Sunday, June 25, 2017

मास्को फिल्मोत्सव में बाहुबली



घर बैठे किसी भी देश को समझने का सबसे आसान तरीका है उस देश का साहित्य पढ़ना या फिल्मे देखना।  आजादी के तुरंत बाद जिस देश ने हमारा हाथ थामा था वह अविभाजित सोवियत रूस था। हमने गवर्नेंस का जो मॉडल पसंद किया था वह समाजवादी लोकतंत्र था क्योंकि विलायत में रह चुके नेहरू को पूंजीवादी  पश्चिम से ज्यादा साम्यवाद देश के लिए बेहतर विकल्प लगा। इसी समय राजकपूर का सिनेमा सोवियत संघ में लोकप्रियता की सभी हदे पार कर गया। आर्थिक मदद से लेकर स्पेस कार्यक्रम तक में देश को रुसी सहायता मिलती रही। नेहरू बाद की सरकारे येन केन अमरीकी समर्थक होती गई और हॉलिवुड हमारे लिए तीर्थ हो गया। हमारी फिल्मे खुलेआम अमेरिकी फिल्मों से  प्रेरणा लेने लगी। रूस जैसा मित्र और उसकी फिल्मे हम से दूर होती गई। 
विगत वर्षों में  भारतीय फिल्म प्रेमी कांन्स , बाफ्टा , ऑस्कर फिल्म समारोह तक सिमट कर रह गए। उनके लिए रुसी फिल्मों का कोई क्रेज नहीं रहा जबकि भारतीय उदासीनता के बावजूद रुसी फिल्मे और मास्को में होने वाले अंतराष्ट्रीय फिल्मोत्सव वैश्विक छाप छोड़ते रहे। विडम्बना देखिये कि मास्को फिल्मोत्सव का जिक्र भारतीय समाचारों में तब हुआ जब 39 वे मास्को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के उद्घाटन सत्र में ' बाहुबली 2 ' को शामिल किया गया। 22 से 29 जून तक चलने वाले इस उत्सव में यूरोप और अमेरिकन फिल्मों के साथ सोवियत ब्लॉक के देशों की फिल्मे भी हिस्सा ले रही है।इस बार के फिल्मोत्सव में थिलर और हॉरर फिल्मों को भी शामिल किया गया है।  तर्कहीन कथानक पर बनी बाहुबली सीरीज की फिल्मों ने कमाई के नए मापदंड खड़े किये है। इसी बहाने भारतीय फिल्मो को अगर एक नयी टेरेटरी मिलती है तो यह स्वागत योग्य है। अफ़सोस की बात है , बांग्लादेश की फिल्म प्रतियोगी खंड में टॉप पर है  और भारत की कोई फिल्म इस फिल्मोत्सव के  लायक नहीं समझी गई।  
एक दौर में भारत ने रूस से काफी कुछ सीखा है। अब भारतीय फिल्म इंडस्ट्री को भी रुसी फिल्म इंडस्ट्री से सबक लेना चाहिए .इस समय देश में  नौ हजार सिंगल स्क्रीन थिएटर है जो जैसे तैसे अपना अस्तित्व बनाये हुए है। जबकि रूस में 3228 पूर्ण डिजिटल थिएटर है। 

Sunday, June 4, 2017

हदें पार करता सोशल मीडिया can social media be tamed ?

हॉलीवुड फिल्मों के प्रशंसकों को 1994 में आई फिल्म ' स्पीड ' अवश्य  याद होगी। इस फिल्म के खलनायक डेनिस हॉपर फिरौती के लिए एक बस में बम रख देते है  और टेलीविज़न के लाइव कवरेज से उसकी हर गतिविधि पर नजर रखते है। हर घटना का सीधा प्रसारण करने वाले न्यूज़ चैनल अपराधियों की कितनी मदद कर देते है , इस खतरनाक चूक की और यह फिल्म ध्यान आकर्षित करती है।  इसी फिल्म में डेनिस हॉपर का डायलॉग ' टेलीविज़न भविष्य का हथियार है ' नए युग की आसन्न चुनौतियों की चेतावनी देता है। अमेरिका में इसी दौर में हर घटना का लाइव कवरेज चरम पर था और इस कला में अगुआ था सी एन एन जिसने लाइव कवरेज और टीवी पत्रकारिता में आज शीर्ष  स्थान हासिल कर लिया है। 
  यह वह दौर था जब सोशल मीडिया नाम का प्लेटफार्म अस्तित्व में नहीं आया था। लोग टेलीफोन और पत्रों से संवाद करते थे। नेटवर्किंग मीडिया नहीं था परन्तु लोग एक हद तक सोशल थे। आज के समय में निसंदेह सोशल मीडिया ने बड़ी बाधाओं को ध्वस्त कर दिया है परन्तु इसके दुरूपयोग ने सामजिक ताना बिखेर दिया है। अफवाहों का बाजार पहले भी गर्म होता था परन्तु अब सोशल नेटवर्किंग की आड़ में ख़बरों और अफवाहों की सुनामी चलाई जा रही है। कुछ और नहीं तो ऐतिहासिक तथ्यों और पात्रों को विवादों में घसीटा जा रहा है। इस माध्यम  पर चलने वाले संदेशों को इतनी तीव्रता से फैलाया जाता है कि एक समाज या एक बड़े वर्ग की मानसिकता को सामूहिक रूप से इच्छानुसार मोड़ा जा सकता है। किसके फ्रीज में बीफ रखा है , कहाँ पर बच्चा चोर गिरोह सक्रिय है , किस ख्यात लेखिका ने कश्मीर पर बयान दिया , किस पूर्व मंत्री ने अपनी पत्नी की ह्त्या की जैसे अनगिनत उदाहरण  है जहां इस माद्यम की वजह से तिल  का ताड़ बना।  हकीकत में अधिकाँश मामले वास्तविकता से कौसो दूर थे।   
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरूपयोग के नाम पर अब सोशल मीडिया पर लगाम लगाने की पहल नहीं की जा सकती न रोक लगाईं जा सकती है। यह अब काफी आगे निकल चूका है। कहने को देश में हर माध्यम के लिए नियामक संस्थाएँ है परन्तु उनको भी सरकारी आकांक्षाओं की पूर्ति का जरिया बना दिया गया है। 
डेनिस हॉपर ने टीवी से दुनिया को डराया था परन्तु सोशल मीडिया उससे भी आगे जाकर सामजिक और जातिय नफरत फैलाने का सबब बन गया है। इस माध्यम  के ' वाच डॉग ' वैसे तो पूरी मुस्तैदी से इस पर नजर रखे हुए है परन्तु वह नाकाफी है। इस प्लेटफार्म का उपयोग करने वालों को ही  विवेक और संयम बरतना होगा अन्यथा वे किसी के भी बहकावे में आकर किसी भी पल अनियंत्रित भीड़ का हिस्सा बन जाएंगे। 

Saturday, May 27, 2017

ऑटो में सवार जेम्स बांड !

जेम्स बांड फिल्मों का दर्शक वर्ग सुदूर अफ्रीका से ऑस्ट्रेलिया तक पाँचों महाद्विपों में फैला हुआ  है। भारत में भी इस काल्पनिक नायक के चहेतों की संख्या लाखों में है। इस पात्र को रचने वाले इयान फ्लेमिंग दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश नौसेना के लिए गुप्तचरी करते थे। युद्ध समाप्ति के बाद उन्होंने ' संडे टाइम्स ' के संवाददाता के रूप में काम करना आरम्भ किया। पत्रकारिता और जासूसी के कॉम्बिनेशन ने उनमे छुपे लेखक को जीवंत कर दिया। अपने दोनों पेशों के अनुभव के आधार पर ' जेम्स बांड ' को केंद्र में रखकर  उन्होंने कहानियां लिखना शुरू किया। फ्लेमिंग के अनुभवों का कैनवास बहुत विशाल था लिहाजा उनका रचा पात्र कई व्यक्तियों का मिश्रण है। वह ताकतवर है , हंसमुख भी , महिलाओ को अपने जाल में फंसाने वाला , ठन्डे दिमाग से ह्त्या करने वाला , नई  तकनीक का जानकार। आदि इत्यादि। जेम्स बांड एक ब्रिटिश जासूस है जिसकी प्रतिबद्धत्ता अपने देश और अपनी महारानी के प्रति है। इस पात्र को लिखते वक्त फ्लेमिंग को अंदाजा नहीं था कि यह एक दिन ' लार्जर देन लाइफ ' इमेज बना लेगा। सीक्रेट सर्विस की बारीक डिटेल और पत्रकारिता की गहराई के अनुभव ने जेम्स बांड के चरित्र को जासूसों का पर्याय बना दिया। 
इयान फ्लेमिंग का लेखकीय सफर महज तेरह  वर्षों (1953 -1966 ) का रहा है। इस अवधि में उन्होंने 14 उपन्यास और कई लघु कथाएँ लिखी। कहानियों की विषय वस्तु इतनी दिलचस्प रही कि लगभग सभी पर फिल्मे बनी। इन फिल्मों ने ' जेम्स बांड ' को कालजयी नायक बना दिया और फिल्मों की एक नयी श्रेणी - बांड मूवी। 
जेम्स बांड सीरीज की अब तक चौवीस फिल्मे आ चुकी है जिनमे 6 अभिनेताओं ने इस किरदार को निभाया है। सबसे ज्यादा ( 7 बार ) जेम्स बांड बनने का मौका मिला रॉजर मुर को। मोहक , लुभावने , विनम्र और लम्बे कद के रॉजर मुर ने ' जेम्स बांड ' को एक  ' लवर बॉय ' की इमेज दी वरना उनके पूर्ववर्ती बांड गंभीर छवि में कैद थे। मुर की सात फिल्मों में से एक ' octopussy का भारत से रिश्ता रहा है। इस फिल्म का बड़ा हिस्सा उदयपुर के ' लेक पैलेस ' में फिल्माया गया है। यह इकलौती 'जेम्स बांड  फिल्म है जिसकी शूटिंग भारत में हुई और बड़ी संख्या में भारतीय एक्टर इस फिल्म का हिस्सा बने। मुख्य रूप से कबीर बेदी और टेनिस सितारे विजय अमृतराज के रोल दर्शकों को आज तक याद है। यूँ तो जेम्स बांड अपनी हर फिल्म में ' एश्टन मार्टिन ' कार चलाता नजर आता है परन्तु इस फिल्म के एक दृश्य में वह ऑटो में बैठा नजर आता है। रॉजर मुर इकलौते जेम्स बांड है जिन्हे सामाजिक सरोकार के लिए ' सर ' की उपाधि से सम्मानित किया गया। 
अपनी पुस्तक ' बांड ऑन बांड ' में एक जगह उन्होंने लिखा है '' आप संजीदगी से बूढ़े हो सकते है या फिर बेधड़क होकर - और में दोनों ही तरह से बूढ़ा रहा हूँ '' . अपनी फिल्मों में कई खतरों से निपटने वाले सर रॉजर मुर अंततः( 23 मई ) कैंसर से हार गए।  

Friday, May 19, 2017

ऐश्वर्या का गाउन और कांन्स फिल्म फेस्टिवल

सत्तरवें कांन्स फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत एक सुखद संयोग के साथ हुई। फ्रांस की जनता ने अपना सबसे युवा राष्ट्रपति चुना है - एम्मानुएल मैक्रॉन। 39 वर्षीय मैक्रॉन फ्रांस के ऐतिहासिक  नेता  नेपोलियन बोनापार्ट से भी छोटे है। फिल्मों के कथानक की तरह ही मैक्रॉन की निजी जिंदगी भी दिलचस्प है। महज पंद्रह  बरस की उम्र में उन्हें अपने स्कूल की चालीस वर्षीया टीचर से प्रेम हुआ। परिवार की समझाइश के बावजूद उन्होंने अपना रिश्ता बरकरार रखा  और विवाह भी रचाया ।  आज चोंसठ बरस की ब्रिजेट ट्रागनेक्स फ्रांस की फर्स्ट लेडी के सम्मान से नवाजी गई है। यहाँ पश्चिमी जगत के  मीडिया  सराहना की जाना चाहिए। चुनाव प्रचार के दौरान कहीं भी इस ' बेमेल ' जोड़े की निजी जिंदगी पर छींटा कशी नहीं की गई।यह  व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सम्मान का श्रेष्ठ उदाहरण है।  
कांन्स फिल्म फेस्टिवल श्रेष्ठ कला फिल्मों का सामूहिक उत्सव है। इसे लेकर उतना ही उत्साह नजर आता है जितना ' ऑस्कर ' समारोह का पलक पांवड़े बिछा कर इंतजार किया जाता है। पिछले कई वर्षों से इस उत्सव में भारतीय फिल्मे भी शामिल होती रही है। यह बात दीगर है कि भारतीय मीडिया ने हमेशा हिंदी फिल्मों को ज्यादा तव्वजो दी और अच्छी रीजनल फिल्मो को नजरअंदाज कर दिया। कांन्स में दस्तक देने वाली  भारतीय फिल्मों के साथ हमेशा से एक विडंबना रही है। इस महोत्सव में वे ही  फिल्मे शामिल हुई जिन्हे भारत में पर्याप्त दर्शक नहीं मिले  यद्धपि उनका कला पक्ष मजबूत  था। 

बॉलीवुड हर वर्ष थोक में फिल्मे बनाता है परन्तु दो चार को छोड़ अधिकाँश घरेलु दर्शकों  तक ही  सिमटी रहती है। वजह स्पस्ट है , ये फिल्मे सिर्फ व्यावसायिक उद्देश्यों की ही पूर्ति करने के लिए बनाई जाती है ।  कला से इनका दूर का भी  नाता नहीं होता। विगत दस बारह वर्षों में कुछ भारतीय फिल्मों ने अवश्य  अपनी मौलिकता की वजह से कांन्स में जगह बनाई। ' लंचबॉक्स ' ' तितली ' ' मार्गेरिटा विथ स्ट्रॉ ' ' मुंबई चा राजा ' ' जल ' 'आई एम् कलाम ' 'मसान ' ऐसी  फिल्मे है जिन्होंने डट कर सराहना बटोरी परन्तु प्रतियोगी खंड तक नहीं पहुँच सकी। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे कुछ प्रयोगधर्मी फिल्मकार बेहतर फिल्मे बना रहे है और उनकी वजह से भारत एक दिन कांन्स में अपनी जगह अवश्य बनाएगा न कि सोनम कपूर , दीपिका ऐश्वर्या राय के डिज़ाइनर गाउन की वजह से।  
इस वर्ष कांन्स में हमें न कुछ खोना है न कुछ पाना क्योंकि हमारी एक भी फिल्म इस महोत्सव में शामिल नहीं हुई है। यद्धपि हमारे मीडिया ने ऐश्वर्या और दीपिका  के  ' रेड कारपेट वाक ' का ऐसा हाइप खड़ा किया है मानो  'स्वर्ण कमल ' भारत को ही मिलने वाला हो।  

Thursday, May 18, 2017

जिंदगी न मिलेगी दोबारा !!




प्रिय असमय विदा लेने वालों 
किसी को तो आपसे बात करनी ही थी तो सोंचा कि क्यों न में ही पहल करूँ। आप मेरे कुछ भी नहीं लगते।  न ही हमारी कोई जान पहचान है। परन्तु लगभग  रोजाना ही आपके बारे में हर अखबार में जिक्र होता है। कभी पहले पन्ने पर तो कभी आंचलिक समाचारों में तो कभी टीवी स्क्रीन पर। बुरी तरह बर्बाद हो चुकी गाड़िया , खून से लथपथ शरीर , आसपास खड़े तमाशबीन,  यह हरेक समाचार पत्र में छपने वाले फोटो का विषय होता है। अक्सर ये बाते मुझे झकझोर देती है। मुझे हैरानी होती है कि वे लोग किस मानसिकता के होते है जो आपके शवों के फोटो सोशल मीडिया पर डाल देते है। संवेदन शून्यता की पराकाष्ठा  कह सकते है । सड़क दुर्घटनाओं पर रोज एक नई स्टोरी होती है। कभी कभी अपने को  दोहराती या भयानकतम या सिहरा देने वाली। इंटरनेट पर बिखरे आंकड़े हिला कर रख देते है। देश की सीमाओं पर जवान सुरक्षित नहीं  है और मार्गों पर नागरिक। प्रतिदिन देश की सड़के 408 जिंदगियां ख़त्म कर देती है। सालाना यह जोड़ ढेड़ लाख पर पहुँचता है और पांच प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। ख़बरों की  दुनिया में सबसे महत्वहीन खबर सड़क दुर्घटनाओं की ही होती है कि इनका फ़ॉलोअप नहीं होता। कभी कोई संवाददाता यह जानने की कोशिश नहीं करता कि घटना के बाद पीड़ित के परिवार पर क्या गुजर रही है। 
विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार हमारा देश सड़क सुरक्षा के नाम पर   निचली पायदान पर है और सड़कों पर जोखिम के मामले में शीर्ष पर। कहने को स्मार्ट शहरों की बात हो रही है परन्तु राजमार्गों पर जिंदगियां  दम तोड़ रही है। अस्पताल इतने निढाल है कि एन वक्त पर  आपात कालिन परिस्तिथियों  संभाल नहीं पाते। अक्सर कस्बे से जिला अस्पताल ले जाने की कवायद में पीड़ित जिंदगी से हार जाता है। यह दिलचस्प तथ्य है कि वाहन घनत्व के लिहाज से देश में सम्पूर्ण दुनिया के मात्र  '' चार '' प्रतिशत वाहन है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है। ईरान में प्रति एक हजार लोगों पर 175 वाहन है , जापान में 525 , जर्मनी में 695 , ब्रिटेन में 732 , अमेरिका में 912 और हमारे देश में मात्रा 18 वाहन। ऊपरोक्त सभी देशों में दुर्घटनाओं में मृतकों  की संख्या लगभग शून्य है या इसके करीब है।   
अफ़सोस की बात है , सड़को पर मौत का पहला पुरूस्कार हमें कई वर्षों से लगातार मिल रहा है। आने वाले और कितने वर्षों तक यह हमें मिलता रहेगा ? इसे लेकर भी कोई दुविधा  नहीं है। आप लोग अब लौट नहीं सकते परन्तु जो अभी भी सड़कों का उपयोग कर रहे है , उनके लिए मेरी शुभकामनाये  वे भरपूर जीवन जिये । खुद भी सुरक्षित रहे और दूसरों को भी सुरक्षित रखे। याद रहे ! प्रायश्चित के लिए जिंदगी न मिलेगी दोबारा। 

Tuesday, May 9, 2017

क्या गॉडफादर दोबारा बनाई जा सकती है ?




ट्रिबेका फिल्म फेस्टिवल ( न्यूयॉर्क ) के एक कार्यक्रम में फ्रांसिस फोर्ड कोपोला से पूछा गया कि  क्या ' गॉडफादर ' दुबारा बनाना संभव है ? मारिओ पुजो द्वारा रचित उपन्यास पर कोपोला ने इसी नाम से 1972 में फिल्म बनाई थी। इस कृति को अपराध जगत की महाभारत का दर्जा प्राप्त है। यह एक इतालियन किशोर शरणार्थी की अमेरिका के अपराध जगत का सिरमौर बनने की कहानी है। यद्धपि केंद्रीय पात्र डॉन कोरलियोनि अपराधी है परन्तु वह और उसके तीन बेटे पारिवारिक रिश्तों और संबंधों को अहमियत देते है।  यह इस अपराध कथा का उजला पक्ष है। उल्लेखनीय तथ्य  है कि ' गॉडफादर ' फिल्म और उपन्यास दोनों को ही सारी दुनिया में सराहा गया है। इस कथानक में ऐसे चुंबकीय पात्र और परिस्तिथिया है जिन्होंने दुनिया भर के फिल्मकारों को प्रेरणा दी , और सफलता दिलाई। मरहूम फ़िरोज़ खान एवं रामगोपाल वर्मा की फिल्मों में गॉडफादर के प्रभाव को महसूस किया जा सकता है। इस बात को इन दोनों ने खुले दिल से स्वीकारा भी है।
जिस व्यक्ति ने कोपोला से प्रश्न किया उसे इस बात की  जानकारी नहीं थी कि पहली रीडिंग में कोपोला ने ' पैरामाउंट ' के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया था कि इस  दुरूह सब्जेक्ट पर फिल्म नहीं बन सकती। बाद में उन्होंने इस फिल्म का निर्देशन करना स्वीकार किया और इतनी पैशन से बनाया कि काल्पनिक कथानक होने के बाद भी दुनिया भर के पर्यटक इटली के ' तुरीन ' कस्बे में डॉन कोरलियोनि का तथाकथित ' मकान ' देखने जरूर जाते है। 
आमतौर पर नए सब्जेक्ट को फिल्माने में सफलता की संभावना बहुत क्षीण होती है। डॉयरेक्टर का जूनून और समर्पण ही फिल्म को क्लासिक , कालजयी बनाता है। बड़ा बजट या नामी स्टार कास्ट कभी सफलता की गारंटी नहीं होता।  अगर ऐसा होता तो ' शोले ' के बाद रमेश सिप्पी की ' शान ' फ्लॉप नहीं होती। जबकि उसके नायक भी अमिताभ ही थे। ठीक इसी तरह के आसिफ ' मुगले आजम ' के बाद ' लव एंड गॉड ' में खुद को दोहरा नहीं पाए। ' पाकिजा ' के बाद कमाल अमरोही ' रजिया सुलतान ' में अपनी जीवन भर की कमाई डूबा बैठे , इस तथ्य के बावजूद कि हेमा मालिनी उस समय शीर्ष पर थी और दर्शक धरम - हेमा की जोड़ी को सर आँखों पर बैठाये हुए थे।    
सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।  न ही सफलता का कोई फिक्स रोडमैप होता है। बगैर किसी ऊँची महत्वाकांक्षा के अपना ' सर्वश्रेष्ठ ' देने वालों को  अक्सर यह नसीब हुई है। पहली सफलता को संयोग मानना फिल्मकारों के  जूनून का अपमान होगा। 
फिल्मों की सफलता में कथानक और उसके प्रस्तुति करण का विशेष महत्व होता है। दूसरी पायदान पर एक्टर होता है जो उस कहानी को अपनी पहचान देता है।  हो सकता है आज मर्लिन ब्रांडो से बेहतर एक्टर मिल जाए परन्तु ब्रांडो जैसा नहीं हो सकता। जैसे अमिताभ की फिल्मों के कितने ही 'रीमेक ' बन जाए परन्तु उनकी इंटेनसिटी के पास भी नहीं पहुंचा जा सकता।  शाहरुख़ खान ' डॉन ' और ऋतिक रोशन ' अग्निपथ ' में इस कड़वे सच को महसूस कर चुके है। 
गॉडफादर ही क्या , किसी भी क्लासिक को दुबारा बनाना संभव नही है ।

Wednesday, May 3, 2017

नयी डगर पर दर्शक

टीवी दर्शकों के लिए एक बहुत ही कॉमन शब्द है ' काउच पोटैटो ' . इस शब्द का हिंदी मतलब है निहायत ही आलसी व्यक्ति जो टीवी देखने का इतना शौकीन है कि   खाना भी टीवी के सामने बैठकर ही खाता है। मौजूदा दौर में यह शब्द इतना लोकप्रिय हुआ है एवं  आम टीवी  दर्शकों के लिए भी उपयोग किया जाने लगा है। हाल ही में आये एक सर्वेक्षण से स्पस्ट हुआ है कि दुनिया भर में टेलीविज़न दर्शको की संख्या में जबरदस्त गिरावट आई है। अकेले भारत की बात होती तो हम आसानी  से दोयम दर्जे के कार्यक्रमों को इसकी वजह मान सकते थे। अनवरत चलने वाले संयुक्त परिवार के आपसी मन मुटाव , दकियानूसी फैशनेबल महिलाओ के षड़यंत्र दर्शाते तथाकथित सामजिक सीरियल और बेहूदगी की सीमा को लांघते कॉमेडी शोज  ने गंभीर दर्शकों को टीवी से काफी पहले ही दूर कर दिया था। परन्तु जब गिरावट का रुझान वैश्विक हो तो निश्चय ही बड़ा कारण होगा।
सर्वे में दर्शको के खिसक जाने  की बड़ी  वजह स्मार्ट फ़ोन बना है। पिछले चार पांच वर्षों  में दुनिया भर में थ्री जी और फोर जी के मोबाइल का चलन तेजी से बड़ा है। जिसने मोबाइल पर टीवी देखने की सुविधा उपलब्ध करा दी। इस उपलब्धि ने  विज्ञापन के लिए भी  नया प्लेटफार्म बना दिया। चुनांचे दर्शकों को शिफ्ट होना  ही था और वे तेजी से हो भी रहे है। देश में  ' रिलायंस जियो ' के धमाकेदार आगमन ने  पलायन को तेजी से बढ़ाया। महज तीन माह  में दस करोड़ ग्राहक का  आंकड़ा इसके पहले किसी कंपनी ने नहीं  छुआ।  
मोबाइल पर ऑन डिमांड वीडियो उपलब्ध कराने की शुरुआत सबसे पहले  ' नेटफ्लिक्स ' ने अमेरिका से की। 1997 में बनी यह कंपनी आज दुनिया भर में ऑन  डिमांड मूवी , टीवी शोज ,वीडियो उपलब्ध कराती है। इ कॉमर्स पोर्टल अमेज़न ने 2006 में शुरुआत की परन्तु मात्र दस वर्षों में इसके ग्राहकों की संख्या 8 करोड़ हो  गई। इसकी लोकप्रियता की वजह इसका न्यूनतम शुल्क है। महज पांच सौ रूपये वार्षिक शुल्क पर अनगिनत फिल्मों और टीवी शोज का लुत्फ़ लिया जा सकता है। इन दोनों ही कंपनियों ने बड़े भारतीय स्टूडियो के साथ मिलकर मोबाइल पर फिल्मे रिलीज़ करने की भी  योजना बनाई है। 
भारत के 90 करोड़ मोबाइल धारी किसी भी कंपनी के लिए एक बड़ी संभावना है। भारत में टीवी दर्शकों की संख्या यूरोप की आबादी से ज्यादा है। 
विकासवाद के सिद्धांत की विशेषता है कि हर नयी परिष्कृत तकनीक पुरानी को चलन से बाहर कर देती है। रेडियो को टेलीविज़न ने लगभग बाहर कर दिया था। उसे  ' फ्रेक्वेंसी मॉडुलेशन ' ( ऍफ़ एम् ) का सहारा लेकर अपना अस्तित्व बचाना पड़ा। लैंडलाइन टेलीफोन के साथ भी यही हो रहा है। टेलीविज़न ने वह दौर भी देखा है जब CNN दुनिया भर में एक हजार प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था और भारत में दूरदर्शन के  प्रसारण टावर प्रतिदिन स्थापित हो रहे थे। 
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मास्को फिल्मोत्सव में बाहुबली

घर बैठे किसी भी देश को समझने का सबसे आसान तरीका है उस देश का साहित्य पढ़ना या फिल्मे देखना।  आजादी के तुरंत बाद जिस देश ने हमारा ह...