Thursday, January 10, 2019

आभासी दुनिया के अँधेरे !

मनोवैज्ञानिकों  के मुताबिक सेल्फियों  फेसबुक , ट्विटर और व्हाट्सप्प  पर लगातार सम्पर्क में रहने वालों ने एक तरह से खुद अपना जीवन आवेगपूर्ण मुहाने पर ला खड़ा कर दिया है। यह जीवन का वह मुकाम बन गया है जहाँ मानसिक शांति की कोई जगह नहीं है। एक तरह से हरेक व्यक्ति अपने साथ अपना खुद का लेटर बॉक्स साथ लिए घूम रहा है।
 'पहुँचते ही खत लिखना या अपनी खेर खबर देते रहना या खतो किताबत करते रहा करो जैसे वाक्य अब कोई नहीं बोलता। नई पीढ़ी को तो यह भी नहीं मालुम है कि इन शब्दों में कितनी आत्मीयता और आग्रह छुपा हुआ होता था। कुछ लिखकर उसके जवाब का  इन्तजार कितना रोमांचकारी होता था , अब बयान नहीं किया जा सकता। तकनीक ने कई ऐसी चीजों को बाहर कर दिया है जो आत्मिक लगाव की पहचान हुआ करती थी। प्रेमियों के बीच होने वाले पत्राचार ने कई लोगों को साहित्यकार बना दिया था। अपने जज्बात कागज़ पर उंडेलकर उसे प्रेमी तक पहुंचाने का रोमांच आज महसूस नहीं किया जा सकता। मिर्जा ग़ालिब ने लिखा था ' कासिद के आते आते  खत इक और लिख रखु , में जानता हु वो जो लिखेंगे जवाब में ' या फ़िल्मी गीतों में प्रमुखता से नजर आई   ' लिखे जो खत  तुझे वो तेरी याद में ' या मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज ना होना ' या ' फूल तुम्हे भेजा है खत में , फूल नहीं मेरा दिल है - जैसी भावनाए आज न समझाई जा सकती न उनके समझने की उम्मीद की जा सकती है। 
 कई खूबियों वाले स्मार्ट फ़ोन ने  सबसे नकारात्मक असर जो समाज को दिया है वह है आत्म मुग्ध और आत्म केंद्रित स्वभाव।खुद की फोटो निकलना और उसे निहारना एक ऐसा जूनून बन चूका है जिसने व्यक्ति को आत्म केंद्रित बना दिया है।  यहाँ मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए हुई दुर्घटनाओं की बात भी बेमानी है। अकेले मोबाइल फ़ोन की वजह से हुई दुर्घटनाओं के इतने  वाकये हो चुके है कि उन्हें अब सामान्य मान लिया गया है।
 अब स्मार्टफोन की वजह से हुए सामाजिक  प्रभावों पर गौर करना जरुरी हो गया है। वह समय गया जब पूरा मोहल्ला व्यक्ति के संपर्क में रहता था परन्तु चंद लाइक और कुछ कमैंट्स की चाहत ने उसे अकेलेपन की और धकेल दिया है।  आभासी दुनिया के मित्र उसकी दुनिया बन गई है। बड़ी मित्र संख्या का दम भरने वाले अधिकांश लोगों के समक्ष इस तरह की हास्यास्पद स्थिति निर्मित होती रही है जब उनकी पोस्ट पर बिला नागा टिपण्णी करने वाले लोग उनके सामने से बगैर मुस्कुराए गुजर जाते है।   व्यक्ति क्षणे क्षणे  समाज से कटता जा रहा है परन्तु उसे इस वक्त एहसास नहीं हो रहा है। प्रदर्शन प्रियता हरेक मनुष्य की जन्मजात सहज प्रवृति रही है। सोशल साइट्स ने इसे विस्फोटक स्तर पर ला खड़ा किया है। नितांत निजी पलों को भी लोग बेखौफ इन साइट्स पर शेयर करने  से नहीं हिचकिचाते भले ही लोग उनके इस कृत्य  पर मजाक बनाते हो।  किसी अवसर विशेष पर कही और से आये संदेशों को फॉरवर्ड करते समय भी  महसूस ही नहीं होता कि इन उधार  की पंक्तियों में स्नेह और प्रेम की रिक्तता है।  उम्मीद थी कि स्मार्ट फोन दूरिया घटाने में मदद करेंगे परन्तु उनका  उल्टा ही असर होते दिख रहा है।  औपचारिकता ने  सहजता को बेदखल कर दिया है। जन्मदिन हो या और कोई विशेष अवसर अब लोग पहले से कही ज्यादा बधाइयाँ भेजते है परन्तु यह काम भी केवल इसलिए किया जाता है ताकि सामने वाले को जताया जा सके कि हमें उसकी फिक्र है। सोशल मीडिया ने हमारे लिए  इतने सारे इमोजी और स्टिकर विकसित कर दिये है कि हमें दिमाग को तकलीफ देने की जरुरत नहीं पड़ती। हर अवसर के लिए हमारे पास रेडीमेड शुभकामनाओ का भण्डार है। 
 जरुरत से व्यसन बन चुके मोबाइल फ़ोन का जीवंत  उदहारण देखना हो तो किसी रेल या  बस यात्रा को देखिये। पिछले माह भोपाल से हैदराबद की लम्बी रेल यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ था तो स्मृतियों में दो  दशक पूर्व इसी तरह दक्षिण भारत प्रवास की झलकियां स्मरण हो आई। उस दौरान हरेक यात्री के पास एक किताब जरूर होती थी।   महज एक दशक पहले तक  सफर में यात्री कुछ न कुछ पढ़ते नजर आते थे। अब बिरला ही कोई ऐसा शख्स दीखता है जिसके पास किताब हो। अब  हर झुकी  गर्दन सिर्फ अपने मोबाइल में गुम नजर आती है। ट्रैन के बाहर बदलता परिदृश्य और प्रकृति किसी को भी नहीं लुभाती। कई अध्यनो और शोध में इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि आँखों के सामने से गुजरने वाले शब्द मस्तिष्क में चित्रों का निर्माण करते है , यह काम मस्तिष्क के विकास के लिए बेहद अहम् है।  दूसरी और नन्ही स्क्रीन पर नाचते चित्र सिर्फ आँखों को थकाने के अलावा कोई सकारात्मक काम नहीं करते ,कम से कम  मस्तिष्क की सक्रियता के लिए तो कुछ भी नहीं !
   कोई माने या न माने परन्तु एक दिलचस्प  जापानी हास्य  कहावत को अमल में लाने का समय आ गया लगता  है -  ' मोबाइल फ़ोन ने आपके कैमरे को बाहर किया , आपके म्यूजिक सिस्टम को बाहर किया , आपकी किताबों को बाहर किया , आपकी अलार्म घडी को बाहर किया ! प्लीज अब  उसे आपके परिवार और मित्रों को बाहर न करने देवे ! 

Wednesday, January 2, 2019

शिल्पों की नगरी में फिल्मे : खजुराहो फिल्मोत्सव

धीरे धीरे आकार ले रहे ' अंतराष्ट्रीय खजुराहो फिल्म फेस्टिवल ' ने इस वर्ष चौथे वर्ष में प्रवेश किया है। विश्व हेरिटेज साइट खजुराहो  पर होने वाला यह अपनी तरह का पहला फिल्म समारोह है। हर वर्ष दिसंबर माह में होने वाले इस महोत्सव की निरंतरता अभिनेता निर्माता एवं सामजिक कार्यकर्ता राजा बुंदेला के अथक प्रयासों से संभव हुई है। मध्य प्रदेश जैसे केंद्र में स्थित राज्य में फिल्म निर्माण की असीम सम्भावनाओ को तलाशने का भागीरथी प्रयास है खजुराहो फिल्म महोत्सव। यह फिल्मोत्सव इस लिहाज से भी अनूठा है कि यह सीधे आम लोगों तक पहुँचने का प्रयास करता है , उनकी रोजमर्रा की समस्याओ के हल ढूंढते हुए सामजिक जनचेतना जगाने का प्रयास करता है। सात दिनों तक चले इस फिल्मोत्सव में शार्ट फिल्मो के अलावा हिंदी की लोकप्रिय फिल्मे और विदेशी फिल्मो का प्रदर्शन अस्थायी टपरा टाकिजों में आम दर्शकों के लिए निशुल्क किया गया।

   ' टपरा टाकीज़ ' एक ऐसी ही पहल है जो साधनहीन दर्शक को सीधे सिनेमा से जोड़ने का प्रयास करता है। दक्षिण भारत में लोकप्रिय इस तरह के टाकीज़ सिनेमा को समाज के आखरी छोर पर बैठे दर्शक के पास ले जाता है। प्राकृतिक संसाधनों और दृश्यावली से संपन्न बुंदेलखंड विकास की बाट जोह रहा है। राजा बुंदेला सिनेमा के रास्ते इस क्षेत्र को मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश कर रहे है।  एक साक्षात्कार में  बात करते हुए उन्होंने इस बात पर अफ़सोस व्यक्त किया कि  पर्यटन की असीम संभावना के बावजूद सरकारों ने इसे रेल एवं  हवाई मार्ग से उस तरह से नहीं जोड़ा है जैसी की आवश्यकता है।
यद्धपि  राजा बुंदेला अपने संपर्कों और संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से इस हेरिटेज साइट को जनचर्चा में शामिल करने में सफल रहे है। एक अन्य प्रश्न के जवाब में वे बताते है कि सिनेमा को सिंगल स्क्रीन की और लौटना ही होगा क्योंकि देश का एक बड़ा दर्शक वर्ग मल्टीप्लेक्स के टिकिट नहीं खरीद सकता है। एक   सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि सिनेमा से गाँव लगभग लुप्त हो चुके है , वे अपने  प्रयासों से सिनेमा को फिर से गाँवों की और ले जाना चाहते है। 
नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम जैसी वीडियो स्ट्रीमिंग साइट के बढ़ते स्वरुप को वे समय की मांग बताते है। परन्तु इन साइट्स पर बढ़ती यौनिकता और गाली गलौज की भाषा के लिए भी चिंता जाहिर करते है। भारतीय समाज के दोहरे मापदंडों पर बात करते हुए वे कहते है कि हमने सेक्स को वर्जित बनाकर रख दिया है जिसकी वजह से यह अंतिम समय तक दिमाग में हलचल मचाये रखता है जबकि पश्चिम के लोग पच्चीस की उम्र में ही इससे ऊपर उठ जाते है यही वजह है कि नेटफ्लिक्स जैसे पोर्टल इस बात का फायदा उठाकर इसे धड़्डले से बेचते रहते है। 
  वे इस बात पर उत्साहित है कि खजुराहो फिल्मोत्सव कई शौकिया फिल्मकारों की नर्सरी बन रहा है। विदित हो कि इस फिल्मोत्सव में एक दर्जन से ज्यादा फिल्मे स्थानीय कलाकारों ने अपनी फिल्मों का प्रदर्शन किया है । इन फिल्मकारों का उत्साह वर्धन करने के लिए उन्हें  फिल्म के प्रदर्शन के बाद स्टेज पर सम्मानित भी किया गया । 
सात दिवसीय  चकाचौंध भरे इस आयोजन के समापन  में कई नामचीन लोगों की उपस्थिति रही।  विशेष रूप से  अभिनेता अनुपम खेर , राजनीतिज्ञ अमर सिंह , केंद्रीय मंत्री सुदर्शन और फिल्मकार बंसी कौल आदि ने फिल्मो को लेकर अपने अनुभव साझा किये। 
 इस महोत्सव की उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि सभी फिल्मकार लोगों से सहजता से मिल रहे थे। आयोजकों को पुलिस प्रशासन की मदद नहीं लेना पड़ी। दो डिग्री तापमान के बावजूद पर्यटकों और स्थानीय लोगों की उत्साहपूर्वक  उपस्तिथि बताती है कि खजुराहो फिल्मोत्सव अपने उद्देश्य में  सफल रहा। 

Tuesday, December 25, 2018

एक बार फिर बिखर गया ऑस्कर का सपना


कई दशकों तक हम फिल्मे देखने वालों को ' ऑस्कर ' से लगाव नहीं था।  हम हमारे ' फिल्म फेयर ' से खुश थे। परन्तु 2001 में ' लगान ' का ऑस्कर की विदेशी भाषा श्रेणी में चयन होना हमारी महत्वकांक्षाओ को पंख लगा गया। यद्धपि ' लगान ' पिछड़ गई परन्तु हमारे फिल्मकारों को एक सुनहरा सपना दिखा गई। न सिर्फ फिल्मकार वरन आम दर्शक भी यही चाहने लगा कि लॉस एंजेलेस के कोडक थिएटर के रेड कार्पेट पर भारतीय अभिनेताओं को चहल कदमी करता देखे। इस दिवा स्वप्न के आकार लेने की एकमात्र वजह थी भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्वीकार्यता मिलती देखने की लालसा क्योंकि भारत आज भी हर वर्ष  दुनिया भर में बनने वाली कुल फिल्मों की संख्या की आधी फिल्मे बनाता है। अगर संख्या के आधार पर ही ऑस्कर मिलता तो हम निश्चित रूप से सबसे आगे होते , बदकिस्मती से ऐसा संभव नहीं है। 
हमारे लिए यह जानना जरुरी है कि ' ऑस्कर ' सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी फिल्मों के लिए है। 1929 से आरम्भ हुए इस  फ़िल्मी पुरूस्कार में विदेशी भाषा की फिल्मों को शामिल करने की शुरुआत 1956 में हुई थी।  ठीक इसी के आसपास भारत में फिल्म फेयर अवार्ड्स शुरू हुए थे। 1958 में ' मदर इंडिया ' पहली भारतीय फिल्म बनी जिसे विदेशी भाषा श्रेणी में पुरुस्कृत होने का गौरव मिला था।  चूँकि नब्बे के दशक के आते आते टेलीविज़न ने सेटेलाइट के जरिये  अपना दायरा फैलाना आरम्भ कर दिया था तो ऑस्कर समारोह का प्रसारण अमरीकी महाद्वीप से निकलकर खुद ब खुद पूरी दुनिया को मोहित करने लगा था। भव्यता , अनूठापन , ताजगी और चकाचौंध से लबरेज यह समारोह दुनिया के साथ भारत को भी अपने आकर्षण में बाँध चूका था। देश में ऑस्कर को लेकर जूनून बढ़ने की एक वजह यह भी थी कि  नब्बे के दशक आते आते ' फिल्म फेयर ' अपनी साख गंवाने लगे थे। नए टीवी चैनल खुद अपने ही अवार्ड्स बांटने लगे थे। प्रतिभा और गुणवत्ता की जगह चमक धमक शीर्ष पर आगई थी। रेवड़ियों की तरह बटने वाले पुरुस्कारों ने फ़िल्मी पुरुस्कारों की विश्वसनीयता को धरातल पर ला दिया था। फिल्म फेयर की साख 1993 में उस समय रसातल में चली गई थी जब स्टेज पर  डिम्पल कपाड़िया ने बगैर लिफाफा खोले अनिल कपूर को बेस्ट एक्टर घोषित कर दिया था जबकि कयास आमिर खान के लगाए जा रहे थे।
   यद्धपि हालात आज भी ज्यादा नहीं बदले है। आज भी इन पुरुस्कारों को इतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जितनी उत्सुकता से ऑस्कर का इंतजार किया जाता है। भारत की और से अभी तक 50  फिल्मे इस समारोह में हिस्सा ले चुकी है। 2019 के लिए भारत की और से भेजी गई असमी भाषा की फिल्म ' विलेज रॉकस्टार ' इस क्रम में इक्क्यावनवी फिल्म थी जो अगले राउंड में जाने के लिए उपयुक्त वोट हासिल न कर सकी और बाहर हो गई। भारत की और से इस श्रेणी में भेजी जाने वाली फिल्मों का चयन भी उनके फ़ाइनल में न पहुँचने की बड़ी वजह रहा है। पक्षपात और अपनों को  उपकृत करने के खेल ने कई अच्छी फिल्मों को ऑस्कर नहीं पहुँचने दिया है। 
ऑस्कर के लिए भारत से भेजी जाने वाली फिल्मों का चयन फिल्म फेडरेशन ऑफ़ इंडिया द्वारा नियुक्त एक स्वतंत्र जूरी करती है जिसमे ग्यारह सदस्य है। यह जूरी कब फिल्मे देखती है और कब उनका चयन करती है यह बहुत बड़ा रहस्य है। क्योंकि फ़िल्मी दुनिया के वरिष्ठ और धाकड़ लोगों को भी ठीक ठीक पता नहीं है कि इस जूरी में कौन कौन लोग है। अतीत में जिस तरह की फिल्मे ऑस्कर के लिए भेजी गई है उससे इस चयन प्रक्रिया पर ही सवाल उठते रहे है। 1996 में इंडियन ' 1998 में ऐश्वर्या अभिनीत ' जींस ' 2007 में ' एकलव्य ' 2012 में ' बर्फी ' जैसे कुछ उदहारण है जो बताते है कि राजनीति और भाई भतीजावाद की भांग यहाँ भी घुली  हुई है। 
आगामी 24 फ़रवरी को जब समारोह पूर्वक ये पुरूस्कार वितरित किये जाएंगे तब हम सिने प्रेमी ' बेगानी शादी ' में ताकझांक करते शख्स की तरह टीवी पर नजरे गढ़ाए आहे भर रहे होंगे। हम और कर भी क्या सकते है ! 

Wednesday, December 5, 2018

MOWGLI: This is not a review . मोगली - यह समीक्षा नहीं है

दूरदर्शन ने अपने स्वर्णिम दिनों में ' जंगल बुक ' की एनिमेटेड सीरीज प्रसारित की थी। यधपि इस जापानी सीरीज को हिंदी वॉइसओवर के साथ के साथ दिखाया गया था जिसके लिए गुलजार साहब ने शीर्षक गीत लिखा था ' जंगल जंगल बात चली है पता चला है , चड्डी पहन के फूल खिला है ' आज पच्चीस बरस बाद भी हर छोटे बड़े की जुबान पर है। कोईआश्चर्य नहीं कि भारत में जन्मे ब्रिटिश लेखक रुडयार्ड किपलिंग की कहानियों पर बनी ' जंगल बुक ' की लोकप्रियता आज भी  बरकरार है। इन कहानियों के केंद्रीय पात्र मोगली और जंगली जानवरों के सहअस्तित्व ने दर्शकों के अवचेतन में सभ्य समाज और जंगल के कानून के विरोधाभास को सहजता से उतार दिया है।   तकरीबन ढेड़ सदी पहले लिखी गई कहानियों ने एक कालजयी पुस्तक ' जंगल बुक ' का रूप लिया और कई पीढ़ियों की कल्पना में रंग घोलते हुए आज भी दर्शकों को लुभाने की क्षमता  बरकरार रखी  है।  इन कहानियों से प्रेरणा लेकर नई  कहानिया ,नाटक और फिल्मों का निर्माण लगातार हो रहा है। यह दुखद आश्चर्य है कि भारत की पृष्ठभूमि पर आधारित इन कहानियों को फिल्माने में भारतीय सिनेमा पीछे रहा है। हॉलीवुड में हर काल खंड में इन कहानियों को दोहराया गया है। संभवतः मोगली की मासूमियत और जानवरों की दुनिया के दुस्साहस का रोमांच इसके लगातार दुहराव की वजह बना है। विज़ुअल इफ़ेक्ट और कंप्यूटर जनित दृश्यों के तालमेल ने फिल्मकारों की कल्पना को नए पंख दिए है। शीघ्र प्रदर्शित हो रही फिल्म ' मोगली ' में हॉलीवुड के बड़े सितारों और वीएफएक्स की मदद से दर्शनीय कारनामा रचा गया है। एंडी सर्किस के निर्देशन में बनी ' मोगली लीजेंड ऑफ़ द जंगल ' ' सिनेमाघरों में  3D के साथ और  नेटफ्लिक्स पर  टीवी दर्शकों के लिए  एक साथ  प्रदर्शित की जायेगी। मोगली ' में भारतीय मूल के रोहन चंद मुख्य भूमिका में है  आदिवासी लड़की की भूमिका फ्रीडा पिंटो ( स्लमडॉग मिलेनियर) ने निभाई है। फिल्म के अंग्रेजी संस्करण में हॉलीवुड के बड़े सितारों  क्रिस्चियन बेले , केट ब्लैंचेट , नाओमी हरिस , एंडी सर्किस आदि ने  अपनी आवाज दी है वही हिंदी वर्शन में अभिषेक बच्चन , जैकी श्रॉफ , करीना कपूर , अनिल कपूर  और माधुरी दीक्षित जैसे बड़े नामों ने अपनी आवाज दी है। 
किसी फिल्म के विचार से लेकर उसके दर्शकों तक पहुँचने में कितना समय लगता है , मोगली ' के बनने की कहानी को देखकर समझा जा सकता है। वार्नर ब्रदर्स ने 2012 में इस फिल्म के बारे में बात करना आरम्भ किया और स्टीव क्लोव , रोन हॉवर्ड ,एलेजैंड्रो गोंजालेज जैसे निर्देशकों से संपर्क किया परन्तु बात नहीं बनी अंत में एंडी सर्किस को जिम्मेदारी सौपी गई जो ' राइज ऑफ़ प्लेनेट ऍप जैसी चर्चित फिल्म निर्देशित कर चुके थे। 2014 में फिल्म के कलाकारों का चयन किया गया और 2015 में फिल्म की शूटिंग दक्षिण अफ्रीका में आरम्भ हुई। 2016 के अक्टूबर में फिल्म को रिलीज़ करना तय किया गया परन्तु एन वक्त पर महसूस हुआ कि  विज़ुअल इफेक्ट इतने प्रभावशाली नहीं है। चुनांचे विसुअल इफ़ेक्ट पर फिर से काम आरम्भ हुआ। इसी दौरान वाल्ट डिज्नी निर्मित ' जंगल बुक ' प्रदर्शित हो गई। दोनों के बीच अंतर रखने के लिए ' मोगली 'में इस बार जानबूझकर देरी की गई। 2018 में वार्नर ब्रदर्स ने मोगली के कॉपी राइट वीडियो स्ट्रीमिंग साइट नेटफ्लिक्स को बेच दिए जो इसे अब अपने प्लेटफार्म के साथ सिनेमाघरों में भी 7 दिसंबर को  प्रदर्शित करेगा। 
एंडी सर्किस की टीम में शामिल नामों को देखकर उम्मीद की जा सकती है कि '  मोगली लीजेंड ऑफ़ द जंगल   ' बॉक्स ऑफिस पर चमत्कार कर जायेगी। माइकेल सरसीन - डायरेक्टर ऑफ़ फोटोग्राफी (वॉर फॉर प्लेनेट ऑफ़ एप ) गेरी फ्रीमैन -प्रोडक्शन डिज़ाइनर (टॉम्ब राइडर ) मार्क संगेर -एडिटर ( ग्रेविटी ) नितिन साहनी -संगीत ( ब्रीथ ) जैसे पेशेवर ' मोगली ' से उम्मीद बड़ा देते है। 

Tuesday, November 27, 2018

This is not a review ....पीहू - यह समीक्षा नहीं है !

पिछले दिनों प्रदर्शित हुई फिल्म ' पीहू ' अपने धमाकेदार कथानक की वजह से  दर्शकों के एक बड़े वर्ग को अपनी और आकर्षित करने में सफल हुई। यद्धपि फिल्म में कोई व्यस्क एक्टर नहीं है परन्तु दो वर्ष की नन्ही लड़की मायरा विश्वकर्मा इस फिल्म की वास्तविक स्टार है। ' पीहू '  दरअसल हमारे बिखरते  पारिवारिक ताने बाने के खतरनाक परिणामों की झलक भर है। हम समय के जिस दौर से गुजर रहे है उसकी कठोर वास्तविकताओं का यह एक ट्रेलर भर  है। इस दौर के नए  माता पिताओ में अहम् को लेकर जो गलतफहमियां पनपती है उसके क्या परिणाम हो सकते है फिल्म इस बात को डरावने ढंग से दर्शाती है। माता पिता के बिगड़ते संबंधों का बड़े शहरों में बच्चों पर क्या असर होता और उन्हें किस बात का ध्यान रखना चाहिए जैसे संजीदा मसले पर चेतावनी देने का प्रयास करती है।  आमतौर पर भारतीय दर्शक इस तरह की फिल्मों के आदी नहीं है। दो साल की बच्ची एक दिन सुबह जागती है तो पाती है कि घर में कोई नहीं है।  उसकी माँ बिस्तर पर लेटी  हुई है।  नन्ही पीहू समझ नहीं पाती कि उसकी माँ ने आत्महत्या कर ली है। घर का सामान एक बच्चे के लिए कितना ख़तरनाक हो सकता है फिल्म इसे डिटेल में बताती है।  वाशिंग पाउडर , फिनाइल बोतल , घर की बालकनी की रेलिंग , पल पल पीहू को एक नए खतरे की तरफ  ले जाती है।   इस रोमांचक फिल्म में एक ' कल्ट फिल्म ' बनने के सभी तत्व मौजूद है। तीन महीने में चौंसठ घंटे की शूटिंग के बाद सौ मिनिट की फिल्म में बेहद तनाव और धड़कन बड़ा देने वाले  दृश्यों को शामिल किया गया है। पीहू को हॉलीवुड कॉमेडी  फिल्म ' होम अलोन ' का डरावना रूप भी कहा जा सकता  है। 
नैशनल अवार्ड विनर डॉक्यूमेंट्री ' कांट टेक धिस शिट एनिमोर ' और ' मिस तनकपुर हाजिर हो ' से पहचान बना चुके विनोद कापरी ने इस फिल्म को लिखने के साथ निर्देशित भी किया है। दो साल की बच्ची से अभिनय कराना बहुत ही चुनौती भरा काम है जिसमे वे एक हद तक सफल रहे है। अनूठे विषय पर फिल्म बनाकर दर्शकों को रोमांचित कर देने वाले फिल्मकारों को सफलता मिलनी ही चाहिए। पैतालीस लाख के बजट में बनी ' पीहू ' बॉक्स ऑफिस पर ढाई  करोड़ कमा चुकी है।फिल्म में कही भी हल्का फुल्का माहौल नहीं है। फिल्म देख रहा दर्शक निश्चित रूप से एक पालक भी होता है और  अकेली पीहू अगले पल कौनसा दुस्साहस कर बैठेगी सोंचकर ही उसका  मन कंपकंपा जाता है। कमजोर और भावुक लोगों के लिए यह फिल्म बिलकुल नहीं है। 


Tuesday, November 20, 2018

शादी : बरबादी या आबादी


सितारों की शादियां उनके प्रशंसकों के लिए अविस्मरणीय अनुभव होती  है।  रील लाइफ से रियल लाइफ में रोमांस घटित होना उन्हें  परियों की कहानियों की तरह रोमांचित कर जाता है। सात समुन्दर पार इटली में दीपिका संग रणवीर सिंह ने पुरे रस्मों रिवाज के साथ सात फेरे लिए है। सफलतम लोगों का विवाह आमजन के लिए भी कौतुक का विषय रहा है। इस जूनून को  भुनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर के समाचार पत्र और टीवी चैनल जरुरी ख़बरों को दरकिनार करते हुए अपना कीमती स्पेस इस तरह के बहु प्रचारित  विवाह को  समर्पित करते रहे है। ये विवाह इस लिहाज से भी दिलचस्प होते है कि अमूमन दूल्हा  दुल्हन अपनी स्क्रीन इमेज से उलट जिंदगी जीते हुए अतीत में एक से अधिक नामों के साथ जुड़कर  चर्चित हो चुके होते है। उनके प्रशंसक सिर्फ यही दुआ कर सकते है कि यह विवाह सालों साल टिक जाय बस !
फ़िल्मी दुनिया की शादियां मनोवैज्ञानिकों और समाज शास्त्रियों के लिए अध्धयन का विषय होना चाहिये क्योंकि इनका लगाव और अलगाव सामान्य व्यक्ति के मनोभावों को प्रभावित करता रहा है। दर्शक अपनी पसंदीदा नायिका को लेकर विशेष संवेदनशील रहे है। अक्सर देखा गया है कि इस तरह विवाह असफल हो जाने पर नायक के कॅरिअर पर कम ही असर पड़ता है परन्तु नायिका का कॅरिअर तबाह हो जाता है। दुर्भाग्यवश  यह सामाजिक अंतर्विरोध भारत में ही देखने को मिलता है। बॉलीवुड के वैवाहिक इतिहास खंगालने  पर  कई  दिलचस्प बातें नजर आती है।
भारतीय सिने  इतिहास की पहली सुपर स्टार देविका रानी ने बीस वर्ष की उम्र में अपने से सोलह वर्ष बड़े हिमांशु राय से विवाह किया था। बारह वर्ष चला यह वैवाहिक जीवन हिमांशु राय की मृत्यु से ख़त्म हुआ था। देविका हिमांशु राय की लगभग सभी फिल्मों की नायिका रही थी। इस जोड़ी की अभिनीत ' कर्मा ' (1933) में फिल्माया गया चार मिनिट का  चुंबन दृश्य आज पिच्चासी वर्ष बाद भी दुनिया के सबसे लम्बे चुंबन दृश्य में शुमार किया जाता है। फिल्मों से रिटायर होने के बाद देविका रानी ने दूसरा विवाह रुसी चित्रकार स्वेतोस्लाव रोएरिक से किया था।  महज अड़तीस  वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह देने वाली बहुआयामी प्रतिभाशाली अभिनेत्री मीना कुमारी ने अपने से उम्र में दुगने  बड़े कमाल अमरोही से अठारह वर्ष की उम्र में विवाह किया था जिसकी परिणीति तलाक में हुई थी। हिंदी सिनेमा की ' गॉडेस ऑफ़ वीनस ' और मर्लिन मोनरो का भारतीय संस्करण मधुबाला का वैवाहिक जीवन भी दुखद ही रहा था।  वे दिलीप कुमार से प्रेम करती थी परन्तु उनके पिता इस विवाह के सख्त खिलाफ थे चुनांचे उन्होंने अल्हड किशोर कुमार में सुकून तलाशना चाहा जहाँ उन्हें निराशा के अलावा कुछ नहीं मिला। दिल की मामूली बिमारी ने उन्हें छतीस बरस की उम्र में ही मौत का शिकार बना दिया था।सौंदर्य और प्रतिभा का संगम रेखा के विवाह को लेकर कई अफवाहे हर दौर में उड़ती रही थी। दिल्ली के व्यवसायी मुकेश अग्रवाल के साथ हुआ उनका विधिवत विवाह सिर्फ एक वर्ष में मुकेश अग्रवाल की आत्म ह्त्या से ख़त्म हुआ था। किरण कुमार , विनोद मेहरा से उनके तथाकथित विवाह के सबूत कभी सामने नहीं आये। अनुपम सौंदर्य , प्रतिभा और बेहतर अवसर के बावजूद इन  तीनों अभिनेत्रियां ( मीना कुमारी, मधुबाला और रेखा) का वैवाहिक जीवन असफल ही रहा था।
आज के दौर के अधिकांश सफल सितारों के विवाह आश्चर्यजनक रूप से अपनी मंजिल पर नहीं पहुँच पाये। नारीत्व सौंदर्य की मूर्ति मनीषा कोइराला अपने पति सम्राट दहल से फेसबुक पर मिली थी परन्तु मात्र दो वर्ष भी वे श्रीमती नहीं रह पाई और सम्राट से अलग हो गई। एक समय बच्चन बहु बनते बनते रही करिश्मा कपूर ने दिल्ली के व्यवसायी संजय कपूर से विवाह किया परन्तु  एक दशक साथ रहने के बाद अलग हो गई। ऋतिक रोशन -सुजैन खान को 14 वर्ष में समझ आया कि वे एक दूसरे के लिए नहीं बने है। सैफ अली अमृता सिंह तेरह  वर्ष साथ रहे , फरहान अख्तर अधाना के साथ पंद्रह वर्ष , पूजा भट्ट मनीष मखीजा ग्यारह वर्ष , आमिर खान रीना दत्ता पंद्रह वर्ष , कमल हासन सारिका ग्यारह वर्ष , कमल हासन वाणी गणपति दस वर्ष और कमल हासन गौतमी तेरह  वर्ष वैवाहिक जीवन जीने के बावजूद विवाह नाम की संस्था को समझ नहीं पाए। मलाइका अरोरा अरबाज को अठारह वर्ष बाद समझ आया कि उनका विवाह गलत था। इसी तरह कल्कि कोचलिन और अनुराग कश्यप चार वर्ष में ही साथ फेरों के बंधन से मुक्त हो गए।
इस तरह के असफल विवाहों की वजह से ही कुछ चर्चित विनोद पूर्ण कहावते अस्तित्व में आई है जैसे ' विवाह एक ऐसा पिंजरा है जिसमे बंद पंछी बाहर जाने को उतावले है और बाहर उन्मुक्त उड़ रहे अंदर जाने को।   

Friday, November 16, 2018

एक एक्टर एक फ़िल्म एक मील का पत्थर




 समय समय पर कुछ प्रयोगधर्मी फिल्मकार अपने क्राफ्ट से दर्शकों को चौकाने का प्रयास करते रहे है। दक्ष और अनुभवी कई फिल्मकारों ने इस तरह का जोखिम या तो अपने करियर की शुरुआत में ले ही  लिया था या तब जब उमके पाँव चिकनी सिनेमाई जमीन पर गहरे जम चुके थे। जरुरी नहीं है कि सारे नवीन प्रयोगों की शुरुआत हॉलीवुड से ही हुई हो। कुछ मील के पत्थर भारतीय फिल्मकारों ने भी स्थापित किये है किंतु उनके बारे में  भारतीय दर्शक कम ही  ही जानते है । ऐसा ही एक अनूठा प्रयोग एक्टर प्रोडूसर सुनील दत्त ने अपनी कई सफल फिल्मों के बाद किया था। ' मुझे जीने दो ' और  ' गुमराह ' की सफलता से लबरेज सुनील दत्त ने 1964 में ' यादे ' का निर्माण किया था। इस फिल्म के निर्देशक और अभिनेता भी वे खुद ही थे। इस फिल्म की विशेषता थी इसमें एक मात्र किरदार का होना। 100 मिनिट की इस फिल्म में सुनील दत्त ने एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका निभाई थी जिसे घर आने पर पता चलता है कि उसका परिवार उसे छोड़कर जा चूका है। अपने एकालाप में वह खुद को तसल्ली दने की कोशिश करता है कि जल्द ही हालत सुधर जाएंगे और सब कुछ ठीक हो जाएगा। नायक के निराशा , पश्चाताप  और कुंठा के पलों को सुनील दत्त ने बखूबी जीवंत किया था।  ब्लैक एंड वाइट में बनी इस फिल्म में ध्वनि , प्रकाश और अँधेरे के संयोजन से मनोभावों का चित्रण उल्लेखनीय था। इस उपलब्धि के लिए उस वर्ष का फिल्म फेयर  सिनेमटोग्राफी अवार्ड और नेशनल अवार्ड ' यादें ' ने अर्जित किया था। चूँकि यह प्रयास मील का पत्थर था तो ' गिनिस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड ' का भी ध्यान इस तरफ जाना था। उपलब्धियों की इस वैश्विक किताब ने ' यादें ' को पहली इकलौती एक अभिनेता वाली फिल्म की  अपनी सूचि में शामिल कर सम्मानित किया। 
यादें ने दुनिया को फिल्मों की एक नयी श्रेणी और अनूठे फिल्म मेकिंग के तरीके से अवगत कराया था। इसकी प्रेरणा से हॉलीवुड ने भी विगत वर्षों में कई दिलचस्प और दर्शनीय ' एक पात्र ' वाली  फिल्मे निर्मित की है। हॉलीवुड  सिनेमाई इतिहास में सबसे लोकप्रिय और सफल फिल्मकार स्टीवन स्पीलबर्ग ने अपनी पहली   फिल्म ' डुएल ' (1971) इकलौते पात्र डेनिस वीवर की मदद से  बनाई थी। कैलिफ़ोर्निया की सुनसान घाटियों में नायक की कार एक दैत्याकार ट्रक से  कुचलने के प्रयास से अपने को बचाने की कवायद के कथानक पर आधारित थी। साठ के दशक में अपनी सुंदरता और अभिनय से वैश्विक लोकप्रियता हासिल कर चुकी ' इंग्रिड बर्गमन ' ने ' द ह्यूमन वॉइस (1966) में एक ऐसी महिला का किरदार निभाया था जिसका प्रेमी उसे विवाह के ठीक एक दिन पहले किसी अन्य महिला के लिए छोड़ देता है। मात्र इक्यावन मिनिट की टेलीविजन के लिए बनी फिल्म भावनाओ का ऐसा ज्वार निर्मित करती है जिसके साथ बहने से दर्शक खुद को रोक नहीं पाता। एक मात्र पात्र अभिनीत फ्रेंच फिल्म ' द मैन हु स्लीप (1974) किसी व्यक्ति का बाहरी दुनिया से क्षणे क्षणे दूर होते जाने की प्रक्रिया को विस्तार से चित्रित करती है। यधपि कुछ फिल्मों में एक से ज्यादा पात्र रहे है परन्तु पूरी फिल्म केंद्रीय पात्र के आस पास ही घूमती है।  रोबर्ट ज़ेमिकिस निर्देशित और टॉम हेंक अभिनीत ' कास्ट अवे (2000) ऐसी ही फिल्म है जिसका नायक निर्जन टापू पर फंसकर चार साल बिताता है। डेनी बॉयल निर्देशित '127 अवर (2010) आई एम् लीजेंड (2007) ग्रेविटी (2013 ) कुछ ऐसी फिल्मे है जिसमे दो तिहाई से ज्यादा समय तक कैमरा एक ही पात्र पर केंद्रित रहता है। 
2005 में कन्नड़ फिल्म  ' शांति ' गिनीस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल होने वाली दूसरी फिल्म बनी। बारागुरु रामचन्द्रप्पा लिखी और निर्देशित इस फिल्म की इकलौती किरदार कन्नड़ अभिनेत्री भावना थी। इकलौती कास्ट की श्रेणी में तमिल फिल्म ' कर्मा (2015) ने एक कदम आगे बढ़कर नया प्रयोग  किया। मर्डर मिस्ट्री के कथानक  और शानदार बैकग्राउंड संगीत की मदद से दर्शक को पलक भी न झपका देने को मजबूर कर देने वाली इस फिल्म का क्रेडिट सिर्फ एक लाइन का है। लेखक , निर्माता , निर्देशक और अभिनेता - आर अरविन्द। दो पात्रो के बीच घटित एक घंटे के वार्तालाप पर आधारित इस फिल्म को दूसरी बार देखने पर महसूस होता है कि एक ही अभिनेता ने दोनों भूमिका निभाई है। लगभग इसी तरह एक पात्र के इर्दगिर्द घूमती शुजीत सरकार की 2008 में निर्मित अमिताभ बच्चन अभिनीत   ' शूबाइट ' 2019 में दर्शको तक पहुँच सकती है। कानूनी विवादों में फंसी इस फिल्म का कथानक यूनिवर्सल अपील लिए है इसलिए समय का अवरोध इसके कथानक को बासी नहीं होने देगा।

आभासी दुनिया के अँधेरे !

मनोवैज्ञानिकों  के मुताबिक सेल्फियों  फेसबुक , ट्विटर और व्हाट्सप्प  पर लगातार सम्पर्क में रहने वालों ने एक तरह से खुद अपना जीवन आवेगपूर...