Thursday, December 31, 2015

War Within : दिलचस्प युद्ध !!

पूरी दुनिया इस समय तनाव के बादलों से ढंकी हुई है। इस समय कोई युद्ध किन्ही दो देशों के बीच नहीं चल रहा वरन देशों के अंदर ही लड़ा जारहा है।  अफगानिस्तान अपने बोये बाबुल काट रहा है और सीरिया एवं ईराक आई एस आई नाम की गाजर घास से मुक्त होने की कोशिश कर रहे है। आतंकवाद एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आरहा है। अमेरिका हो या यूरोप या रूस सभी इस समय कम से कम एक बात पर तो सहमत है कि आई एस आई इस वक्त का गंभीर खतरा है।
इन दिनों एक और दिलचस्प युद्ध देखने में आरहा है।  उपभोक्ता जगत की दो बड़ी कंपनी डाबर और मेरिको अपने हेयर आयल ब्रांड को लेकर आमने सामने है।  इन दोनों के बीच जो चल रहा है उसे युद्ध ही कहेंगे क्योंकि ये अपने वर्चस्व को लेकर काफी आक्रामक हो रहे है। बड़ा मार्किट शेयर हथियाने के लिए दोनों ने ही विज्ञापन बाजी के सभी कायदे कानूनो को धता बता दी है। इनके विज्ञापनों में एक दूसरे का नाम लेकर खुद को सर्वश्रेष्ठ बताने की जो होड़ चली है उसमे कही भी युद्ध विराम की गुंजाइश नजर नहीं आरही।
अखबार जगत में कुछ वर्षों से कम होते सर्कुलेशन की समस्या का निदान बड़े अखबारों ने यह निकाला है कि वे पूरा प्रथम पृष्ठ विज्ञापन के लिए आरक्षित करने लगे है । इस  विधा को जैकेट नाम दिया गया   है। अब  किसी  भी अखबार   पहला पन्ना आम तौर पर तीसरे नंबर से आरम्भ होता है। चूँकि पाठक के  हाथ जब अखबार लगता है तब सबसे पहले उसकी नजर जैकेट पर ही जाती और और यही विज्ञापन दाता का उद्देश्य पूरा हो जाता है। उपरोक्त दोनों ही कंपनियां इस समय इस तकनीक का भरपूर उपयोग कर रही है। इससे जहां आम उपभोक्ता को फायदा हो रहा है वही अखबारों को मुंहमांगा पैसा मिल रहा है।

Friday, November 6, 2015

: Sorry No Idea :सॉरी नो आइडिया !!

कहानियों का अकाल कायम है। देश के एक हिस्से में पानी  की कमी के चलते किसान अब भी आत्म हत्या कर रहे है। सभी सरकारे किसानों की बात करते नहीं थकती परन्तु जाहिर तौर पर वे क्या करती है नजर नहीं आता। ढूंढने वालों को हर शख्स में एक कहानी मिल सकती है परन्तु सृजन के प्रसव से कोई गुजरना नहीं चाहता। सफल दक्षिण भारतीय फिल्मो के अधिकार प्रीमियम पर बिक रहे है परन्तु हिंदी सिनेमा मौलिकता की कमी से जूझ रहा है। स्टार टीवी पर इन दिनों लोग धारावाहिक '' सुमित संभाल लेगा '' के प्रति आकृष्ट होने लगे है। परन्तु यह भी आयातित है।  वार्नर ब्रदर्स  ने 2005 में अमेरिकी टेलीविजन पर एक पारिवारिक ड्रामा प्रस्तुत किया   Everybody loves Raymond . इंटरनेट पर टटोल लीजिये '' सुमित संभाल लेगा '' का कथानक समझ में आ जायगा। हमारी खिड़कियाँ पश्चिम की और कब तक खुली रहेगी ? किसी के पास इसका जवाब नहीं है।

Wednesday, July 29, 2015

SPICY COMEDY :भाभीजी घर पर है

सेंकडो टीवी चैनल और उनमे दर्जनो सिर्फ हास्य पर आधारित।  बावजूद इसके अगर मजेदार हास्य धारावाहिक का नाम तलाशा जाए तो 70 के दशक में पैदा हुई पीढ़ी केवल एक नाम लेगी '' ये जो है जिंदगी '' . शरद जोशी द्वारा लिखित यह कॉमेडी शो भारतीय टेलीविजन इतिहास का सबसे सफल और यादगार धारावाहिक है। इस शो के बाद हजारो धारावाहिक आ कर गुजर गये  परन्तु इसकी ऊंचाई और परिपक्व शालीन हास्य के आस पास भी कोई नहीं पहुँच पाया। विदेशी चैनलों की तर्ज पर कई चैनलों ने अपनी ' मौलिक ' स्टैंड अप कॉमेडी दर्शकों पर थोपी परन्तु उन्होंने बेजान चुटकुलों और फूहड़ता तक ही अपने को सिमित रखा।  और परिणाम यह रहा कि परिवार के साथ बैठकर टेलीविजन देखने वाले दर्शकों ने उनसे हाथ जोड़ लिये।
                     
   इन दिनों एंड टीवी पर दिखाया जा रहा हास्य धारावाहिक '' भाभीजी घर पर है '' लोकप्रियता की पायदान पर तेजी से छलांग भर रहा है।  इस धारावाहिक के  ' कंटेंट ' को हम '' ये जो है जिंदगी '' के साथ तुलना कर देख सकते है। यधपि  '' भाभीजी घर पर है '' का कथानक थोड़ा बोल्ड किस्म का है और इसमें फूहड़ता की गलियों में भटकने की गुंजाईश है , परन्तु इसके निर्माता ने संयम बरतते हुए इसे सिर्फ हास्य तक ही समेट रखा है।  इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि '' तारक मेहता का उल्टा चश्मा '' के पात्र जेठालाल का अपनी शोख पड़ोसन बबीता के प्रति आसक्ति के  भाव का यह विस्तारित रूप है। भाभी जी .... के चारो पात्रो के बीच ' टाइमिंग ' बेमिसाल है।  टाइमिंग किसी भी कॉमेडी की आत्मा होती है।  ' अंगूरी ' के पात्र का अवधी भाषा के साथ खड़ी हिंदी बोलना  और उसमे अंग्रेजी घुसा देना लोटपोट कर देता है। विभूति नारायण जिस तेजी से अपने मनोभाव व्यक्त करते है वह भी चमत्कार से कम नहीं लगता।
                              आम तौर पर सिनेमा और विज्ञापन  को तकनीकी भाषा में ' मिरर इमेज थ्योरी ' से परिभाषित किया जाता है।  जो समाज में है घटता है वही सिनेमा का कथानक बन जाता है या इसके उलट दर्शक जो परदे पर देखता है उसे अपनी जिंदगी में   उतारने लगता है। पिछले दिनों  ' टाइम्स ऑफ़  इंडिया ' ने अपने महानगरो के पाठको के बीच  सर्वेक्षण  के विस्फोटक नतीजे घोषित किये। 50 प्रतिशत से अधिक विवाहित लोगों ने स्वीकार किया की उनके बीच कोई ' तीसरा ' भी मौजूद है। यह बदलता भारत है।  आर्थिक सम्पन्नता के साथ बदलते रिश्ते इस दौर  हकीकत है।
                             बहरहाल ,  सामाजिक  बदलावों को रोका  नहीं जा सकता परन्तु उन पर नजर रखी जा सकती है। भाभीजी यह काम व्यंगात्मक लहजे में कर रहा है। ''' ये जो है जिंदगी'' अगर हास्य का सोलह आना है तो ''भाभीजी घर पर है '' बारह आना है।    

Thursday, July 2, 2015

Sanjay Story :political biopic in india

आत्म कथाओ का अपना आकर्षण है। जब इन कहानियों को फिल्म का कैनवास मिलता है तब किताबों से कही अधिक दर्शक इन्हे मिल जाते है। एक अजीब संयोग हुआ है।  गत सप्ताह एक साथ दो बायोपिक की बाते सुनाई दी है।  भारत की  लोकप्रिय पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके विवादास्पद पुत्र संजय गांधी के जीवन  पर फिल्म बनाने के अधिकार खरीद लिए गए है। फिल्मकार मनीष गुप्ता ने जहां इंदिरा गांधी ( उनके उस दौर में उन्हें मिसेज गांधी के नाम से सम्बोधित किया जाता था ) पर अपनी स्क्रिप्ट तैयार कर सोनिया गांधी को पढ़ने के लिए भेजी है वही ' इकनोमिक टाइम्स ' की खबर कहती है कि सुनील वोहरा ने प्रख्यात पत्रकार विनोद मेहता की दो किताबो के अधिकार ख़रीदे है। पहली है the sanjay story  और दूसरी है ' मीना कुमारी '
 सुनील वोहरा ने विगत में कुछ शानदार फिल्मे दी है।   'गेम्स ऑफ़ वासेपुर  ' ने उन्हें उल्लेखनीय सफलता दिलाई है और अनुराग वासु को स्थापित निर्देशकों में शामिल कराया है ।  2013 में उनकी फिल्म ' शहीद ' ने दो   नेशनल अवार्ड जीते है , लिहाजा संजय गांधी पर बनने वाली फिल्म ज्यादा उत्सुकता जगाती है।
                                 सुनील वोहरा की कंपनी वोहरा ब्रदर्स  टीम ने the sanjay story की स्क्रिप्ट पर काम   आरम्भ कर दिया है। उन सभी लोगों से मुलाक़ात तय की जा रही है जिन लोगों ने संजय गांधी के साथ वक्त गुजारा है। संजय भले ही विवादास्पद रहे परन्तु उनका जीवन  काफी घटना प्रधान रहा है। the sanjay story में विनोद मेहता ने काफी तथ्य उजागर किये है।  संजय की विघवा श्रीमती मेनका गांधी इस फिल्म से असहज हो सकती है। क्योंकि इस पुस्तक में उनके युवा काल का विस्तार से वर्णन किया गया है कि वे किस तरह राजीव और इंदिरा गांधी के सामने धड्ड्ले से सिगरेट पीया करती थी। गर को यह बात फिल्म का हिस्सा बनती है  तो शर्मिंदगी का अंदाजा लगाया जा सकता है। यही नहीं अम्बिका सोनी , रुकसाना सुल्ताना , विद्याचरण शुक्ल , आदि के भी गुलाबी  दिनों का जिक्र सामने आ सकता है। दिलचस्प होगा यह देखना कि सुनील वोहरा इस फिल्म को कैसे सिल्वर स्क्रीन पर लाते है। 
                                बायोपिक बनाना कभी भी किसी फिल्मकार के लिए आसान नहीं रहा है। रिचर्ड एटनबरो ने बीस साल तक  'गांधी ' फिल्म पर काम किया था तब कही जाकर वे कालजयी फिल्म दे पाये थे। इसी तरह की मेहनत ओलिवर स्टोन को अपनी फिल्म जे ऍफ़ के ( अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन ऍफ़ केनेडी ) के लिए करना पड़ी थी। उपरोक्त दोनों ही फिल्मे आत्म कथा श्रेणी की बेहतरीन फिल्मे मानी जाती है। 
                        ऐसा नहीं है की यह दुरूह काम है। इस तरह के प्रोजेक्ट में अथाह धन और समय लगता है और फिल्मकार का आग्रह व्यावसायिक सफलता का भी होता है जिसके चलते वह उस फिल्म में कुछ काल्पनिकता का भी तड़का लगा देता है। ' भाग मिल्खा भाग ' ( धावक मिल्खा सिंह ) ' पानसिंग तोमर ' बेंडिट क्वीन '( फूलन देवी ) की सफलता इस बात का सुन्दर उदाहरण है।  

Saturday, April 25, 2015

show must go on : शो चलते रहना चाहिए .

समय एक सा नहीं रहता। जगजीत सिंह ने कहा भी है '' इसकी आदत आदमी सी है''। जो राहुल निर्भया के हदसे के वक्त नदारद थे अब गरज रहे है। जमीन के बहाने देश भर में राजनीति हो रही है। दुसरो को घेरने वाले केजरीवाल और दिग्विजय सिंह खुद घिर गए है। समय की बिसात पर जिंदगी शतरंज की चाल की तरह व्यवहार करा देती  है .
फ़ास्ट एंड फ्यूरियस श्रंखला की सातवी फिल्म भारत में 2800 प्रिंट के साथ 100 करोड़ कमाने वाली पहली विदेशी फिल्म बन गई है . अविश्वश्नीय कथानक और दृश्यों से भरी इस फिल्म की सफलता में एक भावनात्मक पहलु भी है - इसके चिर परिचित नायक पॉल वाकर की असमय मृत्यु। इस सफलता से झूम उठे निर्माता विन डीजल ने अगली फिल्म की रिलीज़ डेट अभी से घोषित करदी है , जो की 14 फरवरी 2017 है।

Thursday, January 15, 2015

I Love Me : क्यों में खुद से प्यार करू

अगर आप समय के साथ नहीं चलते तो समय आपको उठकर इतिहास के हवाले कर देता है। फिर कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप जीवित है या नहीं। साठ के दशक की धड़कन ' साधना ' इस बात का जीवंत उदाहरण है। साधना अपनी छवि से इस कदर प्रेम करने लगी थी कि बढ़ती उम्र की आहट मात्र से वे  अपने शानदार कॅरियर को अलविदा कहकर घर की चार दिवारी में सिमट गई। सफ़ेद बालों और झुर्रियों ने उन्हें इस कदर भयभीत किया कि वे गुमनाम जिंदगी जीने को मजबूर हो गई। आज वे प्रख्यात गायिका आशा भोंसले की किरायेदार बनकर तन्हा जिंदगी जी रही है। उनके पडोसी भी नहीं जानते है कि उनके बगल में कोई भूतपूर्व शिखर सितारा निवास कर रही है।
भारत के पहले सुपर स्टार राजेश खन्ना आत्म मुग्धता के ऐतिहासिक उदाहरण रहेहै। राजेश खन्ना के बारे में कहा जाता था कि वे अपने संघर्ष के दिनों में भी स्पोर्ट्स कार से काम मांगने निर्माताओ के घर जाया करते थे। जब वे सफल हुए तो उन्होंने सफलता को स्थायी लिया था। सफलता के नशे और अपनी छवि के इस कदर मुरीद हुए कि उन्होंने अपनी प्रेमिका , पत्नी और दोस्तों तक को डट कर बेइज्जत किया। नतीजन अपनी मृत्यु तक वे अपने बंगले में अकेले रहते हुए नैराश्य भोगते रहे। उस अतीत में जीते रहे जो बरसों पहले गुजर गया था।
आत्म मुघ्दता मनुष्य का नैसर्गिक स्वभाव है। सभी में इसका कुछ अंश हमेशा मौजूद रहता है। परन्तु समय के साथ बदलते रहना व्यवहारिक सोंच दर्शाता है। अगर आपको समय की दीवार पर लिखी इबारत पढ़ना नहीं आती है तो समझ लीजिये आप भी आत्म मुघ्ध होते जा रहे है।
इस बिमारी से ग्रसित लोगों को दक्षिण के सुपर स्टार रजनीकांत से सीखना चाहिए। रजनी ने कभी अपने फ़िल्मी किरदार को कभी वास्तविक जीवन में हावी नहीं होने दिया। गंजे सिर , सांवला चेहरा , पारम्परिक दक्षिण भारतीय परिधान में अपने प्रशंशको के सामने आने में गुरेज नहीं किया। यही वजह है कि उनके दर्शक उन्हें भगवान की तरह पूजते है।

Monday, January 5, 2015

I Am In Love ...

कुछ दिनों पूर्व देश के प्रतिष्ठित अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने राहुल गांधी को नसीहत देते हुए सम्पादकीय लिखा था { step aside rahul }. लेकिन राहुल भला कहाँ किसी की सुनते है। लोकसभा चुनाव से लेकर विधान सभाओ और स्थानीय चुनावो में आये विपरीत परिणामो के बावजूद वे अपने दायरे से बाहर नहीं आये। अकेले राहुल ही नहीं ऐसे बहुत से लोग है जो अपनी बनायी दुनिया को ही दुनिया समझते है।  वे समय को पकड़ने की कोशिश करते है , नतीजन खुद के केरीकेचर बनकर रह जाते है।
राहुल को देखकर देवानंद की याद आती है। उन्होंने मान लिया था कि सदाबहार और जवान है , ऐसा मानने में कोई हर्ज भी नहीं है। लेकिन जब  आप अपनी ही छवि के इश्क में गिरफ्तार जाए और उम्र को थामने की कोशिश करे तो गड़बड़ आरम्भ हो जाती है।
बतौर नायक देव साहब की   अंतिम सुपर हिट फिल्म '' देस परदेस '' थी जो 1978 में  आई  थी। चूँकि देव आनंद अपने को  जवान मान चुके थे लिहाजा धड़ाधड़ फिल्मे प्रोडूस करते रहे  उनमे नायक बनते रहे। दर्शक उन्हें  नकार रहे थे परन्तु उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ रहा था क्योंकि पैसा उनका था नायक बनने से उन्हें कौन रोक सकता था। अपनी मृत्यु तक वे काम करते रहे परन्तु उस सफलता को नहीं दोहरा सके। वे मानसिक रूप से सत्तर के दशक में अटक गए थे।  इस विडम्बंना को नहीं समझ कर उन्होंने अपनी प्रतिभा और माध्यम का नुक्सान ही किया।
अमिताभ बच्चन अपनी पहली पारी की ढलान पर इसी कमजोरी का शिकार हुए थे। ' लाल बादशाह '     '  मृत्युदाता ' में नायक के गेट अप में उन्हें देखकर वितृष्णा होने लगी थी परन्तु आर्थिक हादसों और बेकारी के डर ने उन्हें  'मोहब्बते ' में यह स्वीकार करने  लिए प्रेरित कर दिया कि वे नायक बनने लायक युवा नहीं रहे  है।
                         स्वयं को  प्रेम करने के इस  सिंड्रोम से नायिकाए भी अछूती नहीं  रही है। भारत की पहली सितारा देविका रानी को अपनी मृत्यु तक अहसास नहीं हुआ था कि वे बूढ़ी हो चुकी है।  वे ता उम्र मेकअप की परतों में उम्र का हिसाब छुपाती रही।   [ क्रमश ]  
-----इमेजेस गूगल 

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...