Friday, May 19, 2017

ऐश्वर्या का गाउन और कांन्स फिल्म फेस्टिवल

सत्तरवें कांन्स फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत एक सुखद संयोग के साथ हुई। फ्रांस की जनता ने अपना सबसे युवा राष्ट्रपति चुना है - एम्मानुएल मैक्रॉन। 39 वर्षीय मैक्रॉन फ्रांस के ऐतिहासिक  नेता  नेपोलियन बोनापार्ट से भी छोटे है। फिल्मों के कथानक की तरह ही मैक्रॉन की निजी जिंदगी भी दिलचस्प है। महज पंद्रह  बरस की उम्र में उन्हें अपने स्कूल की चालीस वर्षीया टीचर से प्रेम हुआ। परिवार की समझाइश के बावजूद उन्होंने अपना रिश्ता बरकरार रखा  और विवाह भी रचाया ।  आज चोंसठ बरस की ब्रिजेट ट्रागनेक्स फ्रांस की फर्स्ट लेडी के सम्मान से नवाजी गई है। यहाँ पश्चिमी जगत के  मीडिया  सराहना की जाना चाहिए। चुनाव प्रचार के दौरान कहीं भी इस ' बेमेल ' जोड़े की निजी जिंदगी पर छींटा कशी नहीं की गई।यह  व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सम्मान का श्रेष्ठ उदाहरण है।  
कांन्स फिल्म फेस्टिवल श्रेष्ठ कला फिल्मों का सामूहिक उत्सव है। इसे लेकर उतना ही उत्साह नजर आता है जितना ' ऑस्कर ' समारोह का पलक पांवड़े बिछा कर इंतजार किया जाता है। पिछले कई वर्षों से इस उत्सव में भारतीय फिल्मे भी शामिल होती रही है। यह बात दीगर है कि भारतीय मीडिया ने हमेशा हिंदी फिल्मों को ज्यादा तव्वजो दी और अच्छी रीजनल फिल्मो को नजरअंदाज कर दिया। कांन्स में दस्तक देने वाली  भारतीय फिल्मों के साथ हमेशा से एक विडंबना रही है। इस महोत्सव में वे ही  फिल्मे शामिल हुई जिन्हे भारत में पर्याप्त दर्शक नहीं मिले  यद्धपि उनका कला पक्ष मजबूत  था। 

बॉलीवुड हर वर्ष थोक में फिल्मे बनाता है परन्तु दो चार को छोड़ अधिकाँश घरेलु दर्शकों  तक ही  सिमटी रहती है। वजह स्पस्ट है , ये फिल्मे सिर्फ व्यावसायिक उद्देश्यों की ही पूर्ति करने के लिए बनाई जाती है ।  कला से इनका दूर का भी  नाता नहीं होता। विगत दस बारह वर्षों में कुछ भारतीय फिल्मों ने अवश्य  अपनी मौलिकता की वजह से कांन्स में जगह बनाई। ' लंचबॉक्स ' ' तितली ' ' मार्गेरिटा विथ स्ट्रॉ ' ' मुंबई चा राजा ' ' जल ' 'आई एम् कलाम ' 'मसान ' ऐसी  फिल्मे है जिन्होंने डट कर सराहना बटोरी परन्तु प्रतियोगी खंड तक नहीं पहुँच सकी। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे कुछ प्रयोगधर्मी फिल्मकार बेहतर फिल्मे बना रहे है और उनकी वजह से भारत एक दिन कांन्स में अपनी जगह अवश्य बनाएगा न कि सोनम कपूर , दीपिका ऐश्वर्या राय के डिज़ाइनर गाउन की वजह से।  
इस वर्ष कांन्स में हमें न कुछ खोना है न कुछ पाना क्योंकि हमारी एक भी फिल्म इस महोत्सव में शामिल नहीं हुई है। यद्धपि हमारे मीडिया ने ऐश्वर्या और दीपिका  के  ' रेड कारपेट वाक ' का ऐसा हाइप खड़ा किया है मानो  'स्वर्ण कमल ' भारत को ही मिलने वाला हो।  

Thursday, May 18, 2017

जिंदगी न मिलेगी दोबारा !!




प्रिय असमय विदा लेने वालों 
किसी को तो आपसे बात करनी ही थी तो सोंचा कि क्यों न में ही पहल करूँ। आप मेरे कुछ भी नहीं लगते।  न ही हमारी कोई जान पहचान है। परन्तु लगभग  रोजाना ही आपके बारे में हर अखबार में जिक्र होता है। कभी पहले पन्ने पर तो कभी आंचलिक समाचारों में तो कभी टीवी स्क्रीन पर। बुरी तरह बर्बाद हो चुकी गाड़िया , खून से लथपथ शरीर , आसपास खड़े तमाशबीन,  यह हरेक समाचार पत्र में छपने वाले फोटो का विषय होता है। अक्सर ये बाते मुझे झकझोर देती है। मुझे हैरानी होती है कि वे लोग किस मानसिकता के होते है जो आपके शवों के फोटो सोशल मीडिया पर डाल देते है। संवेदन शून्यता की पराकाष्ठा  कह सकते है । सड़क दुर्घटनाओं पर रोज एक नई स्टोरी होती है। कभी कभी अपने को  दोहराती या भयानकतम या सिहरा देने वाली। इंटरनेट पर बिखरे आंकड़े हिला कर रख देते है। देश की सीमाओं पर जवान सुरक्षित नहीं  है और मार्गों पर नागरिक। प्रतिदिन देश की सड़के 408 जिंदगियां ख़त्म कर देती है। सालाना यह जोड़ ढेड़ लाख पर पहुँचता है और पांच प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है। ख़बरों की  दुनिया में सबसे महत्वहीन खबर सड़क दुर्घटनाओं की ही होती है कि इनका फ़ॉलोअप नहीं होता। कभी कोई संवाददाता यह जानने की कोशिश नहीं करता कि घटना के बाद पीड़ित के परिवार पर क्या गुजर रही है। 
विश्व स्वास्थ संगठन के अनुसार हमारा देश सड़क सुरक्षा के नाम पर   निचली पायदान पर है और सड़कों पर जोखिम के मामले में शीर्ष पर। कहने को स्मार्ट शहरों की बात हो रही है परन्तु राजमार्गों पर जिंदगियां  दम तोड़ रही है। अस्पताल इतने निढाल है कि एन वक्त पर  आपात कालिन परिस्तिथियों  संभाल नहीं पाते। अक्सर कस्बे से जिला अस्पताल ले जाने की कवायद में पीड़ित जिंदगी से हार जाता है। यह दिलचस्प तथ्य है कि वाहन घनत्व के लिहाज से देश में सम्पूर्ण दुनिया के मात्र  '' चार '' प्रतिशत वाहन है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है। ईरान में प्रति एक हजार लोगों पर 175 वाहन है , जापान में 525 , जर्मनी में 695 , ब्रिटेन में 732 , अमेरिका में 912 और हमारे देश में मात्रा 18 वाहन। ऊपरोक्त सभी देशों में दुर्घटनाओं में मृतकों  की संख्या लगभग शून्य है या इसके करीब है।   
अफ़सोस की बात है , सड़को पर मौत का पहला पुरूस्कार हमें कई वर्षों से लगातार मिल रहा है। आने वाले और कितने वर्षों तक यह हमें मिलता रहेगा ? इसे लेकर भी कोई दुविधा  नहीं है। आप लोग अब लौट नहीं सकते परन्तु जो अभी भी सड़कों का उपयोग कर रहे है , उनके लिए मेरी शुभकामनाये  वे भरपूर जीवन जिये । खुद भी सुरक्षित रहे और दूसरों को भी सुरक्षित रखे। याद रहे ! प्रायश्चित के लिए जिंदगी न मिलेगी दोबारा। 

Tuesday, May 9, 2017

क्या गॉडफादर दोबारा बनाई जा सकती है ?




ट्रिबेका फिल्म फेस्टिवल ( न्यूयॉर्क ) के एक कार्यक्रम में फ्रांसिस फोर्ड कोपोला से पूछा गया कि  क्या ' गॉडफादर ' दुबारा बनाना संभव है ? मारिओ पुजो द्वारा रचित उपन्यास पर कोपोला ने इसी नाम से 1972 में फिल्म बनाई थी। इस कृति को अपराध जगत की महाभारत का दर्जा प्राप्त है। यह एक इतालियन किशोर शरणार्थी की अमेरिका के अपराध जगत का सिरमौर बनने की कहानी है। यद्धपि केंद्रीय पात्र डॉन कोरलियोनि अपराधी है परन्तु वह और उसके तीन बेटे पारिवारिक रिश्तों और संबंधों को अहमियत देते है।  यह इस अपराध कथा का उजला पक्ष है। उल्लेखनीय तथ्य  है कि ' गॉडफादर ' फिल्म और उपन्यास दोनों को ही सारी दुनिया में सराहा गया है। इस कथानक में ऐसे चुंबकीय पात्र और परिस्तिथिया है जिन्होंने दुनिया भर के फिल्मकारों को प्रेरणा दी , और सफलता दिलाई। मरहूम फ़िरोज़ खान एवं रामगोपाल वर्मा की फिल्मों में गॉडफादर के प्रभाव को महसूस किया जा सकता है। इस बात को इन दोनों ने खुले दिल से स्वीकारा भी है।
जिस व्यक्ति ने कोपोला से प्रश्न किया उसे इस बात की  जानकारी नहीं थी कि पहली रीडिंग में कोपोला ने ' पैरामाउंट ' के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया था कि इस  दुरूह सब्जेक्ट पर फिल्म नहीं बन सकती। बाद में उन्होंने इस फिल्म का निर्देशन करना स्वीकार किया और इतनी पैशन से बनाया कि काल्पनिक कथानक होने के बाद भी दुनिया भर के पर्यटक इटली के ' तुरीन ' कस्बे में डॉन कोरलियोनि का तथाकथित ' मकान ' देखने जरूर जाते है। 
आमतौर पर नए सब्जेक्ट को फिल्माने में सफलता की संभावना बहुत क्षीण होती है। डॉयरेक्टर का जूनून और समर्पण ही फिल्म को क्लासिक , कालजयी बनाता है। बड़ा बजट या नामी स्टार कास्ट कभी सफलता की गारंटी नहीं होता।  अगर ऐसा होता तो ' शोले ' के बाद रमेश सिप्पी की ' शान ' फ्लॉप नहीं होती। जबकि उसके नायक भी अमिताभ ही थे। ठीक इसी तरह के आसिफ ' मुगले आजम ' के बाद ' लव एंड गॉड ' में खुद को दोहरा नहीं पाए। ' पाकिजा ' के बाद कमाल अमरोही ' रजिया सुलतान ' में अपनी जीवन भर की कमाई डूबा बैठे , इस तथ्य के बावजूद कि हेमा मालिनी उस समय शीर्ष पर थी और दर्शक धरम - हेमा की जोड़ी को सर आँखों पर बैठाये हुए थे।    
सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता।  न ही सफलता का कोई फिक्स रोडमैप होता है। बगैर किसी ऊँची महत्वाकांक्षा के अपना ' सर्वश्रेष्ठ ' देने वालों को  अक्सर यह नसीब हुई है। पहली सफलता को संयोग मानना फिल्मकारों के  जूनून का अपमान होगा। 
फिल्मों की सफलता में कथानक और उसके प्रस्तुति करण का विशेष महत्व होता है। दूसरी पायदान पर एक्टर होता है जो उस कहानी को अपनी पहचान देता है।  हो सकता है आज मर्लिन ब्रांडो से बेहतर एक्टर मिल जाए परन्तु ब्रांडो जैसा नहीं हो सकता। जैसे अमिताभ की फिल्मों के कितने ही 'रीमेक ' बन जाए परन्तु उनकी इंटेनसिटी के पास भी नहीं पहुंचा जा सकता।  शाहरुख़ खान ' डॉन ' और ऋतिक रोशन ' अग्निपथ ' में इस कड़वे सच को महसूस कर चुके है। 
गॉडफादर ही क्या , किसी भी क्लासिक को दुबारा बनाना संभव नही है ।

Wednesday, May 3, 2017

नयी डगर पर दर्शक

टीवी दर्शकों के लिए एक बहुत ही कॉमन शब्द है ' काउच पोटैटो ' . इस शब्द का हिंदी मतलब है निहायत ही आलसी व्यक्ति जो टीवी देखने का इतना शौकीन है कि   खाना भी टीवी के सामने बैठकर ही खाता है। मौजूदा दौर में यह शब्द इतना लोकप्रिय हुआ है एवं  आम टीवी  दर्शकों के लिए भी उपयोग किया जाने लगा है। हाल ही में आये एक सर्वेक्षण से स्पस्ट हुआ है कि दुनिया भर में टेलीविज़न दर्शको की संख्या में जबरदस्त गिरावट आई है। अकेले भारत की बात होती तो हम आसानी  से दोयम दर्जे के कार्यक्रमों को इसकी वजह मान सकते थे। अनवरत चलने वाले संयुक्त परिवार के आपसी मन मुटाव , दकियानूसी फैशनेबल महिलाओ के षड़यंत्र दर्शाते तथाकथित सामजिक सीरियल और बेहूदगी की सीमा को लांघते कॉमेडी शोज  ने गंभीर दर्शकों को टीवी से काफी पहले ही दूर कर दिया था। परन्तु जब गिरावट का रुझान वैश्विक हो तो निश्चय ही बड़ा कारण होगा।
सर्वे में दर्शको के खिसक जाने  की बड़ी  वजह स्मार्ट फ़ोन बना है। पिछले चार पांच वर्षों  में दुनिया भर में थ्री जी और फोर जी के मोबाइल का चलन तेजी से बड़ा है। जिसने मोबाइल पर टीवी देखने की सुविधा उपलब्ध करा दी। इस उपलब्धि ने  विज्ञापन के लिए भी  नया प्लेटफार्म बना दिया। चुनांचे दर्शकों को शिफ्ट होना  ही था और वे तेजी से हो भी रहे है। देश में  ' रिलायंस जियो ' के धमाकेदार आगमन ने  पलायन को तेजी से बढ़ाया। महज तीन माह  में दस करोड़ ग्राहक का  आंकड़ा इसके पहले किसी कंपनी ने नहीं  छुआ।  
मोबाइल पर ऑन डिमांड वीडियो उपलब्ध कराने की शुरुआत सबसे पहले  ' नेटफ्लिक्स ' ने अमेरिका से की। 1997 में बनी यह कंपनी आज दुनिया भर में ऑन  डिमांड मूवी , टीवी शोज ,वीडियो उपलब्ध कराती है। इ कॉमर्स पोर्टल अमेज़न ने 2006 में शुरुआत की परन्तु मात्र दस वर्षों में इसके ग्राहकों की संख्या 8 करोड़ हो  गई। इसकी लोकप्रियता की वजह इसका न्यूनतम शुल्क है। महज पांच सौ रूपये वार्षिक शुल्क पर अनगिनत फिल्मों और टीवी शोज का लुत्फ़ लिया जा सकता है। इन दोनों ही कंपनियों ने बड़े भारतीय स्टूडियो के साथ मिलकर मोबाइल पर फिल्मे रिलीज़ करने की भी  योजना बनाई है। 
भारत के 90 करोड़ मोबाइल धारी किसी भी कंपनी के लिए एक बड़ी संभावना है। भारत में टीवी दर्शकों की संख्या यूरोप की आबादी से ज्यादा है। 
विकासवाद के सिद्धांत की विशेषता है कि हर नयी परिष्कृत तकनीक पुरानी को चलन से बाहर कर देती है। रेडियो को टेलीविज़न ने लगभग बाहर कर दिया था। उसे  ' फ्रेक्वेंसी मॉडुलेशन ' ( ऍफ़ एम् ) का सहारा लेकर अपना अस्तित्व बचाना पड़ा। लैंडलाइन टेलीफोन के साथ भी यही हो रहा है। टेलीविज़न ने वह दौर भी देखा है जब CNN दुनिया भर में एक हजार प्रतिशत की दर से बढ़ रहा था और भारत में दूरदर्शन के  प्रसारण टावर प्रतिदिन स्थापित हो रहे थे। 
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Wednesday, April 26, 2017

वो मसीहा आएगा : james bond

जासूसी साहित्य में जो स्थान शेरलॉक होम्स का है सिनेमा के परदे पर वही जगह जेम्स बांड की है। इन दोनों काल्पनिक पात्रों ने लोकप्रियता की वह ऊंचाई हासिल की है जो किसी और चरित्र के बुते की  नहीं है। इन दोनों ही किरदारों ने अपने रचियता को काफी पीछे छोड़ दिया है। जेम्स बांड की पहली फिल्म डॉ नो ( 1962 ) से लेकर 2015 में आई चौबीसवी  फिल्म ' स्पेक्टर ' तक दर्शको की पसंद पर खरी उतरी है।  इन फिल्मो ने ना सिर्फ दर्शको दिल जीता है वरन बॉक्स ऑफिस को भी मालामाल किया है। इन फिल्मो का केंद्रीय पात्र एक ब्रिटिश जासूस है जो एम् आई 6 के लिए काम करता है। जेम्स बांड को एक कोड नाम भी दिया गया है oo7 ( डबल ओ सेवन ) . दूसरे जासूसों से उलट जेम्स कभी अपनी पहचान नहीं छुपाता वह बिंदास होकर अपना परिचय देता है ' नेम इस बांड , जेम्स बांड !
जेम्स बांड की फिल्मे बड़े विशेषणों से लबरेज  रहती है।  बड़ा बजट , भव्य लोकेशंस ,बड़े सेट्स , बड़ी स्टार कास्ट , आधी दुनिया में फैला कथानक , अत्याधुनिक कारे ,  सब कुछ कल्पना से परे। 
जेम्स बांड की सभी फिल्मे इयान फ्लेमिंग के उपन्यासों पर आधारित होती है। ये फिल्मे इस लिहाज से अनूठी होती है कि कथानक सर्व विदित होता है परन्तु फिल्मांकन का तरीका जुदा होता है। पिछली आठ फिल्मो से जेम्स की बोस एक अधेड़ महिला ' एम् ' रही है जो उसे हर बार एक मिशन पर इस समझाइश के साथ भेजती है कि ' जिंदा वापस आना जेम्स '' ! 
2018 में जेम्स बांड सीरीज की नयी फिल्म आने की संभावना है। इस श्रंखला के समस्त अधिकार  ' एम् जी एम् ' व  'ईऑन प्रोडक्शन ' के पास है। इन  स्टूडियो के सूत्रों ने बताया है कि फिलहाल अगली फिल्म के लिए कुछ भी फाइनल नहीं हुआ है।  पिछली चार फिल्मो में बांड बने डेनियल क्रैग ही हीरो रहेंगे या किसी और को मौका दिया जाएगा , स्पस्ट नहीं है। उन्होंने यह जरूर स्वीकार किया कि अगली फिल्म के वितरण अधिकार ( distribution rights ) बेचने के लिए बोली लगाने का काम आरम्भ हो  गया है। पिछली फिल्म ' स्पेक्टर ' के डिस्ट्रीब्यूशन राइट सोनी ( sony ) के पास थे जिसने 57 मिलियन डॉलर का मुनाफा कमाया था। इस बार दौड़  में सोनी के अलावा चार बड़े स्टूडियो - वार्नर ब्रदर्स , यूनिवर्सल पिक्चर , ट्वेंटीथ सेंचुरी फॉक्स एवं एक और अमेरिकन कंपनी ' अन्नपूर्णा पिक्चर ' शामिल है .अन्नपूर्णा पिक्चर का भारत से कोई रिश्ता नहीं है। यह स्टूडियो ओसामा बिन लादेन पर बनी चर्चित फिल्म ' जीरो डार्क थर्टी ' के सफल डिस्ट्रीब्यूशन को लेकर चर्चा में आया है।   
फिलवक्त पच्चीसवां  जेम्स बांड अपनी फिल्मो के क्लाइमेक्स की तरह रहस्य बना हुआ है। करोडो प्रशंसक , अरबो डॉलर का कारोबार और सिल्वर स्क्रीन पर  किसी अनजान नए खतरे से दुनिया को बचाने के लिए उसे आना ही होगा !! 

Tuesday, April 18, 2017

आधा किलोमीटर दूर मयकदा



हमारे देश में हास्य और आनद की सीमा शुष्क राजनेता और अदालते तय करते है। कैसे कपडे पहनना है कैसा भोजन करना है , क्या नहीं करना है जैसी बाते हमारे वोटो से चुने गए जनप्रतिनिधि तय करते है।  कोई भी नियम कायदा लागू करने में इतनी हड़बड़ाहट होती कि उसके प्रभावों पर कोई पूर्व अध्यन नहीं किया जाता। गत  नवंबर में आई नोट बंदी और एक अप्रैल को राजमार्गो पर आई  शराब बंदी से सरकार और अदालतों की यही कमजोरी सामने आई है . वैश्विक रिसर्च संस्था ' क्रिसिल ' ने शराब की दुकानों और शराब परोसने वाली होटलो को राज मार्ग से पांच सो मीटर दूर जाने के आदेश के बाद उत्पन्न प्रभावों का अध्ययन किया है। क्रिसिल आमतौर पर शेयर बाजार में कंपनियों और निवेशकों को आसन्न संकट और जोखिम की चेतावनी देने का काम करती है। क्रिसिल का यह आकलन देश के
प्रीमियम होटल और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर ( सेवा सत्कार उद्योग ) के लिए किया गया है।
इस रिपोर्ट के अनुसार देश के 12 प्रमुख शहरो में सुप्रीम कोर्ट का आदेश गाज बनकर गिरा है। देश के 384 बड़े होटल ( 3 स्टार , 5 स्टार ) इस निर्णय से हलकान हुए है। क्रिसिल ने प्रभावित होटलों को प्रतिशत में समझाया है। सर्वाधिक प्रभावित पुणे रहा है जहाँ 71 प्रतिशत होटल राजमार्ग पर होने से शराब नहीं परोस पाएंगे। कोलकता के राष्ट्रीय  राजमार्ग 12 पर 69 प्रतिशत , आगरा के 67 प्रतिशत , चेन्नई के 48 प्रतिशत होटलों की आय इस आदेश के बाद गिरकर आधी रह गई है।  इस फहरिस्त मे दिल्ली , मुंबई,  हैदराबाद ,बंगलौर भी शामिल है।  अकेले महाराष्ट्र में इस निर्णय के बाद आठ लाख लोग रोजगार से वंचित हो गए है। देश में रोजगार उपलब्ध कराने वाले क्षेत्रों में पर्यटन और  सत्कार उद्योग चार करोड़ नौकरिया पैदा  करता है। इस क्षेत्र के साथ अगर छेड़छाड़ नहीं होती तो यह उद्द्योग 2 प्रतिशत की दर से बढ़ते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में महत्वपूर्ण योगदान देता। 
माननीय अदालत ने इस निर्णय को लागू करते समय कुछ पहलुओं को नजरअंदाज कर दिया। उनके निर्णय में यह भी है कि ये दुकाने या होटल अपने स्थान परिवर्तन का विज्ञापन भी नहीं करेगी। अदालत को इस बात का संज्ञान होना चाहिए कि  'गूगल मैप ' पचास मीटर के दायरे में आने वाली जगहों और स्थानों की सटीक जानकारी दे देता है। उसे वह कैसे रोकेगी ? अधिकांश वाहन जी पी एस से लेस होते है। 
देश में प्रतिवर्ष 464789  सड़क दुर्घटनाये होती है जिसमे शराब से होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या महज ढेड़ प्रतिशत है।  इस ढेड़ प्रतिशत को कड़े  दंडात्मक प्रावधानों से रोका जा सकता था। सरकार स्वास्थ और शिक्षा पर जो पैसा खर्च करती है उसमे बहुत बड़ा हिस्सा शराब से प्राप्त राजस्व का होता है।इस नुक्सान की भरपाई कैसे होगी , माननीय अदालत को इस पर भी गौर करना चाहिए था। 

Saturday, April 15, 2017

हैप्पी एंडिंग ' वाली कहानी



कुछ कहानियों का अंत शुरुआत में ही तय हो जाता है। ऐसी कहानिया पाठकों की जिज्ञासा के तनाव को कम कर देती है।  कुछ दर्शको का फिल्म के अनपेक्षित एंडिंग पर ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। दर्शको का एक बड़ा वर्ग ' हैप्पी एंडिंग ' वाली फिल्मे देखना ज्यादा पसंद करता है। इस तरह की फिल्मे बनाने वाले बड़जात्या घराने ( राजश्री पिक्चर्स ) ने दर्जनों फिल्मे बनाई है ( मेने प्यार किया , हम आपके है कौन , हम साथ साथ है , वगैहरा वगैहरा। बहरहाल , इस कॉलम में आज हम फिल्मो की बात नहीं करेंगे। बात होगी शिवसेना और उनके सांसद रविंद्र गायकवाड़ की। एक पखवाड़े पूर्व एयर इंडिया की फ्लाइट में इन सांसद महोदय ने एक सीनियर कर्मचारी को मनपसंद सीट न मिलने पर बुरी तरह पीट दिया था। सांसद को अपनी ताकत का अंदाजा था कि उनपर कोई चार्ज नहीं लगेगा। लिहाजा टीवी कैमरे पर उन्होंने दबंगई से अपनी वीरता का बखान भी किया। इन पंद्रह दिनों में गायकवाड़ पर दर्जनों लेख , संपादकीय लिख कर सैकड़ों टन अखबारी कागज़ बर्बाद हुआ। दर्जनों न्यूज़ चैनल ने अपने हजारो घंटे सांसद की मर्यादा और नैतिकता बताने में खर्च कर दिए। लेकिन सयाने जानते थे कि कुछ नहीं होगा , और वही हुआ भी।  रविंद्र गायकवाड़ को माफ़ कर दिया गया। इस कहानी में किसी साधारण पैसेंजर को रख कर देखिये।  क्या वह भी इसी तरह माफ़ कर दिया जाता ? शायद कभी नहीं ! 
  अगर आप सोंचते है कि  शिवसेना की धमकी '' मुंबई से एक भी विमान नहीं उड़ने देंगे '' की वजह से ऐसा हुआ है ? तो आप बिलकुल नादान है। शिवसेना इस समय जिस मुकाम पर है वहां से वह केंद्र सरकार की जब चाहे बांह मरोड़ सकती है। महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस की सरकार सेना की बैसाखी पर टिकी हुई है। भाजपा के अश्व मेघ यज्ञ का घोडा जुलाई तक निर्विध्न दौड़ता रहे इसके लिए भी शिवसेना को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता। क्योंकि अगला राष्ट्रपति भाजपा का हो और शिवसेना साथ न हो तो बना बनाया खेल बिगड़ सकता है। 
'' जो चाहते है पा कर रहते है  '' शिवसेना की टैग लाइन हो सकती है।  मराठी मानुस के नाम पर जब चाहा मुंबई को ठप कर देने वाली सेना की उपलब्धियों के फेहरिस्त लम्बी है। 2003 में सचिन तेंडुलकर को मिली फरारी कार पर तत्कालीन एन डी ए सरकार ने सवा करोड़ की एक्साइज ड्यूटी लगाईं तो सचिन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा से मिलने के बजाये ' मातो श्री ' पहुँच गए। हालांकि उनकी माली हालत तब भी इतनी थी कि वे ऐसी दस कार खरीद कर अपनी जेब से टैक्स भर सकते थे। बाल ठाकरे के एक टेलीफोन काल ने भारत सरकार को हिला कर रख दिया और सचिन को टेक्स में छूट मिल गई। जया बच्चन ने एक कार्यक्रम में मराठी के बजाय हिंदी में भाषण दिया। मंच पर राज ठाकरे भी थे। इस गुस्ताखी की सजा अमिताभ की इंग्लिश फिल्म '' द लास्ट लिअर ''के पोस्टरों और होर्डिंग को भुगतना पड़ी। विनम्र  महानायक अपनी जिंदगी में पहली बार किसी से माफ़ी मांगते देखे गए। 
इस लेख का 'लुब्बे लुआब ' यह है कि जाओ रविंद्र हमने तुम्हे तुम्हारी शर्तो पर माफ़ किया ! कानून आम लोगों के लिए है और तुम कानून से ऊपर हो।  

ऐश्वर्या का गाउन और कांन्स फिल्म फेस्टिवल

सत्तरवें कांन्स फिल्म फेस्टिवल की शुरुआत एक सुखद संयोग के साथ हुई। फ्रांस की जनता ने अपना सबसे युवा राष्ट्रपति चुना है - एम्मानुएल मैक्रॉ...