Wednesday, July 29, 2015

SPICY COMEDY :भाभीजी घर पर है

सेंकडो टीवी चैनल और उनमे दर्जनो सिर्फ हास्य पर आधारित।  बावजूद इसके अगर मजेदार हास्य धारावाहिक का नाम तलाशा जाए तो 70 के दशक में पैदा हुई पीढ़ी केवल एक नाम लेगी '' ये जो है जिंदगी '' . शरद जोशी द्वारा लिखित यह कॉमेडी शो भारतीय टेलीविजन इतिहास का सबसे सफल और यादगार धारावाहिक है। इस शो के बाद हजारो धारावाहिक आ कर गुजर गये  परन्तु इसकी ऊंचाई और परिपक्व शालीन हास्य के आस पास भी कोई नहीं पहुँच पाया। विदेशी चैनलों की तर्ज पर कई चैनलों ने अपनी ' मौलिक ' स्टैंड अप कॉमेडी दर्शकों पर थोपी परन्तु उन्होंने बेजान चुटकुलों और फूहड़ता तक ही अपने को सिमित रखा।  और परिणाम यह रहा कि परिवार के साथ बैठकर टेलीविजन देखने वाले दर्शकों ने उनसे हाथ जोड़ लिये।
                     
   इन दिनों एंड टीवी पर दिखाया जा रहा हास्य धारावाहिक '' भाभीजी घर पर है '' लोकप्रियता की पायदान पर तेजी से छलांग भर रहा है।  इस धारावाहिक के  ' कंटेंट ' को हम '' ये जो है जिंदगी '' के साथ तुलना कर देख सकते है। यधपि  '' भाभीजी घर पर है '' का कथानक थोड़ा बोल्ड किस्म का है और इसमें फूहड़ता की गलियों में भटकने की गुंजाईश है , परन्तु इसके निर्माता ने संयम बरतते हुए इसे सिर्फ हास्य तक ही समेट रखा है।  इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि '' तारक मेहता का उल्टा चश्मा '' के पात्र जेठालाल का अपनी शोख पड़ोसन बबीता के प्रति आसक्ति के  भाव का यह विस्तारित रूप है। भाभी जी .... के चारो पात्रो के बीच ' टाइमिंग ' बेमिसाल है।  टाइमिंग किसी भी कॉमेडी की आत्मा होती है।  ' अंगूरी ' के पात्र का अवधी भाषा के साथ खड़ी हिंदी बोलना  और उसमे अंग्रेजी घुसा देना लोटपोट कर देता है। विभूति नारायण जिस तेजी से अपने मनोभाव व्यक्त करते है वह भी चमत्कार से कम नहीं लगता।
                              आम तौर पर सिनेमा और विज्ञापन  को तकनीकी भाषा में ' मिरर इमेज थ्योरी ' से परिभाषित किया जाता है।  जो समाज में है घटता है वही सिनेमा का कथानक बन जाता है या इसके उलट दर्शक जो परदे पर देखता है उसे अपनी जिंदगी में   उतारने लगता है। पिछले दिनों  ' टाइम्स ऑफ़  इंडिया ' ने अपने महानगरो के पाठको के बीच  सर्वेक्षण  के विस्फोटक नतीजे घोषित किये। 50 प्रतिशत से अधिक विवाहित लोगों ने स्वीकार किया की उनके बीच कोई ' तीसरा ' भी मौजूद है। यह बदलता भारत है।  आर्थिक सम्पन्नता के साथ बदलते रिश्ते इस दौर  हकीकत है।
                             बहरहाल ,  सामाजिक  बदलावों को रोका  नहीं जा सकता परन्तु उन पर नजर रखी जा सकती है। भाभीजी यह काम व्यंगात्मक लहजे में कर रहा है। ''' ये जो है जिंदगी'' अगर हास्य का सोलह आना है तो ''भाभीजी घर पर है '' बारह आना है।    

Thursday, July 2, 2015

Sanjay Story :political biopic in india

आत्म कथाओ का अपना आकर्षण है। जब इन कहानियों को फिल्म का कैनवास मिलता है तब किताबों से कही अधिक दर्शक इन्हे मिल जाते है। एक अजीब संयोग हुआ है।  गत सप्ताह एक साथ दो बायोपिक की बाते सुनाई दी है।  भारत की  लोकप्रिय पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके विवादास्पद पुत्र संजय गांधी के जीवन  पर फिल्म बनाने के अधिकार खरीद लिए गए है। फिल्मकार मनीष गुप्ता ने जहां इंदिरा गांधी ( उनके उस दौर में उन्हें मिसेज गांधी के नाम से सम्बोधित किया जाता था ) पर अपनी स्क्रिप्ट तैयार कर सोनिया गांधी को पढ़ने के लिए भेजी है वही ' इकनोमिक टाइम्स ' की खबर कहती है कि सुनील वोहरा ने प्रख्यात पत्रकार विनोद मेहता की दो किताबो के अधिकार ख़रीदे है। पहली है the sanjay story  और दूसरी है ' मीना कुमारी '
 सुनील वोहरा ने विगत में कुछ शानदार फिल्मे दी है।   'गेम्स ऑफ़ वासेपुर  ' ने उन्हें उल्लेखनीय सफलता दिलाई है और अनुराग वासु को स्थापित निर्देशकों में शामिल कराया है ।  2013 में उनकी फिल्म ' शहीद ' ने दो   नेशनल अवार्ड जीते है , लिहाजा संजय गांधी पर बनने वाली फिल्म ज्यादा उत्सुकता जगाती है।
                                 सुनील वोहरा की कंपनी वोहरा ब्रदर्स  टीम ने the sanjay story की स्क्रिप्ट पर काम   आरम्भ कर दिया है। उन सभी लोगों से मुलाक़ात तय की जा रही है जिन लोगों ने संजय गांधी के साथ वक्त गुजारा है। संजय भले ही विवादास्पद रहे परन्तु उनका जीवन  काफी घटना प्रधान रहा है। the sanjay story में विनोद मेहता ने काफी तथ्य उजागर किये है।  संजय की विघवा श्रीमती मेनका गांधी इस फिल्म से असहज हो सकती है। क्योंकि इस पुस्तक में उनके युवा काल का विस्तार से वर्णन किया गया है कि वे किस तरह राजीव और इंदिरा गांधी के सामने धड्ड्ले से सिगरेट पीया करती थी। गर को यह बात फिल्म का हिस्सा बनती है  तो शर्मिंदगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। यही नहीं अम्बिका सोनी , रुकसाना सुल्ताना , विद्याचरण शुक्ल , आदि के भी गुलाबी  दिनों का जिक्र सामने आ सकता है। दिलचस्प होगा यह देखना कि सुनील वोहरा इस फिल्म को कैसे सिल्वर स्क्रीन पर लाते है। 
                                बायोपिक बनाना कभी भी किसी फिल्मकार के लिए आसान नहीं रहा है। रिचर्ड एटनबरो ने बीस साल तक  'गांधी ' फिल्म पर काम किया था तब कही जाकर वे कालजयी फिल्म दे पाये थे। इसी तरह की मेहनत ओलिवर स्टोन को अपनी फिल्म जे ऍफ़ के ( अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन ऍफ़ केनेडी ) के लिए करना पड़ी थी। उपरोक्त दोनों ही फिल्मे आत्म कथा श्रेणी की बेहतरीन फिल्मे मानी जाती है। 
                        ऐसा नहीं है की यह दुरूह काम है। इस तरह के प्रोजेक्ट में अथाह धन और समय लगता है और फिल्मकार का आग्रह व्यावसायिक सफलता का भी होता है जिसके चलते वह उस फिल्म में कुछ काल्पनिकता का भी तड़का लगा देता है। ' भाग मिल्खा भाग ' ( धावक मिल्खा सिंह ) ' पानसिंग तोमर ' बेंडिट क्वीन '( फूलन देवी ) की सफलता इस बात का सुन्दर उदाहरण है।  

ऐश्वर्या का गाउन और कांन्स फिल्म फेस्टिवल

सत्तरवें कांन्स फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत एक सुखद संयोग के साथ हुई। फ्रांस की जनता ने अपना सबसे युवा राष्ट्रपति चुना है - एम्मानुएल मैक्रॉ...