Tuesday, February 28, 2017

नाकाबिल काबिल !!

देश के पुराने पूँजीपति घराने बिड़ला ने देशभर में मंदिरो की विशाल श्रृंखला स्थापित की है । सदियो के बाद भी इस घराने को लोग इनके कारखानो के लिये भले ही याद न रखे परंतु ' बिड़ला मंदिर ' के लिये अवश्य याद रखेंगे । बिड़ला परिवार के लिये एक और उपलब्धि थी गांधी जी का साथ । गांधी जी जब भी दिल्ली आते थे ' बिड़ला हाउस ' में ही ठहरते थे और उनका अंत भी वही हुआ ।  सर्वहारा वर्ग के लिये संघर्ष करने वाले गांधीजी के जीवन का यह विरोधाभास था  जो बहुत कम को समझ में आया ।
सामाजिक सरोकार रखने वाले युवा उद्योगपति घनश्याम  दास बिड़ला ने पंडित मदनमोहन मालवीय के एक अखबार  '  द हिन्दुस्तान टाइम्स 'को दिवालिया होने से बचाने के लिये नब्बे हजार में खरीद लिया ।
अंग्रेजी का यह समाचार पत्र नब्बे वर्षो तक बिड़ला की मिल्कीयत रहने के बाद आखिरकार पांच हजार करोड़ में मुकेश अंबानी ने हाल ही में खरीद लिया । ' पूत कपूत तो क्यों धन संचय ' जैसी कहावत को नजरअंदाज भी कर दिया जाये तो भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बिड़ला के वारिसों में शिखर पर बने रहने की योग्यता नहीं बची है । इस बात का प्रमाण है भारत की पहली कार  ' एम्बेसडर ' की कंपनी हिंदुस्तान मोटर्स को फ्रेंच कंपनी पूजो को बेचना । पचास के दशक से देश की कच्ची पक्की सड़को पर शाही सवारी का अनुभव देने वाली कार का यूँ इतिहास में गुम हो जाना बहुत से लोगों के लिये दुखद है । बी बी सी के सेवानिवृत्त और भारत में ही निवास कर रहे ब्यूरो चीफ मार्क टुली ने अपने संस्मरण में एक पूरा चेप्टर एम्बेसडर को समर्पित किया है । 
उद्योगिक जगत में ' टेकओवर ' और खरीदना बेचना सामान्य बात है । परंतु ऐसी चीजे जिनका इतिहास से जुड़ाव रहा हो , का बिक जाना दुखद है । 
वारिसों की किस्मत बहुत अच्छी होती है अफसोस ! उनका ' विज़न ' बहुत ख़राब होता है ।

Saturday, February 25, 2017

.........काले कव्वे से डरियो !

एक दिलचस्प सच है झूठ बोलना । हम सभी अक्सर झूठ बोलते है । यूँ तो तो झूठ बोलना अच्छी बात नहीं मानी जाती परंतु कुछ परस्थितियों में झूठ की मदद से बिगड़े काम संवर जाते है । सामाजिक व्यवहार में कई बार झूठ का सहारा लेना जरुरी हो जाता है क्योंकि कड़वे सच से ज्यादा फायदेमंद मीठा झूठ हालात को संभाल लेता है ।
चूंकि हम समाज का हिस्सा है और हमारे जैसे लोगों से ही समाज को चलाने वाली संस्थाये बनती है तो उम्मीद की जाती है कि इन संस्थाओ में विराजित लोग  ' आटे में नमक समाये ' जितना ही झूठ बोलेंगे ,  उससे ज्यादा नहीं ।
अफ़सोस ऐसा होता नहीं !  अदालतों में पवित्र ग्रंथ हाथ में लेकर भी लोग धड्ड्ले सच का क़त्ल करते रहते है । झुठो की पैरवी करते है । संसद में अपनी व्यक्तिगत जानकारी शेयर करने में भी कुछ लोगों को परेशानी होती है । गलत आंकड़ों के बल पर कई लोग राजयोग भोगते हुए सदाचारी बने रहते है ।
2014 में फेसबुक के जन्मदाता मार्क जुकरबर्ग भारत आये थे । वसुंधरा राजे सरकार ने उन्हें राजस्थान के एक गाँव का भ्रमण कराया जो कि पूर्णतया कंप्यूटर का उपयोग कर रहा था । जुकरबर्ग भारत की कामयाबी से झूम उठे । आज एक अखबार ने उस गाँव चंदौली का ' स्टिंग ऑपरेशन ' किया ।  गाँव के लोग कंप्यूटर के बारे में कुछ नहीं जानते । जुकेरबर्ग ने जो देखा था वह नन्यान्वे फीसदी झूठ था । एक अंतर्राष्ट्रीय झूठ । लालकिले की प्राचीर से अतिउत्साही मोदी ने घोषणा की कि उत्तर प्रदेश का एक गांव सत्तर साल में पहली बार बिजली से रोशन हो रहा है । उनके झूठ के पैर लंबे नहीं थे । सूरज ढलने से पहले ही खबर आगई कि अखिलेश यादव दो साल पहले ही उसे रोशन कर चुके थे । धर्म गुरु आसाराम जेल से निकलने के लिए इतनी बार झूठ बोल चुके है कि अदालत ने उनपर एक लाख रूपये का जुर्माना लगा दिया । हर खासो आम जिनकी पार्टियों में जाने को बेक़रार रहता था ऐसे सहारा श्री झूठ बोलने की वजह से सुप्रीम कोर्ट के खासे निशाने पर है ।
नब्बे के दशक के खाड़ी युद्ध के खलनायक सद्दाम हुसैन अमरीकी सरकार के लिये गले की फाँस बने हुए थे । अचानक मीडिया में उनके बारे में खुलासा होने लगा कि उन्होंने व्यापक विनाश के रासायनिक हथियार बना लिये है । चूँकि अमेरिका ने अपने आपको दुनिया का तारणहार मान रखा है तो ईराक को नेस्तनाबूत करना न्यायोचित मानने में किसी को भी परेशानी नहीं हुई । देढ़ लाख इराकी , पांच हजार अमेरिकी जान जाने के बाद आज तक वे सामूहिक विनाश के हथियार किसी को नहीं मिले । तत्कालीन इराकी कठपुतली सरकार को भी नहीं , जिसकी डोर वाइट हाउस के हाथों में थी ।
फणीश्वर नाथ रेणु की लिखी कहानी ' मारे गए गुलफाम ' पर आधारित फ़िल्म ' तीसरी कसम ' का भोलाभाला नायक आज भी रेडियो सिलोन पर गुहार लगाता मिल जाता है '' सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है '' लोग इस मनभावन गीत कोआज भी  गुनगुनाते जरूर है परंतु अमल में नहीं लाते ।

Friday, February 17, 2017

अमिताभ बच्चन के जूते तुषार कपूर के पैरों में !!

जियोलाजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया और नेपाल सरकार इन दिनों एक साझा समस्या पर अलग अलग चिंतन कर रहे है । चिंता हिमालय को लेकर है । कवायद इस नुक्ते को लेकर है कि पिछले वर्ष नेपाल में आये भूकंप से कही इस विराट  पर्वत की ऊंचाई कम ज्यादा तो नहीं हो गई ? अनादि काल से हिमालय उत्तर की और से आने वाली बर्फीली हवाओ और घुसपेठियो से भारतीय प्रायद्वीप के लिये कवच का काम करता रहा है । इसकी ऊंचाई में कमीबेशी भारतीय भू भाग के पर्यावरण को प्रभावित कर सकती है । दोनों देश इस महान पर्वत को फिर से नापने के लिए वैज्ञानिकों की टीम भेजने  पर गौर कर रहे है ।
वैज्ञानिकों की चिंता जायज है क्योंकि सवाल मानव के अस्तित्व से जुड़ा है । जब बात ऊंचाई से जुडी है तो कुछ सामाजिक संदर्भो से जुडी संस्थाओ की बात भी होनी चाहिये क्योंकि नैतिकता और आत्मसम्मान के शिखर भी लगातार ध्वस्त हो रहे है ।
दुनिया का सबसे बड़ा और अमीर भारतीय  क्रिकेट बोर्ड पूर्व अध्यक्ष श्रीनिवासन की हरकतों के चलते इतना विवादस्पद हो गया कि इसकी दुरस्ती में सुप्रीम कोर्ट को पसीना बहाना पड़ रहा है। पहलाज निहलानी के ' संस्कारी उसूलो '  ने सेंसर बोर्ड की छीछालेदार कराने में कसर नहीं छोड़ी । यही हाल महाभारत धारावाहिक के पात्र युधिष्ठिर धर्मेन्द्र चौहान ने पुणे फ़िल्म इंस्टिट्यूट का किया है । नोटबंदी के बाद सबसे ज्यादा उँगलियाँ रिज़र्व बैंक की निष्पक्षता पर उठी । ज्ञात इतिहास में रिज़र्व बैंक पर कभी चुटकुले नहीं बने थे । 
पदम् पुरूस्कार अपनी शुरआत से ही नकारात्मक  चर्चा बटोरते रहे है ।हरेक सरकार ने इन्हें अपनों को रेवड़ी की तरह बांटा है । नाकाबिल शख्सियतों ने इन राष्ट्रीय पुरुस्कारों के दामन पर कालिख लगाकर इनका महत्व हल्का कर दिया है। मेघालय के राज्यपाल के अशालीन व्यवहार ने राजभवन की अस्मिता जमीन पर ला पटकी । पहली बार किसी राजभवन के कर्मचारियों को राष्ट्रपति से राज्यपाल को हटाने की गुहार लगानी पड़ी ।पूर्व में एन डी तिवारी यही कारनामा आंध्रप्रदेश राजभवन में कर निलंबित हो चुके है ।
नए शिखर कीर्तिमान  बनाना संभव  है परंतु पुराने को सहेजने कीजवाबदारी भी  हरेक पीढ़ी की है । ताजा दौर ' भक्ति काल ' का है । नेहरू गांधी विरासत को ख़ारिज कर उग्रराष्ट्रवाद के बीज बोये जा रहे है । नेहरू जैकेट और गांधी चरखे से कद बढ़ाया जा रहा है स्कूल की किताबो को फिर से लिखा जा रहा है, पुराने नाम मिटाये जा रहे है । बोन्साई को बरगद की जगह लगाया जा रहा है । इतिहास बनाने के बजाय लिखा जा रहा है । इस दौर की यही विडंबना है ।

Sunday, February 5, 2017

तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा !


देश के 57 हजार करोड़ के विज्ञापन उधोग में 47 प्रतिशत की हिस्सेदारी अकेले टेलीविज़न पर दिखाए  वाले विज्ञापनों की है। इस क्षेत्र के जानकारों के अनुसार यह इंडस्ट्री 16 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है । इस में कोई दो राय नहीं है कि अखबार और टेलीविज़न के  लिए विज्ञापन ही दाल रोटी की व्यवस्था करता है। अभी हमारे न्यूज़ चेनल बीबीसी या सी एन एन की तरह विश्वसनीय नहीं हुए है जिन्हें घर बैठे ग्राहक मिल जाए।
इस समय देश में 832  चेनल प्रसारण कर रहे है जिसमे आधे  न्यूज़ चेनल है। भारतीय उपमहाद्वीप में इन चेनलों ने  विज्ञापनों की बाढ़ ला दी है। इस अति ने निसंदेह मोटी कमाई के अवसर दिए है परंतु  साथ ही  विज्ञापनों में किये जा रहे दावों की पड़ताल करने की जरुरत का भी सरदर्द बड़ा दिया है।
विज्ञापन नियामक संस्था ' एडवरटाइजिंग स्टैण्डर्ड कॉउन्सिल ऑफ़ इंडिया ' ने उपभोक्ता संघ की और से मिली 198  शिकायतों के बाद नामी गिरामी कंपनियों के 98 विज्ञापन प्रतिबंधित  किये है। इन सभी कंपनियों के भ्रामक विज्ञापनों की कहानी सुनाने के लिए यह कॉलम बहुत छोटा है। फिर भी कुछ की बात करना जरुरी है।
ख्यात नाम हेल्थ केयर कंपनिया किस असंवेदना के स्तर पर जाकर बीमार लोगों का आर्थिक शोषण अपने विज्ञापनों में  करती है इस  बात की पुष्टि ASCI के आंकड़े कर देते है। प्रतिबंधित विज्ञापनों में सबसे ज्यादा 31 विज्ञापन स्वास्थ सेवाओ से जुड़े थे। बगैर ऑपरेशन के हार्ट सर्जरी , अस्थमा का दो माह में निदान, सर्जरी से शुगर कंट्रोल , हाइट बढ़ाना , वजन घटाना जैसे दावों को पड़ताल के बाद  भ्रामक माना गया।
बजाज आमंड तेल में बादाम न होना , बीएसएनएल की घर पहुँच सेवा, स्टेट बैंक के गोल्ड लोन में गलत आंकड़े पेश करना , लोरियाल और पैंटीन से बालों में  चमक आना , घडी डिटर्जेंट का सफेदी का दावा , ऐसे ढेर सारे तथ्य है जो इन उपभोक्ता कंपनियों के विज्ञापनों में तो थे परन्तु सिद्ध नहीं हो पाये।
देश में कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट लागू हुए 30 वर्ष हो चुके है परन्तु घोघे की चाल से चलती न्याय प्रणाली ने भ्रामक विज्ञापन दाताओ में डर पैदा नहीं किया है। सरकार ने टेलेविज़न चेनलों पर ' अगर आपको इस विज्ञापन से शिकायत है तो अमुक नंबर पर कॉल करे ' का  स्क्रॉल चला कर अपनी ड्यूटी पूरी कर ली है।  अब गेंद दर्शक के पाले में है। उसे चेनल देखते हुए जाग्रत रहना है और ठोंक बजाकर प्रोडक्ट खरीदना है। सनद रहे , विज्ञापनों की चुनचुनाति मोहक छवियों के छलावे  से आपको आपके अलावा कोई और नहीं बचा सकता !


Tuesday, January 31, 2017

सायोनारा !!

उगते सूरज के देश जापान में पिछले दिनों विचित्र घटना हुई। जापान के सम्राट अकिहितो ने पद त्यागने की इच्छा जाहिर की। सिसमिक झोन पर बसे जापान के निवासियों के लिए यह खबर बड़े भूकंप से कम नहीं थी।टेक्नोलॉजी का शिखर छू रहे देश के लोगों का इस तरह भावुक हो  जाना  अजीब लगता है। परंतु यही इस देश की विशेषता भी है। गौतम बुद्ध भारत में जन्मे परंतु जापान ने उन्हें आत्मसात किया। तरक्की की इन्तेहा ,अध्यात्म की गहराई और परम्पराओ का निर्वहन -आधुनिक जापान की जीवन शैली है।
जन मान्यता के अनुसार सम्राट अकिहितो के पूर्वज सूरज देवी के वंशज माने जाते है।(भारत में सूरज को देवता मानकर पूजा जाता है जापानी उन्हें स्त्री रूप मे पूजते है ) जापानी सम्राट को कोई संवैधानिक पद प्राप्त नहीं है परंतु बावजूद इसके वे देश के सर्वोच्च नागरिक माने जाते है। जो दर्जा भारत में  राष्ट्रपति को है वही स्थान सम्राट अकिहितो का है।
सम्राट के पद त्याग से जनता का यूँ व्याकुल हो जाना समझ में आता है। उनकी लोकप्रियता के कई कारणों में सबसे प्रमुख है किसी भी दुर्घटना के बाद उनका आम जनता के बीच पहुंचना। अपनी इसी खूबी की वजह से वे आज तक आमजन में अपनी जगह बनाये हुए है। तेरासी साल की उम्र में अकिहितो स्वास्थ कारणों से रिटायर होना चाहते है परंतु दो तिहाई  देश उन्हें बने रहने की मनुहार कर रहा है।
हम भारतीयों  को यह बात कभी समझ नहीं आएगी। हमने बहुत कम लोगों को पद त्याग करते देखा है। हमारे यहां कोई रिटायर नहीं होना चाहता। वानप्रस्थ की कल्पना हमारे यहाँ केवल आख्यानों में है। बुजुर्ग नेता अपमानित होने की अवस्था तक पद त्याग नहीं करना चाहते। कहने को हम लोकतंत्र का ऊंचा झंडा उठाये हुए है परंतु अनुसरण राजशाही का करते है। वयोवृद्ध राजनेता इस बात को जानते हुए भी कि उसके वारिस में काबलियत नहीं है , अपनी गद्दी पर बैठा देखना चाहते  है। इस परंपरा को चलाये रखने में अब तक गांधी परिवार बदनाम था परन्तु पिछले कुछ वर्षों में पचास से ज्यादा राजनीतिक परिवारों के नाम सामने आने लगे है। ठाकरे परिवार से लेकर यादव परिवार तक आप अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाने के लिए स्वतंत्र है।
जापानी सम्राट जैसे पद त्याग के उदाहरण हमारे लिए किस्से कहानियों से ज्यादा मायने नहीं रखते। हमारी मौजूदा राजनीतिक परिस्तिथिया भी  हमें इस तरह के कड़वे निर्णय लेने की इजाजत नहीं देती।
माफ़ करना सम्राट हम इस प्रसंग को भूल जाना चाहेंगे !!

Thursday, January 26, 2017

गॉड ब्लेस अमेरिका ! God Bless America ....

जिस समय जल्लिकट्टु तमिलनाडु में उफान ला रहा था और हमारे पसंदीदा सितारे कमल हासन और ए आर रहमान इस क्रूर और अमानवीय परंपरा को जारी रखने की मांग पर मुँह फुलाये बैठे थे ठीक उसी समय डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका के 45 वे राष्ट्रपति  के रूप में शपथ ले रहे थे। आमतौर पर नए नवेले राष्ट्रपति को लेकर अमेरिका के साथ पूरी दुनिया में उत्सुकता व् उल्लास का वातावरण बनता रहा है। उनके प्रारंभिक सौ दिनों को ' हनीमून ' पीरियड कहा जाता है। ये चुनाव इतने चकाचोंध और लुभावने  होते है कि पूरी दुनिया  का मीडिया अपनी घरेलु समस्याओ से पल्ला झाड़ कर वाशिंगटन की और टकटकी लगाये  रहता है। इस बार भी मीडिया की मौजूदगी तो पहले से ज्यादा थी परंतु माहौल में अनिश्चितता और रस्म अदायगी की झलक ज्यादा थी।
इस प्रतिकूल हालात के जिम्मेवार स्वयं डोनाल्ड थे।
अपने नामांकन से लेकर वाइट हाउस में दाखिल होने तक ट्रम्प को अपने देश के  साथ पूरी दुनिया से जोरदार विरोध झेलना पड़ रहा है। वजह- उनके बयान जिन्होंने सारा वातावरण खराब किया। बात यही ख़त्म नहीं होती , उनकी अपरिपक्व कार्य शैली भी उनके खिलाफ बन रहे विरोध का कारण बनती जा रही है। विशिष्ट सलाहकार  के रूप में दामाद का चयन , मेक्सिको और यूरोप में डर पैदा कर देना , यू एन ओ और नाटो से रिश्ते ख़त्म कर देने की धौंस , ताइवान को तवज्जो देकर चीन को चिड़ा देना , मीडिया और महिलाओ के खिलाफ हल्के शब्दो का प्रयोग , एशियाई मूल के लोगों से काम छीन कर अमेरिकियों को देने का वादा जैसी कई बाते है जो उनकी डरावनी इमेज को गहरा रही है।
अमेरिकी राजनीति पर तीखे लेख प्रकाशित करने वाली वेब पत्रिका ' द इंटरसेप्ट ' ने उनके शपथ समारोह की तुलना बराक ओबामा के सत्तारोहण से करते हुए दिलचस्प आंकड़े जुटाए है। ओबामा की शपथ में मात्र दो अरबपति शामिल हुए थे जबकि ट्रम्प के साथ अरबपति मित्रों की भीड़ थी। इंटरसेप्ट लिखता है कि ट्रम्प ' बर्बर पूंजीवाद ' की पैदाइश है उनसे  'आम अमेरिकियों ' के राष्ट्रपति बनने की उम्मीद करना बेमानी है। ट्रम्प जिस आलिशान  'ट्रम्प टावर ' में निवास करते थे उसके सामने वाइट हाउस की हैसियत सरकारी गेस्ट हाउस से  ज्यादा की नहीं है।
इस समय दुनिया के सामने एक नोसिखिये राष्ट्रपति को सहन करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। वे रोज एक फैसले को पलटेंगे रोज एक नया दुश्मन बनायेगे। ट्रम्प को समझने के लिए फिल्म '' चौहदवीं का चाँद '' का गीत ' बदले बदले से मेरे सरकार नजर आते है , घर की बरबादी के आसार नजर आते है - सुनना जरुरी है। 

Thursday, January 19, 2017

मेरी मर्जी !! My wish

सरकार ' आत्म मुग्ध ' महिला की तरह होती है। किसी भी काल की सरकार को आप इस कसौटी पर परख सकते है ।कोई भी  आत्म मुग्ध महिला कभी इस बात को स्वीकार नहीं करेगी कि वह सामान्य शक्ल सूरत की है और दुनिया में  प्रभावशाली व्यक्तित्व के लोग बहुतायत में है। वह हमेशा अपनी खूबियों  का ही बखान करेगी और इस बात पर जोर देगी कि उस जैसा दूजा नहीं है। 
सरकारे अपने आंकड़ों पर मोहित रहती है। उसे अपने फिगर पर इतना नाज रहता है कि उसके खिलाफ बोलने वाला ' गुस्ताख़ ' माना जाता है। पूरी सरकारी मशीनरी इस बात को ही सिद्ध करने में समय गुजार देती है कि उनके द्वारा दिए गए आकलन सोलह आने सच है।'  नोट बंदी पर इतने प्रतिशत जनता हमारे साथ है ' , इतने प्रतिशत लोगों ने कैशलेस अपना लिया , नवंबर के बाद प्रत्यक्ष करों में इतने फीसदी का उछाल आया , आदि इत्यादि। निसंदेह सरकारी आंकड़े देश की सुनहरी तस्वीर बयां करते है तभी तो वित् मंत्री से लेकर पार्षद तक का आग्रह रहता कि इन आंकड़ों को ' जस के तस ' स्वीकार लिया जाए !  
आंख मूंद लेने से हकीकत नहीं बदल जाया करती। सरकारी  ' सच ' के खिलाफ कुछ आर्थिक अखबारों की राय एक अलग कहानी कहती है। गुजिश्ता हफ़्तों में ' फाइनेंसियल एक्सप्रेस ' ने बताया कि नोट बंदी की सर्जिकल स्ट्राइक ने लघु और मध्यम उधोग के 35 प्रतिशत कामगारों को घर बैठा दिया है।  'बिजनेस स्टैण्डर्ड ' कहता है कि ऑटोमोबाइल सेक्टर 20 प्रतिशत डाउन हो गया है , यह गिरावट 16 बरस में पहली बार हुई है। देश का सबसे बड़ा आर्थिक अखबार ' इकनोमिक टाइम्स ' डराता है कि महज नवंबर माह में ही फॉरेन इन्वेस्टर 17 अरब डॉलर पूंजी बाजार से निकाल ले गए ,इतना ही नहीं एन आर आई ( NRI ) ने भी साबित कर दिया कि धन्धे में कोई सगा नहीं होता।  ये परदेसी पंछी तकरीबन 5 अरब डॉलर स्टॉक मार्केट से निकाल ले गए। अकेले नवंबर माह में जितना पैसा देश के बाहर गया है उतना 2008 के लेहमन ब्रदर के पतन के बाद आयी मंदी में भी नहीं गया था। 
सरकार कभी इस बात को  नहीं मानेगी। 
सरकार यह भी  कभी स्वीकार नहीं करेगी कि मोदी की दर्जनों विदेश यात्राओ के बावजूद विदेशी निवेश क्योंकर इतना कम आया ? 
आत्म मुग्ध सरकारे और आत्म मुग्ध महिला यह नहीं जानती कि यह ' मुग्धता ' मानसिक बीमारी है। और यह बीमारी मरीज की इच्छा शक्ति से ही दूर हो सकती है।

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...