Tuesday, May 27, 2014

बगैर देश का निवासी : The Terminal



हम बॉलीवुड के किसी सितारे की तुलना हॉलीवुड के सितारों से  कई कारणों से नहीं कर सकते।  फिर भी थोड़ी बहुत तुलना करना जरुरी भी हो तो में अपने मित्रों को समझाने के लिए टॉम हैंक्स की तुलना आमिर खान से करना चाहूंगा।  टॉम ने अपने फिल्म कॅरियर में डट कर प्रयोग किये है , आमिर की ही तरह उन्हें हर बार कुछ नया करते देखा गया है।  चार दशक में फैले उनके सक्रिय  फिल्म जीवन में कई उल्लेखनीय व बारंबार देखे जाने वाली  फिल्मो  में अभिनय कर उन्होंने इतिहास और दर्शकों के मन में अपना स्थान सुरक्षित  कर लिया  है। हाल ही में मेने टॉम अभिनीत ( 2004 में प्रदर्शित )  '' द टर्मिनल '' देखी।  हास्य और करुणा का शानदार उदाहरण है यह फिल्म। स्टीवन स्पीलबर्ग द्वारा निर्देशित यह फिल्म उनकी अन्य फिल्मों की तरह धमाकेदार नहीं रही परन्तु उनका जादुई स्पर्श इस फिल्म को कालजयी बना गया है।
परिस्थितिया और कानूनी नियम  किस तरह से एक आदमी को  '  मजाक ' बनाकर रख देते है यही इस फिल्म की विषय वस्तु है। पूर्वी यूरोप के देश कार्कोजिया का नागरिक विक्टर नोव्रोस्की न्यूयॉर्क  के जेएफके एयरपोर्ट पर उतरता है संयोग से उसे अंग्रेजी भी नहीं आती है।  आव्रजन अधिकारी उसे बताते है कि उसके देश में गृहयुद्ध छिड़ गया है और अमेरिका ने कार्कोजिया की मान्यता रद्द करदी है।  उसकी मुद्रा , पासपोर्ट और सभी दस्तावेज का कोई महत्त्व नहीं रह गया है।  इस हालत में उसे अमेरिका में प्रवेश नहीं दिया जासकता।  न  उसे वापस भेजा जा  सकता क्योंकि कार्कोजिया से आने और जाने वाली समस्त फ्लाइट निरस्त कर दी गई है चूँकि उसका कोई अपराध नहीं है इसलिए उसे गिरफ्तार भी नहीं किया जा सकता।  वह एक बगैर देश का नागरिक है।  विक्टर की मासूमियत और और परिस्थितिजन्य हास्य  गुदगुदाने के साथ कई जगह रुला भी जाता है।  नायिका कैथरीन जीटा जोंस और एयरपोर्ट के कर्मचारियों के साथ विक्टर की नोकझोंक और दोस्ती  फिल्म को विस्तार देती है।
विदेशी नागरिक के रूप में टॉम हैंक्स ने इस किरदार को यादगार बना दिया है।  फिल्म ख़त्म होने के बाद भी दर्शक विक्टर को भुला नहीं पाते है। उनका अटक अटक कर अंग्रेजी बोलने का लहजा तालिया बजाने को मजबूर कर देता है। 60 मिलियन डॉलर में बनी इस फिल्म को बॉक्स ऑफिस ने भी निराश नहीं किया था। इस फिल्म ने उस समय 220 मिलियन डॉलर का व्यवसाय किया था। इस कथानक का मुख्य पात्र एयरपोर्ट भी है। एयरपोर्ट के  फिल्मांकन के लिए स्पीलबर्ग ने दुनिया भर के एयरपोर्ट देख डाले थे परन्तु शूटिंग करने की अनुमती  उन्हें कही नहीं मिली।  थक हार कर उन्होंने अमेरिकी एयर फ़ोर्स के बेकार पड़े हेंगर में एयरपोर्ट का विशाल सेट खड़ा किया और उसमे सभी चीजे असली लगाकर उसे वास्तविक एयरपोर्ट बना दिया।  रेस्टोरेंट , मैकडोनाल्ड , सभी कुछ असली था , यहाँ तक की कर्मचारियों की यूनिफार्म भी यूनाइटेड एयरलाइन्स ने उपलब्ध कराई थी।
यह फिल्म एक बहुत अच्छी अनुभूति है . 

Saturday, May 24, 2014

ढाई आदमी और हमारा टीवी !!


इधर बहुत दिनों से कोई हिंदी फिल्म नहीं देखी।  इंटरनेट पर यूँ ही भटकते हुए एक खजाना हाथ लगा है।  ये गर्मियां इस लिहाज से भी यादगार रहेगी कि इन दिनों इतने सारे अमेरिकन टीवी सीरियल देख डाले है की अब उन्हें याद रखना मुश्किल हो रहा है। अपने पिछले ब्लॉग में मेने कॉमेडी नाईट विथ कपिल का आलोचनात्मक विश्लेषण किया था।  कुछ मित्रों को वह बेहद ही नागवार गुजरा। मेरे ताजे अनुभव के बाद में दावे से कह सकता हूँ कि भारतीय टेलीविज़न को अभी भी परिपक्व होने में लम्बा रास्ता तय करना है। इसी माह अमेरिका में कॉमेडी ड्रामा '' टू  एंड अ हाफ मैन '' के ग्यारवें सीजन का अंत हुआ है।  एक ही लोकेशन   पर कैमरे का एंगल बदले बगैर तात्कालिक परिस्थियों से हास्य उत्पन्न करना टेढ़ी खीर है।  कॉमेडी  नाईट में भी कपिल कुछ ऐसा ही करने का प्रयास करते है। परन्तु हास्य इतना ' लाउड ' हो जाता है   कि  गले नहीं  उतरता।फूहड़ता हावी हो जाती  है।
बहरहाल !     '' टू  एंड अ हाफ मैन '' अपने प्रस्तुति करण में  लाजवाब है।  इस ' सिटकॉम ' का विषय बोल्ड  है।  परन्तु घटियापन नजर नहीं  आता  ।

 इन दिनों स्टार वर्ल्ड पर इस धारावाहिक का दसवां सीजन दिखाया जा रहा  है।
सिटकॉम शैली के धारावाहिको की कल्पना भारत में अभी करना थोड़ी जल्दबाजी होगी। परिस्थितियों से उत्पन्न हास्य को बगैर दोहराव के अगले 25 /30 मिनिट तक जारी रखना फिल्म बनाने से ज्यादा जटिल है।
जब भी हम भारतीय टेलीविजन कार्यक्रमों की चर्चा करते है तो दूरदर्शन पर 1984 में प्रसारित  शरद जोशी का लिखा '' यह जो है  जिंदगी '' के अलावा दूसरा नाम नजर नहीं आता। इस लोकप्रिय  धारावाहिक में शफी इनामदार , सतीश शाह और राकेश बेदी के साथ स्वरुप संपत ने शानदार अभिनय किया था।
स्वरुप संपत लोकप्रिय चरित्र अभिनेता और हाल ही में सांसद बने परेश रावल की पत्नी है। 

बाबा मुक्त भारत : एक सपना

भारत  के औसत नागरिकों में  एक बात कॉमन है , अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए बाबाओ की शरण मे जाना । राम रहीम के पतन ने एकाएक दुनिया का ध्य...