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Sunday, March 4, 2018

कमल हासन -मुस्कुराता कमल

हिंदी भाषी दर्शको के लिए कमल हासन का नाम अब नया नहीं रहा। परन्तु ठीक सेंतीस साल पहले (1981) जब ' एक दूजे के लिए ' रिलीज़ हुई थी तब स्टाइलिश मूंछ और मासूम से चेहरे वाले इस अभिनेता ने हिंदी दर्शकों को दिवाना बना दिया था। भाषाई दिवार और सीमित संचार  माध्यम की वजह से  बहुत काम लोग जानते थे कि हिंदी फिल्मों में अपनी पारी आरम्भ करने वाला यह नैसर्गिक अभिनेता इस हिंदी फिल्म के साथ अपने फ़िल्मी सफर की सौवी फिल्म कर रहा है। एक दूजे के लिए ' कमल की ही 1978 में बनी तेलुगु फिल्म का रीमेक थी। चार वर्ष की उम्र से कैमरे का सामना कर रहे कमल हसन ( कुछ लोग हासन  भी लिखते है )  बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। उनके नाम के साथ एक्टर , डायरेक्टर , प्रोडूसर , गीतकार , स्क्रीन राइटर , आसानी से चस्पा किया जा सकता है। तीन नेशनल अवार्ड और उन्नीस फिल्मफेयर अवार्ड उनके नाम के साथ लगे  विशेषणों को सार्थक करते है। करन थापर के साथ एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने नाम में जुड़े हासन शब्द की व्याख्या करते हुए बताया था कि यह मुस्लिम नाम नहीं है। हासन संस्कृत के हास्य से बना है। उनके नाम का मतलब होता है ' मुस्कुराता कमल  .  
भारत में ' सिनेमाई संस्कृति ' के अभाव के चलते गैर हिंदी भाषी अच्छी  फिल्मों को भी राष्ट्रीय स्तर पर दर्शक तब तक नहीं मिलते जब तक कि वे फिल्मे किसी बड़े पुरूस्कार के लिए नॉमिनेट नहीं हो जाती। कमल की अधिकांश बेहतरीन तमिल , तेलुगु  फिल्मे हिंदी दर्शको की पहुँच से बाहर रही है। उनकी दर्जन भर हिंदी या हिंदी में डब हुई फिल्मे ' टिप ऑफ़ द आइसबर्ग ' कही जा सकती है। चरित्र में अंदर तक उतर जाने के  जुनून ने  कमल को आलोचना का भी सामना कराया है। ' अप्पू राजा ' के बोने पात्र द्वारा हिंसा या  ' हिन्दुस्तानी ' के बुजुर्ग द्वारा भृष्ट सरकारी मुलाजिमों की ह्त्या के प्रसंग को समीक्षकों ने तीखे स्वर में नकारा। 
फ्रांस के सर्वोच्य सम्मान ' द नाईट ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ आर्ट्स एंड लेटर्स ' से सम्मानित दक्षिण के इस सुपर स्टार को विविध भूमिकाओं को करने के साहस के लिए भी आलोचकों के तंज झेलने पड़े है। उनके बारे में कहा जाता है कि वे एक्टिंग कम और स्वांग ज्यादा करते है। समीक्षक उनकी खूबियों में  आँखों और चेहरे को उनकी सबसे बड़ी ताकत मानते है। ' सदमा ' (1983 ) के एक दृश्य में जब नायिका उन्हें अपने साथ हुए दुराचार के बारे में बताती तब कमल अपनी बेबसी और गुस्सा सिर्फ आँखों से ही व्यक्त कर देते है। ' सागर (1986 ) में अमीर दोस्त के लिए अपने प्यार का त्याग करते हुए आप उन्हेंसदैव याद रख सकते है। । 1987 में आई उनकी ब्लैक कॉमेडी ' पुष्पक ' को भला कौन भूल सकता है।  होने को यह फिल्म दक्षिण भारत से थी परन्तु दुनिया की सभी भाषा में इसे समझा जा सकता था। यह साइलेंट फिल्म थी।  इस तरह की फिल्म करने का साहस सिर्फ कमल हसन ही कर सकते थे। फिल्म में डायलॉग न हो तो चेहरे और आँखों से ही बात को आगे बढ़ाया जा सकता है। सर्वश्रेष्ठ में विश्वास करने वाला यह एक्टर अपनी भूमिकाओं को लेकर काफी संवेदनशील रहा है। अपनी भूमिकाओं से दर्शकों को  किसी और भारतीय एक्टर ने इतना नहीं चौकाया जितना कमल हसन ने चौकाया है।  हॉलीवुड फिल्म ' मिसेज डॉउट फायर ' के भारतीय संस्करण ' चाची 420 ' में महिला का किरदार   जिस सुंदरता और शालीनता से उन्होंने निभाया है वह बेमिसाल है। जहाँ डबल और ट्रिपल रोल किसी एक्टर के लिए मील के पत्थर होते है वहां कमल ने ' दशावतरम ' में दस भूमिकाओं में खुद को उतार कर अन्य अभिनेताओं के लिए असंभव चुनौती की लकीर खींच दी है। यही नहीं उनके द्वारा किये गए कई डबल रोल भी किसी अन्य एक्टर के लिए खासे चुनौतीपूर्ण रहे है। अपने समकालीन अभिनेताओं के लिए कमल ने ऐसे मानक स्थापित कर दिए है जिन्हे छूना मात्र ही उल्लेखनीय हो जाता है। 
कमल हसन अभिनीत सिर्फ उल्लेखनीय फिल्मों की चर्चा के लिए यह कॉलम बहुत छोटा है। 
 नित नयी भूमिकाओं में खुद को उतार देने वाले कमल प्रेम के मामले में थोड़े बदकिस्मत रहे। वे एक नारी से कभी प्रेम नहीं कर पाये। उन्होंने तीन विवाह किये और तीनों की परिणीति तलाक के रूप में हुई। वाणी गणपति , सारिका , और गौतमी इस गतिमान एक्टर के जीवन में ठहर न सकी। हाल ही में कमल नयी भूमिका में सामने आये है। वैसे फिल्मों से इतर सामाजिक  रूप से सक्रियता के संकेत उन्होंने ट्वीटर पर अपनी मुखरता से महसूस कराना काफी पहले  आरम्भ कर दिए थे। दक्षिण के सितारों के फैन क्लब सिर्फ आभासी दुनिया में सक्रीय नहीं होते वे वास्तविकता में भी अपनी उपस्तिथि दर्ज कराते है।  कमल हसन दक्षिण के पहले सितारे है जिन्होंने अपने फैन क्लब को सामाजिक कल्याण के कामों से  जुड़ने को प्रेरित किया है। कमल समाज को शायद कुछ वापस लौटाना चाहते है , इसीलिए उन्होंने अपनी राजनीतिक पार्टी ' मक्कल निधि मायम ' की शुरुआत की है।सामजिक न्याय के इकलौते अजेंडे से आरम्भ होने वाली कमल हसन की  पार्टी ने मौजूदा राजनीतिक परिद्रश्य में फ़िलहाल तो  हलचल मचा दी है। मेहनत से तराशी गई फिल्म की स्क्रिप्ट और अनसोची घटनाओ और पल पल बदलती परिस्तिथियों से लबरेज राजनीतिक राह में जमीन आसमान का फर्क होता है।  दक्षिण भारत की आबो हवा अब तक तो  राजनेता बन रहे फ़िल्मी सितारों को सूट करती रही है। कमल अपनी इस नई  भूमिका को कितना प्रभावशाली बनाते है देखना दिलचस्प होगा। 

Thursday, January 26, 2017

गॉड ब्लेस अमेरिका ! God Bless America ....

जिस समय जल्लिकट्टु तमिलनाडु में उफान ला रहा था और हमारे पसंदीदा सितारे कमल हासन और ए आर रहमान इस क्रूर और अमानवीय परंपरा को जारी रखने की मांग पर मुँह फुलाये बैठे थे ठीक उसी समय डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के 45 वे राष्ट्रपति  के रूप में शपथ ले रहे थे। आमतौर पर नए नवेले राष्ट्रपति को लेकर अमेरिका के साथ पूरी दुनिया में उत्सुकता व् उल्लास का वातावरण बनता रहा है। उनके प्रारंभिक सौ दिनों को ' हनीमून ' पीरियड कहा जाता है। ये चुनाव इतने चकाचोंध और लुभावने  होते है कि पूरी दुनिया  का मीडिया अपनी घरेलु समस्याओ से पल्ला झाड़ कर वाशिंगटन की और टकटकी लगाये  रहता है। इस बार भी मीडिया की मौजूदगी तो पहले से ज्यादा थी परंतु माहौल में अनिश्चितता और रस्म अदायगी की झलक ज्यादा थी।
इस प्रतिकूल हालात के जिम्मेवार स्वयं डोनाल्ड थे।
अपने नामांकन से लेकर वाइट हाउस में दाखिल होने तक ट्रम्प को अपने देश के  साथ पूरी दुनिया से जोरदार विरोध झेलना पड़ रहा है। वजह- उनके बयान जिन्होंने सारा वातावरण खराब किया। बात यही ख़त्म नहीं होती , उनकी अपरिपक्व कार्य शैली भी उनके खिलाफ बन रहे विरोध का कारण बनती जा रही है। विशिष्ट सलाहकार  के रूप में दामाद का चयन , मेक्सिको और यूरोप में डर पैदा कर देना , यू एन ओ और नाटो से रिश्ते ख़त्म कर देने की धौंस , ताइवान को तवज्जो देकर चीन को चिड़ा देना , मीडिया और महिलाओ के खिलाफ हल्के शब्दो का प्रयोग , एशियाई मूल के लोगों से काम छीन कर अमेरिकियों को देने का वादा जैसी कई बाते है जो उनकी डरावनी इमेज को गहरा रही है।
अमेरिकी राजनीति पर तीखे लेख प्रकाशित करने वाली वेब पत्रिका ' द इंटरसेप्ट ' ने उनके शपथ समारोह की तुलना बराक ओबामा के सत्तारोहण से करते हुए दिलचस्प आंकड़े जुटाए है। ओबामा की शपथ में मात्र दो अरबपति शामिल हुए थे जबकि ट्रम्प के साथ अरबपति मित्रों की भीड़ थी। इंटरसेप्ट लिखता है कि ट्रम्प ' बर्बर पूंजीवाद ' की पैदाइश है उनसे  'आम अमेरिकियों ' के राष्ट्रपति बनने की उम्मीद करना बेमानी है। ट्रम्प जिस आलिशान  'ट्रम्प टावर ' में निवास करते थे उसके सामने वाइट हाउस की हैसियत सरकारी गेस्ट हाउस से  ज्यादा की नहीं है।
इस समय दुनिया के सामने एक नोसिखिये राष्ट्रपति को सहन करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। वे रोज एक फैसले को पलटेंगे रोज एक नया दुश्मन बनायेगे। ट्रम्प को समझने के लिए फिल्म '' चौहदवीं का चाँद '' का गीत ' बदले बदले से मेरे सरकार नजर आते है , घर की बरबादी के आसार नजर आते है - सुनना जरुरी है। 

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...