Saturday, April 21, 2018

मुसाफिर हु यारो ! मुझे चलते जाना है




सिनेमाई इतिहास में सत्तर के दशक के एक बड़े हिस्से पर तीन अलग अलग लोगों ने अपनी गहरी छाप छोड़ी है। सुपर स्टार राजेश खन्ना , गायक किशोर कुमार एवं संगीतकार राहुल देव बर्मन। राहुल देव बर्मन के पिता सचिन देव बर्मन  स्वयं जाने माने संगीतकार थे तो राहुल को संगीत की विरासत मिलना तय थी। फिल्म इंडस्ट्री की एक दिलचस्प विशेषता है कि इसमें संतान को पहचान बनाने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता। बल्कि  यहाँ अपनी जगह बनाने के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष की दरकार होती है। राहुल ने महज नौ वर्ष की उम्र में एक धून रच डाली थी जिसका उपयोग उनके पिता ने ' फंटूश  (1956 ) में किया था। आर डी या पंचम के नाम से लोकप्रिय इस संगीत के उस्ताद की रची धूने उनके अवसान के दो दशक बाद भी संगीत प्रेमियों के जेहन में बसी हुई है। इस लोकप्रियता की वजह थी पंचम की अपनी विकसित की हुई शैली। अपने समकालीन संगीतकारों से उलट  ' एक्सपेरिमेंटल ' वाद्य यंत्रों का प्रयोग सबसे पहले आर डी ने ही किया। मिसाल के तौर पर फिल्म ' शोले ' के हेलन और जलाल आगा पर फिल्माये गीत ' मेहबूबा मेहबूबा ' की धून उन्होंने बीयर की खाली बोतल से निकाली थी।  इसी तरह  ' यादों की बारात ' के बेहद रोमांटिक गीत  ' चुरा लिया है तुमने जो दिल को ' के लिए उन्होंने चाय के कप प्लेट का प्रयोग किया था। फिल्म  ' पड़ोसन ' के कालजयी गीत ' एक चतुर नार  के लिए कंगे को रगड़ कर संगीत रचा था। सिर्फ मादक और रोमांस की चाशनी में भीगे गीत ही नहीं वरन  तहाकथित सैड सांग  में भी पंचम ने अपने सिग्नेचर शैली का प्रयोग किया है । ' प्यार का मौसम ' के लिए मोहम्मद रफ़ी का गाया गीत ' तुम बिन जाऊ कहाँ ' नायक की घोर उदासी के बावजूद जीवंत बन पड़ा है। इसी तरह विरह को टालने की मनुहार करता ' तू मइके मत जइयो ' या फिर ' नाम गुम  जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा ' या ' सागर किनारे दिल ये पुकारे ' जैसे गीत उदासियों के बावजूद  हमारे दिल में कही गहरे उतर जाते है। इसके विपरीत ' ओ  हसीना जुल्फों वाली ' ' दिल विल प्यार व्यार ' प्रफुल्लित और तीव्र संगीत का श्रेष्ठ उदाहरण है। 
पंचम के जीवन में आशा भोंसले का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। व्यक्तिगत रूप से भी और पेशेवराना भी।  इस जोड़ी ने मधुरतम और हिट  गीत दिए है। 'नहीं नहीं अभी करो थोड़ा इंतजार ' ' रोज रोज आँखों तले एक ही सपना चले ' ' ये लड़का हाय अल्लाह कैसा है दीवाना ' ' मेरा कुछ सामान  तुम्हारे पास है ' ' पिया तू अब तो आजा ' इस जोड़ी के  सैंकड़ों गीतों में से कुछ उल्लेखनीय उदाहरण है। 
2010 में पंचम के प्रशंसक फिल्मकार ब्रम्हानंद सिंह ने पंचम के जीवन के हरेक पहलु को छूती और उनके समकालीन लोगों के इंटरव्यू के आधार पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई। ' पंचम अनमिक्सड ' नाम की यह डॉक्यूमेंट्री दो नेशनल अवार्ड जीत चुकी है। पिछले दिनों इस डॉक्यूमेंट्री को बाकायदा पी वी आर सिनेमा में फीचर फिल्म की ही तरह रिलीज किया गया। ऑनलाइन फिल्मे उपलब्ध कराने वाली साइट ' नेटफ्लिक्स ' के कैटलॉग में भी इस डॉक्यूमेंट्री ने जगह बना ली है। ऍफ़ एम् रेडियो स्टेशन उनके संगीतबद्ध किये गीतों के बगैर एक दिन भी गुजारा नहीं कर सकते। यही हाल रीमिक्स बनाने वालों का भी है। देर रात तक चलने वाली पार्टिया उनके संगीत के बिना अधूरी मानी जाती है। पंचम यु ही भविष्य के संगीतकार नहीं कहे गए थे। 
फिल्मो की दुनिया में लगातार कोई शीर्ष पर नहीं बना रह सकता। यहां कब ढलान आजाए , दावे से नहीं कहा जा सकता। सत्तर से नब्बे के दशक तक सिरमौर रहे पंचम बप्पी लहरी के आगमन के साथ  अपना सुर खोने लगे थे। विधु विनोद चोपड़ा इस डॉक्यूमेंट्री में कहते नजर आते है कि किस तरह सब तरफ से ख़ारिज कर दिए गए पंचम ' 1942 ए लव स्टोरी ' के लिए संगीत रचते है। इस फिल्म के लिए पंचम का  रचा संगीत  उन्हें उसी स्थान पर वापस बैठा देता है जिसके वे हकदार थे। अफ़सोस ! अपनी सफलता को देखने के लिए पंचम जीवित नहीं रहे।   ' 1942 ए लव स्टोरी ' की रिलीज के पहले ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था। ' कुछ ना कहो , कुछ भी ना कहो ' उनका विदाई  संगीत है । 

Sunday, April 15, 2018

जिंदगी की किताब : रेखा


भानु रेखा गणेशन जिन्हे अब सिर्फ रेखा नाम से जाना जाता है। वे ऐसे माता पिता की संतान थी जिन्होंने विधिवत विवाह नहीं किया था । इस तरह के बच्चे सारी उम्र एक अपराध बोध लिए घूमते है। भारतीय परिवेश में अंततः माँ को ही दोहरी भूमिका निभानी होती है। इस तरह के बच्चे आमतौर पर समय से पहले परिपक्व हो जाते है , साथ ही उनका मिजाज भी  विद्रोही हो जाता  है। रेखा के साथ भी यही हुआ।  उन्हें महज तेरह वर्ष की उम्र में ही कैमरे के सामने धकेल दिया गया था क्योंकि सात लोगों के परिवार का पेट भरने  के लिए किसी को तो कमाना ही था। उनकी पहली हिंदी फिल्म ' सावन भादो ' जब आई तब वे मात्र सोलह बरस की थी। न ठीक से हिंदी बोल पाती थी न अपनी पसंद का खा सकती थी क्योंकि दक्षिण भारत और बम्बई के खान पान में जमीन आसमान का अंतर था। फ़िल्मी पत्रिकाओं ने उन्हें ' मोटी बतख ' कहकर पुकारा तो उनकी ही फिल्म के नायक ने उन्हें ' काली कलूटी ' का खिताब दिया। 
आज अगर रेखा के बारे में बात की जाये और उनके जीवन को कुछ शब्दों में समेटने का प्रयास किया जाए तो वह होगा ' पहाड़ी नदी '. पहाड़ों पर बहने वाली नदिया अक्सर वेगवान और चंचल होती है। वे एकदम से उथली हो जाती है और अचानक से गहरी। रेखा के स्वाभाव में परस्पर विरोधी भाव मौजूद रहे है। अल्हड़ता और गंभीरता। 
वे सारी उम्र ऐसी ही रहती , मोटी , अपनी शक्लों सूरत से बेपरवाह अगर उनके जीवन में अमिताभ का आगमन नहीं हुआ होता। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के प्रसिद्ध नाटक ' पिगमेलियन ' में प्रमुख पात्र प्रो हिंगिस एक उज्जड गंवार लड़की को तराश कर इतना सभ्य बना देते है कि राजपरिवार भी उसे नहीं पहचान पाता। अमिताभ के आभा मंडल का प्रभाव था कि रेखा ने उसमे खुद को तलाशा और निखर गई। अमिताभ रेखा के जीवन में प्रो हिंगिस की तरह ही आये और चले भी गए।  ठीक  ' पिगमेलियन ' के अंत की तरह।  
जब रेखा खुद को निखार रही थी तब हॉलिवुड में ' जेन फोंडा ' ने अपनी देह के कायाकल्प का वीडियो जारी किया था। जेन फोंडा से प्रेरित होने वाली रेखा पहली भारतीय नायिका थी जिन्होंने रेखा :माइंड एंड बॉडी टेम्पल नाम से किताब लिखी थी। अपनी देह को मंदिर मानने की बाते भारतीय आख्यानों में पहले से मौजूद है परन्तु उस पर अमल करने वाली रेखा संभवतः पहली नायिका बनी।  उन्होंने खुद को इतना निखारा कि सौंदर्य के नए प्रतिमान स्थापित होते चले गए। उमराव जान ' कामसूत्र ' खूबसूरत ' उत्सव ' आस्था - अभिनय के साथ उनकी देह के सुंदरतम हो जाने के रेकॉर्डेड दस्तावेज की शक्ल में चिर स्थाई हो गए है। एक नेशनल अवार्ड  तीन फिल्म फेयर अवार्ड और देश की सर्वश्रेष्ठ दस अभिनेत्रियों में स्थान पाने वाली रेखा ने सब कुछ हासिल किया परन्तु कोई एक स्थायी रिश्ता नहीं कमा सकी।  जीतेन्द्र , विनोद मेहरा ,किरण कुमार , मुकेश अग्रवाल और अमिताभ रेखा के जीवन में पड़ाव की तरह आये और गुजर गए। अमिताभ के साथ उनका रिश्ता ' नेशनल डिबेट ' बना और पत्र पत्रिकाओं ने उनके तथाकथित रोमांस पर  इतने पेज काले किये कि एक लाइब्रेरी बन जाए। पद्मश्री से सम्मानित इस अभिनेत्री ने व्यावसायिक सिनेमा के साथ ' समानांतर ' सिनेमा में भी अपनी अमिट उपस्तिथि दर्ज की। गंभीर सिनेमा के हस्ताक्षर श्याम बेनेगल ( कलयुग 1981 ) गोविन्द निहलानी ( विजेता 1982 ) गिरीश कर्नार्ड ( उत्सव 1984 ) गुलजार ( इजाजत 1987 ) ने साबित किया कि रेखा सार्थक फिल्मों को  भी अपने नाम से चला सकती है। 
कुछ अरसे पहले बीबीसी ने हॉलीवुड अभिनेत्री ' मेरिल स्ट्रिप ' को ऑस्कर मिलने पर सवाल किया था कि जब चौंसठ वर्ष की मेरिल को ध्यान में रखकर भूमिकाए लिखी जा सकती है तो पचपन  की रेखा के लिए बॉलीवुड प्रयास क्यों नहीं करता। यह हमारे सिनेमा की विडंबना ही है कि 'खून भरी मांग ' जैसी महिला प्रधान फिल्मों की सफलता के बावजूद नायिका को केंद्र में रखकर बनने वाली फिल्मो की संख्या नगण्य है। एक समय बॉक्स ऑफिस पर धन बरसाने वाली जोड़ी अमिताभ रेखा में से अमिताभ आज भी बेहद व्यस्त है और रेखा लगभग बेरोजगार हो चुकी है। 
पिछले हफ्ते तिरसठ वर्ष की यह  सुंदर अभिनेत्री राजयसभा से अपना कार्यकाल पूरा कर विदा हुई। लेकिन यह विदाई ऐसी थी जिसे रेखा कभी याद रखना नहीं चाहेगी। देश के लगभग सभी समाचार पत्रों ने देश के उच्च सदन के प्रति रेखा की उदासीनता पर कठोर टिका टिपण्णी की।  अस्सी के दशक में अपने करियर के उतार पर इस  शोख अभिनेत्री ने गंभीरता ओढ़ ली थी। फ़िल्मी अवार्ड्स में वे जरूर शिरकत करती रही परन्तु सार्वजनिक समारोह में यदाकदा ही नजर आती रही। वही रवैया उन्होंने राजयसभा के प्रति अपनाया। एक बेहतरीन अदाकारा अपनी सम्मानीय भूमिका को सलीके से नहीं निभा पाई । jnrajneesh@gmail.com
 

Sunday, April 8, 2018

गुनाहों का दरवेश : सलमान खान

इतिहास  में शायद पहली बार अजीब इतेफाक हो रहा है। एक हिरन की मौत पर शेर को सजा मिली है। टाइगर जिन्दा है  की मुनादी से डरे सहमे हिरणो ने अदालत के फैसले से रहत की सांस ली होगी। वे इस बात पर भी उत्साहित होंगे कि देर आये दुरुस्त आये फैसले ने उन सलमानों के होंसले भी पस्त कर दिए होंगे  जो अपने रसूख के बल पर हर सलाखों को फांदने का होंसला रखते है। सलमान खान को अदालत ने पांच साल की सजा सुनाई परन्तु इस मुकाम पर पहुँचने में न्याय को दो दशक लग गये। इन बीस सालों में सलमान लगातार एक साथ दो विपरीत मानसिकता में जीए होंगे। स्टारडम का रुतबा और दिन रात सर पर लटकती फैसले की तलवार।  जैसा फ्योदोर दोस्तोवस्की ने अपनी पुस्तक ' क्राइम एंड पनिशमेंट ' में स्थापित किया है कि सजा से ज्यादा सजा का डर भयानक होता है। इन बीस सालों में सलमान ने क्या नहीं भुगता होगा  - एक अदालत से दूसरी अदालत , वकीलों की फौज , गवाहों की मनुहार , न चाहते हुए भी अपने स्वाभिमान को निचले लेवल पर ले जाना , अनगिनत समझौते वह भी दूसरों की शर्तों पर ,  एक तरफ ग्लैमर की चकाचौंध दूसरी तरफ सजा का खौफ।  चतुर से चतुर अपराधी भी जानता है कि एक दिन उसे कानून के सामने सर झुकाये खड़े होना है।  फिर सलमान तो महज एक बिगड़ैल बच्चे से ज्यादा नहीं थे। मासूमियत और उदंडता उनके स्वाभाव में रही है। हमें सलमान से सहानुभूति हो सकती थी अगर यह उनका इकलौता हादसा होता परन्तु हमें उनसे ईर्ष्या हो रही है।  जिस तरह वह एक के बाद एक अपराध में फंसते गये और बच निकलते रहे उससे पूरी कानूनी प्रक्रिया बहस  बन गई। 
अपनी पहली गलती पर उन्हें समझाइश दी गई होती तो शायद उन्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता। तब शायद उम्र का दौर या छलांग भरता स्टारडम का अहं था जो  उनके विवेक को पर हावी हुआ होगा और बीइंग ह्यूमन का मास्क उन्हें कही तसल्ली दे रहा होगा कि घबराने की बात नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें कोई सहारा नहीं मिला होगा। अभिनय में असफल और लेखन में सफल अपने पिता से मीलों आगे निकले सलमान किस्मत वाले थे जिन्हे अपनी पहली ही फिल्म ' मेने प्यार किया ' से पहचान मिल गई थी। उनकी हर हिमाकत पर उनका परिवार उनके साथ खड़ा नजर आया है। उनके जीवन में आने वाली समस्त महिलाये भी उनके खिलंदड़ स्वाभाव की वजह से उनसे दूर हो गई। रिश्तो का खालीपन उनकी अपनी पसंद थी। वे क्योंकर किसी के हमसफ़र नहीं बने यह उनका अपना निर्णय था।  भीड़ में रहते हुए बंजारा बन जाना उन्होंने ही स्वीकारा था। 
न्याय की लम्बी प्रक्रिया किसी के लिए राहत हो सकती है और किसी के लिए प्रताड़ना। अगर सलमान न्याय को खरीद सकते तो शायद बीस बरस  पहले ही मुक्त हो गए होते। या वे अपना गुनाह कबुल कर लेते तो शायद अब बेफिक्र होकर जी रहे होते।मानसिक यंत्रणा के बीस बरस उनकी सजा से कही ज्यादा है।  लेकिन नहीं !  वे अपनी नियति को भोगे बगैर मुक्त नहीं होने वाले थे। शायद सलमान आज सोंच रहे होंगे कि ' हम साथ साथ है ' कहने वाले उस दिन उन्हें काले हिरन को निशाना बनाने से पहले ही रोक दिए होते या शिकार का थ्रिल उन्हें नहीं उकसाता या गाँव वालों ने उनकी बन्दुक से निकली गोली की आवाज नहीं सुनी होती तो आज दृश्य कुछ और ही होता। बीस साल तक एक हिरन की तरह अपने मुक़दमे के लिए  दौड़ते हुए सलमान को एकाध बार तो ख़याल आया होगा कि आखिर उस हिरन को मार कर हासिल क्या हुआ ? 
किसी फिल्म के किरदार की तरह लोग सलमान में वो सब देखना चाहते हो जो उनकी स्क्रीन इमेज है । परंतु यह जान लेना भी जरूरी वह एक सामान्य इंसान की तरह ही  है ।

Saturday, March 31, 2018

देश का आईना : राग दरबारी

राग दरबारी ' शास्त्रीय संगीत का महत्वपूर्ण राग है। इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण है कि संगीत सम्राट मिंयां तानसेन ने इसे बनाया था। मुग़ल सम्राट अकबर ने इसका नामकरण किया था। दरबार में गाया बजाया जाने वाला राग स्वाभाविक रूप से राग दरबारी ही कहा जायगा। इस राग के माध्यम से गायक वादक विराट या सम्राट की शान में कसीदे काढ़ते है। इस राग को मर्दाना राग भी कहा जाता है क्योंकि अमूमन इसे पुरुष ही साधते है।  यह राग सबसे मधुरतम माना जाता है क्योंकि प्रशंसा या स्तुति में प्रयोग होने वाले शब्द प्रायः कोमल होते है। गजलों और सैंकड़ों हिंदी फिल्मों के गीत इसी राग पर आधारित है - ' हम तुम से जुदा होके मर जाएंगे रो रो के ' ( एक सपेरा एक लुटेरा ) ' सुहानी चांदनी राते हमें सोने नहीं देती -( मुक्ति ) ' देखा है पहली बार साजन की आँखों में प्यार -( साजन ) ' पग घुंघरू बाँध मीरा नाची थी -( नमकहलाल ) जैसे  कुछ लोकप्रिय गीत है। 
1965 में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर श्री लाल शुक्ल उतर प्रदेश के कई जिलों में पदस्थ रहे थे। डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के रूप में उन्हें ग्रामीण समाज और व्यवस्था में व्याप्त भ्र्ष्टाचार , भाई भतीजावाद , रिश्वत , सत्ता का संघर्ष , जातिवाद जैसी समानांतर व्यवस्था को नजदीक से देखने का मौका मिला।  इन अनुभवों के आधार पर उन्होंने दर्जनों कहानियां लिखी और उन्हें एक कड़ी में पिरोकर ' राग दरबारी ' जैसे महान व्यंग्य उपन्यास को आकार  दिया। इस बरस 2018 में यह उपन्यास अपने उदभव के पचास वर्ष पूर्ण कर रहा है। किसी भी साहित्यिक रचना का सौ पचास वर्ष की अवधि को पार कर जाना सामान्य बात है। परन्तु ' राग दरबारी ' के लिए यह आधी सदी इसलिए उल्लेखनीय है कि उपन्यास में वर्णित घटनाएं आज भी जस की तस घटित हो रही है। उपन्यास जब लिखा जा रहा था तब वह काल्पनिक नहीं था। वह इक्कीसवी सदी के वर्तमान की भविष्यवाणी थी। इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है -इसे किसी भी पन्ने से पढ़ना आरम्भ किया जा सकता है। कई साहित्यकार इसे  'आधुनिक महाभारत 'भी कहते है। उपन्यास का कथानक शिवपाल गंज नाम के गाँव में घूमता है। यहां के वासी अपने आपको ' गंजहे ' कहलाने पर गर्व करते है। इस उपन्यास से गुजरते हुए पाठक को महसूस होता कि भारत के हर शहर , हर कसबे में एक शिवपालगंज है। 
राग दरबारी का कथानक ताजा ताजा स्वतंत्र हुए भारत की आकांक्षाओं और आदर्श सपनो के साथ चलती विसंगतियों का वर्णन करता है। गिरते नैतिक मूल्य , राजनीति का पतन , संसाधनों की बन्दर बाँट , शोषित और शोषक की रस्साकसी , गबन , घोटाले, शिक्षा , चरित्रहनन ,आदि का चुटीला वर्णन करते हुए रागदरबारी असली भारत दिखाता है। नब्बे के दशक में ' दूरदर्शन ' ने सरकारी नियंत्रण में होने के बाद भी इस उपन्यास को धारावाहिक के रूप में प्रस्तुत किया था।  यह बहुत साहस की बात थी। आज किसी भी सरकार से इस तरह के ' दुस्साहस ' की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ओमपुरी ने इस धारावाहिक में सूत्रधार ' रंगनाथ ' की भूमिका निभाई थी। अन्य भूमिकाओं में आलोक नाथ , राजेश पूरी , सुधीर दहलवी , मनोहर सिंह एवं जरीना वहाब थे। 
राग दरबारी हर काल में सामयिक है। नई  कहानियों का रोना रोने वाले फिल्मकारों के लिए इस उपन्यास में असीम संभावनाए है। भारतीय दर्शक पलायनवादी सिनेमा / टेलीविज़न का आदी हो चूका है। विसंगतिया रोजाना घटित हो रही है और दर्शक आज भी सिल्क , शिफॉन और स्विट्ज़रलैंड में खोया हुआ है। दर्शकों को आधुनिक समय की कड़वी हकीकतों से परिचित कराने के लिए ' राग दरबारी ' से बेहतर माध्यम नहीं हो सकता।  
@jnrajneesh

Monday, March 26, 2018

महानायक की उलझन

अमिताभ बच्चन ने अपने जीवन में बहुत उतार चढ़ाव देखे है। वे दिवालिया होने की कगार से वापस लोटे है। एक समय शिखर पर होने के बाद उन्होंने बेरोजगारी भी झेली है। राजनीति को केंद्र में रखकर बनी फिल्म ' इंकलाब ' के लिए उन्होंने प्रतिदिन एक लाख रूपये की फीस पर काम किया है जो उस दौर (1984 ) में बड़ी खबर थी। ' सत्ते पे सत्ता ' फिल्म के लिए राज सिप्पी ने उन्हें फीस न देकर एक बँगला भेंट किया था जिसे हम आज ' प्रतीक्षा ' के नाम से जानते है। उन पर बोफोर्स तोप दलाली का आरोप भी लगा था जिसे उन्होंने लम्बी कानूनी लड़ाई से धोया। बचपन से ही वे सत्ता के निकट रहे है। श्रीमती इंदिरा गांधी से लेकर लगभग सभी प्रधान मंत्रियों से उनके नजदीकी संबंध रहे है। चाहे थोड़े समय के लिए प्रधान मंत्री  बने इंद्र कुमार गुजराल हो या देवेगौड़ा। सिर्फ विश्वनाथ प्रताप सिंह से उनकी कभी नहीं बनी। वे मृत्यु के निकट जाकर भी लोटे है। 
अपनी फिल्मों से अमिताभ ने ' एंग्री यंग मेन ' का नाम कमाया था और अपनी जिजीविषा से ' महानायक ' का। अब बरसों बाद उन्हें गुस्से में देखा जा रहा है। इस बार उनका गुस्सा स्क्रीन पर नहीं वास्तविक जिंदगी में फूटा है। सदी के महानायक इसबार ' कॉपीराइट एक्ट 1957 ' की कुछ शर्तों से नाराज है। इस अधिनियम के अनुसार किसी भी लेखक या रचनाकार की मृत्यु के 60 वर्ष बाद उसकी किसी भी कृति पर उस लेखक या उसके वारिस का व्यक्तिगत अधिकार नहीं रह जाता। कॉपीराइट की शर्ते अलग अलग देशों में अलग अलग है।  ब्रिटेन में यह अवधि 70 साल की है तो यूरोपियन देशों में 95 साल की व् अमेरिका में सौ वर्षों की। अमिताभ के पिता डॉ हरिवंशराय बच्चन की समस्त कृतियों ( मधुशाला सहित ) शेक्सपीअर के नाटकों का हिंदी अनुवाद  के कॉपीराइट इस समय महानायक के पास है। भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अनुसार अमिताभ को इन रचनाओं पर से अपना अधिकार छोड़ना होगा। डॉ बच्चन की अधिकाँश रचनाए भारत के अलावा अन्य विदेशी भाषाओ में अनुदित होकर बड़ी मात्रा में रॉयल्टी कमाती है। अमिताभ के नजरिये से इस महान  साहित्यिक विरासत को गंवा देना भावनात्मक नुक्सान ज्यादा है। 
यहाँ एक प्रसंग का उल्लेख करना जरुरी है जो दर्शाता है कि अमिताभ अपनी विरासत को लेकर कितने संवेदनशील है। 2012 में  ' गूगल ' की टीम ने अमिताभ से मुलाक़ात कर डॉ बच्चन की समस्त रचनाओं को ' पब्लिक डोमेन ' पर डालने की इजाजत मांगी थी परन्तु उन्हें कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला। अमिताभ अपने पिता की धरोहर के नैसर्गिक वारिस है।  उनका उग्र हो जाना स्वाभाविक भी है। परन्तु आज जिस मुकाम पर वे खड़े है वहां उनसे  विशाल उदार व्यक्तित्व की अपेक्षा की जाती है। महानायक को विलियम शेक्सपीअर , फ्रेंज काफ्का , सर आर्थर कॉनन डायल , ओ हेनरी , एच् जी वेल्स ,जैसे उदाहरणों पर गौर करना चाहिए जिनका साहित्य ' प्रोजेक्ट गुटेनबर्ग '( gutenberg.org ) जैसे पब्लिक डोमेन पर सारी दुनिया को मुफ्त में सहज उपलब्ध है। अगर डॉ बच्चन इस कतार में शामिल होते है तो यह हरेक भारतीय के लिए गर्व की बात होगी। 
महानायक उम्र के इस पड़ाव पर भी सक्रिय है और भरपूर कमा रहे है। अगर वे रॉयल्टी के मोह को त्याग देते है तो उनके  ' डाई हार्ड ' प्रशंसकों में उनका कद और बड़ा हो जाएगा। इस दिशा में उनका पहल करना एक मिसाल बन सकता है। परदे पर सर्वहारा की लड़ाई लड़ने वाले अमिताभ को ' स्वार्थी ' बनते देखना कोई  पसंद  नहीं करेगा।

Wednesday, March 21, 2018

रुक जाना नही तू कही हार के ...

तंदरुस्त रहना उतना ही स्वाभाविक है जितना किसी बीमारी  से पीड़ित होना। हमारे सारे प्रयास स्वस्थ बने रहने के लिए होते , फिर भी हम किसी न किसी बिमारी की चपेट में आ ही जाते है। जीवन में बहुत कुछ हमें नियंत्रण में लगता है परन्तु असहायता का अहसास तब होता है जब हमें पता चलता है कि अंदर ही अंदर कोई रोग हमारी सजगता को धता बताकर जड़े जमा रहा है। हमारे प्रियजन या हमारे नायक जब किसी रोग से ग्रसित होते है तो हमारे पैरो तले  जमीन खिसक जाती है। हमने अप्रितम सौंदर्य की देवी मधुबाला को उस बीमारी से घुलते  देखा जिसका निदान आज एकदम सामान्य है। हमने दिलीप कुमार की स्मृति को ज्वार भाटे की तरह आते जाते देखा। किंवदंती बन गए ट्रेजेडी किंग की सबसे बड़ी ट्रेजेडी यह है कि जीवन की संध्या में उनकी सारी स्मृतियाँ उनका साथ छोड़ गई। अब वे किसी को पहचान नहीं पाते। लाखों लड़कियों को अनूठा हेयर स्टाइल देने वाली साधना एक ऐसी बीमारी से ग्रस्त हुई जिसने सबसे पहले उनकी बेहद सुन्दर आँखों को अपना शिकार बनाया। जिन्हे देखकर ही दर्शकों में सिहरन दौड़ जाया करती थी वे खलनायक प्राण ऊंचाई पर पहुँचते ही कांपने लगते थे। जिनकी फिल्मे थियेटर से उतरने का नाम नहीं लेती थी वे राजेंद्र कुमार , करियर के शिखर  पर शादी के लिए फिल्मों को नकार देने वाली नूतन , नेहरूजी के कहने पर आजीवन सफ़ेद कपडे पहनने वाली नरगिस- इन सभी को हमने कैंसर से हारते देखा है। सदाबहार देव आनंद और हमारे प्रिय 'जानी ' राजकुमार भी असाध्य बीमारी से पीड़ित थे। 
हमारी त्रासदी यह है कि हमारे अवचेतन में ' हैप्पी एंडिंग ' गहरे से चस्पा हो गया है। हम अपने नायकों को अंत में मुस्कुराते लौटते देखना पसंद करते है। सिल्वर स्क्रीन पर भी उनका बिछोह हमें उदास कर जाता है। जब रियल लाइफ में उनके साथ कुछ अनसोचा गुजरता है तो हम बैचेन हो जाते है। हम भूल जाते है कि वे भी उसी मिटटी के बने है जिसने हमें भी गढ़ा है। हमने बेहद सुंदर मनीषा कोइराला , कनाडाई मूल की लीजा रे और हॉटशॉट क्रिकेटर युवराज सिंह को मौत के पंजों से वापस लौटते भी देखा है।इन लोगों के बारे में अक्सर सुनने को मिलता है कि ये लोग अपनी जीवटता और ' विल पावर ' की बदौलत वापस लोटे है।ये लोग अब सामान्य जीवन जी रहे है। यह तथ्य कई लोगों को प्रेरित कर रहा है।  यहां यह भी गौरतलब है कि साधन बिना विलपावर ज्यादा देर नहीं चल सकता।   अभी हवा में खबर है कि इरफ़ान खान भी किसी घातक बीमारी की चपेट में आगये है। शायद प्रकृति हम जैसों को बताना चाहती कि उसकी नजर में आम और ख़ास एक समान है।
 हमारे नायकों को होने वाली बीमारी का एक उजला पक्ष यह भी है कि आम लोग उस बीमारी  को लेकर तात्कालिक रूप से जाग्रत हो जाते है। ठीक वैसे ही जैसे ' तारे जमीन पर ' के बाद सारा देश ' डिस्लेक्सिआ ' को लेकर बहस करने लगा था या ठीक वैसे ही हॉलीवुड फिल्म ' रेन मेन ' के बाद दुनिया मानसिक रुग्ण रोगियों के प्रति एकदम से विनयशील हो गई थी। 
हास्य अभिनेता जिम केरी की सफलतम फिल्म ' ब्रूस ऑलमाइटी '(2003 ) दुःख सुख के दर्शन को दिलचस्प तरीके से समझाने का प्रयास करती है। नायक ब्रूस अपनी समस्याओ के साथ दुनिया की तकलीफे भी हल करना चाहता है।  भगवान् नायक को अपनी शक्तियां सौंप कर सात दिन के लिए छुट्टी पर चले जाते है। ब्रूस लाख जतन  करता है परन्तु किसी को भी खुश नहीं कर पाता।  उलटे हालात  बिगड़ जाते है। अंत में उसे समझ आता है कि महज दैवीय शक्तियों के भरोसे जीवन नहीं चलता मनुष्य को अपनी समस्याओ से खुद ही दो चार होना पड़ता है। 
विफलताओं , समस्याओ और बीमारियों का एक ही निदान है कि भावुकता को दर किनार कर  इनका साहस के साथ सामना किया जाए। 
 हाल ही जुदा हुए भौतिक वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग रील और रियल लाइफ दोनों में ही अपनी जीवटता से दुनिया को प्रेरित करते रहे हैं ।

Wednesday, March 14, 2018

यह फिल्म कभी नहीं बनेगी !!

बॉलीवुड में नई  फिल्मों की घोषणा होना रूटीन है। परन्तु किसी बायोपिक का एलान ज्यादा लोगों का ध्यान आकर्षित कर लेता है। फिल्मों का यह जॉनर इसलिए भी दिलचस्पी जगा देता है कि मौजूद या गुजर चुकी विख्यात या लोकप्रिय हस्ती के वास्तविक जीवन को दर्शक उत्सुकता से देखना चाहता है। दर्शक यह भी जानना चाहता है कि जो एक्टर इस पात्र को निभा रहा है वह किस हद तक उस चरित्र की त्वचा में उतरा है। करण जोहर ने अपने बैनर धर्मा प्रोडक्शन के तले ' ओशो ' बायोपिक बनाने की घोषणा की है। इस खबर पर प्रतिक्रिया देने से पहले ' ओशो रजनीश ' को जान लेना जरुरी है। 
1931 में मध्यप्रदेश के कुचवाड़ा गाँव में जन्मे और गाडरवाड़ा में आकार लेने वाले इस व्यक्तित्व ने दुनिया में अपनी अलग  पहचान बनाई। शानदार वक्ता , दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रजनीश  , फिर आचार्य रजनीश  , फिर भगवान् रजनीश और अंत में ओशो। रजनीश ने  हरेक धर्म के हर पहलु की सरल व्याख्या की  , हिन्दू धर्म की कट्टरता के विरोधी रहे , हर मौजूद धर्म  में कमिया गिनाई , धार्मिक पाखण्ड का मजाक उड़ाया , ध्यान और अध्यात्म को प्रोडक्ट की तरह बांटा , सर्वहारा और बहुसंख्यक वर्ग को कभी उपलब्ध नहीं हुए। उनके अनुयायी हमेशा उच्च वर्ग के भारतीय  और भोतिक जीवन से ऊबे हुए संभ्रांत  विदेशी रहे। उनके शिष्यों में प्रमुख नाम बॉलीवुड के महेश भट्ट , परवीन बॉबी , विनोद खन्ना अध्यात्म के ब्रांड एम्बेसडरकी तरह थे । सम्भोग से समाधि उनकी दार्शनिक विचारधारा का शुरूआती पहलु था। भारत के पुणे से लेकर अमेरिका के ऑरेगोन को ' रजनीशपुरम ' में बदल देने तक  , एक सौ रॉल्स रॉयस के लवाजमे को साथ लेकर चलने वाले  , तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन को चेलेंज कर दने की घटनाओ के बीच अपनी ही सचिव माँ आनंद शीला द्वारा करोडो डॉलर की हेराफेरी और अमेरिका से निष्काषित इस धर्म गुरु को इक्कीस से ज्यादा देशों ने राजनीतिक शरण देने से इंकार किया। अंततः भारत वापसी , वही पुणे आश्रम फिर फैलने फूलने लगा , आश्रम के फ़ूड कोर्ट का मेनू कार्ड गिनीस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल वजह एक सो पचास देशों का भोजन उपलब्ध कराना था । राजनेताओ से सीधा पंगा लेना रजनीश की फितरत में था। जनता सरकार के प्रधानमंत्री  मोरारजी देसाई हमेशा उनके टारगेट पर रहा करते थे। रजनीश से खुन्नस निकालने के लिए उन्होंने जमीन खरीदने के नियम इतने कड़े कर दिए थे कि पुणे आश्रम के विस्तार के लिए रजनीश मुंह मांगे दाम पर एक फ़ीट जमीन नहीं खरीद पाए जबकि उस दौर में उनके तीस हजार विदेशी भक्त भारत में टिके हुए थे। 
 अपनी सम्मोहक आवाज और सदा एक ही पिच पर प्रवचन देने की शैली ने लाखों को मोहित किया। गूढ़ विषयों पर अधिकार पूर्वक सन्दर्भ सहित बोलना उनकी विशेषता थी। उन्होंने कभी विवाह नहीं किया परन्तु उनके ही शब्दों में उन्होंने पचास वर्ष की उम्र में  ' दो सौ वर्षों का यौन सुख भोग लिया था । 
ऐसे रजनीश पर करण बायोपिक बनाना चाहते है। करण की काबलियत पर कोई शुबहा नहीं है परन्तु तीन घंटे की समय सीमा में रजनीश के जीवन के उतार चड़ाव और उनका बौद्धिक  समेटना आसान नहीं है। जब विवाद का ही दूसरा नाम रजनीश हो तो यह काम और मुश्किल हो जाता है। वैसे भी हम जिस युग से गुजर रहे है वहां तिल का पहाड़ और राइ का ताड़ बनने में देर नहीं लगती। करण अपनी ही फिल्म ' ऐ दिल है मुश्किल ' में शिवसेना के सामने घुटने टेक चुके है फिर भला वे किसके दम पर उस रजनीश को फिल्मा पाएंगे जिन्हे स्थापित मान्यताओं को तोड़ने में मजा आता था , राजनेताओ और धार्मिक पाखंड पर तंज करना जिसकी स्वाभाविक आदत थी। फिल्मों से जुड़े आर्थिक जोखिम की समझ रखने वाला सामान्य व्यक्ति भी अब समझ सकता है कि इस तरह की फिल्म बनाना जान माल दोनों के लिए खतरनाक है। यह फिल्म कभी नहीं बनेगी। करण जौहर का यह ऐलान सनसनी पैदा करने और सुर्खियां बटोरने  से ज्यादा कुछ नहीं है। 

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