Friday, November 16, 2018

एक एक्टर एक फ़िल्म एक मील का पत्थर




 समय समय पर कुछ प्रयोगधर्मी फिल्मकार अपने क्राफ्ट से दर्शकों को चौकाने का प्रयास करते रहे है। दक्ष और अनुभवी कई फिल्मकारों ने इस तरह का जोखिम या तो अपने करियर की शुरुआत में ले ही  लिया था या तब जब उमके पाँव चिकनी सिनेमाई जमीन पर गहरे जम चुके थे। जरुरी नहीं है कि सारे नवीन प्रयोगों की शुरुआत हॉलीवुड से ही हुई हो। कुछ मील के पत्थर भारतीय फिल्मकारों ने भी स्थापित किये है किंतु उनके बारे में  भारतीय दर्शक कम ही  ही जानते है । ऐसा ही एक अनूठा प्रयोग एक्टर प्रोडूसर सुनील दत्त ने अपनी कई सफल फिल्मों के बाद किया था। ' मुझे जीने दो ' और  ' गुमराह ' की सफलता से लबरेज सुनील दत्त ने 1964 में ' यादे ' का निर्माण किया था। इस फिल्म के निर्देशक और अभिनेता भी वे खुद ही थे। इस फिल्म की विशेषता थी इसमें एक मात्र किरदार का होना। 100 मिनिट की इस फिल्म में सुनील दत्त ने एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभाई थी जिसे घर आने पर पता चलता है कि उसका परिवार उसे छोड़कर जा चूका है। अपने एकालाप में वह खुद को तसल्ली दने की कोशिश करता है कि जल्द ही हालत सुधर जाएंगे और सब कुछ ठीक हो जाएगा। नायक के निराशा , पश्चाताप  और कुंठा के पलों को सुनील दत्त ने बखूबी जीवंत किया था।  ब्लैक एंड वाइट में बनी इस फिल्म में ध्वनि , प्रकाश और अँधेरे के संयोजन से मनोभावों का चित्रण उल्लेखनीय था। इस उपलब्धि के लिए उस वर्ष का फिल्म फेयर  सिनेमटोग्राफी अवार्ड और नेशनल अवार्ड ' यादें ' ने अर्जित किया था। चूँकि यह प्रयास मील का पत्थर था तो ' गिनिस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड ' का भी ध्यान इस तरफ जाना था। उपलब्धियों की इस वैश्विक किताब ने ' यादें ' को पहली इकलौती एक अभिनेता वाली फिल्म की  अपनी सूचि में शामिल कर सम्मानित किया। 
यादें ने दुनिया को फिल्मों की एक नयी श्रेणी और अनूठे फिल्म मेकिंग के तरीके से अवगत कराया था। इसकी प्रेरणा से हॉलीवुड ने भी विगत वर्षों में कई दिलचस्प और दर्शनीय ' एक पात्र ' वाली  फिल्मे निर्मित की है। हॉलीवुड  सिनेमाई इतिहास में सबसे लोकप्रिय और सफल फिल्मकार स्टीवन स्पीलबर्ग ने अपनी पहली   फिल्म ' डुएल ' (1971) इकलौते पात्र डेनिस वीवर की मदद से  बनाई थी। कैलिफ़ोर्निया की सुनसान घाटियों में नायक की कार एक दैत्याकार ट्रक से  कुचलने के प्रयास से अपने को बचाने की कवायद के कथानक पर आधारित थी। साठ के दशक में अपनी सुंदरता और अभिनय से वैश्विक लोकप्रियता हासिल कर चुकी ' इंग्रिड बर्गमन ' ने ' द ह्यूमन वॉइस (1966) में एक ऐसी महिला का किरदार निभाया था जिसका प्रेमी उसे विवाह के ठीक एक दिन पहले किसी अन्य महिला के लिए छोड़ देता है। मात्र इक्यावन मिनिट की टेलीविजन के लिए बनी फिल्म भावनाओ का ऐसा ज्वार निर्मित करती है जिसके साथ बहने से दर्शक खुद को रोक नहीं पाता। एक मात्र पात्र अभिनीत फ्रेंच फिल्म ' द मैन हु स्लीप (1974) किसी व्यक्ति का बाहरी दुनिया से क्षणे क्षणे दूर होते जाने की प्रक्रिया को विस्तार से चित्रित करती है। यधपि कुछ फिल्मों में एक से ज्यादा पात्र रहे है परन्तु पूरी फिल्म केंद्रीय पात्र के आस पास ही घूमती है।  रोबर्ट ज़ेमिकिस निर्देशित और टॉम हेंक अभिनीत ' कास्ट अवे (2000) ऐसी ही फिल्म है जिसका नायक निर्जन टापू पर फंसकर चार साल बिताता है। डेनी बॉयल निर्देशित '127 अवर (2010) आई एम् लीजेंड (2007) ग्रेविटी (2013 ) कुछ ऐसी फिल्मे है जिसमे दो तिहाई से ज्यादा समय तक कैमरा एक ही पात्र पर केंद्रित रहता है। 
2005 में कन्नड़ फिल्म  ' शांति ' गिनीस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल होने वाली दूसरी फिल्म बनी। बारागुरु रामचन्द्रप्पा लिखी और निर्देशित इस फिल्म की इकलौती किरदार कन्नड़ अभिनेत्री भावना थी। इकलौती कास्ट की श्रेणी में तमिल फिल्म ' कर्मा (2015) ने एक कदम आगे बढ़कर नया प्रयोग  किया। मर्डर मिस्ट्री के कथानक  और शानदार बैकग्राउंड संगीत की मदद से दर्शक को पलक भी न झपका देने को मजबूर कर देने वाली इस फिल्म का क्रेडिट सिर्फ एक लाइन का है। लेखक , निर्माता , निर्देशक और अभिनेता - आर अरविन्द। दो पात्रो के बीच घटित एक घंटे के वार्तालाप पर आधारित इस फिल्म को दूसरी बार देखने पर महसूस होता है कि एक ही अभिनेता ने दोनों भूमिका निभाई है। लगभग इसी तरह एक पात्र के इर्दगिर्द घूमती शुजीत सरकार की 2008 में निर्मित अमिताभ बच्चन अभिनीत   ' शूबाइट ' 2019 में दर्शको तक पहुँच सकती है। कानूनी विवादों में फंसी इस फिल्म का कथानक यूनिवर्सल अपील लिए है इसलिए समय का अवरोध इसके कथानक को बासी नहीं होने देगा।

Thursday, November 8, 2018

रोमांचक सफर पर ले जाती ' टाइम मशीन '


खबर हॉलीवुड से है।  ' टाइटेनिक ' फिल्म से दुनिया भर में पहचान बना चुके लेनार्डो डी कैप्रिया विख्यात साइंस कहानी  लेखक एच जी वेल्स के कालजयी उपन्यास ' टाइम मशीन ' पर फिल्म निर्माण कर रहे है। लेनार्डो इस फिल्म के माध्यम से खुद को एक फिल्म मेकर के रूप में प्रस्तुत करने जा रहे है।  फिल्म का निर्देशन मशहूर निर्देशक एंडी मशेती करेंगे। फिल्म कितनी बड़ी होगी इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस फिल्म को हॉलीवुड के दो बड़े स्टूडियो , वार्नर ब्रदर्स और पैरामाउंट मिलकर बना रहे है। 
टाइम ट्रेवल सिनेमा के आगमन से पहले से ही जन समुदाय में उत्सुकता का सबब रहा है। ब्रिटिश विक्टोरियन युग में लिखे  गये   उपन्यास ' टाइम मशीन ' ने अनदेखे अनजाने भविष्य को लेकर जो कौतुहल जगाया था उसे सिनेमा को तो अपनी गिरफ्त में लेना ही था। टाइम  ट्रेवल पर जॉर्ज पाल द्वारा निर्मित पहली फिल्म ' टाइम मशीन ' 1960 में बनाई गई थी।  यह फिल्म एच जी वेल्स के उपन्यास का हूबहू सिनेमैटिक अवतार थी। ट्रिक फोटोग्राफी और स्टूडियो निर्मित भव्य सेट्स के अलावा इस फिल्म की एक और उल्लेखनीय विशेषता थी , इस फिल्म में एच जी वेल्स के पोते ने समय यात्रा पर जा रहे वैज्ञानिक के दोस्त की भूमिका निभाई थी। इस फिल्म के बाद जितनी भी फिल्मे और टीवी धारावाहिक इस विषय पर बने उनमे वेल्स को तो क्रेडिट दिया परन्तु कथानक में निर्माता ने अपनी कल्पनाशीलता का भरपूर उपयोग किया। अधिकांश अमेरिकी टीवी धारावाहिकों ने इस उपन्यास के तथ्यों और घटनाक्रम को विस्तार देकर घर बैठे दर्शक को भी टाइम ट्रेवल के रोमांच से सरोबार किया। 2010 में  ए बी सी चैनल पर प्रसारित लोकप्रिय धारावाहिक ' लॉस्ट ' का अंतिम छठा सीजन टाइम ट्रेवल पर ही केंद्रित रहा था। 
2002 में अमेरिकन और ब्रिटिश सहयोग से बनी गाय पियर्स अभिनीत  ' टाइम मशीन ' ने बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत का पंद्रह गुना धन कमाया परन्तु अपने कंप्यूटर जनित दृश्यों की भरमार और प्रेम कहानी के एंगेल की वजह से सिने  समीक्षकों और आलोचकों को प्रभावित नहीं कर सकी। एक दुर्घटनावश समय में आठ लाख वर्ष आगे निकल गए नायक के सामने कबीलाई युग में पहुँच गई  मानव सभ्यता को शिक्षित करने और नरभक्षी ' मार्लोक ' प्राणियों से मानव जाति को बचाने की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है फलस्वरूप उसकी टाइम मशीन नष्ट हो जाती है और वह भविष्य में ही  रह जाता है। 
  टाइम ट्रेवल पर रोबर्ट ज़ेमिकिस निर्देशित  हलकी फुल्की कॉमेडी  ' बैक टू द फ्यूचर ' विशेष उल्लेखनीय फिल्म है। 1985 में निर्मित इस फिल्म का हाई स्कूल का छात्र  नायक अपने बुजुर्ग इलेक्ट्रिक इंजीनियर  मित्र की कार में बैठकर तीस साल पीछे 1955 में चला जाता है। जहाँ उसकी मुलाक़ात हाई स्कूल में ही पढ़ रहे अपने माता पिता से होती है। फिल्म में 1955 का माहौल रचने के लिए  बारीक से बारीक बातों  का ध्यान रखा गया था।  ' बैक टू द फ्यूचर ' बहुत थोड़े बजट में बनी अमेरिका की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्मों की सूची  में स्थान रखती है। इस फिल्म की छप्पर फाड़ सफलता ने  बैक टू द फ्यूचर 2 और  बैक टू द फ्यूचर 3 बनाने की राह आसान की थी। शेष दोनों  भाग भी काफी सफल रहे थे। 
 इस विषय पर हिंदी सिनेमा की हिचकिचाहट समझ नहीं आती। एक जैसे कथानक और एक  ढर्रे पर फिल्म बना रहे फिल्मकारों को काल यात्रा पर फिल्म बनाने का विचार क्यों नहीं आया , समझा जा सकता है। अधिकाँश लोग यह सोंचकर नए विषय को हाथ नहीं लगाते कि किसी और को प्रयास कर लेने दो अगर वह सफल हो गया तो हम भी कूद पड़ेंगे। 2010 में विपुल शाह ने अक्षय कुमार और ऐश्वर्या रॉय को लेकर ' एक्शन रीप्ले ' बनाई थी। बकवास स्क्रिप्ट और बेदम कहानी को सफल नहीं होना था और ऐसा ही हुआ भी। बस उसके बाद हिंदी सिनेमा में टाइम ट्रेवल की कोई बात नहीं करता। 
बॉलीवुड से इतर दक्षिण की क्षेत्रीय फिल्मों ने जरूर हॉलीवुड के सामने खड़े होने का साहस दिखाया है। तमिल , तेलुगु और कन्नड़ में पिछले  कुछ वर्षों में नए सब्जेक्ट पर शानदार फिल्मे बनी है। विडंबना यही है कि क्षेत्रीयता और भाषाई अवरोधों के कारण वे एक बड़े दर्शक वर्ग तक नहीं पहुँच पाती। 2015 में बनी तमिल फिल्म ' इन्द्रू नेत्रु नालाई ' टाइम ट्रेवल पर भारत में बनी मौलिक और बेहतरीन फिल्म है। इसी तरह मलयालम में सूर्या अभिनीत ' टाइम मशीन और कन्नड़ में अभिनेता अजित अभिनीत टाइम मशीन भी दर्शनीय फिल्मे है। 
भविष्य और अतीत की कांच की दीवारों के बीच वर्तमान फंसा हुआ है। न आप इधर जा सकते है न उधर। परन्तु  अपनी फंतासियों में मनुष्य ने इन दोनों ही अवरोधों को पार किया है और आभासी अनुभव का अहसास दिलाने में फिल्मे बड़ी मददगार साबित हुई है। 

आधुनिक ययाति बनाम मी टू

समय का एक दौर ऐसा भी था जब कला के  विभिन्न माध्यमों में महिलाओ की भागीदारी लगभग न के बराबर थी। नगण्यता के इस दौर को उन्नीसवीं शताब्दी के दो प्रमुख प्रतिभाशाली कलाकारों के काम को देखकर समझा जा  सकता है। ये कलाकार थे महान चित्रकार रवि वर्मा जिन्हे राजा रवि वर्मा के नाम से बेहतर जाना जाता है और दूसरे थे गोविंदराव फालके जो बाद में भारतीय सिनेमा के पितामह माने गए। उस दौर में सभ्य समाज की महिलाए अमूमन कला और रागरंग के अवसरों से  दूर ही रखी जाती थी। इन माध्यमों में उनका प्रवेश हेय नजरिये से देखा जाता था लिहाजा राजा रवि वर्मा को अपने चित्रों के मॉडल के लिए गणिका की सहायता लेना पड़ी और दादा साहेब को अपनी नायिका पात्रों के लिए पुरुषों की मदद लेना जरुरी हुआ। बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि दादा साहेब फाल्के के सिनेमा के सपनो में रंग भरने के लिए स्वयं राजा रवि वर्मा ने वित्तीय मदद की थी। 
बदलते समय के साथ सामजिक दृष्टिकोण में भी बदलाव हुआ और महिलाए स्वतंत्र रूप से कला के सभी माध्यमों में हिस्सा लेने लगी।  कही कही पर तो उन्होंने पुरुषों को भी  दूसरे स्थान पर धकेल दिया है। आज सिर्फ महिला प्रधान फिल्मों की बात की जाए तो यह अपने आप में एक जॉनर बन चूका है। परन्तु महिलाओ की स्थिति और उन्हें लेकर बने द्रष्टिकोण में कोई विशेष बदलाव नहीं हुआ है। पुरुष समाज सैंकड़ों वर्षों से पितृसत्तात्मक मानसिकता से ग्रसित रहा है जिसे अब जाकर ' मी टू ' से चुनौती मिलने लगी है। बॉलीवुड में लम्बे समय तक ऐसी फिल्मे बनती रही जिसमे पुरुष की लंपटता और नायिका की सहनशीलता को केंद्र में रखा गया था। इन फिल्मों ने मुंबई से हजार किलोमीटर दूर बैठे दर्शक के अवचेतन में भी यह बात गहरे से उतार दी थी कि वे जो मर्जी आये कर सकते है और पीड़ित लोकलाज के भयवश अपना मुँह बंद रखेगी। परन्तु इस विचार को झटका तब लगा जब ' इंसाफ का तराजू ' की नायिका अपने दुष्कर्मी को मौत के घाट उतार देती है। इसी कड़ी में ' निकाह ' की नायिका अपने तलाक देने वाले शौहर के सामने सवालों की बौछार कर अपने व्यक्तित्व को सहेजती है। ये दोनों ही फिल्मे ' कल्ट ' फिल्मे मानी जाती है जिसकी वजह से उस दौर के समाज में एक जनचेतना बनने की शुरुआत हुई थी। संभवत इन फिल्मों का आईडिया हॉलीवुड फिल्म ' आई स्पिट ऑन योर ग्रेव ' के कथानक से आया होगा जिसके अब तक पांच रीमेक बन चुके है। पुरुष की लंपटता और कामुकता के प्रतिकार के  लिए हिंसा का सहारा भी लेना पड़े तो वह जायज माना जाना चाहिए।  ' आई स्पिट ऑन योर ग्रेव ' इसी बात को स्थापित करती है। 2016 में आई ' पिंक ' का बूढ़ा वकील अदालत में दलील देता है कि महिला की एक ' ना ' को ना ही मानकर पुरुष को अपने दायरे में सिमट जाना चाहिए उसकी ना को  उसके चालचलन और चरित्र से जोड़कर फायदा उठाना गलत ही माना जाएगा। 
अवाम को यह भी समझना होगा कि अगर महिलाए तय करले तो वे पुरुष समाज को बहिष्कृत भी कर सकती है । काफी पहले  आई अरुणा राजे की ' रिहाई ' प्रकाश झा की ' मृत्युदंड '  फरहान अख्तर की ' हनीमून ट्रेवल्स प्राइवेट लिमिटेड और अभी कुछ समय पहले प्रदर्शित श्रीजीत मुखर्जी की  ' बेगमजान ' अलंकृता श्रीवास्तव की ' लिपस्टिक अंडर बुरका '  ऐसी फिल्मे है जहाँ शोषित नायिकाएँ  प्रतिकार स्वरुप अपना रास्ता खुद चुन लेती है। इन फिल्मों का भले ही कोई तात्कालिक प्रभाव नजर नहीं आता हो परन्तु  दर्शक के अवचेतन में एक निशान जरूर छोड़ जाती है। 
अब ' मी टू ' के बाद  क्या हालत बनेगे कुछ उस पर भी विचार करने की जरुरत है। हो सकता है नियोक्ता अपने संस्थान में महिलाओ को काम देने से ही इंकार कर देवे कि क्या पता वह कल कोई आरोप लगाकर उनका चरित्र और व्यवसाय दोनों ही नष्ट कर देगी। यद्धपि इस तरह की आशंका करना थोडा जल्दबाजी भरा निर्णय होगा। परन्तु सोशल मीडिया पर इस सोंच  के समर्थन में विचारो का आदान प्रदान होने लगा है। और कब कौनसा विचार सामूहिक सोंच में बदल जाए , कहा नहीं जा सकता। 
 इधर मी टू - के हल्ले में उजागर चेहरे पूरी बेशर्मी के साथ अपने को बचाने की कवायद में जुट गए है। मानहानि के दावे और सामजिक दबाव बनाने की कवायद आरंभ हो गई है।   शायद इनमे से अधिकांश लोग अपने को बचने में सफल भी हो जाए क्योंकि बेहद खर्चीली न्याय व्यवस्था  और स्वयं को पीड़ित साबित करने  की जिम्मेदारी इन पीड़िताओं को ही उठानी है।  भारत जैसे देश में यह काम कितना दुरूह और जोखिम भरा है बताने की जरुरत नहीं है। महाभारत से सम्बंधित कहानियों में ' ययाति ' का जिक्र अक्सर होता है। साहित्य अकादमी से पुरुस्कृत विष्णु सखाराम खांडेकर रचित उपन्यास में ययाति के बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक का दिलचस्प वर्णन किया गया है कि किस प्रकार भोग विलास में आसक्त राजा अपने युवा पुत्र का यौवन उधार लेकर अपनी कामाग्नि को तुष्ट करता है। मौजूदा समय में हमारे आसपास ययाति के ही वंशज मंडराते नजर आ रहे है। इनके मुखोटे हर हाल में उतारना ही होगा अन्यथा दादा साहेब फाल्के और राजा रवि वर्मा ने जिस कठिनाई में अपना हुनर निखारा था  आज इक्कीसवी सदी में वैसे हालात न ही बने तो बेहतर होगा। पुरुषों को अपनी पितृसत्तात्मक सोंच बदलनी ही होगी। 

Monday, October 15, 2018

रोशनी के पीछे का अंधेरा !



अपना शहर छोड़े बगैर पलायन कर जाने के भाव को महसूस कर जाने का माध्यम है सिनेमा। निसंदेह परदे की चंचल छवियां छलावा भर होती है वास्तविकता से दूर वास्तविकता का भ्रम बनाती हुई। इन छवियों को निभाने वाले पात्र वास्तविक जीवन से  ही आते है। ये लोग कथानक की मांग के अनुरूप थोड़ी देर के लिए पात्र की काया में उतरते है , उस किरदार को जीवंत करते है और पुनः यथार्थ में लौट जाते है। चूँकि दर्शक इनके काल्पनिक  रूप को ही देख पाता है और  वही उसे याद रहता है तो वह उसे ही आदर्श मान आचरण करने  लगता है। ये काल्पनिक पात्र अनजाने ही बड़े समूह के लिए जीवन मूल्य तय कर  बैठते है परन्तु यथार्थ में उन  मूल्यों को गाहे बगाहे  ध्वस्त करते रहते  है। 
भारतीय अवाम ने पिछले सात दशकों में सिद्ध किया है कि ' राजनीति , क्रिकेट और सिनेमा का जूनून  देश की रगों में बहता है। कम खायेगे , कम पहनेगे परन्तु इन तीनो के लिए हमेशा समय निकाल लेंगे। इन तीनों ही क्षेत्रों के नायकों को उनकी मानवीय कमजोरियों के  बावजूद सिर माथे बैठाने की परंपरा का नियम पूर्वक अनुसरण किया जाता रहा है। दक्षिण भारत में राजनेताओ और फिल्म अभिनेताओं के मंदिर बन जाना इस अपरिपक्व मानसिकता का ही परिणाम है। जबकि इन मंदिरों में विराजित लोग किसी समय  आर्थिक और चारित्रिक दुर्बलताओं के दाग धब्बों से लांछित रहे है। अपने इन तथाकथित नायको की कारगुजारियों को नजरअंदाज कर जाने का भाव हमारे देश के एक बड़े वर्ग की सामूहिक सोंच में बदल चूका है। अगर यह सोंच नहीं होती तो भला  आपराधिक पृष्टभूमि के सैंकड़ों  व्यक्ति नगर पालिका से लेकर संसद तक कैसे पहुँच पाते ? क्रिकेट का एक उभरता सितारा अपने होटल के कमरे में अवांछनीय हरकत करते हुए सी सी टीवी में कैद हो जाता है। शर्मिंदा होने के बजाय वह अपने राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी का सदस्य बन जाता है , कुछ समय बाद एक राष्ट्रीय टीवी के रियलिटी शो का हिस्सा भी बन जाता है। जहाँ उसे नकारा जाना चाहिए था वहा वह समर्थन जुटा लेता है। इसी तरह एक दशक पूर्व एक टीवी चैनल के ' कास्टिंग काउच ' पर किये गए स्टिंग ऑपरेशन में उजागर मनोरंजन जगत के कुछ स्थापित नाम आज भी बाइज्जत जमे हुए हैं । उनके कैरियर पर कोई नकारात्मक असर इस घटना ने नही डाला क्योंकि दर्शकों ने उन्हें नकारने का उपक्रम भी नहीं किया था । 
हॉलीवुड फिल्मों के कथानक से प्रेरणा लेने वाला मनोरंजन उद्योग उनके साहस से प्रेरित नही होता । जिस तरह यौन उत्पीड़न की शिकायतों के बाद नामचीन हार्वे विन्स्टीन , बिल कॉस्बी और केविन स्पेसी को सामाजिक रूप से बहिष्कृत कर सलाखों के पार पहुंचाया गया है वैसी नजीर भारत में दिखाई देगी इस बात में
संदेह है । तनु श्री दत्ता  मी टू के भारतीय संस्करण की मशाल धावक बनी है और उनके उठाये गए सवालों ने अन्य महिलाओं को अपनी पीड़ा व्यक्त करने का साहस दिया है । परिणाम स्वरूप संस्कारी आलोक नाथ , नाना पाटेकर  , पत्रकारिता से राजनीति में आये एम जे अकबर , गुजरे जमाने के निर्देशक सुभाष घई , सूफी गायक कैलाश खेर ,  निर्माता विकास बहल आदि  कुछ ऐसे नाम है जो थोड़ी देर से जागी महिलाओ की वजह से सतह पर आये है।यह तूफ़ान यहीं थमता नहीं दिख रहा है। सूरज की पहली किरण के साथ रोज चौकाने वाले खुलासे हो रहे है। इन महिलाओ से बस इतनी सी गिला है कि इन्होने यह साहस जुटाने में समय क्यों जाया किया ? कुछ ऐसे भी आरोप सामने आ रहे है जिनके सच होने में संदेह है।  इतना हो हल्ला होने के बाद भी बॉलीवुड के शीर्ष पर चुप्पी पसरी हुई है । जिनकी आवाज देश भर में सुनी जाती है ऐसे लोग इन दागियों के खिलाफ कुछ भी बोलने से बच रहे है । बॉलीवुड अपना दृष्टिकोण तय करे उसके पूर्व दर्शकों को अपना एजेंडा तय कर लेना चाहिए कि वे ऐसी तमाम फिल्मो और टीवी धारावाहिकों का बहिष्कार करेंगे जिसमे ये नाम शामिल हैं । मी टू की सफलता तभी है जब चकाचोंध के पीछे फैले अंधेरे की सफाई होगी । 
अतीत के अनुभवों से एक कटु सत्य स्पस्ट नजर आता है  कि हमारे देश के बड़े  जनसमूह की याददाश्त ज्यादा देर उनका साथ नहीं देती। या वे देखकर भी अनदेखा करने की अपनी आदत से मजबूर है। सजा के  इंतजार में  सलाखों के पीछे करवटे बदल रहे धार्मिक गुरुओ के अनुयायी कम नहीं हुए है न ही ऐसे राजनेताओ की साख पर किसी तरह की आंच आई है। 
पीड़ितों को अपनी आवाज उठाना ही चाहिए और उनका समर्थन भी इस देश के नागरिकों को करना चाहिए परन्तु इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस तात्कालिक अंधड़ में कोई निर्दोष किसी पूर्वाग्रह का शिकार न हो जाए। 

Wednesday, October 10, 2018

कुछ प्रेम कहानियां ऐसी होती है जिनके होने का कोई सबूत नहीं होता


कुछ प्रेम कहानियां ऐसी होती है जिनके होने का  कोई सबूत नहीं होता परन्तु उनके किस्से बरस दर बरस सुनाये जाते रहे है। ऐसी ही एक कहानी महानायक अमिताभ से जुडी हुई है जो हर बरस उनके जन्मदिन (11 अक्टूबर ) पर हवाओ में तैरने लगती है। इसकी ठोस वजह भी है क्योंकि बिग बी के जन्म दिन से ठीक एक दिन पहले (10 अक्टूबर ) रुपहले परदे की दिवा रेखा का भी अवतरण दिवस पड़ता है। सत्तर  के दशक में आरम्भ इस प्रेमकथा की शुरुआत ' दो अनजाने ' से मानी जाती है। यद्धपि रेखा गणेशन फिल्मों के लिहाज से बच्चन जी से सीनियर है। वे जब फिल्मों में आई थी तब महज सोलह बरस की ही थी। उनकी पहली फिल्म ' सावन भादो ' थी जिसके प्रदर्शन के बाद फ़िल्मी पत्रिकाओं ने उन्हें ' मोटी बतख ' नाम दिया और उनके सहनायकों ने उन्हें  'काली कलूटी ' कहकर पुकारा। इस तथाकथित प्रेम कहानी के दोनों ही पात्र स्वभाव में एक दूसरे से जुदा थे। अमिताभ जहाँ धीर गंभीर किस्म के अनुशासन प्रिय थे वही रेखा घोर लापरवाह चुलबुली टाइप की अल्हड युवती हुआ करती थी।  शायद प्रेम ऐसी  ही परस्पर विरोधी परिस्तिथियों में अंकुरित हुआ करता है। 
अक्सर उद्धत किया जाता है कि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के लोकप्रिय नाटक ' पिग्मेलियन ' के प्रमुख पात्र प्रोफेसर हिग्गिन्स की तरह अमिताभ रेखा की जिंदगी में आये।  और कई मायनों में यह सच भी है। फोनेटिक्स के विद्धान  प्रो हिग्गिन्स इस नाटक में सड़क किनारे फूल बेचने वाली गंवार लड़की को संवार कर इतनी सभ्य और सुसंस्कृत बना देते है कि राजपरिवार भी उसे सम्मान देने लगता है। अमिताभ के आभा मंडल का प्रभाव था कि रेखा ने उसमे खुद को तलाशा और निखर गई। भारतीय आख्यानों में देह को मंदिर मानने की बाते सदियों से मौजूद है। इसे चरितार्थ करने वाली रेखा संभवतः पहली नायिका बनी। उन्होंने खुद को इतना तराशा कि सौन्दर्य के प्रतिमान स्थापित होते चले गए। उनका बदला रूप और उनके अभिनय से सजी दर्जनों फिल्मे उनकी देह के सुन्दरतम हो जाने के रिकार्डेड दस्तावेज की शक्ल में चिर स्थायी हो गए है। 
अमिताभ रेखा की जिंदगी में प्रो हिग्गिन्स की तरह आये थे  और उसी तरह निकल भी गए। यह एक ऐसी कहानी थी जिसका क्लाइमेक्स इसकी शुरुआत में ही तय हो गया था।  शादी शुदा अमिताभ के लिए इस रिश्ते को परवान चढ़ाना संभव नहीं था। उनका करियर बुलंदी पर था और किसी भी तरह की नकारात्मक खबर उन्हें और उनके परिवार को तबाह कर सकती थी इसलिए वे चुपचाप किनारे हो गए। फिल्म सिलसिला इस कहानी का पटाक्षेप मानी जाती है क्योंकि इसके बाद यह जोड़ी फिल्म जगत के दिग्गजों की मनुहार के बाद भी एक फ्रेम में कभी नजर नहीं आई। 
मुखर रेखा आज भी घुमा फिराकर इस रिश्ते को स्वीकार लेती है परन्तु महानायक ने इस विषय पर बीते तीन  दशक में कभी मुंह नहीं खोला। सिलसिला संभवतः ऐसी पहली  फिल्म थी जिसके प्रमुख तीन  पात्र अभिनय नहीं कर रहे थे , वे यथार्थ में जी रहे थे। अमिताभ भले ही आज  इस बात को नहीं स्वीकारते हो   परन्तु जब कभी केबीसी का कोई  प्रतियोगी  उनसे ' तन्हाई की एक रात इधर भी है उधर भी ' सुनाने की फरमाइश करता है तो उस पल उनकी आवाज में गुजरा लम्हा जैसे ठिठक सा जाता है।     
कुछ प्रेम कहानियों के पात्र कभी नहीं मिलते।एक ही शहर में  वे रेल की पटरियों की तरह साथ रहते हुए कभी नहीं मिलते  शायद इसीलिए वे कहानियां अमर हो जाती है। 

Tuesday, October 2, 2018

गांधीजी : इतिहास से सिनेमा तक

अगर आज गांधीजी जीवित होते तो अपना 149 वां जन्मदिवस मना रहे होते। लेकिन इस नाशवान  जगत का नियम है कि मनुष्य को एक निश्चित उम्र के बाद बिदा होना ही पड़ता है। लेकिन कुछ लोग होते है जो अपने पीछे इतनी बड़ी लकीर  छोड़ जाते है कि लोगों को सदिया लग जाती है उन्हें समझने में। अफ़सोस गांधीजी को बलात इस दुनिया से हटाया गया था।  यह तथ्य आज भी दुनिया के एक बड़े वर्ग को सालता है। उनसे मतभेद होना स्वाभाविक था परन्तु उनका अंत तय करना सम्पूर्ण मानव जाति के लिए शर्म का सबब रहा है। 
गांधीजी के जीवन और विचारो  को समेटने की कोशिश में सैंकड़ों किताबे लिखी गई है परन्तु उनकी मृत्यु के बीस बरस तक सिनेमा ने उन्हें लगभग नजर अंदाज ही किया। स्वयं गांधीजी सिनेमा के विरोधी थे और अपने जीवन में उन्होंने एकमात्र फिल्म ' राम राज्य (1943) ही देखी थी। लेकिन उनके अनुयायियों में हर विधा के लोग थे जो उन्हें इन माध्यमों  से जोड़कर करोडो लोगो तक पहुँचाना चाहते थे। ऐसे ही एक थे श्री ए के चट्टीएर मूलतः चीन के निवासी। घुमन्तु , पत्रकार और फिल्मकार - उन्होंने 1938 में भारत के चारो कोनो में एक लाख किलोमीटर की यात्राए  गांधीजी के फोटो और फिल्मों को एकत्र करने के लिए की थी। इस संग्रह के आधार पर उन्होंने गांधीजी पर 81 मिनिट की डॉक्यूमेंट्री ' 20 वी सदी का पैगम्बर - महात्मा गांधी ' ( Mahatma Gandhi -20 th century prophet ) बनाई। महात्मा पर बनी यह पहली आधिकारिक डॉक्यूमेंट्री थी जिसे बकायदा सेंसर बोर्ड का प्रमाण पत्र मिला था. यद्धपि गांधीजी की गोलमेज कॉन्फ्रेंस के लिए  लंदन यात्रा को बी बी सी ने संजो लिया था परन्तु यह द्रश्य कई बरस बाद भारत पहुंचे थे। चट्टीएर की बनाई डॉक्यूमेंट्री 15 एम् एम् के कैमरे से शूट की गई थी और इसका पहला प्रसारण 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में किया गया था। प्रधानमंत्री नेहरू की और से उनकी पुत्री इंदिरा और भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद इसके प्रदर्शन के साक्षी बने थे । 1953 में चट्टीएर इस फिल्म को अंग्रेजी में डब कर अपने साथ अमेरिका ले गए जहाँ इसकी दूसरी स्क्रीनिंग तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डी डी आइसनहोवर और उनकी पत्नी के लिए हुई। इसके बाद यह फिल्म अगले छे साल तक लगभग गुम ही रही और 1959 में इसे फिर तलाशा गया। 2015 में इस फिल्म को पूर्णतः डिजिटल फॉर्मेट में बदल कर संजो लिया गया है। अब यह फिल्म  ' गांधी मेमोरियल म्यूजियम '  की धरोहर है। 
गांधीजी पर बनी पहली फीचर फिल्म के निर्माण की कहानी भी गांधी जी के जीवन की तरह दिलचस्प और उतार चढ़ाव से भरी है। 1952 में हंगरी के फिल्मकार गेब्रियल पिस्कल ने प्रधानमंत्री नेहरू से गांधीजी पर फिल्म निर्माण की अनुमति हासिल कर ली।  वे कुछ कर पाते उससे पहले 1954 में उनकी मृत्यु हो गई और यह प्रयास निष्फल हो गया। 1960 में रिचर्ड एटेनबरो ख्यातनाम निर्देशक डेविड लीन से मिले और उन्हें अपनी स्क्रिप्ट दिखाई।  डेविड लीन इस फिल्म को निर्देशित करने के लिए राजी हो गए , यद्धपि उस समय वे अपनी फिल्म ' द ब्रिजेस ऑन  रिवर क्वाई ' में व्यस्त थे। डेविड ने अभिनेता एलेक गिनेस को गांधी की भूमिका में चुन लिया परन्तु इसके बाद किन्ही कारणों से यह प्रोजेक्ट फिर ठंडे बस्ते में चला गया और डेविड अपनी नई फिल्म ' लॉरेंस ऑफ़ अरेबिया ' में मशगूल हो गए । एक दिन 1962 में  लन्दन स्थित इंडियन हाई कमिशन में कार्यरत प्रशासनिक अधिकारी मोतीलाल कोठारी ने रिचर्ड एटेनबरो से मुलाकात की और उन्हें गांधीजी पर बनने वाली फिल्म के निर्देशक की भूमिका करने के लिए मना लिया।  इससे पहले श्री कोठरी लुई फिशर की गांधीजी पर लिखी किताब के अधिकार हासिल कर चुके थे जो स्वयं लुई फिशर ने उन्हें नि - शुल्क प्रदान कर दिए थे। 1963 में लार्ड माउंटबेटन की सिफारिश पर नेहरूजी की मुलाकात एटेनबरो से हुई , नेहरूजी को स्क्रिप्ट पसंद आई और उन्होंने फिल्म को प्रायोजित करना स्वीकार कर लिया। लेकिन अभी और अड़चने आना बाकी थी। नेहरूजी का अवसान , शास्त्रीजी का अल्प कार्यकाल , इंदिरा गांधी की समस्याए और व्यस्तता , अंततः एटेनबरो का जूनून और अठारह बरस के इंतजार के बाद 1980 में  ' गांधी ' का फिल्मांकन आरंभ हुआ। यहाँ तक आते आते एटेनबरो का बतौर अभिनेता करियर बर्बाद हो चूका था। उनका घर और कार गिरवी रखे जा चुके थे। मुख्य भूमिका के लिए बेन किंग्सले को लिया गया। इस बात पर अखबारों ने बहुत हल्ला मचाया परन्तु एटेनबरो टस  से मस नहीं हुए।  बहुत बाद में मालुम हुआ कि किंग्सले आधे भारतीय ही थे। उनके पिता गुजराती थे और माँ अंग्रेज।  इसके बाद की कहानी दोहराने की आवश्यकता नहीं है। 
यूँ तो गांधीजी पर अनेको डॉक्यूमेट्रियाँ बनती रही है परन्तु 2009 में बीबीसी द्वारा निर्मित मिशेल हुसैन की ' गांधी ' विशेष उल्लेखनीय है। यह  अलग ही तरह से इस युग पुरुष का आकलन करती है। यह डोक्युमेंटी एक तरह से गांधीजी के जीवन का यात्रा वृतांत प्रस्तुत करती है। इसकी प्रस्तुता पाकिस्तानी मूल की ब्रिटिश नागरिक उन सभी  जगहों पर जाती है जहाँ जहाँ अपने जीवन काल में गांधी जी गए थे। 
 विडंबना देखिये ! जिस ब्रिटिश साम्राज्य को गांधी ने बाहर का रास्ता दिखाया था  उसी के एक नागरिक ने उन्हें परदे पर उतार कर अपनी आदरांजलि अर्पित की।
published in indiareview.com and amarujala.com

Thursday, September 27, 2018

जबान संभाल के ...Mind your language !



लोग अपशब्दों का इस्तेमाल क्यों करते है ? सभ्य और सुसंस्कृत दिखने वाले लोग भी गाहे बगाहे बातचीत में गालियों का उपयोग क्यों कर बैठते है ? - यह प्रश्न आमजन के साथ भाषाविदों और मनोवैज्ञानिकों को भी विचलित करता रहा है। अमूमन अधिकांश लोग अपने मनोभावों को व्यक्त करते समय अपशब्दों को अलंकारों की तरह उपयोग करने की भूल कर बैठते है। ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के जेफ बॉवेर ने इस समस्या की तह में जाकर अपने शोध में  कुछ निष्कर्षों का खुलासा किया है। उनके अनुसार जैसे जैसे उम्र बढ़ती जाती है वैसे वैसे हमारे मनोभावों में अपशब्दों के स्वर जुड़ते चले जाते है। अपशब्दों के साथ मनुष्य के सोंचने और दुनिया के प्रति उसके नजरिये में बदलाव भी होने लगता है। अन्य सर्वमान्य कारणों में वक्ता का सीमित शब्द भण्डार , बचपन की परवरिश , कुंठा , निराशा , आत्मविश्वास की कमी  , तर्कों के अभाव में   अपशब्दों का प्रयोग प्रमुख वजह माना गया  है। शोध का एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि व्यक्ति अगर एक से अधिक भाषा का जानकार है तो भी अपशब्द वह अपनी मातृभाषा में ही प्रयोग करता है। मशहूर शायर निदा फाजली ने कभी अपनी नज्म में भी इस सामाजिक समस्या पर कुछ  इस तरह से कटाक्ष किया था कि ' मेरे शहर की तालिम कहाँ तक पहुंची , जो भी गालियाँ थी बच्चों की जुबां तक पहुंची। फाजली साहब की बातों की पुष्टि फिल्मों में बढ़ते गालियों के प्रयोग से भी होती है। दो दशक पूर्व लेखिका माला सेन की पुस्तक ' इंडियास बेंडिट क्वीन : द ट्रू स्टोरी ऑफ़ फूलन देवी ' पर आधारित फिल्म ' बेंडिट क्वीन ' (1994 ) को  एक समय असफल रहे अभिनेता शेखर कपूर ने निर्देशित किया था। चंबल के पिछड़े इलाकों  में ऊँची जात नीची जात के संघर्ष की परिणीति ने फूलन को डाकू बना दिया था। कठोर वास्तविकता दर्शाने के लिए इस फिल्म में गालियों और बलात्कार के दृश्यों की भरमार थी।  नब्बे के दशक का सिनेमा रोमांस और मारधाड़ से भरी फिल्मों के बीच कही अपनी राह तलाश रहा था। ऐसे में फूलन के संवाद दर्शकों को हतप्रभ कर रहे थे। ज्यादा समय नहीं हुआ था जब स्मिता पाटिल का महज कुछ सेकंड्स का स्नान द्रश्य ( चक्र ) राष्ट्रीय  बहस बन गया था। उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि  फूलन की गालियां फिल्मों में यथार्थ दर्शाने के बहाने का सबब बनने वाली है । बायोपिक फिल्मों में भी काल्पनिक घटनाक्रम जोड़ देने वाले चतुर  फिल्मकार काल्पनिक फिल्मों में वास्तविकता का बघार लगाने के लिए गालियों की पगडंडिया तलाश ही लेते है। राम गोपाल वर्मा की आपराधिक पृष्ठ्भूमि पर कल्ट  बनी 'सत्या (1998) हिंसा के अलावा शाब्दिक हिंसा का भी पड़ाव रही। शेक्सपीयर के नाटकों को भाषा का मर्म और उसकी अलंकृत  सुंदरता की ऊंचाई के लिए सराहा जाता है। चार सौ वर्षों तक कोई साहित्य सम सामयिक बना रहे यह भाषा का ही कमाल है। परन्तु उनके ही नाटक ' ओथेलो ' पर आधारित ' ओंकारा (2006) अभिनेता सैफअली खान के गालिमय संवादों के लिए ज्यादा याद की जाती है। ताज्जुब की बात है कि सेंसर बोर्ड की चाकचौबंद घेराबंदी की बाद भी गालियुक्त संवादों से लबरेज फिल्मे बागड़ फलांग कर दर्शकों तक पहुँचती रही है। इश्किया (2010) देहली बेली (2011)  गैंग्स ऑफ़ वासेपुर (2012 )शूटआउट एट वडाला (2013 )एन एच 10 (2015) उड़ता पंजाब (2016) जैसी कुछ  फिल्मे अच्छे कथानक के बावजूद अपने संवादों के कारण अधिक चर्चित रही है।टाइटेनिक ' फिल्म से बुलंदियों पर पहुंचे लेनार्डो डी केप्रिया के प्रशंसकों को उनकी जेक निकलसन के साथ आई ' द डिपार्टेड ' और ' वुल्फ ऑफ़ वाल स्ट्रीट' बेहतर याद होगी। ये दोनों फिल्मे गालियों से इतनी भरी हुई थी कि फिल्म के अंत में दर्शक के जेहन में कहानी नहीं सिर्फ गालियां ही गूंजती रहती है। नेटफ्लिक्स पर हाल ही संपन्न हुई वेब सीरीज ' सेक्रेड गेम्स ' का कथानक दर्शक में रोमांच और उत्सुकता  का वैसा  संचार तो नहीं करता जैसा अनिल कपूर के 24 ( 2013 ) टीवी सीरीज ने किया था परन्तु गालियों के ओवरडोज़ से वितृष्णा का भाव जरूर जगा देता है। धीरे धीरे सामाजिक  ताने बाने, संस्कृति और भाषा में विकृतियाँ घोलती इस परंपरा को रोकना ही होगा। इस दिशा में सामूहिक प्रयास करने की जरुरत है। इस समस्या का हल दर्शकों को ही तलाशना होगा। उन्हें ऐसी फिल्मों और टीवी सीरीज को  को सिरे से नकारना होगा जिनके  निर्माताओं को उनकी सफलता  से यह ग़लतफ़हमी हो गई है कि वे जो परोस देंगे दर्शक उसे आसानी से निगल जाएगा ।अगर समय रहते पहल नहीं की गई तो  सिनेमा के परदे से गालियों को घर की बैठक में आने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। 

एक एक्टर एक फ़िल्म एक मील का पत्थर

 समय समय पर कुछ प्रयोगधर्मी फिल्मकार अपने क्राफ्ट से दर्शकों को चौकाने का प्रयास करते रहे है। दक्ष और अनुभवी कई फिल्मकारों ने इस तरह ...