Friday, August 17, 2018

थोड़ा है थोड़े की जरूरत है !



आज के दिन ( 15th August ) देशभक्ति का सूचकांक अपने उच्चतम बिंदु को स्पर्श कर रहा है। इसके पहले यह गणतंत्र दिवस पर कुलांचे भर चूका है। भारत का पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच हो तो यह आल टाइम हाई पर चला जाता है।  बाकी दिन इसकी सेहत कैसी रहती है , शायद ही किसी का ध्यान जाता हो। अचानक तीन दिन से अखबारों के विज्ञापनों में तिरंगा नुमाया होने लगा है। दो पहिया , तिपहिया चारपहिया वाहन कंपनियों , तेल मंजन शकर साबुन नमकीन  बनाने वालों ने देश को बताना आरम्भ किया कि वे भी  देश भक्त है और देशभक्ति के हवन में कुछ टका छूट देकर अपना योगदान देना चाहते है। इ कॉमर्स साइट्स ने पंद्रह  दिन पहले ही याद दिलाना आरम्भ कर दिया था कि स्वतंत्रता दिवस के पुण्य अवसर पर वे भी परोपकारी हो जाना चाहते है। अगर देश की जनता चाहती है कि वे वाकई परोपकारी हो जाये तो उन्हें इन साइट्स पर डटकर खरीदारी करना होगी। देश भक्ति के  इस हल्ले में देश के कुछ बड़े रिटेल चेन स्टोर भी पीछे नहीं रहना चाहते है। ' सबसे सस्ते दिन ' का नारा देकर वे महीने भर का स्टॉक दो दिन में बेच देना चाहते है। देश की मुख्यधारा में जुड़ने के उनके विनम्र प्रयास को संशय से नहीं देखा जाना चाहिए। मोबाइल हैंड सेट बनाने वाली कंपनिया अब इस हालत में नहीं रही है कि वे राष्ट्रीय अखबारों में फूल पेज के विज्ञापन देकर अपनी देशभक्ति का प्रदर्शन कर सके।  उनका यह अधिकार उनके चीनी प्रतिद्वंदियों ने छीन लिया है। यही हाल पतंग बनाने वाले , रौशनी की लड़ियाँ बनाने वाले और फटाके बनाने वाले देसी कारीगरों का हुआ है। वे अपने चीनी भाइयों को कारोबार सौंपकर पहले ही तीर्थयात्रा पर निकल चुके है। इन लोगों से देशभक्ति की उम्मीद करना बेकार है। वैसे ही बी एस एन एल से उम्मीद करना कि  रोजाना  दामन छुड़ा कर भाग रहे अपने उपभोक्ताओं को अपने पाले में रोकने के लिए वह शुभकामनाओ के अतिरिक्त कुछ दे पाएगा। 
देशभक्ति की ज्वाला को दिन  भर धधकाने के लिए मनोरंजक चैनलों के प्रयासों की उन्मुक्त मन से सराहना की जाना चाहिए। भले ही हमें अंग्रेजों ने मुक्ति दी है परन्तु आज के दिन वे पाकिस्तान से युद्ध पर बनी कुछ सच्ची कुछ काल्पनिक फिल्मों का ' फिल्म फेस्टिवल ' आयोजित न करे तो उनपर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा कायम होने की संभावना बन सकती है। आज के दिन चैनल सर्फ़ करते समय देशवासियों के रक्त में उबाल लाने वाली फिल्मे भी नजर आ सकती है। किसी चैनल पर सनी देओल पाकिस्तान में  हैंडपंप उखाड़ते  नजर आ सकते है तो किसी चैनल पर ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह और इंस्पेक्टर शिवाजीराव  वाघले प्रलयनाथ की मिसाइल के फ्यूज निकालते देखे जा  सकते है। इस ' जंगे आजादी के इस्तकबाल ' में अगर विविध भारती  और ऍफ़ एम् चैनल सुर न मिलाये तो देशभक्ति की आंच शायद मंद पड़ सकती है।  अलसुबह ' पूरब पश्चिम '  और 'उपकार ' के गीत न बजे तो समां नहीं बंधता। आज के दिन कसबे से लेकर देश की राजधानी तक से  निकलने वाले अखबारों में छपे ' सरपंच पति '  ' सांसद प्रतिनिधि के जीजाजी ' के सचित्र शुभकामना संदेशों को न पढ़ना भी घोर अपराध माना जा सकता है। जो लोग आज के दिन अपनी फेसबुक पर तिरंगा पेस्ट नहीं करते , जो लोग अपने व्हाट्सप्प पर प्रोफइल में तिरंगा या ' आई लव इंडिया ' जैसा स्टेटस नहीं डालते वे देशभक्त नहीं माने जा सकते। बदलते वक्त के साथ देशभक्ति के मायने भी बदल गए है । हमारे पूरखों में यह स्वाभाविक थी परंतु हमारी पीढ़ी के लिए यह आभासी दुनिया की ही एक ' इवेंट' बन चुकी है । रोज डे ' प्रपोज़ डे , फ़्रेंडशिप डे , वेलेंटाइन डे जैसा कोई इवेंट ! उन्मुक्त आकाश से निकलकर अब यह संकरी गलियों में प्रवेश कर गई है । हम क्या खाते , पहनते , सोंचते , पसंद करते हैं , किसे वोट देते है , किससे प्यार करते है से तय होता है कि हमारी देशभक्ति किस डिग्री की है । निश्चित रूप से हम आजादी और देशभक्ति को लेकर रास्ता भटक चुके है । ये महज दो शब्द नही है वरन हमारे अस्तित्व के कारक है । अनेकता में सामंजस्य हो , सामाजिक न्याय के लिए आग्रह हो और लोकतंत्र बगैर किन्तु परंतु के हमारी आबोहवा मे घुला हुआ  हो ,  इससे ज्यादा हमे कुछ नही चाहिए । 

Monday, August 6, 2018

चलते चलते मेरे ये गीत याद रखना !

फिल्म थ्री इडियट का गीत ' बहती हवा सा था वो , उड़ती पतंग सा था वो ' पार्श्वगायक किशोर कुमार के अवसान के दो दशक बाद आया था परन्तु इस हरफनमौला व्यक्तित्व पर सटीक बैठता है। किशोर अगर उस जानलेवा हार्ट अटैक को झेल गए होते तो इस बरस (4 अगस्त ) एक कम नब्बे  के हो गए होते। अनिश्चित जीवन को ग़लतफ़हमी में अक्सर स्थायी मान लिया जाता है। तयशुदा जिंदगी जीते हुए लोग जीवन के उतार चढ़ावों को नियति मानकर खुद को खर्च करते रहते है। परन्तु कुछ होते है जो अपने सपनो को हासिल किये बगैर दुनिया को टाटा नहीं करते। किशोर का इकलौता सपना पार्श्व गायकी था और अपने आदर्श  ' के एल सहगल ' से मुलाक़ात। यह मुलाक़ात कभी हो न सकी और किशोर एक्टर बन गए। जबकि सहगल की ही तरह वे नेचुरल गायक थे। गायकी में जिस संजीदगी और अनुशासन की दरकार थी वह उनमे जन्मजात नहीं थी। खिलंदड़ और अल्हड़ता किशोर के व्यक्तित्व में ताउम्र शामिल रहे। बड़े भाई अशोक कुमार स्टार हैसियत वाले थे तो किशोर को फिल्मों में नायक के रोल आसानी से मिल गए। यह वह दौर था जब  ' कॉमेडी ' फिल्मों में फीलर का काम किया करती थी परन्तु किशोर ने अपनी चुलबुली हरकतों से खुद के लिए ' कॉमिक एक्टर ' का खिताब हासिल कर लिया था। किशोर की फिल्मे चली और बहुत चली। इस दौर में ऐसा नायक कहाँ  मिलता जो मजाकिया भी हो ,गाना भी गा सकता हो और भरपूर मनोरंजन भी कर सकता हो। अपनी फिल्मों से  उन्होंने हास्य को एक कला में विकसित कर दिया था , न्यू देहली ( 1956 ) श्रीमान फंटूश (1956 ) आशा   ( 1957 ) चलती का नाम गाडी ( 1958 ) झुमरू ( 1961 ) हाफ टिकिट ( 1962 ) पड़ोसन ( 1968 ) जैसी फिल्मे उनके अपरंपरागत चेहरे और मजाकिया हावभाव की वजह से दर्शकों को बेहद लुभाती थी। सही मायने में वे ब्रिटिश एक्टर बॉब हॉप और अमेरिकन एक्टर डेनी के का भारतीय अवतार बन चुके थे। 
किशोर की गायकी को सबसे पहले अनुभवी संगीतकार  खेमचंद प्रकाश ने पहचाना था या कह सकते है निखारा था। उन्होंने ही किशोर को उनके जीवन का पहला गीत ' जगमग जगमग करता निकला चाँद पूनम का प्यारा ( जिद्दी 1948 ) दिया था। आज इस गीत को सुनते हुए कोई भी यह अंदाजा लगा सकता है कि सहगल उनके मिजाज पर किस हद तक हावी थे। 1931 में  जर्मन फिल्म मेकर फ्रैंक  ओस्टेन द्वारा निर्देशित  अशोक कुमार और देविका रानी अभिनीत ' जीवन नैय्या ' के लिए अशोक कुमार ने गाया था ' कोई हमदम ना रहा कोई सहारा ना रहा , हम किसी के ना रहे कोई हमारा ना रहा ' यह गीत किशोर कुमार को बचपन से ही बहुत पसंद था। चूँकि यह गीत कठिन श्रेणी का था , इसमें चौदह मात्राए थी -संगीत के लिहाज से दुरूह परन्तु एक महीने घर पर रियाज करते हुए किशोर ने इसे ' झुमरू '(1961 ) में  कुछ इस तरह गाया कि आज साठ  वर्ष बाद भी इसकीताजगी और उदासी बरकरार है। 
कभी कभी लगता है कि किशोर कुमार को पिता पुत्र बर्मन का साथ नहीं मिला होता तो क्या होता ? खेमचंद प्रकाश ने किशोर की प्रतिभा को पहचाना था लेकिन उन्हे ऊंचाई पर बैठाया सचिन देव बर्मन ने। आराधना (1969 ) राजेश खन्ना के लिए लॉन्चिंग पैड मानी जाती है तो उतनी ही किशोर कुमार के लिए भी महत्वपूर्ण रही है। ' रूप तेरा मस्ताना प्यार मेरा दीवाना ' या ' मेरे सपनो की  रानी कब आएगी तू ' ऐसे गीत है जो आसानी से बिसारे नहीं जा सकते। किशोर के टैलेंट पर जितना भरोसा एस डी को था उतना ही उनके पुत्र राहुल ( आर डी ) को भी था। आर डी ने किशोर से उन लोगों के लिए भी गवा दिया जिन पर मोहम्मद रफ़ी की आवाज सूट करती थी। धर्मेंद्र ( दो चोर , ब्लैकमेल ) संजीव कुमार ( सीता और गीता , अनामिका ) शशि कपूर ( आ गले लग जा ) जीतेन्द्र ( कारवां , परिचय , जैसे को तैसा ) यही नहीं नए नवेले रणधीर कपूर , नविन निश्चल , विजय अरोरा , विनोद मेहरा , अमिताभ बच्चन , राकेश रोशन आदि भी किशोर के गीतों पर होंठ हिलाते नजर आये। 
अपनी आवाज को नायक के हिसाब से ' मोल्ड ' करने का हुनर किशोर का नैसर्गिक गुण था। कई बार उन्हें सनकी और तुनकमिजाजी समझा गया परन्तु उनके अंदर पसरी गहरी गंभीरता को कम ही लोगों ने नोटिस किया।  उनकी निर्देशित  ' दूर गगन की छाँव में ' (1964 ) उनकी मूडी और सनकी छवि के मिथक को ध्वस्त कर देती है। जो लोग मानते है कि किशोर सिर्फ प्रदर्शनकारी  गानो की वजह से ही याद किये जायेगे तो इस धारणा को तोड़ने के लिए भी पर्याप्त गीत मौजूद है। शुरूआती गीत ' मेरी नीदों में तुम मेरे ख़्वाबों में तुम (नया अंदाज 1956 ) से लेकर ' जीवन से भरी तेरी आँखे ' (सफर 1970 )  और ' बड़ी सूनी सूनी है जिंदगी '( मिली 1975 ) जैसे मधुर मद्धम आवाज से सजे गीत सदियों तक सुधि श्रोताओ के लिए मरहम का काम करते रहेंगे। 

Thursday, August 2, 2018

एक अफसाना जिसे बचाना जरुरी है

कभी साहिर ने ताजमहल को इशारा करते हुए  कहा था ' एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक ! साहिर बहुत हद तक सच लिख रहे थे। उनका उलहाना इस बात को लेकर था कि मुग़ल सम्राट ने अपनी बेगम की याद में इतना भव्य मकबरा बना दिया जिसकी बराबरी दुनिया में कोई दूसरा नहीं कर सकता फिर वह अपनी जीवन संगिनी से कितना ही प्रेम क्यूँ न करता हो। साहिर के ताने के बावजूद आज भी करोडो लोग ताज को पसंद करते है। संभवतः यह दुनिया की इकलौती इमारत है जिसका रिश्ता दिल से है। ताज के अलावा शायद ही कोई  दूसरा स्थापत्य शिल्प होगा जिसे देखकर दिल धड़कता हो। शायद ही कोई दूसरा अजूबा होगा जिसे गीतों , नज्मों , कविताओं , गजलों , शायरी , कहानियों और सिनेमा में एक साथ शामिल किया गया हो। रविंद्रनाथ टैगोर ने इसे ' समय के गाल पर ठहरा आंसू ' कहा तो सतीश गुजराल ने 'संगमरमर में संगीत ' नाम दिया। अमेरिकन उपन्यासकार बयार्ड टेलर ने लिखा है कि भारत में कुछ नहीं होता तो भी अकेला ताज विश्व के पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए काफी है। 
पांच हजार साल पुरानी सभ्यता के तमगे से सजे देश में साढ़े तीन सौ साल कुछ लम्हों के बराबर है। मगर इतने कम समय में ही कोई नायब नमूना अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने लगे तो यह हम सभी के लिए शर्म की बात है। अनियोजित ढंग से फ़ैल रहा आगरा शहर , प्रदुषण उगलते कारखाने और लुप्त होती यमुना नदी ने समय के सीने पर पैर जमाए खड़े ताजमहल की नीवों को हिला दिया है। इसका रंग बदरंग होने लगा है। दीवारों पर दरारे उभरने लगी है। पर्यटकों के छूने से संगमरमर पर झाइंया पड़ने लगी है। कचरे के ढेर से उड़कर आये मच्छरों  के बैठने से जगह जगह हरे चकते उभर आये है।   दुर्भाग्य से हम समय के उस नाजुक दौर से गुजर रहे है जब प्रदुषण और असंतुलित पर्यावरण ने अपने पंजों के निशान ऐतिहासिक विरासतों पर  छोड़ना आरम्भ कर दिये है। हालात की गंभीरता को देश की शीर्ष अदालत की चिंता से भी समझा जा सकता है। ताजमहल की बिगड़ती  सेहत को लेकर सर्वोच्च अदालत ने केंद्र और उतर प्रदेश सरकार को लताड़ लगाईं है। 
इतिहास मोटे तौर पर चरित्रों , घटनाओ और प्रसंगों का विवरण देता है जो किसी देश और समाज के निर्माण या परिवर्तन में महती भूमिका अदा करते है। इतिहास मुग़ल सम्राट शाहजहाँ की तो विस्तार से चर्चा करता है मगर उनकी बेगम का परिचय देने में कंजूस हो जाता है। महज उनचालीस बरस की उम्र में दुनिया से रुखसत हो जाने वाली 'अर्जुमंद बानो ( मुमताज महल उनकी उपाधि थी ) की याद में ताजमहल न बना होता तो शायद उनका जिक्र भी न होता। मुग़लों के जिस सुनहरे दौर में शराब और शबाब का दरिया सतत बह रहा हो वहा किसी नारी के सिर्फ देह का आकर्षण कितने दिनों तक साथ दे सकता था।  
मुमताज इससे भी अधिक कुछ थी जिसकी वजह से शाहजहां ताउम्र उनके प्रेम पाश में बंधे रहे। और यही वजह रही कि  उनकी स्मृति को चिर स्थायी बनाने के लिए ताजमहल का निर्माण किया गया। ताजमहल शाहजहाँ के उदात दाम्पत्य प्रेम का चरम  बिंदु है। 
प्रेम के प्रतिक इस स्मारक को सहेजने की जिम्मेदारी से आँखे नहीं मुंदी जा सकती। इसे यूँ ही खुले आसमान और प्रदूषित वातावरण के बीच अकेला नहीं छोड़ा जा सकता है। अगर शीर्ष अदालत ने इसके लिए फ़िक्र की है तो यह पुरे देश के लिए फिक्रमंद होने का समय है। सन 1632 में इसके निर्माण से लेकर मौजूदा समय तक इसे बारह पीढ़ियों ने निहारा है। अगली बारह पीढ़िया भी इसे देख पाये ऐसे प्रयास करने ही होंगे। इतिहास की धरोहर को इतिहास होने से बचाना ही होगा। 

Wednesday, July 25, 2018

सैराट की धड़क

ब्रिटिश  राइटर और कंपोजर एंथोनी बर्गेस ने कहीं  कहा था कि ' यह वाकई मजेदार है कि दुनिया के रंग हमें फिल्म के परदे पर वास्तविकता से  ज्यादा वास्तविक लगते है '। हमारे चारो और सामाजिक समस्याओ का अम्बार लगा हुआ है। रेडियो टेलीविजन और अखबार  ऐसी खबरों को घसीटकर  हमारे ड्राइंग  रूम में ला पटकते है परन्तु हमारी संवेदनाए नहीं जागती। लोग इन मसलों  पर तब तक कान नहीं देते जब तक इन्हे किसी किताब की शक्ल में गूँथ न दिया जाये या फिल्म में न बदल दिया जाये।  परन्तु किसी फिल्म पर  ' रियल लाइफ स्टोरी ' या ' सत्य  घटना पर आधारित ' का टैग समाज को  आंदोलित कर जाता है। 2016 में आई मराठी फिल्म ' सैराट ' देखकर लोगों को  ' ऑनर किलिंग '  की हैवानियत का अंदाजा हुआ जबकि अमूमन हर तीसरे दिन देश के किसी न किसी हिस्से में ऊँची / नीची  जात के बहाने कोई युवा प्रेमी जोड़ा अपनी जान गँवा रहा है। इस फिल्म ने दर्शकों को कुछ इस तरह आंदोलित किया कि महज एक हफ्ते में यह फिल्म राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गई और फिल्मफेयर व  रास्ट्रीय पुरुस्कारों से भी नवाजी गई।  
कुछ पटकथाए इतनी मासूम और सच्ची होती है कि उन्हें निभाने वाले और उससे जुड़े  लोग  भी उसके सकारात्मक प्रभावों से बच नहीं पाते। यधपि वे सिर्फ कुछ समय के लिए   ही उस चरित्र में उतरते है परन्तु लम्बे समय के लिए विनम्र हो जाते है। सैराट के चार रीमेक बन चुके है। हालिया हिंदी  रिलीज ' धड़क ' इस क्रम में पांचवी फिल्म है। सैराट अन्य फिल्मों की तरह ' पहले प्यार ' की स्लो मोशन झलकियों से भरपूर है लेकिन शेष फिल्मों से अलग करती है इसकी सादगी में सुंदरता। सैराट वर्तमान की सच्चाई को कुछ इस तरह से प्रस्तुत करती है मानो मरीज को  कड़वी दवाई  शहद का लेप लगाकर खिलाई जा रही हो।  इस फिल्म के लेखक निर्देशक नागराज मंजुले को बात करते हुए सुनिये। पहली ही फिल्म से देश के चोटी के फिल्मकारों की जमात में खड़े हो जाने और तूफानी सफलता के बाद भी उन्हें नहीं लगता है कि उन्होंने कोई बहुत बड़ा तीर मारा है। और यह भी  तब जब महानायक अमिताभ बच्चन ने  उनसे उनके लिए एक पटकथा लिखने को कहा है।   फिल्म की नायिका जाह्नवी कपूर से अनुपमा चोपड़ा ने अपने वेब पोर्टल के इंटरव्यू में पूछा  कि फिल्म की रिलीज के पूर्व ही ट्विटर पर उन्हें लाखों लोग फॉलो कर रहे है तो क्या इसे फिल्म की सफलता के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए ? जाह्नवी का शालीन  जवाब था ' ये लोग मेरे प्रशंसक सिर्फ मेरे पेरेंट्स ( श्रीदेवी , बोनी कपूर ) की वजह से है , मुझे खुद को साबित करना बाकी है ! इसी तरह  सादगी का एक उदाहरण फिल्म ' गांधी ' से भी जुड़ा हुआ है। बेन किंग्सले का  जब महात्मा गांधी की भूमिका के लिए चयन हुआ तो आश्चर्यजनक रूप से उनकी मांसाहार और शराब की दिलचस्पी ख़त्म हो गई थी। चरित्र का किरदार पर हावी हो जाने  का यह बिरला उदाहरण था।  
सैराट से लेकर धड़क तक का सफर एक अच्छी कहानी के  महत्व को  दर्शाता है वही फिल्म जगत में मौलिक कहानियों  के लंबे समय से चल रहे अकाल की पुष्टि भी करता है। सफल फिल्मों के रीमेक बनना अच्छी बात है परन्तु इस तरह का ट्रेंड बन जाना सफल फिल्मकारों के चूक जाने का संकेत भी माना जा सकता है। 
 सैराट की तरह कुछ कालजयी विदेशी फिल्मों पर भी दुनिया भर के  फिल्मकार इस कदर आसक्त रहे  है कि उनके प्रदर्शन के पचास पचहत्तर  वर्ष बाद आज  भी उनके कथानक से प्रेरित फिल्मे बनाई जा रही है। प्रसिद्ध जापानी फिल्मकार ' अकीरा कुरोसावा ' की निर्देशित ' सेवन समुराई (1954 ) और फ्रांसिस फोर्ड कोपोला की ' गॉडफादर (1972 ) उन उल्लेखनीय फिल्मों में शामिल है जिन्हे लगभग दुनिया की हर भाषा में रीमेक किया गया है। फिल्मकारों को यह तथ्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि अच्छे भोजन की रेसिपी की तरह किसी फिल्म के कथानक को दोहराने मात्र से सौ फीसदी  सफलता के ख़याली पुलाव पकने की निश्चिंतता होती तो ' मौलिकता ' जीवन और फिल्मों से कब की लुप्त हो गई होती । 

Wednesday, July 18, 2018

एक औऱ गांधी

कुछ तारीखे अगर किसी महत्वपूर्ण शख्सियत से न जुड़े तो वे फिर सिर्फ एक अंक भर रह जाती है। ऐसी ही एक तारीख है अठारह जुलाई  जो इतिहास में सिर्फ नेल्सन मंडेला की वजह से अहम् हो गई। आज ही के दिन ठीक सौ वर्ष पूर्व इस महा मानव ने जन्म लिया था। काफी बाद में ' दक्षिण अफ्रीका के गांधी ' के नाम से लोकप्रिय हुए मंडेला ने अपनी जीवटता और महात्मा गांधी के सिद्धांतो पर चलकर नस्लवादी  ब्रिटिश साम्राज्य को घुटनो पर ला दिया था। अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस के जुझारू कार्यकर्ता की हैसियत से अपना राजनीतिक जीवन आरम्भ करने वाले युवा मंडेला शुरुआत में अहिंसा के सिद्धांत के खासे विरोधी थे। षड्यंत्र और सत्ता विरोधी हिंसक गतिविधियों के चलते उन्हें जीवन के सत्ताईस बरस जेल में गुजारना पड़े।  यही पुस्तकों के माध्यम से उन्हें गांधीजी के आदर्शो की जानकारी मिली। यह भी विचित्र संयोग ही है कि गांधीजी ने अपने राजनीतिक जीवन का ककहरा दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और नस्लवाद का विरोध करते हुए ही सीखा था। बेरिस्टर गांधी अपने जीवन के इक्कीस वर्ष दक्षिण अफ्रीका में बिता कर जब भारत लौट रहे थे तब नेल्सन मंडेला की उम्र महज चार वर्ष थी। यह गांधी जी की दूरदृस्टि थी कि उन्होंने अपने  बिदाई भाषण में कहा था कि मेरे अधूरे कामों को इसी देश का कोई नागरिक पूर्ण करेगा। मंडेला ने यह सच कर दिखाया।  एक कैदी से राष्ट्रपति बनने के सफर की रोमांचक कहानियों को शब्द मिले और शब्दों को  सिनेमा का पर्दा भी मिला। नेल्सन मंडेला इतिहास की कुछ ऐसी हस्तियों में शामिल है जिन्हे सिर्फ एक फिल्म के माध्यम से नहीं समेटा जा सकता है। कभी वे शेक्सपीअर के शाही किरदारों की तरह कविताई शैली में भाषण देते नजर आते है तो कभी आग उगलते राजनेता की तरह, कभी विद्रोही , कभी शांति के पुरोधा तो कभी अश्वेतों के तारण हार । किसी भी अभिनेता के लिए जीवन के इतने विभिन्न और दुरूह रेशों को एक साथ पकड् पाना मुश्किल रहा है। इसलिए मंडेला पर बनी अधिकांश फिल्मे उनके जीवन के कुछ भावों तक ही सिमित रही है।  


अंदर तक उतरने वाली आवाज , विनम्र रहस्य्मयी मुस्कान , एक बुजुर्ग की चहलकदमी - कभी बगीचे में , कभी अपने राष्ट्रपति कार्यालय में , कभी जेल कम्पाउंड में ,कभी गूढ़ रूप से विनम्र , धमकाते हुए ,सहयोगियों और विरोधियों को आश्चर्यचकित करते हुए - कई अभिनेताओं ने नेल्सन मंडेला के  आलिशान जीवन के इन कई  पलों को अलग अलग फिल्मों  में  परदे पर जीवंत किया है। मॉर्गन फ्रीमेन , डेविड हस्बेर्ट ,डेविड हारवुड ,टेर्रेंस होवार्ड , डेविड ग्लोवर , सिडनी पोइटर , क्लार्क पीटर , इदरीस अल्बा और लिंडन एनकोसी जैसे हॉलीवुड और दक्षिण अफ़्रीकी अभिनेताओं ने इस दुरूह पात्र को निभाने का प्रयास किया है। मंडेला के जीवन पर बनी अनेक फिल्मों में से मॉर्गन फ्रीमैन अभिनीत व क्लिंट ईस्टवूड द्वारा निर्मित ' इन्विक्टस (2009 ) और इदरीस अल्बा अभिनीत ' द लॉग वाक टू फ्रीडम (2013 ) ज्यादा विश्वनीय बायोपिक मानी जाती है। अधिकांश फिल्म समीक्षकों का मानना है कि अस्सी के दशक के बाद मंडेला पर बनी फिल्मों के नायक रिचर्ड एटेनबरो की क्लासिक ' गांधी (1983 ) के नायक बेन किंग्सले के अभिनय के पास पहुँचने की कोशिश करते नजर आते है। मंडेला पर बनी कुछ फिल्मे और टीवी धारावाहिक विवादास्पद भी रहे है। सिर्फ कारावास के वर्षों पर आधारित डेनिस हस्बेर्ट अभिनीत ' गुडबाय कलर ऑफ़ फ्रीडम (2007 ) मंडेला और उनके श्वेत पहरेदारो के दोस्ताना चित्रण की वजह से विवादित हो गई थी। मंडेला की प्रेमिका और बाद में जीवन संगिनी बनी विनी मंडेला के संबंधों पर भी एक टीवी फिल्म ब्रिटेन में रिलीज़ की जा चुकी है। 

Friday, July 13, 2018

खामोश फिल्म मेकर : विधु विनोद चोपड़ा

' संजू ' की घनघोर सफलता ने फिल्म के निर्माता विधु विनोद चोपड़ा के ताज में सफलता का एक पंख और सजा  दिया है। विधु न केवल आज  भारत के सफलतम प्रोड्यूसर है वरन बेहतरीन निर्देशकों में भी अपना एक अलग मुकाम रखते है। किसी भी फिल्मकार के लिए खुद को साबित करना और सफलता का क्रम बनाये रखना आसान नहीं होता क्योंकि उसे खुद को तराशने के इतने अवसर नहीं मिलते जितने किसी एक्टर को मिलते है। ऐसे ही चुनिंदा अवसरों को यादगार मील के पत्थरों में बदल देना उसे ' जीनियस ' की श्रेणी में ला खड़ा करता है। श्रीनगर में जन्मे और अंग्रेजी का शून्य ज्ञान लेकर फिल्म निर्माण सिखने पुणे इंस्टिट्यूट पहुंचे विधु ने ऋत्विक घटक से सिर्फ इस बात के लिए थप्पड़ खाया था कि वे तब तक शेक्सपीअर के बारे में कुछ नहीं जानते थे। उनकी विलक्षणता का पहला प्रमाण तब मिला जब पुणे के अंतिम वर्ष में प्रोजेक्ट के लिए बनाई उनकी  डॉक्यूमेंट्री ' एन  एनकाउंटर  विथ फेसेस ' ऑस्कर के लिए नामांकित हो गई। अमेरिकन राइटर , डायरेक्टर , एक्टर क्वेंटिन टैरेंटीनो से आप उम्मीद नहीं कर सकते कि वे कोई बॉलिवुड फिल्म भारत आकर बना लेंगे परन्तु विधु विनोद से ऐसी आशा की जा सकती है। फिल्म माध्यम को लेकर जुनूनी हद तक समर्पित इस फिल्मकार ने 2015 में हॉलीवुड जाकर सौ फीसदी  अमेरिकन फिल्म ' ब्रोकन  होर्सेस ' बना दी थी। 
सफलता के शिखर पर खड़े विधु का शुरूआती सफर  इतना आसान नहीं रहा है लेकिन उनकी जीवटता कइयों के लिए प्रेरणा बन सकती है। सन पिच्चासी का बरस हिंदी सिनेमा  में  कई नए चेहरों को स्थापित कर रहा था।  ' बेताब ' से शुरुआत करने वाले सनी देओल के पैर ' अर्जुन ' ने मजबूती से जमा दिए थे। अनिल कपूर '  वो सात दिन ' जैसी  यादगार भूमिका के बाद ' साहेब ' और ' मेरी जंग ' से नई ऊंचाइयो को छूने जा रहे थे। मिथुन चक्रवर्ती ' डिस्को डांसर ' से मिली सफलता को ' प्यार झुकता नहीं ' और  ' ग़ुलामी ' तक दोहरा रहे थे। जमे जकड़े अमिताभ ( मर्द , गिरफ्तार ) राजेशखन्ना ( आखिर क्यों , बेवफाई ) आदि  की फिल्मे सिनेमाघरों पर ' हॉउसफुल ' की तख्तियां टांग रही थी। ऐसे में एक अनजान से निर्माता निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा  की  फिल्म ' खामोश ' का पोस्टर बम्बई के रीगल सिनेमा पर लगा नजर आया। यह फिल्म एक बरस पहले बन चुकी थी परन्तु इसे कोई खरीदने को तैयार नहीं था। वजह यह उस दौर में आ रही कहानियों से ठीक उलट थी। रीगल के मालिक को टिकिट बिक्री का चालीस प्रतिशत देने के आश्वासन पर फिल्म रिलीज करने के लिए मनाया गया।   निर्माता खुद इतने तंगहाल थे कि वे इस फिल्म के  सिर्फ एक प्रिंट का खर्चा भी ब मुश्किल उठा पाए थे। विधु , की पत्नी रेनू सलूजा , सहायक बिनोद प्रधान , दोस्त और एक्टर सुधीर मिश्रा दीवारों पर ' खामोश ' के  पोस्टर चिपका रहे थे। रिलीज पर होने वाला धूम धड़ाका भी संभव नहीं था क्योंकि कोई भी नामी गिरामी हस्ती फिल्म देखने नहीं पहुंची थी। रात के शो में कही से घूमते घामते अनिल कपूर रीगल पहुँच गए। अनिल का यूँ इस तरह  आना अगले दिन के अखबारों की खबर बन गया। शायद ' खामोश ' को इतनी ही पब्लिसिटी की जरुरत थी। फिल्म चली और कई हफ्तों तक चली। फिल्म में कोई स्टार नहीं था सिर्फ एक्टर थे। आज के सारे चर्चित नाम इस फिल्म में थे। पंकज कपूर , नसीरुद्दीन शाह , शबाना आजमी , सोनी राजदान , सुषमा सेठ , अजित वाच्छानी , सदाशिव अमरापुरकर  ये लोग तब तक इतने जाने पहचाने नहीं थे।  सिर्फ फिल्म के नायक अमोल पालेकर और शबाना आजमी को ही दर्शक पहले भी देख चुके थे। फिल्म की यूएसपी थी सधी हुई  स्क्रिप्ट , बेहतरीन कैमरा वर्क और लाजवाब एडिटिंग। एक तरह से यह फिल्म  अपने  समय से आगे की फिल्म थी। निर्देशन इतना सधा हुआ था कि क्लाइमेक्स तक दर्शक सस्पेंस में ही उलझा रहता है। फिल्म के शुरुआत में आने वाले क्रेडिट में सिर्फ फिल्म के तकनीशियनों के नाम थे।   सिर्फ आठ लाख  में बनी इस फिल्म ने अपनी लागत तो नहीं निकाली परन्तु अपने अनूठेपन की वजह से आज भी याद की जाती है। अपनी पहली फिल्म से लेकर आज तक अलग अलग सब्जेक्ट पर  साफ़ सुथरी फिल्मे बनाकर एक मुकाम बना चुके विधु ने अपने  संघर्ष के दिनों से बहुत कुछ सीखा है। कई  सितारों  के लिए उनका स्पर्श पारस साबित हुआ है। अपनी चमक खो चुके संजय दत्त के लिए ' मुन्ना भाई ' सीरीज ,  संगीत में लगभग ख़ारिज कर दिए गए आर डी बर्मन के लिए  1942 ए लव स्टोरी , आमिर खान के लिए नई ऊंचाइयां ( 3 इडियट्स , पीके ) लगभग लड़खड़ाते रनवीर के कैरियर के  लिए हालिया ' संजू ' टर्निंग पॉइंट साबित हुई है। कोई आश्चर्य नहीं कि इतनी खूबियों की वजह से  उनका बेनर  ' विनोद चोपड़ा फिल्म्स ' देश के चार बड़े प्रोडक्शन हाउस में गिना जाता है। 
rajneesh jain 

Tuesday, July 3, 2018

संजय की कहानी !

किसी फिल्म की सार्थकता इसी में है कि वह जनचर्चा बन जाये , चाय के अड्डों पर लोग उसका जिक्र करे ,अखबारों में उस पर लेख लिखे जाए , सोशल मीडिया कुछ देर के लिए पोलिटिकल तंज और कटाक्षों को परे रख इस फिल्म के किरदारों की अभिनय क्षमता पर बहस करने लगे तो सीधा सा मतलब है कि लेखक ( अभिजात जोशी ) और निर्देशक ( राजकुमार हिरानी ) का प्रयास सफल रहा है। 
 ' संजू ' पहला बायोपिक नहीं है। न ही संजय दत्त आदर्श पुरुष है। परन्तु इस फिल्म के फ्लोर पर आने से लेकर प्रदर्शन तक जितनी हवा बनी उतनी शायद ही किसी अन्य बायोपिक को लेकर बनी है। ' संजू ' ऐसी बायोपिक जरूर है जो भारतीय दर्शक के बदलते रुख को पुरजोर तरीके से रेखांकित करती नजर आती है। विगत तीन वर्षों में बॉलीवुड छब्बीस बायोपिक रीलिज कर चूका है। इसी वर्ष संजू के साथ यह आंकड़ा दस फिल्मो पर पहुँच गया है। इस जॉनर में लगातार फिल्मे बनना सिद्ध करता है कि दर्शक फंतासी और पलायनवादी सिनेमा के साथ  वास्तविक जीवन और घटनाओ पर फिल्मों में भी दिलचस्पी लेने लगा है। दर्शक के मानसिक स्तर की परिपक्वता के लिहाज से यह संकेत सुखद है। 
अभिनेता संजय दत्त के जीवन के कुछ ज्ञात और कुछ अनसुने लम्हों को परदे पर देखने के बाद संभव है कि उनके बहुत से प्रशंसक उनसे दुरी बना सकते है। जो व्यक्ति अस्पताल में भर्ती अपनी माँ के वार्ड में नशाखोरी कर सकता है , अपने शालीन और सामाजिक पिता को मुसीबतों में डाल  सकता है , अपनी बे लगाम यौन गतिविधियों का ढिंढोरा पीटकर अपनी बहनो को शर्मिंदगी में डाल सकता है , अपनी प्रेमिकाओ की संख्या को लेकर डींग भर सकता है वह सहानुभूति का पात्र तो हो ही नहीं सकता। संजय दत्त का सेंतीस साला कैरियर भले ही उन्हें ' नायक ' की श्रेणी में रखता हो परन्तु उनका चाल चलन सामान्य व्यक्ति के इर्द गिर्द भी नहीं पहुँचता है। 
कुछ समय पहले नेशनल अवार्ड विजेता फिल्मकार हंसल मेहता ने आपातकाल के सूत्रधार  संजय गांधी पर बायोपिक बनाने की घोषणा की है। उन्होंने ' आउटलुक ' पत्रिका के पूर्व संपादक स्व विनोद मेहता की पुस्तक ' द संजय स्टोरी ' के अधिकार ख़रीदे है। द संजय स्टोरी ' संजय गांधी के चौतीस वर्षीय जीवन का सटीक और तथ्यात्मक ब्यौरा है।  इसे शोधग्रंथ कहना ज्यादा उपयुक्त है क्योंकि श्री मेहता ने संजय गांधी के संपर्क में आए अधिकांश लोगों से मुलाक़ात कर सिलसिलेवार तथ्य जुटाए है। अगर यह फिल्म सिनेमाघर का मुँह देखती है तो कई जीवित और मृत नामचीन हस्तियों के चेहरे पर से नकाब हटा देगी। फिलवक्त हंसल इस फिल्म की पटकथा पर काम कर रहे है। इस फिल्म का बनना ' संजू ' की तरह आसान नहीं होगा।  संजय दत्त ने अपने को उजागर करने का जैसा जोखिम उठाया है वैसा शायद मरहूम संजय गांधी की पत्नी  श्रीमती  मेनका और पुत्र वरुण गांधी न उठा पाए। 
लेख के आरम्भ में मेने भारतीय दर्शकों के बदलते स्वाद का जिक्र किया था। परन्तु यह इतना परिपक्व भी नहीं हुआ कि हॉलीवुड की कालजयी ' आल द प्रेसिडेंट मेन ' या  'जेएफके ' जैसी कठोर वास्तविकताओं को झेल जाए। न ही  हमारे राजनेता इतने सहिष्णु हुए है जो सच को आसानी से पचा जाये। 

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...