भरी फिल्मे देखने वाले युवाओं को एक बार इस फिल्म को अवश्य देखना चाहिए. इस तरह की ब्लेक कामेडी मुद्दत से बनती है  
खास बात ये है कि इस फ़िल्म में पहली बार कमल हासन को बिना मूंछों के पेश किया गया था.इस फ़िल्म की यादें अब भी लोगों के ज़ेहन में ताज़ा हैं, ना सिर्फ प्रयोगात्मक फ़िल्म के लिए बल्कि इस फ़िल्म में दिए गए संदेश की वजह से भी कि कैसे ज़िंदगी में शार्टकट से कमाए गए पैसे से आप खुशी नहीं हासिल कर सकते.  आज 25 साल बाद ये फ़िल्म और ज़्यादा सार्थक हो जाती है जब देश में घोटालों की ख़बरें हो और लोग भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे हों. 
महात्मा गांधी पर फिल्म  ''हे राम'' बनाने वाले कमल हासन एक समय गांधी के घोर आलोचक थे . ''हे राम'' उनके शब्दों में बापू से क्षमा याचना थी .

मास्को फिल्मोत्सव में बाहुबली

घर बैठे किसी भी देश को समझने का सबसे आसान तरीका है उस देश का साहित्य पढ़ना या फिल्मे देखना।  आजादी के तुरंत बाद जिस देश ने हमारा ह...