Wednesday, April 26, 2017

वो मसीहा आएगा : james bond

जासूसी साहित्य में जो स्थान शेरलॉक होम्स का है सिनेमा के परदे पर वही जगह जेम्स बांड की है। इन दोनों काल्पनिक पात्रों ने लोकप्रियता की वह ऊंचाई हासिल की है जो किसी और चरित्र के बुते की  नहीं है। इन दोनों ही किरदारों ने अपने रचियता को काफी पीछे छोड़ दिया है। जेम्स बांड की पहली फिल्म डॉ नो ( 1962 ) से लेकर 2015 में आई चौबीसवी  फिल्म ' स्पेक्टर ' तक दर्शको की पसंद पर खरी उतरी है।  इन फिल्मो ने ना सिर्फ दर्शको दिल जीता है वरन बॉक्स ऑफिस को भी मालामाल किया है। इन फिल्मो का केंद्रीय पात्र एक ब्रिटिश जासूस है जो एम् आई 6 के लिए काम करता है। जेम्स बांड को एक कोड नाम भी दिया गया है oo7 ( डबल ओ सेवन ) . दूसरे जासूसों से उलट जेम्स कभी अपनी पहचान नहीं छुपाता वह बिंदास होकर अपना परिचय देता है ' नेम इस बांड , जेम्स बांड !
जेम्स बांड की फिल्मे बड़े विशेषणों से लबरेज  रहती है।  बड़ा बजट , भव्य लोकेशंस ,बड़े सेट्स , बड़ी स्टार कास्ट , आधी दुनिया में फैला कथानक , अत्याधुनिक कारे ,  सब कुछ कल्पना से परे। 
जेम्स बांड की सभी फिल्मे इयान फ्लेमिंग के उपन्यासों पर आधारित होती है। ये फिल्मे इस लिहाज से अनूठी होती है कि कथानक सर्व विदित होता है परन्तु फिल्मांकन का तरीका जुदा होता है। पिछली आठ फिल्मो से जेम्स की बोस एक अधेड़ महिला ' एम् ' रही है जो उसे हर बार एक मिशन पर इस समझाइश के साथ भेजती है कि ' जिंदा वापस आना जेम्स '' ! 
2018 में जेम्स बांड सीरीज की नयी फिल्म आने की संभावना है। इस श्रंखला के समस्त अधिकार  ' एम् जी एम् ' व  'ईऑन प्रोडक्शन ' के पास है। इन  स्टूडियो के सूत्रों ने बताया है कि फिलहाल अगली फिल्म के लिए कुछ भी फाइनल नहीं हुआ है।  पिछली चार फिल्मो में बांड बने डेनियल क्रैग ही हीरो रहेंगे या किसी और को मौका दिया जाएगा , स्पस्ट नहीं है। उन्होंने यह जरूर स्वीकार किया कि अगली फिल्म के वितरण अधिकार ( distribution rights ) बेचने के लिए बोली लगाने का काम आरम्भ हो  गया है। पिछली फिल्म ' स्पेक्टर ' के डिस्ट्रीब्यूशन राइट सोनी ( sony ) के पास थे जिसने 57 मिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया था। इस बार दौड़  में सोनी के अलावा चार बड़े स्टूडियो - वार्नर ब्रदर्स , यूनिवर्सल पिक्चर , ट्वेंटीथ सेंचुरी फॉक्स एवं एक और अमेरिकन कंपनी ' अन्नपूर्णा पिक्चर ' शामिल है .अन्नपूर्णा पिक्चर का भारत से कोई रिश्ता नहीं है। यह स्टूडियो ओसामा बिन लादेन पर बनी चर्चित फिल्म ' जीरो डार्क थर्टी ' के सफल डिस्ट्रीब्यूशन को लेकर चर्चा में आया है।   
फिलवक्त पच्चीसवां  जेम्स बांड अपनी फिल्मो के क्लाइमेक्स की तरह रहस्य बना हुआ है। करोडो प्रशंसक , अरबो डॉलर का कारोबार और सिल्वर स्क्रीन पर  किसी अनजान नए खतरे से दुनिया को बचाने के लिए उसे आना ही होगा !! 

Tuesday, April 18, 2017

आधा किलोमीटर दूर मयकदा



हमारे देश में हास्य और आनद की सीमा शुष्क राजनेता और अदालते तय करते है। कैसे कपडे पहनना है कैसा भोजन करना है , क्या नहीं करना है जैसी बाते हमारे वोटो से चुने गए जनप्रतिनिधि तय करते है।  कोई भी नियम कायदा लागू करने में इतनी हड़बड़ाहट होती कि उसके प्रभावों पर कोई पूर्व अध्यन नहीं किया जाता। गत  नवंबर में आई नोट बंदी और एक अप्रैल को राजमार्गो पर आई  शराब बंदी से सरकार और अदालतों की यही कमजोरी सामने आई है . वैश्विक रिसर्च संस्था ' क्रिसिल ' ने शराब की दुकानों और शराब परोसने वाली होटलो को राज मार्ग से पांच सो मीटर दूर जाने के आदेश के बाद उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन किया है। क्रिसिल आमतौर पर शेयर बाजार में कंपनियों और निवेशकों को आसन्न संकट और जोखिम की चेतावनी देने का काम करती है। क्रिसिल का यह आकलन देश के
प्रीमियम होटल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर ( सेवा सत्कार उद्योग ) के लिए किया गया है।
इस रिपोर्ट के अनुसार देश के 12 प्रमुख शहरो में सुप्रीम कोर्ट का आदेश गाज बनकर गिरा है। देश के 384 बड़े होटल ( 3 स्टार , 5 स्टार ) इस निर्णय से हलकान हुए है। क्रिसिल ने प्रभावित होटलों को प्रतिशत में समझाया है। सर्वाधिक प्रभावित पुणे रहा है जहाँ 71 प्रतिशत होटल राजमार्ग पर होने से शराब नहीं परोस पाएंगे। कोलकता के राष्ट्रीय  राजमार्ग 12 पर 69 प्रतिशत , आगरा के 67 प्रतिशत , चेन्नई के 48 प्रतिशत होटलों की आय इस आदेश के बाद गिरकर आधी रह गई है।  इस फहरिस्त मे दिल्ली , मुंबई,  हैदराबाद ,बंगलौर भी शामिल है।  अकेले महाराष्ट्र में इस निर्णय के बाद आठ लाख लोग रोजगार से वंचित हो गए है। देश में रोजगार उपलब्ध कराने वाले क्षेत्रों में पर्यटन और  सत्कार उद्योग चार करोड़ नौकरिया पैदा  करता है। इस क्षेत्र के साथ अगर छेड़छाड़ नहीं होती तो यह उद्द्योग 2 प्रतिशत की दर से बढ़ते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में महत्वपूर्ण योगदान देता। 
माननीय अदालत ने इस निर्णय को लागू करते समय कुछ पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया। उनके निर्णय में यह भी है कि ये दुकाने या होटल अपने स्थान परिवर्तन का विज्ञापन भी नहीं करेगी। अदालत को इस बात का संज्ञान होना चाहिए कि  'गूगल मैप ' पचास मीटर के दायरे में आने वाली जगहों और स्थानों की सटीक जानकारी दे देता है। उसे वह कैसे रोकेगी ? अधिकांश वाहन जी पी एस से लेस होते है। 
देश में प्रतिवर्ष 464789  सड़क दुर्घटनाये होती है जिसमे शराब से होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या महज ढेड़ प्रतिशत है।  इस ढेड़ प्रतिशत को कड़े  दंडात्मक प्रावधानों से रोका जा सकता था। सरकार स्वास्थ और शिक्षा पर जो पैसा खर्च करती है उसमे बहुत बड़ा हिस्सा शराब से प्राप्त राजस्व का होता है।इस नुक्सान की भरपाई कैसे होगी , माननीय अदालत को इस पर भी गौर करना चाहिए था। 

Saturday, April 15, 2017

हैप्पी एंडिंग ' वाली कहानी



कुछ कहानियों का अंत शुरुआत में ही तय हो जाता है। ऐसी कहानिया पाठकों की जिज्ञासा के तनाव को कम कर देती है।  कुछ दर्शको का फिल्म के अनपेक्षित एंडिंग पर ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। दर्शको का एक बड़ा वर्ग ' हैप्पी एंडिंग ' वाली फिल्मे देखना ज्यादा पसंद करता है। इस तरह की फिल्मे बनाने वाले बड़जात्या घराने ( राजश्री पिक्चर्स ) ने दर्जनों फिल्मे बनाई है ( मेने प्यार किया , हम आपके है कौन , हम साथ साथ है , वगैहरा वगैहरा। बहरहाल , इस कॉलम में आज हम फिल्मो की बात नहीं करेंगे। बात होगी शिवसेना और उनके सांसद रविंद्र गायकवाड़ की। एक पखवाड़े पूर्व एयर इंडिया की फ्लाइट में इन सांसद महोदय ने एक सीनियर कर्मचारी को मनपसंद सीट न मिलने पर बुरी तरह पीट दिया था। सांसद को अपनी ताकत का अंदाजा था कि उनपर कोई चार्ज नहीं लगेगा। लिहाजा टीवी कैमरे पर उन्होंने दबंगई से अपनी वीरता का बखान भी किया। इन पंद्रह दिनों में गायकवाड़ पर दर्जनों लेख , संपादकीय लिख कर सैकड़ों टन अखबारी कागज़ बर्बाद हुआ। दर्जनों न्यूज़ चैनल ने अपने हजारो घंटे सांसद की मर्यादा और नैतिकता बताने में खर्च कर दिए। लेकिन सयाने जानते थे कि कुछ नहीं होगा , और वही हुआ भी।  रविंद्र गायकवाड़ को माफ़ कर दिया गया। इस कहानी में किसी साधारण पैसेंजर को रख कर देखिये।  क्या वह भी इसी तरह माफ़ कर दिया जाता ? शायद कभी नहीं ! 
  अगर आप सोंचते है कि  शिवसेना की धमकी '' मुंबई से एक भी विमान नहीं उड़ने देंगे '' की वजह से ऐसा हुआ है ? तो आप बिलकुल नादान है। शिवसेना इस समय जिस मुकाम पर है वहां से वह केंद्र सरकार की जब चाहे बांह मरोड़ सकती है। महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस की सरकार सेना की बैसाखी पर टिकी हुई है। भाजपा के अश्व मेघ यज्ञ का घोडा जुलाई तक निर्विध्न दौड़ता रहे इसके लिए भी शिवसेना को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता। क्योंकि अगला राष्ट्रपति भाजपा का हो और शिवसेना साथ न हो तो बना बनाया खेल बिगड़ सकता है। 
'' जो चाहते है पा कर रहते है  '' शिवसेना की टैग लाइन हो सकती है।  मराठी मानुस के नाम पर जब चाहा मुंबई को ठप कर देने वाली सेना की उपलब्धियों के फेहरिस्त लम्बी है। 2003 में सचिन तेंडुलकर को मिली फरारी कार पर तत्कालीन एन डी ए सरकार ने सवा करोड़ की एक्साइज ड्यूटी लगाईं तो सचिन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा से मिलने के बजाये ' मातो श्री ' पहुँच गए। हालांकि उनकी माली हालत तब भी इतनी थी कि वे ऐसी दस कार खरीद कर अपनी जेब से टैक्स भर सकते थे। बाल ठाकरे के एक टेलीफोन काल ने भारत सरकार को हिला कर रख दिया और सचिन को टेक्स में छूट मिल गई। जया बच्चन ने एक कार्यक्रम में मराठी के बजाय हिंदी में भाषण दिया। मंच पर राज ठाकरे भी थे। इस गुस्ताखी की सजा अमिताभ की इंग्लिश फिल्म '' द लास्ट लिअर ''के पोस्टरों और होर्डिंग को भुगतना पड़ी। विनम्र  महानायक अपनी जिंदगी में पहली बार किसी से माफ़ी मांगते देखे गए। 
इस लेख का 'लुब्बे लुआब ' यह है कि जाओ रविंद्र हमने तुम्हे तुम्हारी शर्तो पर माफ़ किया ! कानून आम लोगों के लिए है और तुम कानून से ऊपर हो।  

Wednesday, April 5, 2017

आतंक वाद से छे गुना ज्यादा लोग प्यार में मरते है !!

टाइम्स ऑफ़ इंडिया में पिछले रविवार अतुल ठाकुर की दिलचस्प रिपोर्ट छपी है। अंग्रेजी के पत्रकार जितनी खोज कर खबर निकालते है उतनी मेहनत हिंदी के पत्रकार नहीं करते। ऐसा मेने महसूस किया है। टाइम्स ने हैडलाइन बनाई है '' आतंकी हमले से ज्यादा लोग प्यार में मरते है '' यह खबर उस देश की वास्तविक तस्वीर दिखाती है जहां आख्यानों में प्रेम भरा पड़ा है , पत्थरों के शिल्प में उकेरा गया है और हर दूसरी बॉलीवुड फिल्म में महिमा मंडित किया गया है। संगीत की दुनिया के ज्ञात इतिहास में 90 प्रतिशत गीत ( फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी ) गजल , रूबाइयां , मुक्तक , शायरी के केंद्र में सिर्फ प्रेम रहा है। 
टाइम्स की रिपोर्ट में  2001 से 2015 के दौरान राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान के आंकड़े प्रकाशित किये है।  इस अवधि में 38585 लोगों की हत्या प्रेम प्रसंगों की वजह से हुई। 79189 आत्महत्याओ की वजह प्यार बना। ढाई लाख से ज्यादा महिलाओ के अगवा या अपहरण के केस दर्ज हुए ( घर से भागने वाले प्रेमियो में लड़के पर अपहरण का ही केस दर्ज होता है ) प्रेम करने पर जान से मार दिए जाने के सबसे अधिक प्रकरण आंध्र प्रदेश , उत्तर प्रदेश , तमिलनाडु , और मध्य प्रदेश में ही हुए है। 
दुनिया को प्रेम का पाठ पढ़ाने वाले देश में एक दिन में सात हत्याए , चौदह आत्महत्या , और सेंतालिस अपहरण हो जाते है जिनकी वजह प्रेम प्रसंग होता है। राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान ने आतंक वाद की वजह से इस अवधि में मरने वालो की संख्या 20000 बताई है। इसमें आतंकवादी , हमले में शहीद सेना और पुलिस के जवान और आम नागरिक शामिल है। 
उपरोक्त आंकड़े किसी को भी दशहत में ला सकते है।  परंतु यही हकीकत है। फिलहाल जो लोग प्रेम में है उनका दिल इन आंकड़ों से दहल सकता है। सरकार इन   सब से क्या सबक लेगी , दावे से नहीं कहा जा सकता। भारतीय समाज शास्त्रियों को जरूर सजग होने की जरुरत है।  भौतिक रूप  से आधुनिक हो रहा समाज सिर्फ बाहर से बदल रहा है अंदर से आज भी वह सोलहवी शताब्दी की मानसिकता को ढो रहा लगता है। 

Thursday, March 30, 2017

एक थी अमृता एक थी कमला

 ' माय स्टोरी ' कमला दास की आत्मकथा का नाम है और इस हफ्ते दो फिल्मों की घोषणा हुई है जो इस आत्मकथा पर आधारित है।  अंग्रेजी और मलयालम में बंनने वाली ये फिल्मे कमला दास के जीवन पर बनेगी।  हिंदी पाठकों के लिए कमला दास का नाम जाना पहचाना नहीं है।  अंग्रेजी साहित्य को पसंद करने वाले इस खबर पर उत्साहित हो सकते है। कमला दास मलयालम और अंग्रेजी की शीर्ष लेखिका रही है। उनकी हैसियत का कयास इसी बात से लगाया जा सकता है कि साहित्य अकादमी पुरूस्कार के अलावा उन्हें कई अंतराष्ट्रीय पुरुस्कारों से सम्मानित किया गया है।  उनकी कविताये एम् पी बोर्ड , सी बी एस इ , और एन सी आर टी, के पाठ्य क्रमो में शामिल है। 
 फिल्मकारों की दिलचस्पी कमला के लेखन में नहीं वरन उनकी निजी जिंदगी में है । । अपनी आत्मकथा में उन्होंने बेबाक  ढंग  से अपने  बारे में लिखा है। महज पंद्रह वर्ष की उम्र में ब्याह दी गई कमला ने स्वीकारा है कि उनके अन्य पुरुषों से भी संबंध थे। 
इसी तरह का एक उदाहरण अमृता प्रीतम का भी है।  पंजाबी की इस ख्यात लेखिका को ज्ञानपीठ पुरूस्कार से सम्मानित किया गया है। अमृता की आत्मकथा ' रसीदी टिकिट ' भी साहित्य और साफगोई का बिरला मोती है। वर्षों तक पेंटर इमरोज के साथ लिव इन रिलेशन में रही अमृता गीतकार साहिर लुधियानवी की भी प्रेमिका रही। यह बात उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में अपनी आत्मकथा में स्वीकारी है। साहिर के लिखे अधिकांश फ़िल्मी गीतों में अमृता की उपस्तिथि को महसूस किया जा सकता है।  अमृता के जीवन पर भी एक फिल्म की घोषणा हो चुकी है। 
कहने को बॉलीवुड में दुनिया की सबसे ज्यादा फिल्मे बनती है परंतु उनका स्तर दोयम दर्जे का ही होता है। बायोपिक या आत्मकथ्य पर बनने वाली फिल्मो में जिस समझदारी और गंभीरता की जरुरत होती है उस तथ्य का बॉलीवुड में सर्वथा अभाव रहा है।  अमृता या कमला अपने समय से आगे जीने वाली लेखिकाएं  थी। इनके चरित्र के साथ पूरा न्याय होना चाहिए। सनसनी और उत्तेजना का आदि हो चूका भारतीय दर्शक इन फिल्मों में वही तलाशेगा जो उसे नहीं तलाशना चाहिए।  

Thursday, March 23, 2017

पाकिस्तानियों को परेशान करने वाले हिंदुस्तानी

भारत पाकिस्तान के रिश्तों में नफरत और महोब्बत साथ चलती है । यह विचित्रता  दुनिया में कही और नहीं पायी जाती । संभवत इस लक्षण की वजह इनका डी एन ए है जो सरहद के दोनों और के लोगों में सामान रूप से पाया जाता है । कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाय तो दोनों और के कलाकारों को एक दूसरे के मुल्क में भरपूर सम्मान और स्नेह  मिला है । तमाम पूर्वाग्रहों के बावजूद गुलाम अली और नुसरत फ़तेह अली को चाव से इस तरफ सुना जाता है । वही लता मंगेशकर और हिंदी फिल्में उस तरफ पसंद की जाती है । 
राजनीतिक मजबूरियों के चलते रिश्तो में  कड़वाहट मुमकिन है परंतु दोनों और ऐसे तत्व भी है जो इस नफरत को हवा देते रहते है। हेडिलबर्ग यूनिवर्सिटी के असिस्टेन्ट प्रोफेसर जुरगेन शफलकमर ने पकिस्तान में रहकर  एक दिलचस्प रिसर्च की है।The Conversation वेब साइट पर छपी उनकी रिसर्च सिद्ध कर देती है की दोनों तरफ की सरकारे कड़वाहट कम करने के कितने ही जतन करले परंतु कभी सफल नहीं होंगी।  उनकी यह रिसर्च गैर साहित्यिक उपन्यासों पर आधारित है। रेलवे स्टेशनों और सड़क किनारे बिकने वाली किताबो या सनसनी फैलाने वाली इन डाइजेस्ट में छपी कहानियों में खलनायक का किरदार आमतौर पर हिन्दू निभाते है। 30 से 50 हजार की संख्या में छपने वाली ये किताबे पाकिस्तान के सभी प्रमुख शहरों में पढ़ी जाती है।  हॉरर और जासूसी कहानियों से भरी इन किताबों में बुरे काम करने वाले सभी पात्र भारतीय या हिन्दू होते है।  मोहन, शंकर , निशा , महेंद्र आदि नाम के पात्र मुसलमानों का परेशान करते है या जिन्न , भूत चुड़ैल बनकर लोगों को तंग करते है।  इन लोंगो को मारने वाला इस्लाम का नेक फरिश्ता होता है जो अमन और मोहब्बत का पैगाम सारी दुनिया में फैलाता है। 
भारत-पाकिस्तान दोनों के बीच रिश्तों में इतने बड़े उतार चढ़ाव आ चुके है कि इस ' लुगदी साहित्य ' पर चर्चा की गुंजाइश शायद ही कभी आये। नफरत और चरित्र  ह्त्या का सिलसिला यूँ ही चलता रहेगा।जावेद अख्तर , जगजीत सिंह और गुलजार को सुनने वाले लोग भारतीयों से बिला वजह नफरत करते रहेंगे .  हिंदुस्तानी कभी नहीं जान पाएंगे कि आखिर आम पाकिस्तानी उनसे इतनी दुश्मनी क्यों रखता है ?

Saturday, March 18, 2017

बुरके में लिपस्टिक



' जब खुला आसमान आँगन में झांकता हो तो खिड़कियों पर कितने ही मोटे  परदे लगा दो , उजाला कमरे में प्रवेश कर ही जाएगा '' ऐसी ही हिमाकत भारतीय सेंसर बोर्ड इन दिनों कर रहा है। समाज के सांस्कृतिक उत्थान की जितनी चिंता सेंसर बोर्ड को है उतनी शायद किसी को भी नहीं है। ' हर - हर  मोदी , घर -घर मोदी ' का नारा देने वाले पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड चेयरमैन का पद इस एक नारे की बदौलत मिला है।  तभी से वे हर फिल्म को सर्टिफिकेट देने में विवादों में घिरते आये है। निहलानी साहब का मानना है कि भारतीय संस्कृति का बचाव करना उनकी जिम्मेदारी है , जिसे फिल्मे दूषित कर रही है।  वे इस तथ्य को भूल जाते है कि  ' कामसूत्र ' भारत में ही लिखा गया है और खजुराहों के शिल्प भी हमारे ही किन्ही पूर्वजों के हाथ से ही तराशे गए थे। बावजूद इसके हमारी संस्कृति असहिष्णु रही है। 
पिछले दो सालों में बहुत सी फिल्मों को सेंसर बोर्ड के नश्तर का शिकार होना पड़ा है।  इसमें  ग्लोबल अपील  वाली जेम्स बांड की फिल्म ' स्काई फाल ' भी शामिल है। ' गंगा जल ' अपहरण ' आरक्षण ' और ' राजनीती ' जैसी फिल्मे प्रोड्यूस करने वाले प्रकाश झा की ताजा फिल्म ' लिपस्टिक अंडर माय बुरक़ा ' इन दिनों सेंसर बोर्ड में अटकी पड़ी है। टोक्यो और मुम्बई फिल्म फेस्टिवल में यह फिल्म पुरूस्कार जीत चुकी है और अंतराष्ट्रीय स्तर पर सराही जा रही है।  भोपाल की चार महिलाओं के जीवन पर आधारित इस फिल्म को निर्देशित भी एक महिला - अलंकृता श्रीवास्तव ने किया है।  स्क्रीनिंग कमेटी  का मानना है कि फिल्म की विषय वस्तु काफी ' बोल्ड ' है और डायलॉग भी अश्लील है। निहलानी साहब का सोच है कि भारतीय नारी की ' फंतासी ' इतनी उड़ान नहीं भर सकती जितनी इसके पात्र दर्शाते है। गौर करने लायक तथ्य है कि देश के 35 प्रतिशत मोबाइल धारी इंटरनेट से जुड़े हुए है और महज एक ' क्लिक ' से  पोर्न की दुनिया में प्रवेश करने में सक्षम है। यही नहीं , अमेरिकन टेलीविज़न के सर्वाधिक चर्चित टीवी शो ' गेम ऑफ़ थ्रोन ' ब्रेकिंग बेड ' टू एंड हाफ मैन '(सेक्स , हिंसा , नग्नता , से लबरेज ) पाइरेटेड साइट्स पर आसानी से डाउनलोड हो कर देखे जा रहे है।   
इंटरनेट  खुले आसमान से हँमारे घरों में झाँक रहा है और हम ब्रिटिश कालीन सेंसर बोर्ड से संस्कृति की रक्षा कर रहे है। यह डबल स्टैण्डर्ड हमें कहीं नहीं ले जाएगा। 

वो मसीहा आएगा : james bond

जासूसी साहित्य में जो स्थान शेरलॉक होम्स का है सिनेमा के परदे पर वही जगह जेम्स बांड की है। इन दोनों काल्पनिक पात्रों ने लोकप्रियता की वह ऊं...