Skip to main content

Posts

बुरके में लिपस्टिक

' जब खुला आसमान आँगन में झांकता हो तो खिड़कियों पर कितने ही मोटे  परदे लगा दो , उजाला कमरे में प्रवेश कर ही जाएगा '' ऐसी ही हिमाकत भारतीय सेंसर बोर्ड इन दिनों कर रहा है। समाज के सांस्कृतिक उत्थान की जितनी चिंता सेंसर बोर्ड को है उतनी शायद किसी को भी नहीं है। ' हर - हर  मोदी , घर -घर मोदी ' का नारा देने वाले पहलाज निहलानी को सेंसर बोर्ड चेयरमैन का पद इस एक नारे की बदौलत मिला है।  तभी से वे हर फिल्म को सर्टिफिकेट देने में विवादों में घिरते आये है। निहलानी साहब का मानना है कि भारतीय संस्कृति का बचाव करना उनकी जिम्मेदारी है , जिसे फिल्मे दूषित कर रही है।  वे इस तथ्य को भूल जाते है कि  ' कामसूत्र ' भारत में ही लिखा गया है और खजुराहों के शिल्प भी हमारे ही किन्ही पूर्वजों के हाथ से ही तराशे गए थे। बावजूद इसके हमारी संस्कृति असहिष्णु रही है।  पिछले दो सालों में बहुत सी फिल्मों को सेंसर बोर्ड के नश्तर का शिकार होना पड़ा है।  इसमें  ग्लोबल अपील  वाली जेम्स बांड की फिल्म ' स्काई फाल ' भी शामिल है। ' गंगा जल ' अपहरण ' आरक्षण ' और ' राजनीती &#…
Recent posts

एक लेखक की मौत

वेद प्रकाश शर्मा का निधन हो गया। अस्सी के दशक में युवा हुई पीढ़ी इस नाम से भलीभांति परिचित होगी। इंटरनेट से पोषित पीढ़ी के बारे में मै दावे से कुछ नहीं कह सकता। यह पीढ़ी बाल साहित्य ( पराग , नंदन ,इंद्रजाल कॉमिक्स , ) पढ़ कर युवा हुई थी। इन लोगों को पढ़ने की भूख लग चुकी थी जिसे शांत करने की जवाबदारी उस दौर में कस्बे नगरों में मौजूद किराये पर उपन्यास उपलब्ध कराने वाली लाइब्रेरीयो के जिम्मे थी।  जिसे वे बखूबी निभ्रा रही थी। टेलीविज़न नाम का अजूबा अभी कुछ वर्षों की दुरी पर था और टॉकीज़ में लगने वाली फिल्मे महीनो नहीं बदलती थी। उस दौर के युवा जासूसी उपन्यास पढ़ते थे।  कर्नल रंजीत, सुरेंद्र मोहन पाठक ,जेम्स हेडली चेस ,के जासूसी उपन्यासों  की फेहरिस्त में वेद प्रकाश शर्मा का नाम भी था। होने को गुलशन नंदा भी थे परंतु उनके उपन्यासों का केंद्रीय भाव  ' प्रेम ' होता था। गुलशन नंदा काफी ऊंचाई हासिल कर चुके थे और फिल्मों के लिए भी लिखने लगे थे। राजेश खन्ना के लिए उन्होंने कई फिल्मे लिखी थी।  राजेश खन्ना का मतलब होता था ' भावुक -रुमानियत - आदर्शवादी प्रेम।  ऐसे ही गुलशन नंदा के नावेल थे। जासूस…

दानी मुख्यमंत्री ?

इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के निर्यात से समृद्धि के ढेर पर बैठे नए नवेले राज्य तेलंगाना के मुख्य मंत्री इन दिनों अलग वजह से सुर्खियां बटोर रहे है । चंद्रशेखर राव ( उनके मित्र और नजदीकी उन्हें स्नेह से सी के आर पुकारते है ) काफी धार्मिक प्रवृति के इंसान है । उनके धार्मिक होने से किसी को ऐतराज नहीं है । धर्म व्यक्ति की निजी पसंद है ।परंतु अति धार्मिकता में व्यक्ति तार्किक न होकर अंधविश्वासी ज्यादा हो जाता है । यही बात मुख्य मंत्री के साथ हो रही है । तेलंगाना के गठन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद उसका प्रमुख बनने तक सी के आर ने काफी संघर्ष किया है ।उन्हें जो कुछ भी हासिल हुआ उसे वे भगवान् की देन मानते है । और कही कोई गड़बड़ न हो जाए इसलिए चोटी के ज्योतिषियों की राय लेते रहते है । यह विचित्र विरोधाभास है कि जिस हैदराबाद को बिल गेट्स ने भारत की सिलिकॉन वेली कहा था उस राज्य का प्रमुख इस कदर अंधविश्वासी व्यक्ति बना ।सत्ता सँभालते ही उन्हें सलाह दी गई कि उनके सरकारी निवास का वास्तु दोषपूर्ण है , लिहाजा रेकॉर्ड समय में एक विशाल मुख्य मंत्री आवास का निर्माण किया गया । 
भगवान का आभार मानने के लिये सी क…

नाकाबिल काबिल !!

देश के पुराने पूँजीपति घराने बिड़ला ने देशभर में मंदिरो की विशाल श्रृंखला स्थापित की है । सदियो के बाद भी इस घराने को लोग इनके कारखानो के लिये भले ही याद न रखे परंतु ' बिड़ला मंदिर ' के लिये अवश्य याद रखेंगे । बिड़ला परिवार के लिये एक और उपलब्धि थी गांधी जी का साथ । गांधी जी जब भी दिल्ली आते थे ' बिड़ला हाउस ' में ही ठहरते थे और उनका अंत भी वही हुआ ।  सर्वहारा वर्ग के लिये संघर्ष करने वाले गांधीजी के जीवन का यह विरोधाभास था  जो बहुत कम को समझ में आया ।
सामाजिक सरोकार रखने वाले युवा उद्योगपति घनश्याम  दास बिड़ला ने पंडित मदनमोहन मालवीय के एक अखबार  '  द हिन्दुस्तान टाइम्स 'को दिवालिया होने से बचाने के लिये नब्बे हजार में खरीद लिया ।
अंग्रेजी का यह समाचार पत्र नब्बे वर्षो तक बिड़ला की मिल्कीयत रहने के बाद आखिरकार पांच हजार करोड़ में मुकेश अंबानी ने हाल ही में खरीद लिया । ' पूत कपूत तो क्यों धन संचय ' जैसी कहावत को नजरअंदाज भी कर दिया जाये तो भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बिड़ला के वारिसों में शिखर पर बने रहने की योग्यता नहीं बची है । इस बात का प्रमाण है …

.........काले कव्वे से डरियो !

एक दिलचस्प सच है झूठ बोलना । हम सभी अक्सर झूठ बोलते है । यूँ तो तो झूठ बोलना अच्छी बात नहीं मानी जाती परंतु कुछ परस्थितियों में झूठ की मदद से बिगड़े काम संवर जाते है । सामाजिक व्यवहार में कई बार झूठ का सहारा लेना जरुरी हो जाता है क्योंकि कड़वे सच से ज्यादा फायदेमंद मीठा झूठ हालात को संभाल लेता है ।
चूंकि हम समाज का हिस्सा है और हमारे जैसे लोगों से ही समाज को चलाने वाली संस्थाये बनती है तो उम्मीद की जाती है कि इन संस्थाओ में विराजित लोग  ' आटे में नमक समाये ' जितना ही झूठ बोलेंगे ,  उससे ज्यादा नहीं ।
अफ़सोस ऐसा होता नहीं !  अदालतों में पवित्र ग्रंथ हाथ में लेकर भी लोग धड्ड्ले सच का क़त्ल करते रहते है । झुठो की पैरवी करते है । संसद में अपनी व्यक्तिगत जानकारी शेयर करने में भी कुछ लोगों को परेशानी होती है । गलत आंकड़ों के बल पर कई लोग राजयोग भोगते हुए सदाचारी बने रहते है ।
2014 में फेसबुक के जन्मदाता मार्क जुकरबर्ग भारत आये थे । वसुंधरा राजे सरकार ने उन्हें राजस्थान के एक गाँव का भ्रमण कराया जो कि पूर्णतया कंप्यूटर का उपयोग कर रहा था । जुकरबर्ग भारत की कामयाबी से झूम उठे । आज एक अखबार ने…

अमिताभ बच्चन के जूते तुषार कपूर के पैरों में !!

जियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया और नेपाल सरकार इन दिनों एक साझा समस्या पर अलग अलग चिंतन कर रहे है । चिंता हिमालय को लेकर है । कवायद इस नुक्ते को लेकर है कि पिछले वर्ष नेपाल में आये भूकंप से कही इस विराट  पर्वत की ऊंचाई कम ज्यादा तो नहीं हो गई ? अनादि काल से हिमालय उत्तर की और से आने वाली बर्फीली हवाओ और घुसपेठियो से भारतीय प्रायद्वीप के लिये कवच का काम करता रहा है । इसकी ऊंचाई में कमीबेशी भारतीय भू भाग के पर्यावरण को प्रभावित कर सकती है । दोनों देश इस महान पर्वत को फिर से नापने के लिए वैज्ञानिकों की टीम भेजने  पर गौर कर रहे है ।
वैज्ञानिकों की चिंता जायज है क्योंकि सवाल मानव के अस्तित्व से जुड़ा है । जब बात ऊंचाई से जुडी है तो कुछ सामाजिक संदर्भो से जुडी संस्थाओ की बात भी होनी चाहिये क्योंकि नैतिकता और आत्मसम्मान के शिखर भी लगातार ध्वस्त हो रहे है ।
दुनिया का सबसे बड़ा और अमीर भारतीय  क्रिकेट बोर्ड पूर्व अध्यक्ष श्रीनिवासन की हरकतों के चलते इतना विवादस्पद हो गया कि इसकी दुरस्ती में सुप्रीम कोर्ट को पसीना बहाना पड़ रहा है। पहलाज निहलानी के ' संस्कारी उसूलो '  ने सेंसर बोर्ड की छीछालेदार …

तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा !

देश के 57 हजार करोड़ के विज्ञापन उधोग में 47 प्रतिशत की हिस्सेदारी अकेले टेलीविज़न पर दिखाए  वाले विज्ञापनों की है। इस क्षेत्र के जानकारों के अनुसार यह इंडस्ट्री 16 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है । इस में कोई दो राय नहीं है कि अखबार और टेलीविज़न के  लिए विज्ञापन ही दाल रोटी की व्यवस्था करता है। अभी हमारे न्यूज़ चेनल बीबीसी या सी एन एन की तरह विश्वसनीय नहीं हुए है जिन्हें घर बैठे ग्राहक मिल जाए।
इस समय देश में 832  चेनल प्रसारण कर रहे है जिसमे आधे  न्यूज़ चेनल है। भारतीय उपमहाद्वीप में इन चेनलों ने  विज्ञापनों की बाढ़ ला दी है। इस अति ने निसंदेह मोटी कमाई के अवसर दिए है परंतु  साथ ही  विज्ञापनों में किये जा रहे दावों की पड़ताल करने की जरुरत का भी सरदर्द बड़ा दिया है।
विज्ञापन नियामक संस्था ' एडवरटाइजिंग स्टैण्डर्ड कॉउन्सिल ऑफ़ इंडिया ' ने उपभोक्ता संघ की और से मिली 198  शिकायतों के बाद नामी गिरामी कंपनियों के 98 विज्ञापन प्रतिबंधित  किये है। इन सभी कंपनियों के भ्रामक विज्ञापनों की कहानी सुनाने के लिए यह कॉलम बहुत छोटा है। फिर भी कुछ की बात करना जरुरी है।
ख्यात नाम हेल्थ केयर कंपनिया किस अस…