Tuesday, July 3, 2018

संजय की कहानी !

किसी फिल्म की सार्थकता इसी में है कि वह जनचर्चा बन जाये , चाय के अड्डों पर लोग उसका जिक्र करे ,अखबारों में उस पर लेख लिखे जाए , सोशल मीडिया कुछ देर के लिए पोलिटिकल तंज और कटाक्षों को परे रख इस फिल्म के किरदारों की अभिनय क्षमता पर बहस करने लगे तो सीधा सा मतलब है कि लेखक ( अभिजात जोशी ) और निर्देशक ( राजकुमार हिरानी ) का प्रयास सफल रहा है। 
 ' संजू ' पहला बायोपिक नहीं है। न ही संजय दत्त आदर्श पुरुष है। परन्तु इस फिल्म के फ्लोर पर आने से लेकर प्रदर्शन तक जितनी हवा बनी उतनी शायद ही किसी अन्य बायोपिक को लेकर बनी है। ' संजू ' ऐसी बायोपिक जरूर है जो भारतीय दर्शक के बदलते रुख को पुरजोर तरीके से रेखांकित करती नजर आती है। विगत तीन वर्षों में बॉलीवुड छब्बीस बायोपिक रीलिज कर चूका है। इसी वर्ष संजू के साथ यह आंकड़ा दस फिल्मो पर पहुँच गया है। इस जॉनर में लगातार फिल्मे बनना सिद्ध करता है कि दर्शक फंतासी और पलायनवादी सिनेमा के साथ  वास्तविक जीवन और घटनाओ पर फिल्मों में भी दिलचस्पी लेने लगा है। दर्शक के मानसिक स्तर की परिपक्वता के लिहाज से यह संकेत सुखद है। 
अभिनेता संजय दत्त के जीवन के कुछ ज्ञात और कुछ अनसुने लम्हों को परदे पर देखने के बाद संभव है कि उनके बहुत से प्रशंसक उनसे दुरी बना सकते है। जो व्यक्ति अस्पताल में भर्ती अपनी माँ के वार्ड में नशाखोरी कर सकता है , अपने शालीन और सामाजिक पिता को मुसीबतों में डाल  सकता है , अपनी बे लगाम यौन गतिविधियों का ढिंढोरा पीटकर अपनी बहनो को शर्मिंदगी में डाल सकता है , अपनी प्रेमिकाओ की संख्या को लेकर डींग भर सकता है वह सहानुभूति का पात्र तो हो ही नहीं सकता। संजय दत्त का सेंतीस साला कैरियर भले ही उन्हें ' नायक ' की श्रेणी में रखता हो परन्तु उनका चाल चलन सामान्य व्यक्ति के इर्द गिर्द भी नहीं पहुँचता है। 
कुछ समय पहले नेशनल अवार्ड विजेता फिल्मकार हंसल मेहता ने आपातकाल के सूत्रधार  संजय गांधी पर बायोपिक बनाने की घोषणा की है। उन्होंने ' आउटलुक ' पत्रिका के पूर्व संपादक स्व विनोद मेहता की पुस्तक ' द संजय स्टोरी ' के अधिकार ख़रीदे है। द संजय स्टोरी ' संजय गांधी के चौतीस वर्षीय जीवन का सटीक और तथ्यात्मक ब्यौरा है।  इसे शोधग्रंथ कहना ज्यादा उपयुक्त है क्योंकि श्री मेहता ने संजय गांधी के संपर्क में आए अधिकांश लोगों से मुलाक़ात कर सिलसिलेवार तथ्य जुटाए है। अगर यह फिल्म सिनेमाघर का मुँह देखती है तो कई जीवित और मृत नामचीन हस्तियों के चेहरे पर से नकाब हटा देगी। फिलवक्त हंसल इस फिल्म की पटकथा पर काम कर रहे है। इस फिल्म का बनना ' संजू ' की तरह आसान नहीं होगा।  संजय दत्त ने अपने को उजागर करने का जैसा जोखिम उठाया है वैसा शायद मरहूम संजय गांधी की पत्नी  श्रीमती  मेनका और पुत्र वरुण गांधी न उठा पाए। 
लेख के आरम्भ में मेने भारतीय दर्शकों के बदलते स्वाद का जिक्र किया था। परन्तु यह इतना परिपक्व भी नहीं हुआ कि हॉलीवुड की कालजयी ' आल द प्रेसिडेंट मेन ' या  'जेएफके ' जैसी कठोर वास्तविकताओं को झेल जाए। न ही  हमारे राजनेता इतने सहिष्णु हुए है जो सच को आसानी से पचा जाये। 

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