Monday, May 21, 2018

लुभावना विध्वंस !

देश के कुछ हिस्सों में आये धुल आंधी के अंधड़ ने सौ से ज्यादा लोगों की जिंदगी ख़त्म करदी सम्पति का नुक्सान हुआ वह अलग। हमारा देश इस लिहाज से श्रेष्ठ  है कि इसे प्रकृति ने चारो मौसमों  की सौगात  दी है। परन्तु हरेक मौसम अपनी पराकाष्टा पर विध्वंस भी लेकर आता है। अति बारिश से आने वाली बाढ़ , पेंतालिस छयालीस डिग्री तापमान पर चलने वाली गर्म हवाए , शीत लहर और कोहरे का प्रकोप आदि भी कई हजार लोगों को असमय काल के सुपुर्द करते रहे है। इनके अलावा भूस्खलन , भूकंप , बादल फटना जैसी प्राकृतिक आपदाए भी बगैर आहट हमारी जिंदगियों पर मंडराती रही  है। ये आपदाएं भी किसी फिल्म का विषय हो सकती है यह बात हॉलीवुड ने दुनिया को बेहतर तरीके से समझाई है। आपदाओं पर बनी फिल्मों को ' डिजास्टर मूवी ' की श्रेणी में रखा गया है।इन फिल्मो का इतिहास इतना ही पुराना है जितना सिनेमा का।  सिनेमा माध्यम के शुरूआती दौर में ही इस तरह की फिल्मे बनना आरम्भ हो गई थी। साइलेंट फिल्मों के समय में बनी ' फायर ' ( 1901 ) विध्वंस पर आधारित पहली फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म में एक आदमी जलते हुए मकान से एक परिवार को सुरक्षित बाहर निकालता है। अपनी पहली और अंतिम यात्रा पर लंदन से अमेरिका के लिए निकले टाइटेनिक जहाज ने 1912 में जल समाधि ली थी। इस दुखद घटना के ठीक एक वर्ष बाद साइलेंट फिल्म ' टाइटेनिक अटलांटिस '  1913  में अमेरिका में रिलीज़ हो गई थी। 
डिजास्टर फिल्मों में आमतौर पर प्रकृति फिल्म का नायक होती है। सम्पूर्ण कथानक उसके ही इर्दगिर्द घूमता है। प्राकृतिक आपदाएं अपने पुरे शबाब पर होती है।  अधिकांश फिल्मों में मनुष्य उसके सामने असहाय ही नजर आता है। परन्तु अंत में मनुष्य अपनी चतुराई से किसी तरह बच निकल कर प्रकृति के कोप से  मानव जाति को बचा लेता है। डिजास्टर जॉनर की फिल्मो का ऐसा आकर्षण रहा है कि कॉमेडी और हॉरर की तरह दुनिया भर में इसने अपना अलग दर्शक वर्ग बना लिया है। इस आकर्षण को हॉलीवुड के बड़े स्टूडियो और फिल्मकारों ने डटकर भुनाया है। समय के साथ अपग्रेड होती तकनीक , विजुअल इफेक्ट , सिनेमोटोग्राफीऔर कंप्यूटर जनरेटेड इमेजेस के बदलाव को हर नई  फिल्म के आगमन के साथ महसूस किया जा सकता है। इन फिल्मों की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह रही है कि अधिकाँश सफल फिल्म किसी बेस्टसेलर किताब पर आधारित रही है। 1974 में आई ' द टॉवरिंग इन्फर्नो ' एक सो अड़तीस  मंजिला बिल्डिंग में लगी आग में फंसे लोगों पर आधारित थी। इस फिल्म को दर्शक आज भी याद करते है। इसी तरह आर्थर हैली के लोकप्रिय उपन्यास ' एयरपोर्ट ' पर इसी नाम से आई फिल्म और ' अर्थक्वेक ' ( दोनों 1975 ) आज भी अपनी लोकप्रियता बरकरार रखे हुए है। 
1990 के बाद इन फिल्मों के विशाल  बजट और वीएफएक्स तकनीक के बढ़ते  प्रयोग ने कल्पना  और वास्तविकता की लकीर को लगभग पाट  दिया है। अब इन फिल्मो में विध्वंस को देखना लुभावना हो गया है।  एक बड़े स्वीमिंग पूल में शूट हुई  केट विंस्लेट , लेनार्डो डी कैप्रिया की दुखद प्रेमकथा  वाली ' टाइटेनिक '  ( 1997 ) इसके पहले स्टीवन स्पीलबर्ग की हेलन हंट और बिल पिक्सटन अभिनीत  आधी सीट पर बैठकर देखने को मजबूर कर देने वाली  ' ट्विस्टर ' ( 1996 ) जेम्स बांड बनने के पूर्व पिएर्स ब्रोसनन की ' दांतेस पीक ' ( 1997 ) कभी ' गॉडफादर ' फिल्म में गॉडफादर बने मार्लोन ब्रांडो के विश्वस्त सलाहकार बने रोबर्ट डुआल की ' डीप इम्पैक्ट ' (1998 ) धीमी आवाज में डायलाग बोलने वाले ब्रूस विलिस की ' आर्मगेडन ' (1998 ) डेनिस क्वेड की ' द डे आफ्टर टुमारो ' ( 2004 ) हॉलीवुड के चॉकलेटी हीरो जॉन कुसाक की ' 2012 ' ( 2009 ) डिजास्टर श्रेणी की बेहद उल्लेखनीय फिल्मे है। 
भारत में इन फिल्मों का बहुत बड़ा दर्शक वर्ग है परन्तु बॉलीवुड में साइंस फिक्शन या डिजास्टर फिल्मे बनाने का दुस्साहस बिरले निर्माताओं ने  ही किया है। 1979 में यश चोपड़ा निर्देशित ' काला पत्थर ' चसनाला खान दुर्घटना पर आधारित थी। अमिताभ बच्चन के शानदार अभिनय के बावजूद यह फिल्म अपनी लागत  नहीं निकाल पाई थी। इसी तरह बी आर चोपड़ा निर्मित ' द बर्निंग ट्रैन ' (1980 ) अपने डिजास्टर से अधिक मधुर गीत संगीत के लिए सराही गई थी।  दोनों ही फिल्मे मानव निर्मित आपदाओं पर आधारित थी। 

Saturday, May 12, 2018

आईना दिखाती फिल्म

अधिकांश न्यूज़  चैनल मौजूदा दौर में सबसे ज्यादा अविश्सनीयता के माहौल से गुजर रहे है। चार पांच  साल पहले भी खबरे बाकायदा प्लांट की जाती थी। दर्शकों की मानसिकता को किस और मोड़ना है इस पर गहन शोध होता था।  परन्तु यह सब काम एक सिमित दायरे में और लुके छिपे तरीके से होता था। वर्तमान में यह सब काम धड़ल्ले से और खुलकर हो रहा है। फेक न्यूज़ ' शब्द जितना अब प्रचलन में आया है उतना पहले कभी नहीं रहा। ख़बरों के प्रस्तुतीकरण से तय किया जाने लगा है कि दर्शक के अवचेतन में कोनसा विचार रोपना है ताकि समय आने पर उसे बरगलाने में ज्यादा कवायद न करना पड़े। 



 पेशे से सिविल इंजीनियर और विडिओ लाइब्रेरी चलाकर फिल्म उधोग में आये रामगोपाल वर्मा ने अपनी पहली ही फिल्म से ऐसा समां बाँधा था  कि क्या दक्षिण और क्या बॉलीवुड सभी उनके कायल होगए। रामगोपाल वर्मा ने फिल्म मेकिंग की कोई विधिवत शिक्षा नहीं ली है।  अपनी विडिओ लाइब्रेरी में फिल्मे देखकर और एक ही दृश्य को दर्जनों बार रिवाइंड कर उन्होंने निर्देशन और स्क्रिप्ट राइटिंग के गुर सीखे थे। अपने समकालीन निर्देशकों से उलट वर्मा ने अपनी खुद की फिल्म मेकिंग शैली निर्मित की। उनकी फिल्मे मूलतः तीन महत्वपूर्ण स्तंभों पर टिकी  होती है - सधी हुई स्क्रिप्ट , केमेरे का एंगल और सलीके से की गई एडिटिंग। उनकी फिल्मो की बुनावट पर खासतौर से आइन रेंड , और जेम्स हेडली चेस का प्रभाव महसूस किया जा सकता है। 1992  में उनकी निर्देशित सुपर नेचुरल थ्रिलर ' रात ' का ओपनिंग सीन  महज संगीत और कैमरे के मूवमेंट से ही दर्शक को सिहरा देता है। बाद में आगे चलकर यही प्रयोग उन्होंने ' भूत '  ( 2003 ) डरना मना है ( 2003 ) डरना जरुरी है (2006 ) में भी किया। स्क्रिप्ट राइटर या  डायरेक्टर या  प्रोडूसर के रूप में उनका नाम अस्सी से ज्यादा फिल्मों के साथ जुड़ा है। उनकी सत्या , शिवा , कंपनी , सरकार , अब तक छप्पन जैसी फिल्मे  मील का पत्थर मानी जाती  है।   उनकी सभी फिल्मों की बात करने के लिए यह कॉलम बहुत छोटा है। इस लेख की शुरुआत में हमने पक्षपाती न्यूज़ चैनल की भूमिका पर सवाल उठाये थे। 2010 में राम गोपाल वर्मा ने इस तरह के असाधारण विषय पर ' रण ' निर्देशित की थी। यह पोलिटिकल थ्रिलर फिल्म इस मायने में भी जुदा थी कि इस तरह की फिल्मों के लिए दर्शक अपना मानस अभी हॉलीवुड की तरह परिपक्व नहीं कर पाया है। दूसरा , इस तरह की फिल्म बनाना जिसके किरदार सीधे वास्तविक जीवन से उठकर आरहे हो , वाकई में जोखिम और साहस का काम है।  एक लड़खड़ा कर चल रहे न्यूज़ चैनल का मालिक आइन रैंड के उपन्यास ' फाउंटेन हेड ' के नायक हॉवर्ड रॉक की तरह आदर्शवादी है। उसूल उसके जीवन की प्राथमिकता है।  उसका बेटा और दामाद एक भ्रष्ट राजनेता की मदद से अपने न्यूज़ चैनल पर  फेक न्यूज़ चला कर ईमानदार प्रधानमंत्री को सत्ता से हटा देते है।  उद्योगपति -राजनेता -न्यूज़ चैनल का गठजोड़ कैसे हरेक परिस्तिथि को अपने पक्ष में मोड़ लेता है , यह फिल्म उसका सुन्दर उदहारण है। आठ वर्ष पुरानी यह फिल्म देखते हुए दर्शक को महसूस होता है जैसे वर्तमान को हूबहू स्क्रीन पर उतार दिया गया हो। विश्वसनीयता की आखरी पायदान पर खड़े न्यूज़ चैनल , औद्योगिक घरानों के लालच , राजनैतिक हत्याए , कपड़ों की तरह बदलती वफ़ादारी -  ' रण ' हमारे समाज को आईना दिखाती है। यह कड़वा सच भी दर्शाती है कि निष्पक्षता के रास्ते पर चलने वाले चेनलों को दर्शकों का भी सहारा नही मिलता । टीआरपी का खेल उन्हें आर्थिक रूप से तंगहाल कर देता है ।

Thursday, May 10, 2018

जमीन से जुड़ा फिल्मकार : माजिद मजीदी

कोई भी  रचनाकार जिस माहौल में अपना लड़कपन गुजारता है उसकी झलक उनकी  रचनाओं में स्वाभाविक रूप से प्रतिबिंबित होने लगती है। उनका भोगा हुआ यथार्थ अनजाने ही उनकी लेखनी में उतर आता है। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद , मेक्सिम गोर्की या फ्रेंज़ काफ्का की अधिकांश रचनाओं में पाठक जीवन की  मधुरता व कटुताओं के साथ  उस दौर की सामाजिक बुनावट को भी  महसूस कर सकते है। इसी तरह के अनुभव महान फिल्मकारों की नजर को भी  आकार देते है। कोई भी फ़िल्म परदे पर आने से पहले कई बार उनके मानस में गुजरती है । तंगहाली में गुजारे  समय का  निचोड़  अनजाने ही उनके अनुभवों में दर्ज हो जाता है । खुद भोगे यथार्थ की पूंजी से संचित उनका अनुभव उनकी कृतियों में साफ़ झलकता है। ऐसे ही एक फिल्मकार है माजिद मजीदी। इस ईरानी फिल्मकार ने 1979 की  प्रसिद्द ईरानी क्रांति को नजदीक से देखा है जिसमे पहलवी वंश को हटाकर कट्टरपंथी अयातुल्लाह खोमेनी ने देश पर  इस्लामिक शासन लाद दिया था। माजिद  मजीदी और उनकी तरह के लिबरल फिल्मकारों की वजह से अस्सी नब्बे के दशक को दूसरी सांस्कृतिक क्रांति के रूप में याद किया जाता है। यह वह दौर था जब ईरानी फिल्मे वैश्विक फलक पर अपनी छाप छोड़ रही थी। फिल्मकारों के सामने अक्सर दो विकल्प रहते है। एक , या तो वे लोकप्रिय सिनेमा बनाये , जिससे उनकी तिजोरी भरती रहे , दूसरा   वैश्विक सोंच वाला सिनेमा बनाये जो सिनेमाई माध्यम को समृद्ध करते हुए कलात्मक सिनेमा को एक नई उचाई पर ले जाये । अपने पेंतीस  साल के सफर में माजिद मजीदी ने उन्नीस फिल्मे और डॉक्यूमेंटरीया निर्देशित कर अपने को दूसरी श्रेणी में स्थापित किया है। 
मानवतावाद मजीदी की फिल्मों का महत्वपूर्ण पहलु रहा है। यद्धपि उनकी फिल्मों की थीम समसामयिक होती है परन्तु कहानी में आधुनिक और प्राचिन जीवन शैली दोस्ताना ढंग से गुथी हुई साथ साथ चलती है। उनकी फिल्मों में सूफी संस्कृति की गंध महसूस की जा सकती है जो पूरी दुनिया की नजर  में ईरान की  सांस्कृतिक पहचान है। मजीदी दर्शक को बाध्य कर देते कि वह  मानवीय अनुभवों को काव्यात्मक लहजे में महसूस करे। 
अपनी फिल्म ' चिल्ड्रन ऑफ़ हेवन ' से ऑस्कर अकादमी की दहलीज पर ईरान के पहले  कदम रखाने  वाले मजीदी की फिल्मे हमें अपने मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के गाँव की सैर करा देती है। जैसे जैसे आप शहर की उलझन भरी जिंदगी से दूर होने लगते है आपको भोले भाले लोग मिलना आरम्भ हो जाते है। ये वे लोग होते है जो शहरों की दिखावटी और बनावटी जिंदगी से दूर सुरक्षित बच गए है। ऐसी ही एक खूबसूरत बुनी हुई  फिल्म ' सांग ऑफ़ स्पैरो ' है। यह फिल्म हमें ठहरकर सोंचने को मजबूर करती है कि   हम आधुनिकता को तजकर मानवीय मूल्यों और मानवीयता को सहेज सकते है अन्यथा  'रोबोट ' बनने से  हमें कोई नहीं रोक सकता।  
चीन सरकार के निमंत्रण पर एक डॉक्यूमेंट्री बना चुके मजीदी पैगम्बर ' मोहम्मद ' ( 2015 ) पर भी फिल्म  बना चुके है। सत्यजीत रे और श्याम बेनेगल से प्रभावित इस फिल्मकार ने हालिया रिलीज़ हिंदी फिल्म ' बियॉन्ड द क्लाउड्स ' को निर्देशित किया है।

Saturday, April 28, 2018

एक धागे में बंधी फिल्मे

अमेरिकन फिल्म ' मेमेंटो (2000 ) स्पेनिश फिल्म ' इर्रिवर्सिबल ' ( 2002 ) तमिल फिल्म 'गजनी ' ( 2005 ) हिंदी फिल्म ' गजनी ' (2008 ) में क्या बात कॉमन है ? जिन दर्शकों ने इन चारों फिल्मों को डूबकर  देखा है उनकी स्मृति में तुरंत इस सवाल का जवाब उभर सकता है।  चारो ही फिल्मे एक ही विचार के विस्तार का  परिणाम है। साधारण से विचार में भी अनगिनत अद्रश्य तंतु निकले हुए होते है जिनको थामकर  कई कालजयी रचनाओं का सृजन किया जा सकता है। इस तरह के प्रयासों में समानताए होने के बाद भी उन्हें मौलिक ही  माना जाता है। 
मेटाफ़िज़िक्स दर्शनशास्त्र की शाखा है जो मस्तिष्क में उठने वाले आधारभूत प्रश्नों के जवाब खोजने का प्रयास करती है। किसी अवधारणा की प्रकृति क्या है या मनुष्य के होने , उसके अस्तित्व और यथार्थ ,अनजाने भविष्य  जैसी  गूढ़ और दुरूह  लगने वाली बाधाओं के समाधान प्रस्तुत  करती है। 
अमेरिकन निर्माता निर्देशक क्रिस्टोफर नोलन ने इस तरह के उबाऊ लगने वाले विषयों पर दिलचस्प और सफल फिल्मे बनाई है। उनकी एक फिल्म ' इन्सेप्शन ' में नायक खलनायक के सपनों में प्रवेशकर षड़यंत्र को रोकता है। नोलन की ही ' मेमेंटो ' का नायक ' एन्डरग्राड  एम्नेसिआ ' से पीड़ित है जिसकी वजह से उसकी  स्मृतियाँ पांच मिनिट से ज्यादा नहीं रह पाती। यह बिमारी उसे एक प्राणघातक चोंट की वजह से लगी है। नोलन ने दर्शको को नायक की मनोस्तिथि बताने के लिए ब्लैक एंड वाइट एव कलर दृश्यों की सीक्वेंस का सहारा लिया था। जब भी उसकी याददाश्त जाती है द्रश्य ब्लैक एंड वाइट में बदल जाता है। इस दौरान वह जो भी कुछ करता है उसे याद नहीं रहता। और यही द्रश्य सबसे  पहले आता है।  मेमेंटो से प्रेरित होकर फ्रेंच डायरेक्टर गॉस्पेर नोए ने अनूठा प्रयोग किया।  उन्होंने मात्र तेरह द्रश्यों की सहायता से क्राइम थ्रिलर ' इर्रिवर्सिबल ' बनाई। यह पूरी फिल्म ही रिवर्स में चलती है। मतलब फिल्म का अंतिम तेरहवाँ  द्रश्य सबसे पहले दिखाया जाता है फिर बारहवा फिर ग्यारवा। यह फिल्म नग्नता , हिंसा और  क्रूरता से भरपूर थी। गॉस्पेर ने कैमरे के साथ भी प्रयोग किया। पूरी फिल्म में कैमरा एक जगह भी स्थिर नहीं रहता वह लगातार घूमता रहता है।  सिर्फ दुष्कर्म के नो मिनिट के सीन में एक ही जगह  ठिठक कर रुक जाता है।जैसे दशहत भरा कोई व्यक्ति टकटकी लगाए अपराध होते देख रहा है। ।  इसी तरह मर्डर के एक मिनिट के  सीन में भौंचक हो ठिठक जाता है। ।यह ऐसी फिल्म है जो हर कोई नहीं देखना चाहेगा।  दोनों ही फिल्मों में पात्रों की भावनाओ  और परिस्तिथियों की वजह से उनकी असहाय स्थिति का बेहतरीन चित्रण है। आम आदमी परिस्तिथिवश किस तरह बदल जाता है यही बात  ये फिल्मे बगैर लाग लपेट के दर्शाती है। तमिल निर्देशक मुरुगदास ने मेमेंटो के नायक की शार्ट टर्म मेमोरी  को प्रेमकहानी में डुबाकर  'गजनी ' बनाई जो बेहद सफल रही। इसे तेलुगु में भी बनाया गया और हिंदी में भी। इन तीनो ही फिल्मों की  नायिका ' असिन ही रही और निर्देशक मुरुगदास रहे। यद्धपि उस दौर में आमिर खान पर आरोप लगे थे कि वे किसी हॉलिवुड फिल्म की नक़ल कर रहे है परन्तु गजनी की सफलता ने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए थे ।
ये सभी फिल्मे इस बात पर फोकस करती है कि हमें अगर भविष्य पूरी तरह ज्ञात हो जाए तो जीवन असहनीय हो जाएगा। जीवन का आनंद उसकी निर्दोष अज्ञानता में ही निहित है। यद्धपि यह सच इन फिल्मों ने बहुत ही हिंसक और क्रूर तरीके से दर्शाया है। 
सुजॉय घोष ने ' इर्रिवर्सिबल ' के राइट्स खरीद कर उसे हिंदी मे अमिताभ बच्चन और तापसी पुन्नू के साथ बनाने की घोषणा की है। 


Saturday, April 21, 2018

मुसाफिर हु यारो ! मुझे चलते जाना है




सिनेमाई इतिहास में सत्तर के दशक के एक बड़े हिस्से पर तीन अलग अलग लोगों ने अपनी गहरी छाप छोड़ी है। सुपर स्टार राजेश खन्ना , गायक किशोर कुमार एवं संगीतकार राहुल देव बर्मन। राहुल देव बर्मन के पिता सचिन देव बर्मन  स्वयं जाने माने संगीतकार थे तो राहुल को संगीत की विरासत मिलना तय थी। फिल्म इंडस्ट्री की एक दिलचस्प विशेषता है कि इसमें संतान को पहचान बनाने के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता। बल्कि  यहाँ अपनी जगह बनाने के लिए सबसे ज्यादा संघर्ष की दरकार होती है। राहुल ने महज नौ वर्ष की उम्र में एक धून रच डाली थी जिसका उपयोग उनके पिता ने ' फंटूश  (1956 ) में किया था। आर डी या पंचम के नाम से लोकप्रिय इस संगीत के उस्ताद की रची धूने उनके अवसान के दो दशक बाद भी संगीत प्रेमियों के जेहन में बसी हुई है। इस लोकप्रियता की वजह थी पंचम की अपनी विकसित की हुई शैली। अपने समकालीन संगीतकारों से उलट  ' एक्सपेरिमेंटल ' वाद्य यंत्रों का प्रयोग सबसे पहले आर डी ने ही किया। मिसाल के तौर पर फिल्म ' शोले ' के हेलन और जलाल आगा पर फिल्माये गीत ' मेहबूबा मेहबूबा ' की धून उन्होंने बीयर की खाली बोतल से निकाली थी।  इसी तरह  ' यादों की बारात ' के बेहद रोमांटिक गीत  ' चुरा लिया है तुमने जो दिल को ' के लिए उन्होंने चाय के कप प्लेट का प्रयोग किया था। फिल्म  ' पड़ोसन ' के कालजयी गीत ' एक चतुर नार  के लिए कंगे को रगड़ कर संगीत रचा था। सिर्फ मादक और रोमांस की चाशनी में भीगे गीत ही नहीं वरन  तहाकथित सैड सांग  में भी पंचम ने अपने सिग्नेचर शैली का प्रयोग किया है । ' प्यार का मौसम ' के लिए मोहम्मद रफ़ी का गाया गीत ' तुम बिन जाऊ कहाँ ' नायक की घोर उदासी के बावजूद जीवंत बन पड़ा है। इसी तरह विरह को टालने की मनुहार करता ' तू मइके मत जइयो ' या फिर ' नाम गुम  जाएगा चेहरा ये बदल जाएगा ' या ' सागर किनारे दिल ये पुकारे ' जैसे गीत उदासियों के बावजूद  हमारे दिल में कही गहरे उतर जाते है। इसके विपरीत ' ओ  हसीना जुल्फों वाली ' ' दिल विल प्यार व्यार ' प्रफुल्लित और तीव्र संगीत का श्रेष्ठ उदाहरण है। 
पंचम के जीवन में आशा भोंसले का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। व्यक्तिगत रूप से भी और पेशेवराना भी।  इस जोड़ी ने मधुरतम और हिट  गीत दिए है। 'नहीं नहीं अभी करो थोड़ा इंतजार ' ' रोज रोज आँखों तले एक ही सपना चले ' ' ये लड़का हाय अल्लाह कैसा है दीवाना ' ' मेरा कुछ सामान  तुम्हारे पास है ' ' पिया तू अब तो आजा ' इस जोड़ी के  सैंकड़ों गीतों में से कुछ उल्लेखनीय उदाहरण है। 
2010 में पंचम के प्रशंसक फिल्मकार ब्रम्हानंद सिंह ने पंचम के जीवन के हरेक पहलु को छूती और उनके समकालीन लोगों के इंटरव्यू के आधार पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई। ' पंचम अनमिक्सड ' नाम की यह डॉक्यूमेंट्री दो नेशनल अवार्ड जीत चुकी है। पिछले दिनों इस डॉक्यूमेंट्री को बाकायदा पी वी आर सिनेमा में फीचर फिल्म की ही तरह रिलीज किया गया। ऑनलाइन फिल्मे उपलब्ध कराने वाली साइट ' नेटफ्लिक्स ' के कैटलॉग में भी इस डॉक्यूमेंट्री ने जगह बना ली है। ऍफ़ एम् रेडियो स्टेशन उनके संगीतबद्ध किये गीतों के बगैर एक दिन भी गुजारा नहीं कर सकते। यही हाल रीमिक्स बनाने वालों का भी है। देर रात तक चलने वाली पार्टिया उनके संगीत के बिना अधूरी मानी जाती है। पंचम यु ही भविष्य के संगीतकार नहीं कहे गए थे। 
फिल्मो की दुनिया में लगातार कोई शीर्ष पर नहीं बना रह सकता। यहां कब ढलान आजाए , दावे से नहीं कहा जा सकता। सत्तर से नब्बे के दशक तक सिरमौर रहे पंचम बप्पी लहरी के आगमन के साथ  अपना सुर खोने लगे थे। विधु विनोद चोपड़ा इस डॉक्यूमेंट्री में कहते नजर आते है कि किस तरह सब तरफ से ख़ारिज कर दिए गए पंचम ' 1942 ए लव स्टोरी ' के लिए संगीत रचते है। इस फिल्म के लिए पंचम का  रचा संगीत  उन्हें उसी स्थान पर वापस बैठा देता है जिसके वे हकदार थे। अफ़सोस ! अपनी सफलता को देखने के लिए पंचम जीवित नहीं रहे।   ' 1942 ए लव स्टोरी ' की रिलीज के पहले ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था। ' कुछ ना कहो , कुछ भी ना कहो ' उनका विदाई  संगीत है । 

Sunday, April 15, 2018

जिंदगी की किताब : रेखा


भानु रेखा गणेशन जिन्हे अब सिर्फ रेखा नाम से जाना जाता है। वे ऐसे माता पिता की संतान थी जिन्होंने विधिवत विवाह नहीं किया था । इस तरह के बच्चे सारी उम्र एक अपराध बोध लिए घूमते है। भारतीय परिवेश में अंततः माँ को ही दोहरी भूमिका निभानी होती है। इस तरह के बच्चे आमतौर पर समय से पहले परिपक्व हो जाते है , साथ ही उनका मिजाज भी  विद्रोही हो जाता  है। रेखा के साथ भी यही हुआ।  उन्हें महज तेरह वर्ष की उम्र में ही कैमरे के सामने धकेल दिया गया था क्योंकि सात लोगों के परिवार का पेट भरने  के लिए किसी को तो कमाना ही था। उनकी पहली हिंदी फिल्म ' सावन भादो ' जब आई तब वे मात्र सोलह बरस की थी। न ठीक से हिंदी बोल पाती थी न अपनी पसंद का खा सकती थी क्योंकि दक्षिण भारत और बम्बई के खान पान में जमीन आसमान का अंतर था। फ़िल्मी पत्रिकाओं ने उन्हें ' मोटी बतख ' कहकर पुकारा तो उनकी ही फिल्म के नायक ने उन्हें ' काली कलूटी ' का खिताब दिया। 
आज अगर रेखा के बारे में बात की जाये और उनके जीवन को कुछ शब्दों में समेटने का प्रयास किया जाए तो वह होगा ' पहाड़ी नदी '. पहाड़ों पर बहने वाली नदिया अक्सर वेगवान और चंचल होती है। वे एकदम से उथली हो जाती है और अचानक से गहरी। रेखा के स्वाभाव में परस्पर विरोधी भाव मौजूद रहे है। अल्हड़ता और गंभीरता। 
वे सारी उम्र ऐसी ही रहती , मोटी , अपनी शक्लों सूरत से बेपरवाह अगर उनके जीवन में अमिताभ का आगमन नहीं हुआ होता। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ के प्रसिद्ध नाटक ' पिगमेलियन ' में प्रमुख पात्र प्रो हिंगिस एक उज्जड गंवार लड़की को तराश कर इतना सभ्य बना देते है कि राजपरिवार भी उसे नहीं पहचान पाता। अमिताभ के आभा मंडल का प्रभाव था कि रेखा ने उसमे खुद को तलाशा और निखर गई। अमिताभ रेखा के जीवन में प्रो हिंगिस की तरह ही आये और चले भी गए।  ठीक  ' पिगमेलियन ' के अंत की तरह।  
जब रेखा खुद को निखार रही थी तब हॉलिवुड में ' जेन फोंडा ' ने अपनी देह के कायाकल्प का वीडियो जारी किया था। जेन फोंडा से प्रेरित होने वाली रेखा पहली भारतीय नायिका थी जिन्होंने रेखा :माइंड एंड बॉडी टेम्पल नाम से किताब लिखी थी। अपनी देह को मंदिर मानने की बाते भारतीय आख्यानों में पहले से मौजूद है परन्तु उस पर अमल करने वाली रेखा संभवतः पहली नायिका बनी।  उन्होंने खुद को इतना निखारा कि सौंदर्य के नए प्रतिमान स्थापित होते चले गए। उमराव जान ' कामसूत्र ' खूबसूरत ' उत्सव ' आस्था - अभिनय के साथ उनकी देह के सुंदरतम हो जाने के रेकॉर्डेड दस्तावेज की शक्ल में चिर स्थाई हो गए है। एक नेशनल अवार्ड  तीन फिल्म फेयर अवार्ड और देश की सर्वश्रेष्ठ दस अभिनेत्रियों में स्थान पाने वाली रेखा ने सब कुछ हासिल किया परन्तु कोई एक स्थायी रिश्ता नहीं कमा सकी।  जीतेन्द्र , विनोद मेहरा ,किरण कुमार , मुकेश अग्रवाल और अमिताभ रेखा के जीवन में पड़ाव की तरह आये और गुजर गए। अमिताभ के साथ उनका रिश्ता ' नेशनल डिबेट ' बना और पत्र पत्रिकाओं ने उनके तथाकथित रोमांस पर  इतने पेज काले किये कि एक लाइब्रेरी बन जाए। पद्मश्री से सम्मानित इस अभिनेत्री ने व्यावसायिक सिनेमा के साथ ' समानांतर ' सिनेमा में भी अपनी अमिट उपस्तिथि दर्ज की। गंभीर सिनेमा के हस्ताक्षर श्याम बेनेगल ( कलयुग 1981 ) गोविन्द निहलानी ( विजेता 1982 ) गिरीश कर्नार्ड ( उत्सव 1984 ) गुलजार ( इजाजत 1987 ) ने साबित किया कि रेखा सार्थक फिल्मों को  भी अपने नाम से चला सकती है। 
कुछ अरसे पहले बीबीसी ने हॉलीवुड अभिनेत्री ' मेरिल स्ट्रिप ' को ऑस्कर मिलने पर सवाल किया था कि जब चौंसठ वर्ष की मेरिल को ध्यान में रखकर भूमिकाए लिखी जा सकती है तो पचपन  की रेखा के लिए बॉलीवुड प्रयास क्यों नहीं करता। यह हमारे सिनेमा की विडंबना ही है कि 'खून भरी मांग ' जैसी महिला प्रधान फिल्मों की सफलता के बावजूद नायिका को केंद्र में रखकर बनने वाली फिल्मो की संख्या नगण्य है। एक समय बॉक्स ऑफिस पर धन बरसाने वाली जोड़ी अमिताभ रेखा में से अमिताभ आज भी बेहद व्यस्त है और रेखा लगभग बेरोजगार हो चुकी है। 
पिछले हफ्ते तिरसठ वर्ष की यह  सुंदर अभिनेत्री राजयसभा से अपना कार्यकाल पूरा कर विदा हुई। लेकिन यह विदाई ऐसी थी जिसे रेखा कभी याद रखना नहीं चाहेगी। देश के लगभग सभी समाचार पत्रों ने देश के उच्च सदन के प्रति रेखा की उदासीनता पर कठोर टिका टिपण्णी की।  अस्सी के दशक में अपने करियर के उतार पर इस  शोख अभिनेत्री ने गंभीरता ओढ़ ली थी। फ़िल्मी अवार्ड्स में वे जरूर शिरकत करती रही परन्तु सार्वजनिक समारोह में यदाकदा ही नजर आती रही। वही रवैया उन्होंने राजयसभा के प्रति अपनाया। एक बेहतरीन अदाकारा अपनी सम्मानीय भूमिका को सलीके से नहीं निभा पाई । jnrajneesh@gmail.com
 

Sunday, April 8, 2018

गुनाहों का दरवेश : सलमान खान

इतिहास  में शायद पहली बार अजीब इतेफाक हो रहा है। एक हिरन की मौत पर शेर को सजा मिली है। टाइगर जिन्दा है  की मुनादी से डरे सहमे हिरणो ने अदालत के फैसले से रहत की सांस ली होगी। वे इस बात पर भी उत्साहित होंगे कि देर आये दुरुस्त आये फैसले ने उन सलमानों के होंसले भी पस्त कर दिए होंगे  जो अपने रसूख के बल पर हर सलाखों को फांदने का होंसला रखते है। सलमान खान को अदालत ने पांच साल की सजा सुनाई परन्तु इस मुकाम पर पहुँचने में न्याय को दो दशक लग गये। इन बीस सालों में सलमान लगातार एक साथ दो विपरीत मानसिकता में जीए होंगे। स्टारडम का रुतबा और दिन रात सर पर लटकती फैसले की तलवार।  जैसा फ्योदोर दोस्तोवस्की ने अपनी पुस्तक ' क्राइम एंड पनिशमेंट ' में स्थापित किया है कि सजा से ज्यादा सजा का डर भयानक होता है। इन बीस सालों में सलमान ने क्या नहीं भुगता होगा  - एक अदालत से दूसरी अदालत , वकीलों की फौज , गवाहों की मनुहार , न चाहते हुए भी अपने स्वाभिमान को निचले लेवल पर ले जाना , अनगिनत समझौते वह भी दूसरों की शर्तों पर ,  एक तरफ ग्लैमर की चकाचौंध दूसरी तरफ सजा का खौफ।  चतुर से चतुर अपराधी भी जानता है कि एक दिन उसे कानून के सामने सर झुकाये खड़े होना है।  फिर सलमान तो महज एक बिगड़ैल बच्चे से ज्यादा नहीं थे। मासूमियत और उदंडता उनके स्वाभाव में रही है। हमें सलमान से सहानुभूति हो सकती थी अगर यह उनका इकलौता हादसा होता परन्तु हमें उनसे ईर्ष्या हो रही है।  जिस तरह वह एक के बाद एक अपराध में फंसते गये और बच निकलते रहे उससे पूरी कानूनी प्रक्रिया बहस  बन गई। 
अपनी पहली गलती पर उन्हें समझाइश दी गई होती तो शायद उन्हें यह दिन नहीं देखना पड़ता। तब शायद उम्र का दौर या छलांग भरता स्टारडम का अहं था जो  उनके विवेक को पर हावी हुआ होगा और बीइंग ह्यूमन का मास्क उन्हें कही तसल्ली दे रहा होगा कि घबराने की बात नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें कोई सहारा नहीं मिला होगा। अभिनय में असफल और लेखन में सफल अपने पिता से मीलों आगे निकले सलमान किस्मत वाले थे जिन्हे अपनी पहली ही फिल्म ' मेने प्यार किया ' से पहचान मिल गई थी। उनकी हर हिमाकत पर उनका परिवार उनके साथ खड़ा नजर आया है। उनके जीवन में आने वाली समस्त महिलाये भी उनके खिलंदड़ स्वाभाव की वजह से उनसे दूर हो गई। रिश्तो का खालीपन उनकी अपनी पसंद थी। वे क्योंकर किसी के हमसफ़र नहीं बने यह उनका अपना निर्णय था।  भीड़ में रहते हुए बंजारा बन जाना उन्होंने ही स्वीकारा था। 
न्याय की लम्बी प्रक्रिया किसी के लिए राहत हो सकती है और किसी के लिए प्रताड़ना। अगर सलमान न्याय को खरीद सकते तो शायद बीस बरस  पहले ही मुक्त हो गए होते। या वे अपना गुनाह कबुल कर लेते तो शायद अब बेफिक्र होकर जी रहे होते।मानसिक यंत्रणा के बीस बरस उनकी सजा से कही ज्यादा है।  लेकिन नहीं !  वे अपनी नियति को भोगे बगैर मुक्त नहीं होने वाले थे। शायद सलमान आज सोंच रहे होंगे कि ' हम साथ साथ है ' कहने वाले उस दिन उन्हें काले हिरन को निशाना बनाने से पहले ही रोक दिए होते या शिकार का थ्रिल उन्हें नहीं उकसाता या गाँव वालों ने उनकी बन्दुक से निकली गोली की आवाज नहीं सुनी होती तो आज दृश्य कुछ और ही होता। बीस साल तक एक हिरन की तरह अपने मुक़दमे के लिए  दौड़ते हुए सलमान को एकाध बार तो ख़याल आया होगा कि आखिर उस हिरन को मार कर हासिल क्या हुआ ? 
किसी फिल्म के किरदार की तरह लोग सलमान में वो सब देखना चाहते हो जो उनकी स्क्रीन इमेज है । परंतु यह जान लेना भी जरूरी वह एक सामान्य इंसान की तरह ही  है ।

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