Saturday, August 6, 2011

बोलीवुड की समस्या ?

सलमान खान की हिट फिल्मो और सिंघम की शानदार सफलता ने बोलीवुड की हरियाली को विस्तार दिया है . फिल्मों का हिट होना फिल्म इंडस्ट्री के लिए ही नहीं वरन अर्थ -व्यवस्था के लिए भी अच्छा शगुन है . बोलीवुड फिलहाल साठ हजार लोगो को सीधे तौर पर रोजगार देता है . इसमें दक्षिण के सिनेमा उद्योग को और जोड़ दिया जाए तो आंकड़े और ज्यादा लुभावने हो जाते है . यंहा यह और स्पष्ट हो जाना चाहिए कि दक्षिण भारत में देश के उनसाठ प्रतिशत सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर है . प्राइज वाटर कूपर और फिक्की ने अपनी रिपोर्ट में फिल्म उद्योग को 9 .3 प्रतिशत की दर से बढने की धारणा व्यक्त की है , परन्तु बावजूद हालिया फिल्मो की सफलता के - द्रश्य सुहावना नहीं है . बोलीवुड अपने बड़े भाई होलीवुड की तरह नकारात्मक प्रगति दर्ज करा रहा है . यधपि गिरावट चिंतनीय नहीं है .पिछले वर्षों के आंकड़े इस छोटी सी चिंता की सही तस्वीर बयान कर देते है . सन 2009 /10 में फिल्मो के राजस्व में तीन प्रतिशत की कमी आई है . इस दौरान टिकटों की कुल बिक्री 8 .28 करोड़ रही . जबकि इसे 9 करोड़ के आंकड़े को पार कर जाना था . ठीक इसी तरह अकेले अमरीका के सिने दर्शकों के आंकड़े देखे जाए तो वह भी माथे पर शिकन ला दते है . वंहा टिकिटों की बिक्री ने 1 .22 अरब के आंकड़े को छुआ है जो की पिछले वर्ष से आधा प्रतिशत कम है . आर्थिक मंदी ने जंहाँ हरेक वर्ग को अपने प्रभाव में लिया है वही ऐसे भी शेत्र है जो इस प्रभाव से अछूते रहे है . इस अवधि में टेलीविजन ने बारह प्रतिशत , अखबार ने छे प्रतिशत , रेडियों ने ग्यारह प्रतिशत ,और संगीत ने पांच प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है .इन दोनों रिसर्च कंपनियों की रिपोर्ट सावधानी से चिंतन करने को प्रेरित करती है . बोलीवुड को अपना दायरा बढाने के लिए गंभीरता से कदम उठाने होंगे .यह सही है की भारतीय फिल्मे दुनिया भर के देशों में सराही जारही है परन्तु अगल बगल में पकिस्तान और बांगला देश में आज भी प्रतिबंधित है . सोनिया गांधी की हालिया यात्रा के बाद बांगला देश ने जरुर हमारी कुछ फिल्मों को प्रदर्शन की अनुमति दी है . परन्तु यह काफी नहीं है . दोनों देशों में बरसों से पायरेटेड रास्ते से फिल्मे प्रवेश कर रही है . अगर यही प्रवेश सही तरीके से हो तो अच्छे व्यवसाय की उम्मीद की जा सकती है.
बोलीवुड को एक और महत्वपूर्ण बात की और ध्यान देना होगा , जिस तरह रजनीकांत की 'रोबोट' तीन भाषा में रीलिज होकर '3 इडियट' से ज्यादा व्यवसाय कर गई ,

होलीवुड की फिल्मे हिंदी समेत शेत्रिय भाषाओ में डब होकर पहले हफ्ते में ही अपनी लागत निकाल देती है , उसी तरह हिंदी फिल्मो को भी शेत्रिय भाषाओ में डब होकर अपना दायरा बढाना होगा . 3 इडियट , ऐ वेडनेसडे , मुन्नाभाई सीरिज की फिल्मे , आदि आसानी से बोलीवुड को इस क्षेत्र में शुरुआत करने पर प्रेरित कर सकती है .

Tuesday, July 26, 2011

जिंदगी न मिलेगी दोबारा.

यह सिर्फ संयोग है . ताजा फिल्म '' जिंदगी न मिलेगी दोबारा '' और चेतन भगत के उपन्यास '' वन नाईट एट कॉल सेंटर'' के क्लाइमेक्स में एक समानता है .'' जिंदगी ..........के पात्र अपने जीवन और तनावों से परेशान है है . उन्हें राह मिलती है , जब वे रोमांचक और खतरनाक खेलों का हिस्सा बनते है . मौत और जीवन के मध्य जब चंद साँसों का फासला रह जाता है तब उन्हें अपने डर छोटे लगने लगते है और जिंदगी जरुरी . इसी पल उनकी सोंच बदलती है और वे वह फैसला करते है जिससे आँख चुरा रहेथे . फिल्म क्लासिक की श्रेणी में नहीं जाती है वरन अच्छा मनोरंजन करती है .
इसी तरह चेतन के उपन्यास'' वन नाईट एट कॉल सेंटर'' के छे पात्र (तीन लड़के और तीन लड़कियां ) अपनी अनिश्चित जिंदगी , और टूटते सपनो से परेशान है . एक रात ये लोग अपने काल सेंटर से चंद घंटों के लिए क्वालिस में घुमने निकलते है और अपने को एक निर्माणाधीन बिल्डिंग के बेसमेंट में फंसा पाते है . मोबाइल फोन का नेटवर्क नहीं मिलता , और न ही कोई चीख पुकार सुनकर बचाने आता है . उसी वक्त एक मोबाइल पर' भगवान्' की कॉल आती है . भगवान् उन्हें उनकी कमियों और अच्छाइयों के बारे में बताते है . हरेक पात्र अपने बारे में बताता है और खुद ही अपनी मदद करने का वचन देता है . मौत के मुंह से निकलने के बाद उनकी सोंच और दिशा बदल जाती है .
चेतन के उपन्यास भी 'साहित्यिक ' श्रेणी के नहीं है .परन्तु उनकी भाषा शेली अवश्य ही लुभाती है . यही कारण है की वे इस समय भारत के पहले ' बेस्ट सेलर ' है .
जेसा मेने शुरुआत में कहा दोनों क्लाइमेक्स का एक सामान होना महज संयोग है . '' जिंदगी .... की पटकथा में जोया अख्तर और रीमा कागती की मेहनत को कम करके नहीं आँका जा सकता है .

Thursday, July 21, 2011

unfaithful affairs

इन दिनों हर छपने वाली चीज पर एक नाम सुर्ख़ियों में चल रहा है वह है मिडिया सम्राट रुपर्ट मर्डोक और उनके बेटे जेम्स का . ऑस्ट्रेलिया से लेकर अमेरिका फिर यूरोप से लेकर एशिया तक जिस आदमी ने अपनी सल्तनत फेला रखी है , और जिसे महज मनुष्य न मानकर एक देश की तरह पुकारा जाता है( अमरीकी अखबार उन्हें मर्दोकिया के नाम से भी बुलाते है ) - इस समय थोड़े संकट में है . फोन टेपिंग के सिलसिले में उनका 168 बरस पुराना अखबार बंद हो गया और ब्रिटेन के सांसदों की उस समिति के सामने उपस्थित होना पड़ा जो एक समय उनके सामने कोर्निश बजाते थे . एक समय ऐसा भी था जब औस्ट्रेलिया में किसी दल का नेता उनके साथ डिनर टेबल पर देख लिया जाता था तो उसे अगला प्रधान मंत्री मान लिया जाता था . ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमन्त्री टोनी ब्लेयर ने अपने कार्यकाल में मर्डोक से मुलाकातों का एक रिकार्ड बनाया था . यही हाल जेम्स केमरून का भी है . भले ही आज सारी दुनिया उनके कामकाज के तरीके पर उंगलियाँ उठा रही हो ,लेकिन पत्रकारिता को एक ताकत के रूप मेंउभारने में मर्डोक को हमेशा याद किया जाएगा .
यहाँ पर मर्डोक की पत्नी का जिक्र करना जरुरी होगा . संसदीय समिति के सामने जब पिता पुत्र मर्डोक बयान दे रहे थे तो एक सज्जन ने मर्डोक पर शेविंग फोम फेका . उसकी हरकत से विचलित हुए बगेर वेंडी मर्डोक ने पति की ढाल बनकर न उस शख्स को घूंसा जमाया वरन तुरंत ही मर्डोक के गाल पर लगा फोम पोंछ दिया . चाइनिस मूल की वेंडी फिलहाल इस कदम से ट्विटर पर छाई हुई है . पत्नियां कंही की भी हो , अपने पति के के बुरे वक्त में भी छाया बन कर साथ रही है . अन्तर्रष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख डोमिनिक स्ट्रास काहन के बलात्कार प्रकरण में उनकी पत्नी एन सिंक्लेअर ने पति की जमानत कराने में अपना घर गिरवी रख दिया . टोनी ब्लेयर की पत्निचेरी ब्लेयर एक लालची और स्वार्थी महिला मानी जाती थी परन्तु जब जब टोनी पर विरोधियों के हमले हुए चेरी ने पूरी ताकत से पति का साथ दिया . अरबपति डोनाल्ड ट्रंप की पत्नि मेलानिया ट्रंप ने पूरा जोर इस बात के लिए लगा रखा है कि वे रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार बन जाए . फ़्रांस की प्रथम महिला कार्ला ब्रूनी ज्यादातर अपनी सुन्दरता के लिए जानी जाती है . फिलहाल वे गर्भवती है परन्तु अपने पति की दूसरी पारी के लिए कम जतन नहीं कर रही है . इन सब से इतर हिलेरी क्लिंटन का जिक्र न करना उनके साथ नाइंसाफी होगी . बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की के प्रकरण के समय हिलेरी ने अपने पति का साथ महाभियोग के खतरे तक दिया था . आज वे अमरीका की विदेश मंत्री है और बफादार पत्नि मानी जाती है .
सारे लेख का लुब्बे -लुआब यह है की सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया भर की पत्नियां बफदारी के मामले में एक जेसी है . फिर चाहे पति लोग कितने ही दुष्ट , कामी , और लम्पट क्यूँ न हो

Thursday, July 7, 2011

चलो कुछ करते है !!

आर्थिक भ्रष्टाचार पर जितनी बातें अब हो रही है शायद पहले कभी नहीं हुई . यह भी उतना ही सही है कि इससे लड़ने के जितने प्रयास अब हुए है पहले कभी नहीं हुए . जिसने भी इससे लड़ने का बीड़ा उठाया उसके दामन पर दाग लगे और इतना हडकाया गया कि मूल मुद्दे को छोड़ कर पहले अपना बचाव करने में उसे अपनी उर्जा नष्ट करना पड़ी . गुजरात के मुख्य मंत्री की सहायक रेनू पोखरना ''वाल स्ट्रीट जर्नल '' में लिखती है कि लोक पाल से पहले सिविल सर्विस में सफाई के लिए संसद में बिल लाया जाना चाहिए . संभवतः उनके कहने का आशय है कि सफाई कि शुरुआत ईमारत के गुम्बद से न होकर रोशनदान से होना चाहिए .चूँकि लोकपाल जनप्रतिनिधियों को दायरे में लाने की बात कर रहा है , इसलिए शोर शराबा कुछ ज्यादा है .जबकि नोकरशाही की तरफ से प्रतिरोध इतना प्रबल नहीं रहना है . दूसरी और विख्यात अर्थशास्त्री अमर्त्यसेन का मानना है कि भारत में भ्रष्टाचार नहीं बड़ा है वरन उसमे शामिल पैसे का आकार बड गया है. अपनी थ्योरी को आगे बढ़ाते हुए वे कहते है कि ' बहुसंख्य वर्ग आज भी इस बात पर अडिग है कि इस बीमारी का इलाज प्रजातांत्रिक तरीके से हो सकता है .
गेंद अब आपके हमारे पाले में है . हमें अपने अवचेतन से आलोकिक व्यक्तिव के नायको का अनुसरण करने की प्रवृति को छोड़ना होगा . हर समस्या के निदान के लिए आम जन को ही पहल करना होगी . यह ये भी हो सकती है कि हम प्रण करे कि अपने परिवार या मित्र वर्ग में भ्रष्टाचार से कमाए धन का सार्वजनिक विरोध करे .
यह आसान नहीं है. परन्तु पहल किसी को तो करना ही होगी . फिल्म 'दिवार' के नायक को याद कीजिये . उसकी माँ और छोटा भाई उसका घर महज इसलिए छोड़ देते है कि नायक ने तस्करी के माध्यम से दौलत का ढेर खड़ा किया है .

हमारे बशीर बद्र साहब बरसों से दोहरा रहे है '' एक पत्थर तो पुरजोर उछालो यारों , कौन कहता है आसमान में छेद नहीं होता ''

Sunday, July 3, 2011

अब किस्से कहानियों में नहीं रहे खजाने !!

अफ़साने हकीकत में उतर रहे है . देश सोने की चिडिया था , इस बात का इल्म अब आम लोगो को होने लगा है . पद्मनाम स्वामी मंदिर के तहखाने खजाना उगल रहे है . पहली बार तिरुपति बालाजी का सोना कम लगने लगा है . फिल्म 'ममी'एक काल्पनिक कहानी थी परन्तु उसके खजाने की खोज का घटना क्रम बेहद प्रभावशाली बन पढ़ा था , खास तौर पर फिल्म के अंत में ध्वस्त होते पिरामिड और उसमे नष्ट होते खजाने के द्रश्य . ठीक इसी तरह ' निकोलस केज ' अभिनीत 'नेशनल ट्रेजर ' खजाने की खोज पर बनी शानदार फिल्म थी . वाल स्ट्रीट के कही नीचे दबा खजाना खोजना नायक के लिए एक तरह से अपने पिता के खोये सम्मान को पुनह स्थापित करने का प्रयास है . खलनायक और नायक की रस्साकसी के बीच पिता पुत्र के रिश्ते को मजबूत करती यह फिल्म जितनी बार देखो , ताज़ी  लगती है . फिल्म के अंत में सारे खजाने को सरकार के संरक्षण में जाते बताया गया है . पद्मनाम मंदिर के खजाने को लेकर भी कुछ इसी तरह की खबरे आना शुरू होगई है. अगर ऐसा होता है तो यह देश हित में होगा . फिल्म उपकार में मनोज कुमार पर फिल्माया गीत ....मेरे देश की धरती सोना उगले ...चरितार्थ हो रहा है . जेसा मेने शुरुआत में कहा- कहानिया हकीकत में उतर रही है .

Saturday, June 25, 2011

Timeless beauty

सिमी गरेवाल फिलहाल किसी प्रोडक्ट के लिए विज्ञापन नहीं करती है .उम्र को पीछे धकेलने वाले कास्मेटिक के लिए वे बेहतरीन चुनाव हो सकती है . उम्र के जिस मुकाम पर आज वह खड़ी है वह आम तौर पर जीवन की शाम का वक्त कहा जासकता है . जीवन के साठ बसंत देख चुकी सिमी अपने नए टाक शो ''india's most desirable'' से पुनह टेलीविजन पर अवतरित हुई है . अफ़सोस की बात है उनका ताजा शो दर्शकों की अपेक्षा पर इस बार खरा नहीं उतरा है . परन्तु वे आज भी उतनी ही त्ताजगी से भरी है जितनी दस वर्ष पूर्व' rendezvous with simi garewal ' के प्रसारण के वक्त थी .समय की खासियत है कि वह हरेक जीवित प्राणी पर अपने निशाँ छोड़ता जाता है . सौभाग्य से सिमी गरेवाल समय के पंजो से खुद को बचाए हुए है . 'कालातीत ' शब्द शायद ऐसी ही शख्सियतों के लिए बना है .

एक और महिला का जिक्र करना यहाँ जरुरी है . ये है दिवंगत अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की बेटी पेटी डेविस . सिमी गरेवाल की ही तरह इनपर भी गुजिश्ता वक्त का असर नहीं पड़ा है . इन्होने अपनी बात कहने के लिए किताबों का सहारा लिया है . व्यक्तिव विकास पर इनकी लिखी अब तक आठ किताबें प्रकाशित हो चुकी है . सन 1994 में इन्होने'' प्ले बॉय '' पत्रिका में अपने निर्वस्त्र फोटो छपवा कर सनसनी फेला दी थी . सनसनी की वजह सिर्फ यह नहीं थी कि वे अमरीकी राष्ट्रपति कि बिटिया की तस्वीरे है , बल्कि वजह यह थी कि उस समय पेटी डेविस कि उम्र बन्यालिस वर्ष थी . जो की 'प्लेबॉय' की मोडलों की निर्धारित उम्र से दुगनी थी . पेटी का सन्देश था कि बदती उम्र में भी शरीर


को संतुलित रखा जासकता है . जून माह में पेटी ने पुनह धमाका करते हुए अपनी अनाव्रत तस्वीरे इस बार ''मोर मैगज़ीन '' में एक लेख के साथ छपवाई है . इस समय पेटी कि उम्र साठ के करीब है . हांलाकि वे अपनी पुरानी बात पर कायम है परन्तु आज उनका मानना है कि दुनिया में ऐसी कोई कसरत नहीं है जो शरीर में मोजूद जेविक घडी को रोक सके . उनका मानना है कि प्लेबॉय में छपे फोटो और सत्रह साल के अंतराल से मोर मैगज़ीन में छपे फोटो में सिर्फ इतना अंतर आया है कि उनकी कुहनियों कि त्वचा पर उम्र ने असर किया है .

सुन्दरता के लिए लकदक गहनों और मेकअप कि परतों कि जरुरत नहीं होती . कम से कम सिमी , और पेटी को देखकर तो यही महसूस होता है .

Tuesday, June 14, 2011

हिंदी फिल्मो में विदेशी !!!!!!

जो लोग इतिहास पढते है वे जानते है की भारत ने सदियों से विदेशी शासको और आक्रमण कारियों को आकर्षित किया है . भारत के सोने और ज्ञान की तलाश में बरसों से विदेशियों का आना जारी रहा है .मौजूदा दौर निश्चित तौर पर ऐसा नहीं है परन्तु हमारी फिल्म इंडस्ट्री में यह ट्रेंड साफ़ दिखाई देता है . यह भी सच है कि गुणवत्ता के मान से हमारी दो -चार फिल्मे और दो -चार फिल्मकार ही ओस्कर के लेवल तक जा सकते है . कांस फिल्मो के प्रतियोगी खंड तक हमारी फिल्मे पहुच नहीं पाती .(ऐश्वर्या रॉय अवश्य ही बीला-नागा दस साल से भारत का नाम काँस में रोशन कर रही है - वजह उनका एक अंतर्राष्ट्रीय कास्मेटिक ब्रांड के साथ करार होना है ) परन्तु बावजूद इन सबके , विदेशी या विदेशी मूल के भारतीयों को बोलीवूड जबरदस्त लुभाता है . अब एक्टर अपने देश की नागरिकता छोड़े बगेर वर्किंग वीसा के माध्यम से फिल्मो में प्रवेश कर रहे है . इस समय शीर्ष की अभिनेत्रियों में शुमार केटरीना कैफ ब्रिटेन निवासी है . पिछले दस सालों में उन्होंने अपनी अलग पहचान और जगह बना ली है . अब वे अपनी बहनों को लांच करने की तेयारी कर रही है . हांलाकि उनकी हिंदी आज भी माशा -अल्लाह है . परन्तु इससे उनकी सफलता पर कोई असर नहीं पड़ा है .
पड़ोस में रहने वाली लड़की जैसी दीप्ति नवल की पैदाइश यु तो पंजाब की है . परन्तु पदाई के लिए अमरीका जाकर बसने और नागरिकता हासिल करने के बाद जब उन्होंने भारत के बारे में सोंचा तो सबसे पहले उनके जेहन में हिंदी फिल्मे ही आई . कुछ समय के लिए प्रकाश झा से विवाह करने वाली दीप्ति आज 75 फिल्म पुरानी हो चुकी है . सार्थक फिल्मो के लिए याद रखी जाने वाली दीप्ती निर्देशक भी बन गई है . उनकी फिल्म दो आने की धुप चार आने की बारिश प्रदर्शन के लिए तैयार है .
भले ही पाकिस्तान की सरकार और अवाम भारत को पानी पी पी कर कोसे परन्तु वहां के कलाकार भारतीय फिल्मो से जुड़ने का कोई मौका नहीं गंवाते है . अदनान सामी , राहत फ़तेह अली खान , जेबा बख्तियार , वीना मालिक , मीरा , सलमा आगा , साफ़ तौर पर मानते है कि हिंदी फिल्मे शोहरत और दौलत का प्रवेश द्वार है . मुंबई में ठाकरे सल्तनत की नाक के नीचे रहने के बावजूद इन्हें भारतीय फिल्मो का वातावरण उत्साहजनक और प्रेरणा दायक लगता है .

जर्मन बाला क्लाडिया सिसला (बिग बॉस 3 ) चेकोस्लाविया की याना गुप्ता , नोर्वे की निगार खान , और एक समय सैफ अली की बेगम बनते -बनते बची इटली की रोजा केट्लिना, कोई शसक्त पहचान नहीं बना पाई . परन्तु दाल रोटी लायक काम इन्हें आज भी मिल रहा है .(निगार खान को वीसा ख़त्म होने पर नोर्वे भेजा जा चूका है )सिर्फ एक फिल्म में जलवा बिखेर कर अपने मुल्क वापस लौट चुकी अभिनेत्रियों की तादात भी कम नहीं है ,एलिस पेटन-रंग दे बसंती , कायली मिनोग -ब्लू , बारबरा मोरी -काईट , उल्लेखनीय है .
श्रीलंकाई सुंदरी जेक्लिन फर्नांडिस को लम्बी रेस की दावेदार माना जा सकता है . वेसे तो उनके खाते में कोई बड़ी हिट नहीं है परन्तु हाल ही में उन्होंने मर्डर 2हासिल कर भट्ट केम्प में प्रवेश हासिल किया है.
वर्किंग -वीसा पर भारत आने वाले एक्टर एक और रोचक ट्रेंड बना रहे है . फिल्म इंडस्ट्री में इन लोगो की सफलता में महिला कलाकारों का प्रतिशत पुरुषों के बनिस्बत बहुत ज्यादा है . पुरुषों में , कुछ दिन पूर्व दिवंगत हुए बोब क्रिस्टो और नफासत से हिंदी बोलने वाले टॉम अल्टर को छोड़ कर तीसरा नाम याद नहीं आता है .


दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...