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Sunday, March 4, 2018

एक नायिका की मौत का उत्सव मनाता मीडिया

समय से पहले होने वाली किसी की भी मृत्यु प्रायः हमें स्तब्ध कर जाती है। इस देश में क्रिकेट और फिल्मों  के लिए जुनूनी हद तक जूनून है। ये दोनों ही क्षेत्र ऐसे है जिनके नायको की हर गतिविधि  पर अवाम की निगाहें उत्सुकता से जमी रहती है। यहाँ होने वाली सामान्य गतिविधि का भी  कैमरे  की नजर से गुजरना रस्म माना जाता है। सुपर सितारा श्रीदेवी का आकस्मिक अवसान सामान्य घटना नहीं थी। ऐसे में टीवी मीडिया का इस घटना पर टूट पड़ना स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी। परन्तु मीडिया ने खबर को इस तरह से ट्रीट किया मानो यह ब्रम्हांड की इकलोती घटना हो। बाथटब में बैठा एंकर या स्टूडियों में बाथरूम के दृश्य कल्पना से परे थे।  श्रीदेवी के अपने सौतेले पुत्र से कैसे सम्बन्ध थे या उनका पुनर्जन्म हो चूका है जैसी खबरे हैडलाइन में आ रही थी। 
आम लोगों की आलोचना में आये समाचार  प्रसारण का यह पहला वाकया नहीं था। समाचार के नाम पर ' भुत  प्रेत ' रावण की लंका ' दो हजार के नोट में लगी माइक्रो चिप ' जैसे एक्सक्लूसिव पर दिन भर ख़बरों का स्क्रॉल चलाने वाला मीडिया आखिर हमें कहाँ ले जाना चाहता है ? जिन लोगों की स्मृति में अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े आतंकी हमले ' ट्विन टावर ' के ध्वस्त होने की यादे बरकरार है उन्हें उस वक्त के अमेरिकी टीवी प्रसारण की क्वालिटी और कंटेंट भी याद होंगे। 9 /11 के नाम से चर्चित इस हादसे ने लगभग तीन हजार जीवन लील लिए थे। उस समय अमेरिकी टीवी चैनलों ने लगातार 48 घंटे तक बगैर एक भी कमर्शियल ब्रेक लिए प्रसारण किया था। किसी भी मृतक का फोटो उसकी राष्ट्रीयता , जाति पर कोई बहस नहीं हुई। किसी भी न्यूज़ रीडर या एंकर ने इस्लाम या मुसलमानों के खिलाफ नफरत का एक शब्द नहीं कहा जबकि घटना के कुछ घंटों बाद ही लादेन का नाम सामने आगया था। यह भी तब जबकि अमेरिकी सरकार  ने उन्हें किसी प्रकार का निर्देश नहीं दिया था। अपने देश और समाज के लिए अमेरिकी टीवी मीडिया की इस जिम्मेदारी की सराहना आज भी की जाती है। विकट  विपरीत परिस्तिथि में मीडिया का शालीन व्यवहार मिसाल बनता है।  अफ़सोस भारतीय मीडिया इस कसौटी पर खरा नहीं उतरा। 
एक दो अपवादों को छोड़ कर फटाफट न्यूज़ और सास बहु के किस्सों और धारावाहिकों की अनर्गल गॉसिप से पटा टीवी शायद ही कभी अपने क्वालिटी कंटेंट पर फोकस करता नजर आया है। अधकचरे ज्ञान से लबरेज रंगी पुती मशीनी एंकर समाचार के नाम पर सनसनी ज्यादा परोसती है। रेडियो के दौर में देवकीनंदन पांडे और बीबीसी के मार्क टूली को सुन चूका दर्शक कैसे इस तरह के अत्याचार को सहन कर रहा है, कल्पना ही की जा सकती है। समाचारों की हैडलाइन के भी प्रायोजक ढूंढ लेने वाले चैनल क्यों नहीं अपने कुछ संवाददाताओं को भारत भ्रमण पर भेज देते ? उन्हें वे खबरे मिलेगी जो इस अविश्वश्नीय भारत के कोने कुचाले में रोज घटती है। जिन्हे कोई  माध्यम नहीं मिल पाता। टीवी को   वे वास्तविक  लोग मिलेगें जो महानगर की आभासी जिंदगी से उलट जीवन की हकीकतों का रोजाना सामना कर रहे है। नैतिकता और सदाचारिता की वे नजीर मिलेगी जो किसी किताब तक अब तक नहीं पहुंची है। 
श्री देवी का यु अचानक चले जाना दुखद है।  हम उनके बारे में जानना चाहते है। हम उनके फोटो देखना चाहते है , उस तरह नहीं जिस तरह दिखाए गए। हम खबर देखना चाहते है  परन्तु उस दिन की यह अकेली खबर नहीं होगी जो दिन रात हमारा पीछा करे। हम चाहेंगे की हमारे न्यूज़ चैनल भी बीबीसी और सीएनएन की तरह गंभीर और व्यापक हो , जो हमें दृश्य के साथ विचार भी दे सके। वाशिंगटन पोस्ट जब हमारे मीडिया के बारे में लिखता है कि ' भारत में एक नायिका के साथ मीडिया की भी मौत हो गई ' या कोई मित्र जब फेसबुक पर स्टेटस डालता है कि ' देश में गिद्ध लुप्त नहीं हुए वे मीडिया में बदल गए है ' तो   यकीन  मानिये बहुत शर्म आती है यह सुन देख कर।

Monday, August 25, 2014

आज की ताजा खबर



ये आकाशवाणी है. , बुधवार की शाम है और और आपका दोस्त अमीन सयानी हाजिर है बिनाका गीतमाला लेकर, अब प्रस्तुत है फौजी भाइयों का फर्माइशी कार्यक्रम जयमाला , इस समय रात के नौ बजे है प्रस्तुत है हवा महल , ये जुमले आज कितने लोगो को याद है ? चालीस पार के  लोगों को रेडियों की यह प्रस्तुतियाँ अवश्य याद   होगी। परन्तु बीस -पच्चीस आयु वर्ग के लिए यह शब्द गए गुजरे जमाने की बात है।
अस्सी के दशक में टेलीविजन के   उदभव  और नब्बे के दशक में सेटे लाइट चैनलों की बारिश ने रेडियो को पहले ड्राइंग रूम से बाहर किया और फिर घर से रुखसत किया। उस दौर में लोगों की दिनचर्या आकाशवाणी के सुबह के समाचारों से बंधी होती थी। समाचारों के पहले बजने वाली बीप - बीप की ध्वनि घडी मिलाने का जरिया हुआ करती थी। दस मिनिट के हिंदी समाचारों के ठीक  बाद अंग्रेजी समाचार ( हूबहू अनुवाद ) अंग्रेजी सीखने की मुफ्त कोचिंग हुआ करता था। देवकी नंदन पांडे , इला भट्ट , बरुण हलधर , मेलवेल डिमेलो  स्टार समाचार वाचक  थे। यही हाल रेडिओ सीलोन का हुआ करता था।  नए पुराने गीत सबसे ज्यादा वही सुनाई देते थे। रेडियो सीलोन की उदघोषिकाओ के बोलने का अटपटा  नमकिनी , जुकामी अंदाज चर्चा का विषय हुआ करता  था।  बुधवार और रविवार के दिन अमीन सयानी और तब्बस्सुम के नाम हुआ करते थे।  आकाशवाणी को कोई टक्कर देता था तो सिर्फ रेडिओ सीलोन।
सन  2000 आते आते देश की फिजाओ में निजी रेडिओ स्टेशनों ने अपनी संगीत लहरियां बिखेरना आरम्भ कर दी थी। इसके उदघोषकों को   रेडिओ जॉकी कहा जाने लगा।  इन 'आर जे' ने जिनकी उम्र महज बीस पच्चीस वर्ष हुआ करती थी अपनी' हिंगलिश' से ऐसा समां बाँधा कि पूरी महानगरीय युवा पीढ़ी ऍफ़ एम रेडिओ की मुरीद हो गई।
अचानक से सुचना प्रसारण मंत्रालय के बोझिल और उम्रदराज नौकरशाहों को अहसास हुआ कि आकाशवाणी इन ऍफ़ एम स्टेशनों से पिछड़ रही है , लिहाजा तुरत फुरत निर्णय लिया गया है कि अब वे भी अपने सौ से अधिक स्टेशनों में रेडियो जॉकी नियुक्त करेंगे।  आकाशवाणी आज अपनी हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है।  निजी ऍफ़ एम चैनल जिस रफ़्तार से भाग रहे है उस हिसाब से आकशवाणी के अच्छे दिन दूर प्रतीत हो रहे है।
संसद में पूर्व यूपीए सरकार के पास 800 नए ऍफ़ एम चैनलों को आरम्भ करने का प्रस्ताव था जिसे निश्चित तौर  पर मोदी सरकार हरी झंडी दिखाएगी। उस द्रश्य की कल्पना करना आसान है जब छोट कस्बों में भी ऍफ़ एम चैनलों का   डिजिटल संगीत सुनाई देगा . आकशवाणी ने उससे  निपटने   लिए कुछ तो सोंच ही रखा होगा।
(वास्तविकता - इस समय देश में  आकाशवाणी के 171  व निजी ऍफ़ एम स्टेशनों की संख्या 248 है।  जो की जनसँख्या के  मान से काफी कम है। अमेरिका में इस समय  ऍफ़  एम के 6224 स्टेशन है जबकि शैक्षणिक कार्यक्रम प्रसारित करने  वाले 2447 ऍफ़ एम स्टेशन अलग से है )

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...