Wednesday, September 19, 2018

' सिनेमाई फलक पर महिला फिल्मकार '

 मै बनुँगी फिल्म स्टार दुनिया करेगी मुझसे प्यार '- रेडियो सीलोन सुंनने वाले श्रोताओ को शमशाद बेगम का गाया ' अजीब लड़की ( 1952 ) का यह गीत भली भांति याद होगा। अक्सर बजने वाला यह गीत दुनिया में संख्या के लिहाज से सबसे अधिक फिल्मे बनाने वाले देश की महिलाओ की कैमरे के आगे और पीछे सक्रीय होने की आकांक्षाओं और संभावनाओं को सीधे शब्दों में प्रकट कर देता है। कैमरे के सामने आने वाली महिलाओ को तो अपने आप ' एक्सपोज़र ' मिल जाता है और उनके बेहतर प्रदर्शन से औसत दर्शकों में पहचान भी मिल जाती है। परन्तु कैमरे के पीछे जगह बनाने के लिए उन्हें उतना ही संघर्ष करना पड़ता है क्योंकि इस जगह उनकी सीरत देखी जाती है सूरत नहीं। बावजूद कठिनाइयों और हमारे देश की विभिन्नताओं के स्टोरी राइटिंग , स्क्रिप्ट राइटिंग और डायरेक्शन में महिलाऐ अपनी दमदार उपस्तिथि दर्ज करा रही है। यह दिलचस्प तथ्य है कि परदे के पीछे महिलाओ की भूमिका उतनी ही पुरानी है जितना की सिनेमा का इतिहास है। दादा साहेब फाल्के के समकालीन अर्देशिर ईरानी ने 1920 में फिल्म निर्माण की शुरुआत की थी। उनकी ही एक साइलेंट फिल्म ' वीर अभिमन्यु ' से नायिका के करियर की शुरुआत करने वाली ' फातिमा बेगम ' ने 1926 में अपनी फिल्म कंपनी ' फातिमा फिल्म्स ' स्थापित कर दी थी जिसे बाद में विक्टोरिया फातिमा फिल्म्स में बदल दिया गया। इस बैनर के तले उन्होंने अपनी पहली फिल्म ' बुलबुल -ए -पाकिस्तान ( 1928 ) बनाई। वे पहली निर्देशक थी जिन्होंने अपनी फिल्मों में कल्पना और ट्रिक फोटोग्राफी का उपयोग किया था। फातिमा बेगम के बाद लगभग पचास वर्षों तक इस क्षेत्र में गिनीचुनी महिलाओ ने ही कदम रखे। गुजरे जमाने की तारिका साधना ने अपने करियर की शाम ' गीता मेरा नाम (1974 ) निर्देशित की थी। यद्धपि नरगिस ने राजकपूर के साथ सोलह फिल्मे की थी और आर के फिल्म्स के प्रोडक्शन का सारा काम उन्ही की निगरानी में होता था परन्तु घोषित रूप से वे कभी निर्देशक की कुर्सी पर नहीं बैठी। अस्सी के दशक तक महिला निर्देशकों में जो नाम अपनी पहचान बना चुके थे उनमे उल्लेखनीय थी सई परांजपे और अपर्णा सेन। रेडियो एनाउंसर से अपना करियर आरंभ करने वाली सई ने अपनी निर्देशित पहली फिल्म ' स्पर्श '(1980) से नेशनल अवार्ड हासिल कर लिया था। उनकी निर्देशित अन्य फिल्मे ' चश्मेबद्दूर (1981) कथा (1982) कालजयी श्रेणी में शामिल हो चुकी है। अपर्णा सेन ने अपनी निर्देशकीय पारी लगभग सई परांजपे के साथ ही आरंभ की थी। शशिकपूर की ' 36 चोरंगी लेन (1981) के लिए उन्हें ' बेस्ट डाइरेक्टर नेशनल अवार्ड से सम्मानित किया गया। अपर्णा सेन ने लगभग एक दर्जन से ज्यादा हिंदी और बंगाली फिल्मे निर्देशित की है। उन्हें उनका दूसरा नेशनल अवार्ड ' मि एंड मिसेज अय्यर (2002 ) के लिए मिला था। 

नब्बे और शताब्दी के दशक के आते आते प्रतिभाशाली महिला फिल्मकारों का सूखा हरियाली में बदल चूका था। न सिर्फ निर्देशन बल्कि कहानी और पटकथा लेखन में भी वे अपनी धाक जमा रही थी। कल्पना लाजमी ( रुदाली , दरमिया , दमन ) दीपा मेहता (फायर , अर्थ , वाटर ) मीरा नायर ( मिसिसिपी मसाला ,नेमसेक ,मानसून वेडिंग , सलाम बॉम्बे ) गुरिंदर चड्ढा ( बेंड इट लाइक बेकहम ,ब्राइड एंड प्रेजुड़ाइस , वाइसराय हाउस ) फराह खान ( मैं हूँ ना , ओम शांति ओम ,तीस मार खां , हैप्पी न्यू ईयर) तनूजा चंद्रा ( दुश्मन , संघर्ष ) किरण राव ( असिस्टेंट डाइरेक्टर -लगान , स्वदेस , डाइरेक्टर -धोबी घाट) रीमा कागती ( हनीमून ट्रेवल्स , गोल्ड ,असिस्टेंट डायरेक्टर लक्ष्य , जिंदगी ना मिलेगी दोबारा , दिल चाहता है ) अनुषा रिजवी (पीपली लाइव ) मेघना गुलजार ( फिलहाल ,जस्ट मैरिड , दस कहानियां , तलवार , राजी ) जोया अख्तर ( लक बाई चांस , जिंदगी ना मिलेगी दोबारा ) गौरी शिंदे ( इंग्लिश विंग्लिश , डिअर जिंदगी ) लीना यादव ( शब्द , तीन पत्ती , पार्चड ), अलंकृता श्रीवास्तव (टर्निंग 30 , लिपस्टिक अंडर बुरका ) , नंदिता दास ( फिराक , मंटो )आदि। अगर इसमें क्षेत्रीय भाषा की फिल्मकारों को जोड़ दिया जाए तो यह फेहरिस्त और लंबी जा सकती है। यहाँ हालिया प्रदर्शित फिल्म ' मनमर्जियां ' के एक प्रसंग का जिक्र करना जरुरी है। इस फिल्म की कहानी कनिका ढिल्लों ने लिखी है। निर्माता आनद एल राय चाहते थे कि फिल्म को कनिका ही डायरेक्ट करे क्योंकि वे फिल्म की क्रिएटिव डायरेक्टर भी थी । परन्तु अभिषेक बच्चन अपनी कमबैक फिल्म में किसी नए डायरेक्टर की जोखिम नहीं उठाना चाहते थे। उन्हें अनुराग कश्यप पर ज्यादा भरोसा था , चुनांचे फिल्म इंडस्ट्री को एक बढ़िया स्टोरी राइटर तो मिला परन्तु एक बढ़िया महिला डायरेक्टर से वंचित होना पड़ा। 
इन सभी फिल्मकारों में सिर्फ एक समानता है कि इन्होने बनी बनाई लीक पर चल रही कहानियों के बजाय ' रिअलिस्टिक कहानियों ' को प्राथमिकता दी। सुनने में अजीब और अविश्वसनीय लग सकता है कि फिल्म माध्यम में सदियों आगे चलने वाला हॉलीवुड इस क्षेत्र में बॉलिवुड से कही पीछे है। वहां महिलाओ को अपने उचित प्रतिनिधित्व के लिए अभी भी संघर्ष करना पड़ रहा है। सिर्फ अमेरिकन फिल्मों की ही बात की जाए तो पिछले दस वर्षों में किसी भी महिला निर्देशक ने एक से अधिक फिल्म को डाइरेक्ट नहीं किया है । प्रतिभा का ऐसा अकाल रहा है कि कैथरीन बिगेलो ( हर्ट लॉकर 2009) के बाद आज तक किसी महिला निर्देशक को ऑस्कर नहीं मिला है। 
पिछले दो वर्षों में जब से वीडियो स्ट्रीमिंग साइट ' नेटफ्लिक्स ' और ' अमेज़न प्राइम ' ने भारत में अपने पैर पसारे है तब से फिल्मकारों को खासकर रचनात्मक और प्रतिभाशाली महिला फिल्मकारों को एक नया मंच मिल गया है।

Wednesday, September 12, 2018

अभिषेक बच्चन होने के मायने


अभिषेक बच्चन की ' मनमर्जिया ' के बहाने ' सौतुक डॉट कॉम sautuk.com के लिए लिखा मेरा लेख। 

आज के समय में सबसे मुश्किल काम है अभिषेक बच्चन होना। जब परिवार का हरेक सदस्य अपने पीछे कई मील के पत्थर लगाता आया हो तो उम्मीदों का सागर लहलहाना स्वाभाविक है। मिलेनियम स्टार और महानायक के इकलौते वारिस ने ऐसे समय फिल्मों में प्रवेश किया था जब सारी दुनिया वाय टू के के आतंक से अपने कम्प्यूटरों को बचाने में जुटी हुई थी। इस दुविधाग्रस्त समय में मीडिया और आमजनो की बातों में सिर्फ कंप्यूटर ही था। स्वयं अमिताभ इस समय अपने जीवन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे थे। उनकी फिल्मे लगातार फ्लॉप हो रही थी , और उनकी कंपनी ए बी सी एल लगभग दिवालिया हो चुकी थी।
' प्रतिक्षा ' के बाहर प्रशंसकों के बजाय लेनदारों का हुजूम खड़ा था। नंबर वन के सिंहासन पर बरसों रहने के बाद भी अमिताभ का प्रभाव इतना नहीं बचा था कि अभिषेक के लिए कही सिफारिश कर सके। ऐसे अनिश्चय भरे समय में देशप्रेम और युद्ध आधारित फिल्मों के लिए प्रसिद्ध जे पी दत्ता ने अभिषेक को ' रिफ्यूजी ' (2000 )में लांच किया। देश की सरहद पर बसे ग्रामीणों के शरणार्थी जीवन में प्रेम कहानी गूँथ कर फिल्म का कथानक बुना गया था। सरहद पर रहने वालों की त्रासदी को जावेद अख्तर ने शब्द दिये ' पंछी नदिया पवन के झोंके कोई सरहद ना इन्हे रोके ' । अच्छी कहानी और मधुर संगीत के बावजूद ' रिफ्यूजी ' असफल हो गई। सपनें देखने का आदी दर्शक महानायक के पुत्र को शरणार्थी के रूप में देखना सहन नहीं कर पाया। असफलता सिर्फ प्रोफेशनल लेवल पर ही नहीं आई वरन व्यक्तिगत स्तर पर भी आई। करिश्मा कपूर से सगाई के बावजूद वे विवाह के बंधन में न बंध सके। 
यह जूनियर बच्चन के लिए हिचकोले भरी शुरुआत थी। अपने पिता की तरह उनकी कदकाठी शानदार थी और उन्ही की तरह वे चलन के हिसाब से रोमांटिक भूमिका में मिसफिट थे। प्रेमकहानियों के लिए मिसफिट उनका व्यक्तित्व कई फिल्मों की असफलता का कारण बना परन्तु उनकी दूसरी खूबियों की तरफ कम ही निर्देशकों का ध्यान गया। जिन्होंने इस बात को समझ लिया उनकी फिल्मों में अभिषेक ने कमाल कर दिया। राम गोपाल वर्मा की ' सरकार ( 2005 ) में उनका रोल अमिताभ से छोटा था परन्तु क्लाइमेक्स में जिस तरह अपने चेहरे पर कोई भाव लाये बगैर वे अपने दुश्मनो का सफाया करते है उस वक्त वे ' गॉडफादर ' के माइकेल कोर्लेऑन ( अल पचिनो ) के समकक्ष जा खड़े होते है। एक्टिंग की यही तीव्रता ' युवा 'के लल्लन और ' गुरु 'के गुरुकांत देसाई में भी नजर आती है।
शुरूआती दर्जन भर फिल्मों की असफलता के बाद अभिषेक को पहली सफलता ' युवा ' ( 2004 ) में मिली थी। इस फिल्म के अलावा उनकी लगातार पांच फिल्मे बैक टू बैक सफल रही धूम (2004 ) सरकार ( 2005 ) बंटी और बबली (2005 ) ब्लफ मास्टर ( 2005 ) कभी अलविदा ना कहना ( 2006 ) प्रमुख है। इतनी सफलता के बाद भी अभिषेक को वह मुकाम नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। उनकी गिनती कभी शीर्ष नायकों में नहीं हुई। इस ट्रेजेडी की एक वजह यह भी थी कि उनकी समस्त सफल फिल्मे ' मल्टी स्टारर ' थी। इन फिल्मो की सफलता का श्रेय उनके सहनायक ले गए। ठीक इसी तरह असफलता का ठीकरा उनके माथे फोड़ा गया। अभिषेक अब तक बयालीस फिल्मों में आ चुके है। इन फिल्मों में उनकी ग्यारह फिल्मे फ्लॉप रही और बारह फिल्मे सुपर फ्लॉप रही। उनकी कुछ फिल्मों को लेकर उनकी समझ पर प्रश्न चिन्ह लगता रहा है कि क्या सोंचकर उन्होंने ये फिल्मे साइन की होगी। जे पी दत्ता से वे इस कदर अनुग्रहित रहे कि उनकी ' एल ओ सी ' में छोटी सी भूमिका और ' उमराव जान ' के बकवास रीमेक में भी काम करने से मना नहीं कर पाए। इसी प्रकार ब्लॉकबस्टर हॉलिवुड फिल्म ' इटालियन जॉब ' का घनघोर कचरा हिंदी संस्करण ' प्लेयर ' उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल मानी जा सकती है। इसी तरह अच्छी कहानी परन्तु कमजोर स्क्रिप्ट ' खेले हम जी जान से ' आशुतोष ग्वारिकर के निर्देशक होने के बाद भी सांस नहीं ले सकी। अपने अठारह वर्षीय कैरियर में अब तक यह अभिनेता तीन ' बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर ' अवार्ड कमा चूका है। बतौर एक्टर -पोडूसर पिता पुत्र के संबंधों पर आधारित उनकी फिल्म ' पा ' उन्हें नॅशनल अवार्ड दिला चुकी है। 
पिछले दो वर्षों से अभिषेक ने फिल्मों से दुरी बना ली थी। वे कुछ बेहतर करना चाहते थे। प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा से बात करते हुए उन्होंने साफगोई से स्वीकार किया था कि आत्म संतुष्टि के भाव ने उनकी संघर्ष करने की क्षमता ख़त्म कर दी थी। अब वे पुनः लौटने वाले है। ख्यातनाम फिल्मकार आनंद एल राय की अनुराग कश्यप निर्देशित ' मनमर्जियां ' उनकी कमबैक फिल्म होगी। शायर गीतकार साहिर लुधियानवी और जग प्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम के संबंधों पर बायोपिक को संजय लीला भंसाली बना रहे है। फिल्मो से इतर प्रो कब्बडी लीग और इंडियन सुपर लीग फूटबाल के सहमालिक जूनियर बच्चन से दर्शक आगामी फिल्मों में भी उम्मीद लगाए बैठे है। वे ही साबित कर सकते है कि वे खुशकिस्मत है और अभिषेक होना वाकई चुनौती भरा दिलचस्प काम है।

Tuesday, September 11, 2018

ना उम्र की सीमा हो ना हो जन्म का बंधन !


पिछले बरस जब फ्रांस ने अपने नए राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रॉन  को चुना तो वे अलग ही कारण से ख़बरों की सुर्ख़ियों में छा गए थे।  वजह - उनकी पत्नी ब्रिगेट चौंसठ वर्ष की थी और वे महज उनचालीस के ही थे । हमारी आदत हो गई है पति की उम्र पत्नी से ज्यादा देखने की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और मलेनिआ ट्रम्प में 24 वर्ष का अंतर है। पत्नी से कही अधिक उम्र का पति अमूमन सारी दुनिया में कुछ किन्तु परंतु के सहारे सामाजिक रूप से स्वीकार्य है। परन्तु इसका उल्टा होना थोड़ा चौका देता है। पिछले हफ्ते पूर्व मिस वर्ल्ड और बॉलिवुड की शीर्ष अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने अपने से ग्यारह वर्ष छोटे अमेरिकी गायक निक जोंस से सगाई की तो किसी ने उनकी उम्र के अंतर को लेकर  विशेष  टिका टिप्पणी नहीं की परंतु आश्चर्य जरूर व्यक्त किया । भारतीय समाज भी अब  इस तरह के विवाह में उम्र के अंतर को थोड़े संशय के साथ   स्वीकारने लगा है। पारम्परिक विवाह से उलट , जिसमे लड़के की उम्र हमेशा लड़की से ज्यादा रहती आयी थी , अब बड़ी उम्र की लड़कियां युवा लड़कों से ब्याही जाने लगी है।  खासकर फिल्मों और सेलिब्रिटी के विवाहों में यह चलन आम होने लगा है । उम्र के इस असंतुलन पर बनी फिल्मों का सिलसिला सत्तर के दशक से हिन्दी फिल्मों में आरंभ हुआ है । 1977 में आयी फिल्म ' दूसरा आदमी ' में परिपक्व  राखी और युवा ऋषि कपूर संभवतः पहले नायक नायिका थे जिन्होंने फिल्मों में इस परंपरा की शुरुआत की थी। उस दौर में इस तरह की कास्ट अपवाद थी परन्तु अब दृश्य पूरी तरह बदल गया है। आमजन की मानसिकता बदलने में निश्चित रूप से सिनेमा की कहानियों और उन्हें निभाने वाले नायक नायिकाओ ने विशेष भूमिका अदा की है। शाहरुख़ खान ने अपने कैरियर की शुरुआत में अधिक उम्र की नायिका दीपा साही के साथ  ' माया मेमसाब ' (1993) और श्री देवी के साथ  ' आर्मी ' ( 1996 ) की थी।  2001 में फरहान अख्तर ने अपने निर्देशन में ' दिल चाहता है ' के रूप में आधुनिक भारत के युवाओ की जीवन शैली और प्रेम को लेकर उनकी पसंद को फोकस किया था। फिल्म के तीन नायकों में से एक का झुकाव परिपक्व महिला  की तरफ होता है। आमिर और प्रीति जिंटा की प्रेम कहानी के बावजूद अक्षय खन्ना और डिंपल कपाड़िया का शालीन प्रेम ' दिल चाहता है '  को एक पायदान ऊपर ले जाता है। डिम्पल कपाड़िया ने युवा नायक से प्रेम की ऐसी ही भूमिका ‘लीला’ में भी निभाई थी, जबकि ‘लीला’ में उनकी सहअभिनेत्री दीप्ति नवल ने ‘फ्रीकी चक्र’ नामक फ़िल्म में अपने से कई साल छोटे युवा नायक के साथ प्रेम करने वाली महिला का चरित्र निभाया था।
 अयान मुकर्जी के निर्देशन में बनी ' वेक अप सिड ' ( 2009 ) में नायक नायिका ( रणवीर कपूर , कोंकणा सेन ) की  उम्र का अंतर प्रेम में आड़े नहीं आता। जगजीत सिंह ने अपने  कालजयी गीत  ' ना उम्र की सीमा हो न जन्म का बंधन , जब प्यार करे कोई तो केवल देखे मन '  से जंग लगी रवायतों को सिरे से नकारते हुए  फिल्मकारों और समाज को अपने दायरे से बाहर झाँकने को प्रेरित किया था ।  भारत के पहले शो मेन राजकपूर ने अपनी क्लासिक ' मेरा नाम जोकर ' में  एक किशोर लड़के के मन मे अपनी टीचर को लेकर चल रही आसक्ति के अंतर्द्वंद्व को खूबसूरती के साथ उकेरा था । बाद में इसी विचार को विस्तार देकर उन्होंने ' बॉबी ' (1972) बनाई । एक किशोर के  किसी युवती के प्रति आसक्त हो जाने को सनसनी बनाकर परोसने का प्रयास निर्देशक के शशिलाल नायर ने ' एक छोटी सी लव स्टोरी (2002) बनाकर किया । फिल्म का स्क्रीन प्ले पंकज कपूर ने लिखा था और नायिका थी मनीषा कोइराला। अच्छे सब्जेक्ट को गलत तरीके से हैंडल किया जाय तो फिल्म का कैसे  कबाड़ा हो सकता है, एक छोटी सी लव स्टोरी इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण थी।
हॉलिवुड से चला यह चलन अब बॉलीवुड में भी सामान्य मान लिया गया है । गंभीर और लोकप्रिय पत्रिका ' सायकोलोजी टुडे ' के आंकड़े इस तथ्य की पुष्टि करते है । इस पत्रिका के अनुसार 1964 से 2015 तक इस तरह के विवाह में चोसठ फीसदी की बढ़ोतरी हुई है । दूल्हा वही जो दुल्हन मन भाये जैसी शादियों के उदाहरण फिल्मों से लेकर खेल और कॉरपोरेट  जगत  तक बहुतायत से मौजूद हैं । शकीरा , एलिजाबेथ टेलर , टीना टर्नर , डेमी मुर , पेगी कोलिन से लेकर हमारी ऐश्वर्या राय ,  प्रिटी जिंटा, उर्मिला मातोंडकर , फरहा खान , शिल्पा शेट्टी , अधाना अख्तर , अंजलि तेंदुलकर  , बिपाशा बसु - जैसे नाम समुद्र में तैरते हिमखंड के ऊपरी भाग की तरह है । कुल मिलाकर
रिश्तो की अहमियत तभी तक है जबतक वे अच्छे बंधन में बंधे रहे  , और अच्छे संबंधों में उम्र का अंतर कोई फर्क पैदा नही करता । अगर आप बालिग है , एक दूसरे से प्रेम करते है , जीवन के बहाव में कम्फ़र्टेबल है तो उम्र एक संख्या से ज्यादा मायने नही रखती ।     

उपरोक्त लेख भास्कर समूह की मासिक पत्रिका ' अहा जिंदगी ' के सितम्बर अंक में प्रकाशित हुआ है।                

Tuesday, September 4, 2018

सब कुछ सीखा हमने , न सीखी होशियारी !!

अखबार, टेलीविज़न  और सोशल मीडिया में राजकपूर के आइकोनिक आर के  स्टूडियो के बिकने की खबर अब ठंडी पड़ने लगी है। ट्विटर और फेसबुक पर उनके प्रशंसक अफ़सोस और हताशा भरी प्रतिक्रिया के बाद चुप है। यह पहला मौका नहीं है जब किंवदंती बनी विरासत को उसके वारिस सहेज नहीं पाये। भारत के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना के बंगले ' आशीर्वाद ' और किशोर कुमार के खंडवा स्थित ' गौरीकुंज ' की जो गति  हुई  वही सब अब इस स्टूडियो के साथ घटने जा रहा है। सत्तर बरस पुराना स्टूडियो अब कुछ ही समय में इतिहास के गलियारों में गुम  हो जाएगा और उसकी जगह ले लेगी कोई बहुमंजिला इमारत या कोई हाउसिंग कॉलोनी।
 हमारे देश का सामूहिक चरित्र जीवन के दो परस्पर विरोधी बिदुओ के बीच पैंडुलम की तरह डोलता रहता है। एक तरफ हम बेहद अतीतजीवी मानसिकता में जकड़े रहते है , अपने तथाकथित गौरवशाली अतीत के लिए मरने मारने पर उतारू हो जाते है। वही दूसरी तरफ अपनी इमारतों और सांस्कृतिक विरासतों  के प्रति बेहद लापरवाह और गैर जिम्मेदाराना रुख अपना लेते है। व्यक्तित्व का यही भटकाव न हमें गुजरे समय से जुड़े रहने देता है न ही भविष्य के प्रति सजग बनाता है। 
अंग्रेजी और अंग्रेजियत के प्रति हमारा लगाव विश्वविख्यात है। भाषा और रहन सहन के मान से हम ' गोरो ' की तरह हो जाना चाहते है। हमारे फिल्म पुरूस्कार बतर्ज़े 'ऑस्कर ' और ' बाफ्टा ' की फोटोकॉपी बनने का प्रयास करते है।  परन्तु हम उनकी तरह अपनी विरासतों के प्रति संवेदनशील नहीं बन पाते। अमेरिका के पास अपनी कोई ऐतिहासिक संस्कृति नहीं है परन्तु हॉलीवुड ने जिस तरह अपनी फिल्मो और फिल्मकारों को सहेजा है वैसा हमने अभी प्रयास करना भी आरंभ नहीं किया है। सिनेमा के शुरूआती दौर में बनी भारतीय फिल्मों के प्रिंट तो दूर की बात है हमारे पास पहली सवाक फिल्म  ' आलमआरा 'का पोस्टर भी सुरक्षित नहीं बचा। जबकि हॉलीवुड ने उस दौर की चालीस प्रतिशत फिल्मों को नष्ट होने से बचा लिया है। अपने फिल्मकारों की स्मृतियों को आमजन में ताजा रखने के लिए कैलिफोर्निया के रास्तो पर पीतल के सितारों को जमीन पर मढ़ा गया है।  इन सितारों पर उल्लेखनीय अभिनेताओं और अभिनेत्रियों के नाम उकेरे गए है। उम्रदराज और असहाय फिल्मकारों की देखरेख करने के लिए ' मूवी पिक्चर एंड टेलीविज़न फंड ' नाम की  संस्था है जो उन्हें जीवन की शाम में भी सम्मान से जीने का मौका देती है। एक जमाने के सुपर स्टार  भारत भूषण , भगवान् दादा की तरह उन्हें अपना जीवन झुग्गी झोपडी में नहीं गुजारना पड़ता। ए के हंगल जैसे वरिष्ठ और लोकप्रिय अभिनेता के इलाज के  लिए चंदा नहीं करना पड़ता।  
 एक वर्ष पहले जब आर के स्टूडियो में आग लगी थी तब ही तय हो गया था कि अब इस महान विरासत पर पर्दा गिरने वाला है। राजकपूर ने अपनी फिल्म के कॉस्टयूम , जूते , स्मृतिचिन्ह  ' बरसात ' का छाता ,  ' मेरा नाम जोकर ' का जोकर , श्री 420 का हैट , जैसी बहुत सी छोटी छोटी चीजों को स्टूडियो में  सहेजा था। यह सारा इतिहास उस आग में भस्म हो गया। दूसरों की फिल्मों में काम करने वाले उनके पुत्र अपने पिता के सपनो की रखवाली नहीं कर पाये। यहाँ शशिकपूर के परिवार खासकर उनकी पुत्री संजना कपूर  की तारीफ़ करना होगी जिसने विकट  परिस्तिथियों में भी ' पृथ्वी थिएटर ' को चालीस वर्षों से चलायमान रखा है।
 हमारे दौर के वारिसों के लिए संग्राहलय से ज्यादा उसकी जमीन का दाम महत्वपूर्ण रहा है। प्रसिद्ध फ़िल्मकार कमाल अमरोही ( पाकीजा के निर्माता ) के वारिसों ने उनकी प्रॉपर्टी के लिए कितने दांव पेच लगाए इस पर अलग से एक फिल्म बन सकती है। 
केलिन गोव ने अपने उपन्यास ' बिटर फ्रॉस्ट ' में कहा है '  विरासत - इस पर गर्व हो क्योंकि आप इसकी विरासत होंगे। अपनी विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी आपकी है , अन्यथा यह खो जाएगी !

Thursday, August 30, 2018

वो मसीहा आएगा


वह इकलौता  जासूस है जो कभी अपनी पहचान नहीं छुपाता। उसे हत्या करने का लाइसेंस मिला हुआ है। अब तक उस पर चार हजार गोलियां चल चुकी है और 365 खलनायको को वह मौत के घाट उतार चुका है । वह ब्रिटिश है और इंग्लैंड की रानी के प्रति वफादार है । उसका कार्यक्षेत्र पूरी दुनिया है । एकबार वह भारत भी आ चुका है (1983 ऑक्टोपूसी ) ।  वह जिस किसी भी बार में जाता है  उसका बारमैन उसे नाम से पुकारता है और उसके पसंद की मार्टीनी पेश करता है  । अपने दुश्मन को भी वह अपना नाम बताता है ' माई नेम इस बॉण्ड ! जेम्स बॉण्ड ! दुनिया भर के सिनेप्रेमियों का जाना  पहचाना इयान फ्लेमिंग द्वारा रचित काल्पनिक पात्र अपने हैरत अंगेज कारनामों के कारण पिछले पचास वर्षों से दर्शकों का मनोरंजन करता रहा है। । 1962 से लेकर 2015 तक जेम्स बॉन्ड 24 फिल्मों में अवतरित हो चुका है । जेम्स की शुरुआती फिल्मों में भी स्टंट और ट्रिक फोटोग्राफी पर विशेष ध्यान दिया जाता था क्योंकि स्थानीय भाषा मे डबिंग न होने के बावजूद भी गैर अंग्रेजी भाषाई देशो में वे चाव से देखी जाती थी ।   इस वर्ष दिसंबर से बॉण्ड सीरीज की पच्चीसवी फिल्म का  फिल्मांकन आरम्भ होना था और अगले वर्ष नवंबर में यह फिल्म रिलीज़ होना थी परन्तु फिलहाल जो परिस्तिथियाँ  बनी है उसके चलते यह फिल्म संभवतः अगले वर्ष शायद ही पूरी हो पाये। अभी तक इस फ़िल्म को निर्देशित करने की जिम्मेदारी डेनी बॉयल ( स्लमडॉग मिलेनियर ) को सौपी गई थी परंतु अचानक उन्होंने निर्माता कंपनी इयोन प्रोडक्शन के साथ कुछ ' रचनात्मक मतभेदों ' के चलते फ़िल्म छोड़ दी  । इस बार संभावना थी कि बॉण्ड की भूमिका में डेनियल क्रैग को कुछ नया करते हुए देखा जा सकता है। उम्मीद थी कि अपनी एश्टन  मार्टिन कार से वे कुछ अविश्वसनीय स्टंट करते नजर आएंगे और एक बार फिर दुनिया को बचाएँगे। फिल्मों की सबसे लोकप्रिय फ्रँचाइज़ी में बॉण्ड का किरदार डेनियल क्रैग के आलावा छे अभिनेता निभा चुके है। अंतर्मुखी , भावहीन चेहरे वाला यह नायक सबसे अधिक समय तक जेम्स बॉण्ड बने  रहने का रिकॉर्ड बना चूका है। तेरह  वर्ष ! इन तेरह वर्षों में हम दो सुपरमैन , दो बैटमैन , तीन स्पाइडरमैन , स्टारशिप इंटरप्राइजेस की पूरी नई  पीढ़ी , देख चुके है। यहाँ तक की एक्स मेन ( ह्यूज जैकमैन  ) भी अपने स्टील के पंजे को खूंटी पर टांग कर कैरेक्टर रोल करने लगे है ।गौरतलब है कि  हरेक चरित्र का अपना एक काल चक्र होता है। बॉन्ड फिल्म के ताजा विवाद से यही लगता है कि डेनियल क्रैग का समय पूरा हो चुका है और वे शायद ही अगली बार  जेम्स बॉन्ड बने नजर आये ! यधपि उम्र के लिहाज से वे अपने पूर्ववर्ती जेम्स बॉन्ड में  सबसे कम उम्र के है। छप्पन वर्षीय टॉम क्रूस अपनी हालिया रिलीज ' मिशन इम्पॉसिबल - फॉल आउट में जितने चुस्त दुरुस्त नजर आए है उस लिहाज से पचास वर्षीय  क्रेग के लिए उम्मीद है कि वे एक बार और अपना ब्लैक टैक्सेडो पहने नजर आ सकते है । जेम्स बांड फिल्मों की सबसे बड़ी विशेषता है उसके कथानक के  बारे में दर्शक पहले से ही सब कुछ जानता है। पाँचों महाद्वीपों में फैले उसके  उसके  प्रशंसक  एक बात अच्छी तरह जानते है कि उनका नायक कभी मरेगा नहीं। उसकी फिल्मों का कथानक कई देशों में फैला हुआ होता है। भव्यता उसकी फिल्मों का दूसरा नाम होती है। उसके  टाइटल सांग से लेकर क्लाइमेक्स के विध्वंस तक सब कुछ भव्य और लुभावना होता है। दर्शक को हमेशा पता होता है कि  उसकी असिस्टेंट ' मनी पैनी ' हमेशा उसकी मदद करेगी , क्यू  उसके लिए आधुनिक गेजेट्स बनायगे ,  उसकी बॉस एम् उसे खतरनाक मिशन पर भेजते हुए एक बार अवश्य कहेगी  ' जिन्दा लौट कर आना बॉन्ड ! पहली ही नजर में वह नायिका की आंखों में उतर जाता  है  । जेम्स से आप भावुक प्रेमी की उम्मीद नहीं कर सकते ,  क्योंकि हर बार उसकी नायिकाएँ अलग होती है   इसलिए वह हमेशा चिरकुमार नजर आता है । 
 अब कयास ही लगाये जा सकते है कि कोई और अभिनेता  जेम्स बॉन्ड बन कर लौटेगा । क्योंकि जिस नाम की वजह से बॉक्स ऑफिस पर धन बरसता है उसे ऐसे ही नही छोड़ा जा सकता है । सनद रहे , जेम्स बॉन्ड मरता नही , जेम्स बॉन्ड  मरा नही करते वे अपने प्रशंसकों के मन मे अमर रहते है ।  


Tuesday, August 21, 2018

पराया माल अपना !

सफलता के लिए जायज तरीके आजमाना सामान्य बात  है। सफल की नक़ल भी स्वीकार्य है अगर उसे अपनी मौलिकता के साथ हासिल करने के प्रयास किये गए हो तो ।  किसी के आईडिया को चुराकर अपने नाम से चला देना इंटरनेट युग में संभव सबसे आसान काम हो गया है परन्तु इतना ही आसान उसका पकड़ा जाना भी संभव हुआ है।  दुनिया के हरेक व्यवसाय में सफलता के अनुसरण की स्वाभाविक प्रवृति रही है ।  एप्पल के कर्ता धर्ता बनने से पहले स्टीव जॉब ने एनीमेशन  कंपनी ' पिक्सर एनीमेशन स्टूडियो ' बनाई थी।  इस कंपनी ने पारंपरिक हाथ  से  बनाये एनीमेशन को छोड़कर कंप्यूटर की मदद से एनीमेशन फिल्मे बनाने की शुरुआत की । नब्बे के दशक तक एनीमेशन की दुनिया के सरताज ' वाल्ट डिज़्नी ' भी अपने एनीमेशन के लिए आर्टिस्ट पर ही निर्भर थे।  परन्तु ' पिक्सर ' की घनघोर सफल फिल्म ' टॉय स्टोरी (1995 ) ने एनीमेशन की दुनिया के नियम बदल दिये।  आज एनीमेशन की दुनिया कंप्यूटर में सिमट गई है। एनीमेशन बनाने वाली सभी कंपनियां और स्टूडियो कंप्यूटर जनरेटेड इमेजेस से सफलता के नए कीर्तिमान रच रहे है।  अपनी मौलिकता की वजह से सभी कंपनियों के पास काम की कमी नहीं है। 
पाकिस्तानी फिल्म ' एक्टर इन लॉ (2016 ) इस समय भारत में अलग  कारणों से  चर्चा में है। पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री पिछले कुछ समय से अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है ।  वर्षभर में  ब- मुश्किल   पचास फिल्मे बनाने वाला पाकिस्तानी फिल्म उद्द्योग भारतीय फिल्मों की तस्करी के चलते अपने  अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है। बावजूद इसके  वहाँ की कई फिल्मे और गीत भारतीय फिल्मों के लिए प्रेरणा या कहे आसान शिकार बनते रहे है । कुछ समय पूर्व एक भारतीय  टीवी चैनल ने पाकिस्तानी सीरियल का भारत में प्रदर्शन करना आरम्भ किया था। अपनी मौलिकता और मानवीय रिश्तों की तह तक जाने की कहानियों पर आधारित इन धारावाहिकों ने खासी लोकप्रियता भी अर्जित की थी। इन धारावाहिकों ने यह भी रेखांकित किया था कि जुदा मजहब  और खींची सरहद के बावजूद सतह के नीचे सबकुछ एकसार है।  सितंबर में प्रदर्शित होने वाली टी सीरीज निर्मित फिल्म ' बत्ती गुल मीटर चालू ( शाहिद  कपूर , श्रद्धा कपूर ) पर आरोप लगा है कि वह ' फ्रेम -टू - फ्रेम ' पाकिस्तानी फिल्म ' एक्टर इन लॉ ' की कॉपी है। पाकिस्तानी निर्माता नबील कुरैशी का कहना है कि न तो उनसे फिल्म के अधिकार ख़रीदे गए न ही उन्हें क्रेडिट देने की ओपचारिकता निभाई गई।  एक तरफ हम चाहते है कि दुनिया हमारी फिल्मों को हॉलीवुड फिल्मों की तरह सर आँखों पर बैठाये दूसरी तरफ कुछ फिल्मकार इस तरह चोरी के माल पर अपनी मोहर लगाकर वाही वाही लूटना चाहते है। दोनों बाते एकसाथ नहीं हो सकती। किसी विचार से प्रेरणा लेना और किसी कहानी को ज्यों का त्यों परोस देना अलग अलग बाते है। यह पहला प्रसंग नहीं है जब किसी भारतीय फिल्मकार ने इस तरह हाथ की सफाई दिखाई है। 1985 में आई लोकप्रिय फिल्म ' प्यार झुकता नहीं ( मिथुन , पद्मिनी कोल्हापुरी ) 1977 में बनी पाकिस्तानी फिल्म ' आईना "  की सीन टू सीन और संवाद तक कॉपी की हुई थी।  


इसी तरह 1977 में पाकिस्तानी सुपरहिट पारिवारिक ड्रामा फिल्म ' सलाखे ' को हिन्दुस्तानी निर्देशक अनिल सूरी ने कार्बन पेपर लगाकर ' बेगुनाह (1991 ) के नाम से भारत में बना दिया था। राजेश खन्ना, फराह अभिनीत यह फिल्म बाप बेटी के रिश्ते पर आधारित थी। सूरी साहब ने इस फिल्म के लिए गीतकार को भी तकलीफ नहीं दी।  सीन, संवाद के साथ गीत भी हूबहू उठा लिए थे। हमारे कुछ सफल और लोकप्रिय संगीतकारों ने भी  पाकिस्तानी कलाकारों   नुसरत फ़तेह अली , हसन जहांगीर , नाजिया हसन ,  रेशमा के  प्राइवेट एलबमों से  और नई पुरानी पाकिस्तानी  फिल्मों से संगीत  उठाने में कभी शर्म महसूस नहीं की। नदीम - श्रावण , अनु मलिक , प्रीतम आदि पर लगे चोरी और सीनाजोरी के  आरोपों को इंटरनेट पर सरलता से तलाशा जा सकता है। 
सामान्य सिने दर्शक के पास कभी इतना समय नहीं रहता कि वह फिल्म को लेकर कोई शोध करे। वह शुद्ध मनोरंजन की आस में सिनेमा का रुख करता है। लेकिन जब कभी उसे पता चलता है कि जिस कहानी या गीत पर उसने वाह -वाह लुटाई थी उसका वास्तविक हकदार सरहद पार बैठा है तो उसका विश्वास अपने देश के फिल्मकार के प्रति दरक जाता है। 

Friday, August 17, 2018

थोड़ा है थोड़े की जरूरत है !



आज के दिन ( 15th August ) देशभक्ति का सूचकांक अपने उच्चतम बिंदु को स्पर्श कर रहा है। इसके पहले यह गणतंत्र दिवस पर कुलांचे भर चूका है। भारत का पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच हो तो यह आल टाइम हाई पर चला जाता है।  बाकी दिन इसकी सेहत कैसी रहती है , शायद ही किसी का ध्यान जाता हो। अचानक तीन दिन से अखबारों के विज्ञापनों में तिरंगा नुमाया होने लगा है। दो पहिया , तिपहिया चारपहिया वाहन कंपनियों , तेल मंजन शकर साबुन नमकीन  बनाने वालों ने देश को बताना आरम्भ किया कि वे भी  देश भक्त है और देशभक्ति के हवन में कुछ टका छूट देकर अपना योगदान देना चाहते है। इ कॉमर्स साइट्स ने पंद्रह  दिन पहले ही याद दिलाना आरम्भ कर दिया था कि स्वतंत्रता दिवस के पुण्य अवसर पर वे भी परोपकारी हो जाना चाहते है। अगर देश की जनता चाहती है कि वे वाकई परोपकारी हो जाये तो उन्हें इन साइट्स पर डटकर खरीदारी करना होगी। देश भक्ति के  इस हल्ले में देश के कुछ बड़े रिटेल चेन स्टोर भी पीछे नहीं रहना चाहते है। ' सबसे सस्ते दिन ' का नारा देकर वे महीने भर का स्टॉक दो दिन में बेच देना चाहते है। देश की मुख्यधारा में जुड़ने के उनके विनम्र प्रयास को संशय से नहीं देखा जाना चाहिए। मोबाइल हैंड सेट बनाने वाली कंपनिया अब इस हालत में नहीं रही है कि वे राष्ट्रीय अखबारों में फूल पेज के विज्ञापन देकर अपनी देशभक्ति का प्रदर्शन कर सके।  उनका यह अधिकार उनके चीनी प्रतिद्वंदियों ने छीन लिया है। यही हाल पतंग बनाने वाले , रौशनी की लड़ियाँ बनाने वाले और फटाके बनाने वाले देसी कारीगरों का हुआ है। वे अपने चीनी भाइयों को कारोबार सौंपकर पहले ही तीर्थयात्रा पर निकल चुके है। इन लोगों से देशभक्ति की उम्मीद करना बेकार है। वैसे ही बी एस एन एल से उम्मीद करना कि  रोजाना  दामन छुड़ा कर भाग रहे अपने उपभोक्ताओं को अपने पाले में रोकने के लिए वह शुभकामनाओ के अतिरिक्त कुछ दे पाएगा। 
देशभक्ति की ज्वाला को दिन  भर धधकाने के लिए मनोरंजक चैनलों के प्रयासों की उन्मुक्त मन से सराहना की जाना चाहिए। भले ही हमें अंग्रेजों ने मुक्ति दी है परन्तु आज के दिन वे पाकिस्तान से युद्ध पर बनी कुछ सच्ची कुछ काल्पनिक फिल्मों का ' फिल्म फेस्टिवल ' आयोजित न करे तो उनपर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा कायम होने की संभावना बन सकती है। आज के दिन चैनल सर्फ़ करते समय देशवासियों के रक्त में उबाल लाने वाली फिल्मे भी नजर आ सकती है। किसी चैनल पर सनी देओल पाकिस्तान में  हैंडपंप उखाड़ते  नजर आ सकते है तो किसी चैनल पर ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह और इंस्पेक्टर शिवाजीराव  वाघले प्रलयनाथ की मिसाइल के फ्यूज निकालते देखे जा  सकते है। इस ' जंगे आजादी के इस्तकबाल ' में अगर विविध भारती  और ऍफ़ एम् चैनल सुर न मिलाये तो देशभक्ति की आंच शायद मंद पड़ सकती है।  अलसुबह ' पूरब पश्चिम '  और 'उपकार ' के गीत न बजे तो समां नहीं बंधता। आज के दिन कसबे से लेकर देश की राजधानी तक से  निकलने वाले अखबारों में छपे ' सरपंच पति '  ' सांसद प्रतिनिधि के जीजाजी ' के सचित्र शुभकामना संदेशों को न पढ़ना भी घोर अपराध माना जा सकता है। जो लोग आज के दिन अपनी फेसबुक पर तिरंगा पेस्ट नहीं करते , जो लोग अपने व्हाट्सप्प पर प्रोफइल में तिरंगा या ' आई लव इंडिया ' जैसा स्टेटस नहीं डालते वे देशभक्त नहीं माने जा सकते। बदलते वक्त के साथ देशभक्ति के मायने भी बदल गए है । हमारे पूरखों में यह स्वाभाविक थी परंतु हमारी पीढ़ी के लिए यह आभासी दुनिया की ही एक ' इवेंट' बन चुकी है । रोज डे ' प्रपोज़ डे , फ़्रेंडशिप डे , वेलेंटाइन डे जैसा कोई इवेंट ! उन्मुक्त आकाश से निकलकर अब यह संकरी गलियों में प्रवेश कर गई है । हम क्या खाते , पहनते , सोंचते , पसंद करते हैं , किसे वोट देते है , किससे प्यार करते है से तय होता है कि हमारी देशभक्ति किस डिग्री की है । निश्चित रूप से हम आजादी और देशभक्ति को लेकर रास्ता भटक चुके है । ये महज दो शब्द नही है वरन हमारे अस्तित्व के कारक है । अनेकता में सामंजस्य हो , सामाजिक न्याय के लिए आग्रह हो और लोकतंत्र बगैर किन्तु परंतु के हमारी आबोहवा मे घुला हुआ  हो ,  इससे ज्यादा हमे कुछ नही चाहिए । 

' सिनेमाई फलक पर महिला फिल्मकार '

 मै बनुँगी फिल्म स्टार दुनिया करेगी मुझसे प्यार '- रेडियो सीलोन सुंनने वाले श्रोताओ को शमशाद बेगम का गाया ' अजीब लड़की ( 1952 ...