Saturday, December 20, 2014

A Real queen. :रानी की कहानी

एक वास्तविक रानी की कहानी !
I am fond of inspirational stories. I never thought there are so many and are around me too. Mr. Ravi Jain asked me to meet Rani and I got a real life inspiring story. A young lady from rural India, Rani Tanwar is a girl of 17.
She is now preparing for high school examinations. She is so dedicated to her studies that she travels at least 6 km daily to reach school on bicycle. She doesn’t want to be like other Indian girls who get married as soon as they complete their teenage years. Her mother is a homemaker and part time social worker at a village community center. When I met Rani she was learning video games on her brother’s mobile.
ShantiSeva availed Rani with a sewing machine. She is not a professional but stitches well. The sewing machine has generated so many dreams in her bright eyes. She talks about her future. She wants to join a professional institute of fashion and clothing in future. The sewing machine has drawn a road map to her career. Perhaps some day she will have her own label and designer range.

for more story please visit shantiseva.org

. story of chetan. : चेतन की कहानी

इन दिनों में एक अमेरिकन स्वयं सेवी संगठन [ shantiseva . org ] के लिए रियल लाइफ स्टोरीज पर ब्लॉग लिख रहा हूँ।
I had seen Chetan selling peanuts, candy and other eatables on the train between Shujalpur to Bhopal, but never realized his ambitions. A polio victim since the age of five, he cannot stand on his feet. But this obstacle did not deter him from his will to live a respectful life. On some days he travels twice between these two cities to earn his livelihood. This is a practice normally seen on Indian railways.
Finally, I met Chetan and his family in their home. He and his family live in Kishoni, a village 3 km away from Shujalpur. He lives there with his wife, Rekha, who also suffered from polio, but their three year old son Maruti is a cute and healthy baby.
In February, 2014 ShantiSeva granted Chetan a loan of Rs. 15,000 to help him expand his business, which he has done quite successfully.
The monsoon rains have caused business activities to slow down in rural India. Chetan’s business too has suffered, but he is resolute to fight poverty. Although he has no strong leg, he wants to stand on his own feet.

Thursday, December 18, 2014

impact of commercial : विज्ञापन का असर

समय बहुत तेजी से बदल रहा है। बहुत से बदलाव ऐसे होते है जो बदलाव की प्रक्रिया के दौरान नजर नहीं आते। इन पर यकायक ध्यान नहीं जाता। हाथ घडी की सुइयों को भी हम कहाँ चलते हुए देख पाते है। परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है।'' बदलाव'' होने के बाद ही आमतौर पर नजर आता है। सामजिक क्षेत्र में बदलाव की बानगी हमें टेलीविजन के विज्ञापनों में स्पस्ट नजर आती है। बस प्रतीकों को सही ढंग से समझना जरुरी होता है।
2006 के पूर्व गुजरात भ्रमण करने वाले पर्यटकों की सालाना संख्या एक करोड़ थी परन्तु महानायक अमिताभ बच्चन के निमंत्रण '' कुछ दिन तो गुजारों गुजरात में '' के बाद यह संख्या 2013 में दो करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है। होटल और होस्पिटेलिटी सेक्टर को लगभग एक लाख करोड़ का माना गया है जिसमे गुजरात 34 % का सबसे बड़ा हिस्सा देता है। महज एक विज्ञापन ने इतना बड़ा बदलाव किया है।
डिटर्जेंट मार्किट के पुराने खिलाड़ी' निरमा ' के चार साल से चल रहे विज्ञापन को याद कीजिये। कीचड़ में फसी एम्बुलेंस को चार फेशनेबल युवतियां { हेमा , जया , रेखा , सुषमा }धकेल कर बाहर निकाल देती है। तमाशबीन पुरुषो की दुनिया में उनके आत्मनिर्भर होने का उदघोष इससे बेहतर तरीके से नहीं हो सकता।
विज्ञापन की दुनिया के पुरोधा अक्सर ' मिरर थ्योरी ' की बात करते है। विज्ञापन बदलाव ला रहे है या बदलाव की वजह से विज्ञापन अपने को बदल रहे है। बड़ा मुश्किल है किसी नतीजे पर पहुचना। यही इस थ्योरी का सार है। अन्य और उदाहरण भी है। ज्वेलरी के एक विज्ञापन में बीबी खुद को डायमंड गिफ्ट करती है। एक अन्य में एक इन्वेस्टर पति अपना काम छोड़ कर उपन्यास लिख रहा है। हेवल्स के विज्ञापन में कामकाजी पत्नी पति को रोजमर्रा के काम समझा कर ऑफिस के लिए निकल रही है।कहीं भी किसी पर अहसान का भाव नहीं है न ही किसी को निचा दिखाने की कोशिश है। सन्देश स्पस्ट है, ओरतो की इज्जत करो। लैंगिक आधार पर काम का बटवारा गुजरे समय की बात हो रहा है।
बदलाव तो हो रहे है। फिर वे 'टाटा टी ' के आव्हान 'जागो रे!!! ' की वजह से हो रहे हो या 'आईडिया ' के उल्लू मत बनाओ ' की वजह से। क्योंकि 2014 के आम चुनाव में 60 लाख नोटा मतों का पड़ना कोई हलकी फुलकी घटना नहीं मानी जा सकती है।

ऑस्कर की तलाश में न्यूटन

अमूमन हर वर्ष लगभग सितम्बर माह के अंतिम हफ्ते में भारत की और से  ऑस्कर समारोह में हिस्सा लेने के लिए एक भारतीय  भाषाई फिल्म का चयन किया जा...