Thursday, January 15, 2015

I Love Me : क्यों में खुद से प्यार करू

अगर आप समय के साथ नहीं चलते तो समय आपको उठकर इतिहास के हवाले कर देता है। फिर कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप जीवित है या नहीं। साठ के दशक की धड़कन ' साधना ' इस बात का जीवंत उदाहरण है। साधना अपनी छवि से इस कदर प्रेम करने लगी थी कि बढ़ती उम्र की आहट मात्र से वे  अपने शानदार कॅरियर को अलविदा कहकर घर की चार दिवारी में सिमट गई। सफ़ेद बालों और झुर्रियों ने उन्हें इस कदर भयभीत किया कि वे गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर हो गई। आज वे प्रख्यात गायिका आशा भोंसले की किरायेदार बनकर तन्हा जिंदगी जी रही है। उनके पडोसी भी नहीं जानते है कि उनके बगल में कोई भूतपूर्व शिखर सितारा निवास कर रही है।
भारत के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना आत्म मुग्धता के ऐतिहासिक उदाहरण रहेहै। राजेश खन्ना के बारे में कहा जाता था कि वे अपने संघर्ष के दिनों में भी स्पोर्ट्स कार से काम मांगने निर्माताओ के घर जाया करते थे। जब वे सफल हुए तो उन्होंने सफलता को स्थायी लिया था। सफलता के नशे और अपनी छवि के इस कदर मुरीद हुए कि उन्होंने अपनी प्रेमिका , पत्नी और दोस्तों तक को डट कर बेइज्जत किया। नतीजन अपनी मृत्यु तक वे अपने बंगले में अकेले रहते हुए नैराश्य भोगते रहे। उस अतीत में जीते रहे जो बरसों पहले गुजर गया था।
आत्म मुघ्दता मनुष्य का नैसर्गिक स्वभाव है। सभी में इसका कुछ अंश हमेशा मौजूद रहता है। परन्तु समय के साथ बदलते रहना व्यवहारिक सोंच दर्शाता है। अगर आपको समय की दीवार पर लिखी इबारत पढ़ना नहीं आती है तो समझ लीजिये आप भी आत्म मुघ्ध होते जा रहे है।
इस बिमारी से ग्रसित लोगों को दक्षिण के सुपर स्टार रजनीकांत से सीखना चाहिए। रजनी ने कभी अपने फ़िल्मी किरदार को कभी वास्तविक जीवन में हावी नहीं होने दिया। गंजे सिर , सांवला चेहरा , पारम्परिक दक्षिण भारतीय परिधान में अपने प्रशंशको के सामने आने में गुरेज नहीं किया। यही वजह है कि उनके दर्शक उन्हें भगवान की तरह पूजते है।

Monday, January 5, 2015

I Am In Love ...

कुछ दिनों पूर्व देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने राहुल गांधी को नसीहत देते हुए सम्पादकीय लिखा था { step aside rahul }. लेकिन राहुल भला कहाँ किसी की सुनते है। लोकसभा चुनाव से लेकर विधान सभाओ और स्थानीय चुनावो में आये विपरीत परिणामो के बावजूद वे अपने दायरे से बाहर नहीं आये। अकेले राहुल ही नहीं ऐसे बहुत से लोग है जो अपनी बनायी दुनिया को ही दुनिया समझते है।  वे समय को पकड़ने की कोशिश करते है , नतीजन खुद के केरीकेचर बनकर रह जाते है।
राहुल को देखकर देवानंद की याद आती है। उन्होंने मान लिया था कि सदाबहार और जवान है , ऐसा मानने में कोई हर्ज भी नहीं है। लेकिन जब  आप अपनी ही छवि के इश्क में गिरफ्तार जाए और उम्र को थामने की कोशिश करे तो गड़बड़ आरम्भ हो जाती है।
बतौर नायक देव साहब की   अंतिम सुपर हिट फिल्म '' देस परदेस '' थी जो 1978 में  आई  थी। चूँकि देव आनंद अपने को  जवान मान चुके थे लिहाजा धड़ाधड़ फिल्मे प्रोडूस करते रहे  उनमे नायक बनते रहे। दर्शक उन्हें  नकार रहे थे परन्तु उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा था क्योंकि पैसा उनका था नायक बनने से उन्हें कौन रोक सकता था। अपनी मृत्यु तक वे काम करते रहे परन्तु उस सफलता को नहीं दोहरा सके। वे मानसिक रूप से सत्तर के दशक में अटक गए थे।  इस विडम्बंना को नहीं समझ कर उन्होंने अपनी प्रतिभा और माध्यम का नुक्सान ही किया।
अमिताभ बच्चन अपनी पहली पारी की ढलान पर इसी कमजोरी का शिकार हुए थे। ' लाल बादशाह '     '  मृत्युदाता ' में नायक के गेट अप में उन्हें देखकर वितृष्णा होने लगी थी परन्तु आर्थिक हादसों और बेकारी के डर ने उन्हें  'मोहब्बते ' में यह स्वीकार करने  लिए प्रेरित कर दिया कि वे नायक बनने लायक युवा नहीं रहे  है।
                         स्वयं को  प्रेम करने के इस  सिंड्रोम से नायिकाए भी अछूती नहीं  रही है। भारत की पहली सितारा देविका रानी को अपनी मृत्यु तक अहसास नहीं हुआ था कि वे बूढ़ी हो चुकी है।  वे ता उम्र मेकअप की परतों में उम्र का हिसाब छुपाती रही।   [ क्रमश ]  
-----इमेजेस गूगल 

मास्को फिल्मोत्सव में बाहुबली

घर बैठे किसी भी देश को समझने का सबसे आसान तरीका है उस देश का साहित्य पढ़ना या फिल्मे देखना।  आजादी के तुरंत बाद जिस देश ने हमारा ह...