Thursday, November 16, 2017

ऑस्कर की तलाश में न्यूटन

अमूमन हर वर्ष लगभग सितम्बर माह के अंतिम हफ्ते में भारत की और से  ऑस्कर समारोह में हिस्सा लेने के लिए एक भारतीय  भाषाई फिल्म का चयन किया जाता रहा है।  यह पुरूस्कार  समारोह आगामी  मार्च में संपन्न होता रहा है। जैसे जैसे उत्तर भारत का तापमान गिरने लगता है वैसे वैसे देश में ' ऑस्कर ' को लेकर गर्माहट बढ़ने लगती है। प्रबुद्ध  सिने प्रेमी उम्मीद से भरने लगते है कि शायद इस बरस दशकों से चला आरहा ऑस्कर का सूखा ख़त्म हो जाए ! पंद्रह बरस पहले (2002 ) यह सुनहरी ट्रॉफी भारत के हाथ से छिटक गई थी जब ' नो मेन्स लैंड ' ने ' लगान ' को शिकस्त देकर कई सपनो को ध्वस्त कर दिया था। हिंदी और क्षेत्रीय  फिल्मों की दाल रोटी खाने वाला बॉलीवुड हॉलीवुड के  सपने देखना बंद नहीं करता। बात चाहे विज्ञान फंतासियों की हो या फिर मानवीय रिश्तो पर बनी फिल्मों की , बॉलीवुड  अधिकतर  प्रेरणाए आयात करने के ज्यादा पक्ष में रहा है। ऑस्कर के सपनो का रंग इतना गाढ़ा होता कि फ़िल्मी दुनिया की अलसुबह तक चलने वाली पार्टिया हो या पेज थ्री पर दिखने वाली हस्तियां हो इस रंग में सरोबार दिखती है। सिर्फ फ़िल्मी सामग्री के भरोसे चलने वाले टेलीविज़न चैनल अपने तयशुदा कार्यक्रमों को परे रख हॉलीवुड को फोकस में ले आते है। कौनसी तारिका रेड कारपेट पर किस डिज़ाइनर का गाउन पहन कर किस पुरुष मित्र के साथ छटा बिखेरेगी , अमेरिकन और ब्रिटिश सट्टा बाजार किस फिल्म और किस सितारे पर दांव लगा रहे है जैसी अटकलों पर कीमती एयरटाइम खपाने लग जाते है। 
ऑस्कर के लिए बॉलीवुड के जूनून को गैरजरूरी मानकर ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता। यद्धपि ये पुरस्कार  ( विदेशी भाषा श्रेणी को छोड़कर ) सिर्फ और सिर्फ  अमेरिकन फिल्मों के लिए ही है। परन्तु  चकाचौंध और व्यापक प्रसारण के लिहाज से ये वैश्विक दर्जा हासिल कर चुके है। इस बार विदेशी भाषा श्रेणी में 92 देशों की फिल्मे टॉप फोर में आने के लिए संघर्ष करेंगी। जो की एक रिकॉर्ड है। 
इस बार का ऑस्कर समारोह ( क्रम के हिसाब से 90 वां ) भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। हाल ही में पहली बार ऑस्कर अकादमी ने अपने मौजूदा  6688 सदस्यों में भारत के चुनिंदा सितारों और फिल्मकारों को शामिल कर  सम्मानित किया है। आमिर खान , अमिताभ , ऐश्वर्या , प्रियंका , दीपिका , सलमान और इरफ़ान खान ,बुद्धदेब दास  गुप्ता , मृणाल सेन आदि उन भारतीयों में से है जो   इस बार  फिल्मों की सभी  श्रेष्ठ श्रेणियों  के लिए वोट करेंगे। वैसे तीन दशक पहले (1987 ) दक्षिण भारतीय सितारे चिरंजीवी बाकायदा ऑस्कर समारोह में निमंत्रित होने का गौरव हासिल कर चुके है।  
इस वर्ष भारत का प्रतिनिधित्व प्रतिभावान अभिनेता राजकुमार राव की फिल्म ' न्यूटन ' करेगी। 2010 में एकता कपूर निर्मित ' लव सेक्स और धोखा ' से अपने करियर का आगाज करने वाले राजकुमार फिल्म- दर- फिल्म '' कोई पो चे ' (2013 ) ' शाहिद ' (2013 राष्ट्रीय पुरूस्कार ) ' सिटी लाइट '( 2014 ) ' ट्रैप्ड ' ( 2017 )  से अपने अभिनय की विभिन्नताओं की छाप छोड़ते जा रहे है। महज चुनिंदा फिल्मों के सहारे राजकुमार ने दर्शकों में विशेष जगह बना ली है। दर्शकों का एक बड़ा वर्ग सिर्फ उनका नाम देखकर टिकिट खरीदने लगा है। 
' न्यूटन ' टॉप फोर का सफर तय कर पाती है या नहीं इस बात में संशय है। ऑस्कर की हिमालयीन चढाई सिनेमाई गुणवत्ता , वैश्विक अपील और तटस्थ जूरी जैसे सँकरे रास्तो से होकर गुजरती है। एक्सपीरीमेंटल राजकुमार राव का सराहनीय न्यूटन क्या इतनी दूर जा पायेगा ? देखना दिलचस्प होगा। शुभकामनाएं।  

Sunday, November 5, 2017

एक थी पद्मावती

पद्मिनी -यह नाम जेहन में आते ही एक ऐसी राजकुमारी का अक्स दिमाग में बनने लगता है जो बला की सुन्दर थी। उसके बराबर की सुंदरता सिर्फ हेलन ऑफ़ ट्रॉय या मिस्र की क्लिओपेट्रा में ही मिलने की संभावना मानी जाती रही है। यद्धपि इन तीनो ही नारियों को इनकी सुंदरता के साथ इनके बुद्धि कौशल के लिए भी याद किया जाता है। दुनिया को पद्मिनी का पता सबसे पहले मलिक मोहम्मद जायसी के काव्य ग्रन्थ '' पद्मावत ' से मिला था। एक ऐसी सुंदर युवती जिसने अपने और अपने पति के  मान सम्मान के लिए जौहर का रास्ता चुना था। 
इतिहास के गलियारों में पद्मिनी की खोज हमें सन 1303 तक ले जाती है।  इस बरस दिल्ली के सबसे ताकतवर सुल्तान अलाउद्दीन  खिलजी ने चितोड़ पर आक्रमण किया था। अफ़्रीकी यात्री और विद्वान् ' इब्ने बतूता ' ने अपने संस्मरणों में खिलजी का जिक्र करते हुए उसे शानदार सुल्तान के रूप में दर्ज किया है जबकि अन्य समकालीन विद्वानों की राय उनसे जुदा है। भारत का सिलसिलेवार इतिहास लिखने का प्रयास करने वाले स्कॉटिश मूल के ब्रिटिश नागरिक जेम्स टॉड की नजरों में खिलजी एक क्रूर और विस्तार वादी सुलतान था। विंसेंट स्मिथ के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी की दो पत्निया थी जो हमेशा आपस में लड़ा करती थी। दिल्ली पर शासन करने वाले सुलतान का जोर अपनी बीबीयों पर नहीं चलता था। एक अन्य ब्रिटिश लेखक केविन रुश्बी  ने हाल ही अपने शोध ' चैसिंग माउंटेन लाइफ ' में सुल्तान खिलजी को ' रोमांस रहित ' रूखे स्वभाव का ' जोरू का गुलाम ' कह कर चित्रित किया है।  
ताज्जुब की बात है कि खिलजी से राज्याश्रय प्राप्त विख्यात हिंदी और फारसी के कवि आमिर खुसरों ने अपने किसी ग्रन्थ में पद्मावती का कही जिक्र नहीं किया है। खुसरो का लेखन आज हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। खुसरो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भाषा को ' हिंदवी ' नाम दिया था जो कालांतर में हिंदी हुआ। श्रृंगार ,दर्शन और प्रेम की चाशनी में भीगी खुसरो की रुबाइयों में अपने सुलतान की प्रेयसी का जिक्र न होना पद्मावती के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाता है। बहुत से लोगों को इस बात से झटका लग सकता है कि उस दौर के साहित्यकारों और इतिहास लेखकों के ग्रंथों में इस अनुपम सुंदर रानी का कही जिक्र नहीं है। 
पद्मावती एक ऐसी नायिका है जिसका जन्म खिलजी की मृत्यु के दो सौ साल बाद सूफी परंपरा के कवि ' मालिक मोहम्मद जायसी ' के काव्य संग्रह ' पद्मावत ' में हुआ है। प्रेम की साधना का संदेश देते पद्मावत ने एक काल्पनिक नारी का इतना सजीव चित्रण किया की वह हाड़मांस की लगने लगी। सुराहीदार गर्दन , पतली कमर , गुलाबी रंग , अप्रितम सौंदर्य ,जैसे जायसी के  शब्द चित्रों ने जन मानस में कल्पना और हकीकत के बीच की बारीक लकीर को मिटा दिया। पद्मिनी देश के अवचेतन में गहरे उतर ' मिथ ' होने के बावजूद  ऐतिहासिक महिला मान सराही और पूजी  गई।
   ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब पद्मावती को सिनेमा स्क्रीन पर लाया जा रहा है। न ही संजय लीला भंसाली का  यह प्रथम प्रयास है। 2008 में  संजय की महत्वाकांक्षी फिल्म ' सांवरिया ' के फ्लॉप होने के बाद उन्होंने मशहूर फ्रेंच ओपेरा थिएटर दू चेटलेट के लिए अल्बर्ट रोसोले रचित 1923 के बेले ' पद्मावती ' को डायरेक्ट किया था। इस ओपेरा ने संजय की असफलता को धो कर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मंच पर शाबासी दिलवाई थी। सिनेमा के आरंभिक साइलेंट युग में ' पद्मावती ' अंग्रेजी शीर्षक से बनी फिल्म ' फ्लेम ऑफ़ फ़्लैश ' में नजर आई थी दुर्भाग्य से इस फिल्म का प्रिंट अब नष्ट हो चूका है। इस फिल्म के बरसों बाद तमिल सिनेमा के सुपर स्टार ' शिवाजी गणेशन और वैजयंती माला 1963 में बनी ' चित्तूर रानी पद्मावती ' में नजर आये।  इस फिल्म में  वैजयंतीमाला पर फिल्माये दर्जन भर गानो की वजह से कहानी का कचूमर बना दिया था। एक किंवदंती का इतना बुरा चित्रण दर्शकों से बरदाश्त नहीं हुआ और उन्होंने इस फिल्म को शिवाजी गणेशन की लोकप्रियता के बावजूद नकार दिया। 1964 में जयराज , अनीता गुहा , लक्ष्मी छाया , हेलन और सज्जन अभिनीत ' महारानी पद्मावती ' अपेक्षाकृत सफल रही थी।  यह पहली फिल्म थी जिस पर जायसी के ' पद्मावत ' की स्पस्ट छाप थी। आम धारणा के विपरीत इस फिल्म का अंत चौकाने वाला था।  कलिंग युद्ध के बाद जिस तरह अशोक ने प्रायश्चित किया था ठीक उसी तरह अलाउद्दीन खिलजी इस फिल्म में आंसू बहाता नजर आया था। 
पिछली शताब्दियों में ऐसे बहुत से पात्र कथा साहित्य से निकल कर इतिहास की सरहद में प्रवेश कर गए है। अनारकली , जोधाबाई , रानी पद्मावती ऐसे ही नाम है। जनमानस में ये इस कदर पैठ बनाये है कि इन्हे कल्पना कह कर ख़ारिज करना जोखिम का काम है।इन पर बनी फिल्मे सदैव जनचर्चा और विवाद का विषय रही है।  व्यावसायिक फिल्मों में तर्क ढूँढना कोरी कवायद ही मानी जायेगी। निर्देशक अपनी कल्पना को मनचाहा आकाश देने के लिए स्वतंत्र है ,परन्तु उसे अपनी जिम्मेदारियों का भी अहसास होना चाहिए।  कल्पना की दहलीज लांघते चरित्रों का चित्रण परिपक्व मानसिकता और सावधानी की अपेक्षा करता है।यह सुकून की बात है कि  फिल्म को फ्लॉप या फ्लोट करने का आखरी निर्णय दर्शक के हाथ में तो सुरक्षित है ही। 



परछाइयों की आत्मकथा

आत्मकथा - किताबो की एक ऐसी श्रेणी है जिसके तलबगार कम है परंतु कोई आत्मकथा अगर हंगामा बरपा दे तो सभी का ध्यान उसकी और चला जाता हैं । विवाद की एक चिंगारी लेखक और प्रकाशक को मालामाल कर देती हैं । यद्यपि बहुत कम आत्मकथाएँ  इतने नसीब वाली होती है जिन्हें पाठक सर माथे पर बिठाते है अन्यथा वे कब आती है और कब चली जाती है , पता नही चलता । डॉ कलाम या स्टीव जॉब्स ऐसे लोग है जिनके बारे मे लोग हमेशा पढ़ना चाहते है । सफलता के अनजान अंधेरे रास्तो  पर इन किताबो ने कईयों के जीवन मे लाइट हाउस की भूमिका निभाई है । 
सिने प्रेमियों को अभिनेताओं की आत्मकथा सदैव लुभाती है । राजनेताओं की आत्मकथाओं की तरह यह  भी पढ़ने वालों में खासी दिलचस्पी जगातीहै । इन आत्मकथाओं में काफी अनसुना ,अनदेखा मिलने की संभावना बनी रहती हैं । गुजरे समय मे कुछ आत्मकथाओ ने अपने आने से पहले काफी उम्मीद जगायी थी । दिलीप कुमार की उदय तारा नायर लिखित आत्मकथा ' द सब्सटेंस एंड शैडो ' ऐसी ही थी जो ट्रेजेडी किंग के प्रशंसकों को निराश कर गई ।दिलीप कुमार की नायिकाये , समकालीन अभिनेताओं से उनकी होड़ , राजकपूर , देव आनंद से  पेशेवर गैर पेशेवर संबंध। मधुबाला से प्रेम फिर विवाह की मनुहार और अदालत में संबंधों का पटाक्षेप जैसी ढेर सारी  बाते है जो सर्वविदित है परन्तु उनके प्रशंसक उनकी ही जुबानी सुनना चाहते थे लेकिन दिलीप की बहु प्रतीक्षित आत्मकथा से नदारद थी।  फ़िल्म  ' शायद ' से अपने कैरियर की सुरुआत करने वाले ओम पुरी की आत्मकथा उनकी दूसरी पत्नी ने इस विवादास्पद ढंग से लिखी कि इस महान एक्टर को कोर्ट की शरण लेना पड़ी ।  '' द
अनलाइकली हीरो '' नाम से ही आभास दिलाती है कि इस किताब में ओमपुरी के उन लम्हों की दास्तान है जो वे कभी सामने नहीं लाने वाले थे। साल में एक दो बार कोई न कोई पत्रकार अमिताभ बच्चन से पूछ ही बैठता है कि सर आप कब अपने संस्मरण लिख रहे है ? हमेशा की तरह महानायक विनम्र होकर बात घुमा देते है।   सिने प्रेमियों की स्मृति में जुम्मे जुम्मे जगह बनाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी की हालिया आत्मकथा कुछ जल्दी ही आगई । नवाज की स्क्रीन परफॉर्मेंस की जितनी तारीफ की जाए , कम है। इस धुरंधर अभिनेता ने ऋतुपर्णो चटर्जी लिखित अपनी आत्मकथा में अपनी सहाभिनेत्रियो पर इतनी हल्की टिप्पणियों कर दी कि बवाल हो गया । अच्छा एक्टर अच्छा इंसान भी हो इस बात पर प्रश्नचिन्ह लग गया । नवाज की आत्मकथा बाजार से हटा ली गई है । 
मोजूदा दौर व्यक्तित्व के विखंडन का दौर है । जो खरा दिखता है जरूरी नहीं खरा हो भी । बाजार ने नैतिकता की हदें तय कर दी है । दर्शक और सिनेमा के तलबगारों के लिए अपने आदर्श निश्चित करने से पहले तोल मोल करना जरूरी हो गया है।

Thursday, September 7, 2017

बाबा मुक्त भारत : एक सपना

भारत  के औसत नागरिकों में  एक बात कॉमन है , अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए बाबाओ की शरण मे जाना । राम रहीम के पतन ने एकाएक दुनिया का ध्यान यत्रतत्र बिखरे बाबाओ की ओर आकर्षित कर दिया है । अपने शहर से लेकर प्रदेश और देश की राजधानी तक नजर दौड़ाइये , दर्जन भर पॉवरफुल बाबा स्मृति में कौंध जाएंगे । खाये पिये और विपन्न लोगो का हुजूम बाबाओ की बैठक में दिख जाएगा ।
मेरे जैसे कितने ही लोग अक्सर इस सवाल पर उलझ जाते है कि इन लोगों को बनाता कौन है । यह कहना कि ये लोग अनपढ़ लोगों की आस्था का परिणाम है , बाबाओ के टैलेंट का अपमान करने जैसा होगा । पढे लिखे भी भारी संख्या में इनके यहाँ माथा टेकते देखे जा सकते है । इस दौर में साइंटिफिक टेम्पर की बात करना बेमानी है । देश मे एक बड़ा वर्ग यह मान बैठा है कि आसमानी शक्तियों से साक्षात्कार आम आदमी के बस में नही है लेकिन कोई भी तथाकथित सिद्ध पुरुष या माताजी इस काम को बखूबी किसी विशेष दिन अंजाम दे सकते है । किसी भी काल की सरकार के बारे मे गूगल कर लिजिये हरेक प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का एक पसंदीदा बाबा जरूर मिलेगा जिसे इतना राज्याश्रय मिलेगा कि उसकी चुप्पी और हंसी भी सचिवालय में डिस्कस की जावेगी । महत्वपूर्ण निर्णय उसके निकाले हुए शुभमुहूर्त पर ही लिए जाते रहे हैं । फिर चाहे आजादी की घोषणा हो या सेटेलाइट लॉन्चिंग हो । 
टेलीविजन के विस्तार के पहले अखबार साप्ताहिक राशिफल निकाल कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लिया करते थे । यह समय बाबाओ के विकास में बाधक था । परंतु टेलीविजन ने जिस तरह से अपने मोर्निंग स्लॉट में बाबाओ को जगह दी उसे देखकर तो ऐसा लगता है मानो बाबाओ ने चैनलों को खरीद लिया है । आप जिसे भी टॉप थ्री चेनल मानते है उसके सुबह के प्रसारण में  एक न एक बाबा को अंधविश्वास फैलाते हुए अवश्य पाएंगे । चार सौ न्यूज़ चैनल में से दो तिहाई इसी तरह से अपना खर्चा निकाल रहे हैं । शायद बाबा इसी तरह बनते है । कस्बो और शहरों में टीवी की चकाचौंध से दूर अनगिनत बाबा अपनी किस्मत चमका रहे है । जरूरत है सिर्फ गौर से देखने की । फिर किसी दिन कोई आसाराम या रामपाल का कुछ उल्टा सीधा सामने आता है तो सारा मीडिया उसे लानतें देने लगता है । जबकि उसके प्रवचन और कीर्तन टेलीविजन पर देखकर उसकी टीआरपी हमने ही बड़ाई होती है । राम रहीम प्रकरण पर अफसोस करने की जरूरत नहीं है। शिवराज सिंह भी समय समय पर बाबा की मदद लेते रहते है और मोदी भी । खट्टर और अमरिंदर की तरह इन्हें शर्मिंदा न होना पड़े यही दुआ की जा सकती है । जिस तरह अर्थव्यवस्था में कालाधन घुला हुआ है वैसे ही बाबाओ का प्रभाव समाज में रचा बसा है । भारतीय समाज की बाबा मुक्त कल्पना दूर की कौड़ी है । हमे इनके अस्तित्व के साथ जीना सीखना होगा ।

Saturday, August 19, 2017

Return of James Bond !!



काफी समय से चल रही अटकलों पर अंततः विराम लग गया। स्वयं डेनियल क्रैग ने ही इस बात की पुष्टि कर दी है कि जेम्स बांड सीरीज की आगामी ( याने 25 वी ) फिल्म में वे ही जेम्स बांड बनकर लौटेंगे। फिल्म का शीर्षक फिलहाल तय नहीं हुआ है अभी उसे बांड 25 कह कर ही बात की जा रही है। ब्रिटिश थिएटर से अपना कैरियर आरम्भ करने वाले डेनियल क्रैग की यह लगातार पांचवी और अंतिम  फिल्म होगी।  15 अगस्त को जब भारत स्वाधीनता दिवस मना रहा था तब यह ब्रिटिश एक्टर प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपनी फिल्म की रिलीज़ डेट 8 नवंबर 2019 घोषित कर रहे थे।  क्रैग की इस सुचना पर ट्विटर झूम उठा। ब्रिटेन और दुनिया भर के बांड प्रशंसकों ने इस खबर को ' टॉप ट्रेन्डिंग ' बना दिया। ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाली ' जेम्स बांड इंटरनेशनल फैन मैगज़ीन ' के संपादक अजय चौधरी ने इसे फिल्म के प्रोडूयसर इयोन और एम् जी एम् के लिए भरपूर मुनाफे की और बढ़ते कदम बताया। डेनियल क्रैग अभिनीत चारों फिल्मों ने कमाई का रेकॉर्ड बनाया है।  यही वजह है कि जेम्स बांड के लिए अन्य अभिनेताओं पर  दो साल तक विचार करने के बाद  डेनियल के ही नाम पर मोहर लगाना पड़ी।   
जेम्स बांड फिल्मों का दर्शक वर्ग सुदूर अफ्रीका से ऑस्ट्रेलिया तक पाँचों महाद्विपों में फैला हुआ  है। भारत में भी इस काल्पनिक नायक के चहेतों की संख्या लाखों में है। इस पात्र को रचने वाले इयान फ्लेमिंग दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश नौसेना के लिए गुप्तचरी करते थे। युद्ध समाप्ति के बाद उन्होंने ' संडे टाइम्स ' के संवाददाता के रूप में काम करना आरम्भ किया। पत्रकारिता और जासूसी के कॉम्बिनेशन ने उनमे छुपे लेखक को जीवंत कर दिया। अपने दोनों पेशों के अनुभव के आधार पर ' जेम्स बांड ' को केंद्र में रखकर  उन्होंने कहानियां लिखना शुरू किया। फ्लेमिंग के अनुभवों का कैनवास बहुत विशाल था लिहाजा उनका रचा पात्र कई व्यक्तियों का मिश्रण है। वह ताकतवर है , हंसमुख भी , महिलाओ को अपने जाल में फंसाने वाला , ठन्डे दिमाग से ह्त्या करने वाला , नई  तकनीक का जानकार ,मौत को धता बताने वाला . 
 जेम्स बांड एक ब्रिटिश जासूस है जिसकी प्रतिबद्धत्ता अपने देश और अपनी महारानी के प्रति है। इस पात्र को लिखते वक्त फ्लेमिंग को अंदाजा नहीं था कि यह एक दिन ' लार्जर देन लाइफ ' इमेज बना लेगा। सीक्रेट सर्विस की बारीक डिटेल और पत्रकारिता की गहराई के अनुभव ने जेम्स बांड के चरित्र को जासूसों का पर्याय बना दिया है।जेम्स को एक कोड नाम भी दिया गया है ,डबल ओ सेवन।  इयान फ्लेमिंग का लेखकीय सफर महज तेरह  वर्षों (1953 -1966 ) का रहा था । इस अवधि में उन्होंने 14 उपन्यास और कई लघु कथाएँ लिखी। कहानियों की विषय वस्तु इतनी दिलचस्प रही कि लगभग सभी पर फिल्मे बनी। इन फिल्मों ने ' जेम्स बांड ' को कालजयी नायक बना दिया और फिल्मों की एक नयी श्रेणी दी  - बांड मूवी।  समस्त बांड फिल्मो में एक बात बहुत कॉमन है।  वह दुनिया को बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं करता। खतरों से बचकर दुश्मन को नेस्तनाबूत करते हुए वह मसीहा की तरह वापस लौटता है।  
 जेम्स बांड की फिल्मों को ब्रिटिश सिनेमा की  ' रॉल्स रॉयस ' भी कहा जाता है क्योंकि वे उत्कृष्टता की अपनी परंपरा को बरकरार रखे हुए है। फिर कौन भला इतने व्यापक कैनवास की फिल्म से अपने को जोड़ना नहीं चाहेगा ? जेम्स अपनी फिल्म में कई नामी गिरामी ब्रांड्स को अप्रत्यक्ष रूप से प्रमोट कर देता है , घड़ियों से लेकर लक्ज़री कार और शराब से लेकर सूट तक। यह सब इसलिए कि बांड की पिछली फिल्म ने कमाई का एक अरब डॉलर का शिखर छुआ था। भारतीय दर्शकों के लिए डेनियल क्रैग का मेहनताना भी जानना जरुरी है , वे इस बार अपनी फीस डबल ले रहे है। सिर्फ पंद्रह  करोड़ डॉलर !!

Thursday, August 10, 2017

मैडम तुसाद में एक लड़की भीगी भागी सी



'' एक धूप का टुकड़ा हमे थोड़ी देर के लिये उधार दिया गया था " अरुंधति रॉय के बुकर विजेता उपन्यास की यह लाइन मधुबाला के सम्पूर्ण जीवन को परिभाषित करती है । जिस उम्र में लोग अपना कैरियर संवारने का सपना देखते हैं उस उम्र में  सौंदर्य की इस  देवी ने दुनिया को अलविदा कह दिया था । छत्तीस बरस की उम्र इतनी भी ज्यादा नहीं होती कि आप सब को रुलाकर कब्र में जा लेटे । सत्तर फिल्मों का उनका सफर बीस सालों में थम गया था । मेडिकल साइंस ने साठ के दशक तक इतनी तरक्की नही की थी । आज जो सामान्य ऑपरेशन है वह उस समय लाइलाज था । मधुबाला के दिल मे छेद था । बदकिस्मती से एक छेद उनके नसीब में भी था । हिंदुस्तानी सिनेमा के अब तक के इतिहास की सबसे सुंदर इस अभिनेत्री को ' वीनस ऑफ इंडियन सिनेमा ' और ' भारत की मर्लिन मुनरो ' कहा जाता था । परंतु सौंदर्य मलिका प्रेम के मामले में कंगाल थी । कहने को वे आधुनिक शहर मुंबई में रहती थी परंतु पारिवारिक माहौल सोहलवीं सदी का था ।सितारा हैसियत होने के बाद भी उन्हें पार्टियों में जाने की इजाजत नहीं थी । उनके पिता उनकी और दिलीप कुमार की शादी के लिए कई मिन्नतों के बाद भी नही पिघले जबकि दोनों एक दूसरे के प्रेम में आकंठ डूबे हुए थे । पिता को नीचा दिखाने के लिए मधुबाला ने किशोर कुमार से हड़बड़ी में विवाह कर लिया । परंतु किशोर कभी अच्छे पति नही बन पाए । 1951 में फ्रैंक काप्रा उन्हें हॉलीवुड ले जाना चाहते थे परंतु इस बार पिता के साथ अंग्रेजी भी उनके आड़े आयी । फिर भी ' लाइफ मैगज़ीन ' के फोटोग्राफर जेम्स बुर्के ने उनकी कुछ तस्वीरे  लाइफ में छपवा दी । भारत के बाहर किसी सिने तारिका के फोटो छपना और उनका सनसनी मचा देना पहली घटना थी । किशोर कुमार के साथ अच्छे पलों में आई उनकी फिल्म ' चलती का नाम गाड़ी ' का गीत ' एक लड़की भीगी भागी सी , सोई रातो में जागी सी ' आज भी सदाबहार रोमैंटिक गीतों में शुमार है । इसी तरह 1949 में आयी ' महल ' में उनके लिये लता मंगेशकर का गाया  ' आएगा आने वाला आएगा ' गीत लता मंगेशकर की सफलता के  लिये टर्निंग पॉइंट बना । ऐन वेलेंटाइन डे पर जन्म लेने वाली मधुबाला की बदकिस्मती ने  मौत के बाद भी उनका पीछा नही छोड़ा । मृत्यु के बाद उन्हें बांद्रा के कब्रिस्तान में दफनाया गया था परंतु सन दो हजार में कब्रिस्तान में जगह की कमी के चलते कुछ कब्रो को हटाना जरूरी हो गया था । लिहाजा अन्य कब्रो के साथ मधुबाला की कब्र भी हटा दी गई । आज कोई भी दावे के साथ नही कह सकता है कि मधुबाला कहाँ दफन है।
चर्चित लोगों के पुतले बनाकर प्रदर्शनी लगाने वाले अंतरराष्ट्रीय म्यूज़ियम ' मैडम तुसाद ' ने मधुबाला को हाल ही में अपने संग्रह में शामिल कर आदरांजलि दी है । लाखों दिलों की धड़कन मधुबाला को अब  सिने प्रेमी 'मुगले आजम ' की अनारकली के रूप में निहार सकते है । 

Monday, July 17, 2017

partition 1947 बंटवारे से उपजा सिनेमा


हमारी पीढ़ी कई मामलों में  सौभाग्यशाली है। हमें  बंटवारे का दंश नहीं झेलना पड़ा जैसा हमारे पूर्वजों ने भोगा था। हमारे बचपन से ही हमने पाकिस्तान को एक अशांत और हैरान परेशान देश के रूप में देखा है । सिर्फ एक  काल्पनिक लकीर खींच देने से दो देश धर्म के नाम पर अलग हो गए।  परन्तु इस बड़ी घटना से उपजी जातीय हिंसा ने एक करोड़ से ज्यादा लोगों को अपनी जड़ों से उखाड़  दिया और लाखों की बलि ले ली। अफ़सोस की बात है पीढ़ी दर पीढ़ी यह जातीय नफरत  अब जैसे हमारे डी एन ए में समा गयी  है। बंटवारे और उससे उत्पन्न हिंसा को इतिहासकारो , फिल्मकारों और साहित्यकारों ने अपने नजरिये से देखा है। बतौर पाठक जब आप इतिहास के इस हाहाकारी गलियारे से गुजरते है या सिनेमा हाल के अँधेरे में उन नारकीय और दशहत भरे पलों से दो चार होते है तो एकबारगी उन लोगों के प्रति सहानुभूति से भर जाते है जिन्होंने वास्तविकता में उस क्षण को जिया था। 
इस वाकये को अमृता प्रीतम ने अपने उपन्यास ' पिंजर ' (1950 ) में एक औरत के दृष्टिकोण  से उजागर किया था। बंटवारे की वजह से नागरिकों ने न सिर्फ अपनी चल अचल सम्पति को खोया था वरन अपने परिवार की महिलाओ को भी महज धर्म के आधार पर  बलात अगवा होते देखा था। 2003 में इसी नाम से उर्मिला मार्तोंडकर को केंद्र में  रखकर चंद्र प्रकाश द्धिवेदी ने फिल्म बनाई थी। ' पिंजर ' बॉक्स ऑफिस पर तो कमजोर रही परन्तु उस वर्ष का ' नेशनल अवार्ड ' इसी ने जीता था। 
 तीखे व्यंग्यों और तेजाबी भाषा के धनी खुशवंत सिंह ने बंटवारे की पीड़ा को नजदीक से देखा था। उन्होंने जब लिखना आरम्भ किया तो सबसे पहला उपन्यास ' ट्रैन टू पाकिस्तान '' (1956 ) लिखा था।  अंग्रेजी में लिखे इस उपन्यास के  केंद्र में  सीमा पर बसे  ' मनो माजरा ' गाँव  के स्थानीय निवासियों की  नजर से बंटवारे को देखा गया था। पीढ़ियों से पड़ोस में रह रहे लोग सिर्फ एक खबर पर कैसे एक दूसरे की जान के प्यासे हो गए और भीड़ में बदल गए इस उपन्यास की कथा वस्तु है। 1998 में पामेला रूक्स ने इस कहानी पर बनी फिल्म को निर्देशित किया था। ' ट्रैन टू पाकिस्तान '  को भारत के अलावा ब्रिटेन , श्रीलंका और अमेरिका में भी रिलीज़ किया गया था। इसके जुनूनी हिंसा के दृश्यों ने विभिन्न फिल्म महोत्सवों में बंटवारे के दर्द को दुनिया को महसूस कराया था। 
' तमस ' बंटवारे की चपेट में आये एक बुजुर्ग सिख दंपति की भारत वापसी की कहानी कहता है। मृत जानवरों की खाल उतारने वाले नाथू को कुछ लोग एक सुअर मारने को कहते है।  अगले दिन उस सुअर की लाश एक मस्जिद के दरवाजे पर मिलती है। बंटवारे की विकराल हिंसा के शिकार सिख और हिन्दुओ का दारुण वर्णन और तात्कालीन राजनीति की उथल पुथल ' तमस ' का कथानक है। इस उपन्यास के लिए भीष्म साहनी को 1975 का साहित्य अकादमी पुरूस्कार मिला था। 1988 में इस कहानी को गोविन्द निहलानी के निर्देशन में  ' दूरदर्शन ' पर टीवी सीरीज के रूप में दिखाया गया था। 
भारतीय मूल की ब्रिटिश नागरिक और फिल्मकार गुरिंदर चड्ढा बंटवारे को कथानक बनाकर अपनी फिल्म ' पार्टीशन 1947 ' को अगस्त में रिलीज़ कर रही है। इस फिल्म को उन्होंने बंटवारे के रचनाकार ' लार्ड माउंटबेटन और उनकी पत्नि  लेडी एडविना माउंटबेटन ' को केंद्र में रखकर बनाया है। बंटवारे की बेला में भारत से साजो सामान  समेट रहे अंग्रेज क्या सोंच रहे थे, इस फिल्म की कहानी है। स्वर्गीय ओम पूरी की यह अंतिम  फिल्म है।वैश्विक स्तर पर यह फिल्म ' वायसरॉय हाउस ' के नाम से प्रदर्शित होगी। 

ऑस्कर की तलाश में न्यूटन

अमूमन हर वर्ष लगभग सितम्बर माह के अंतिम हफ्ते में भारत की और से  ऑस्कर समारोह में हिस्सा लेने के लिए एक भारतीय  भाषाई फिल्म का चयन किया जा...