Thursday, March 19, 2020

तेरे मेरे बीच में कैसा है ये बंधन अनजाना !


बॉलीवुड फिल्मों में दर्शाये प्रेम का विस्तार गली मोहल्ले के युवाओ या रेस्तरां के सुनसान कोने में बैठे जोड़े पर भलीभांति प्रतिबिंबित होते देखे जा सकते है। यद्धपि वे कुछ गलत नहीं कर रहे होते। मस्तिष्क में चल रही हलचल एड्रेनिल रसायन से प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है जिसका परिणाम अक्सर विपरीत सेक्स के आकर्षण पर जाकर ख़त्म होता है। भाषाई शब्दों में हम इस घटना को प्यार होना कहते है !
मनोवैज्ञानिक एल्ड्रिन रिच ने लिखा है ' प्रेम एक सम्मानीय संबंध है जिसमे दो लोग अधिकार पूर्वक प्रेम शब्द का उपयोग करते है। प्रेम दरअसल एक प्रक्रिया है जो बहुत ही कोमल , थोड़ी अधिकार ,थोड़ी भय ग्रस्त होते हुए उस सत्य से दोनों प्रेमियों का परिचय कराती है जिसमे वे होशपूर्वक एक दूसरे को एक नहीं अनेको  बार याद दिलाते है कि वे उससे कितना प्रेम करते है। इस प्रक्रिया में वे रोमांच के साथ एक दूसरे को खो देने की भयग्रंथि से भी ग्रसित रहते है। अक्सर कोई भी प्रेम में पड़ते समय एक कल्पना का सहारा लेता है कि वह अनजान बाहरी व्यक्ति उसके अंदर के खालीपन को भर देगा ! यधपि उसकी इस स्वनिर्मित आश्वस्ति के पीछे कोई ठोस आधार नहीं होता। यह उसका ही बनाया हुआ भ्रम होता। यह तब तक चलता है जब तक उस आगंतुक का वास्तविक जीवन में प्रवेश नहीं हो जाता। मनोवैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि अधिकांश प्रेम कहानिया हताशा की कहानियां होती। इस अवधारणा के समर्थन में तर्क देते हुए वे कहते है कि  जब आप प्रेम में पड़ते है तो अवचेतन में आप स्वीकार लेते है कि आप अब तक हताश थे ! आप किसी के इंतजार में थे , आपके जीवन में  किसी चीज की कमी थी। जो अब अचानक से पूर्ण  हो गई है। प्रेम दरअसल आपके खालीपन की गहराई से आपका साक्षात्कार करा देता है।
            प्रेम हो जाने के बाद उसकी नियति तय होने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। अमूमन दो ही विकल्प होते है जहाँ प्रेम पहुँचता है। एक , या तो जोड़े हमेशा के लिए बिना शर्त  सुखद अनुभवों को गढ़ते हुए जीवन को निखार लेते है।  दो , या तो  प्रेम चूक जाता है या फिर चयनकर्ता उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता और प्रेम काफूर हो जाता है। मोटे  तौर पर देखे तो प्रेमियों में उम्र का अंतर , समाज के रोड़े , भिन्न परिवेश , विचारों में मतभिन्नता , आर्थिक हालात इसके बिखरने की मूल वजह माना जाता है। यधपि इस तथ्य को कोई ध्यान नहीं देता कि प्रेम का न होना ही इस वियोग की मूल वजह है। शुरुआत में दैहिकता  , रूपसौंदर्य , लोकप्रियता ,बुद्धिमानी , वाकपटुता , संपन्नता या ऐसा ही कोई अन्य प्रभावी कारण रूमानी आकर्षण बनकर इस तरह मन मस्तिष्क पर छा जाता है जिसे संजीदा लोग भी
प्रेम समझने की भूल कर बैठते है। फिर एक निश्चित समय पर उस प्रभावी कारक की कलई मंद होने की आवश्यक प्रक्रिया आरंभ हो जाती है और वह तथाकथित प्रेम धीमे धीमे रिस जाता है। कभी किसी एक का तो कभी एक साथ दोनों ही का !
यहाँ यह भी विचारणीय है कि जो लोग अतीत में  प्रेम की मिसाल बन चुके है उन जैसा हो जाने की कामना करना भी प्रेम के संविधान में  निषेध माना गया है। प्रेम के आरंभ में किसी प्रयोजन का होना- प्रेम न होना ही माना जाएगा। कोई भी प्रयोजन फिर वह भौतिक हो चाहे मानसिक एक समय के बाद हासिल हो ही जाता है। फिर प्रेम करने की गुंजाइश भी उसके साथ ही ख़त्म हो जाती है। लैला मजनू हो जाना , शिरी फरहाद हो जाना या अमृता इमरोज हो जाना किसी तपस्या से कम नहीं है। यह सार्वभौम सत्य गहरे उतारना जरुरी है।
दस बारह वर्ष पूर्व पटना के उम्रदराज प्रोफेसर और उनकी शिष्या के प्रेम प्रसंग को लोग आज तक भूले नहीं है। उनके इस संबंध और  प्रोफेसर की पत्नी द्वारा शिष्या की सरेआम पिटाई को देश के एक प्रतिष्ठित न्यूज़ चैनल ने इस प्रमुखता से सनसनीखेज बना दिया था कि गुरु - शिष्या की जोड़ी शाम होने से पहले सेलेब्रिटी हो गई थी। टीवी चैनल ने ही प्रोफेसर को ' लवगुरु ' की उपाधि से नवाज दिया जो उनके साथ अब तक चिपकी हुई है। प्रोफेसर की नौकरी गई और आर्थिक हालात बदतर होने के बाद अब खबर है कि यह जोड़ा अलग हो चूका है। शिष्या वेस्ट इंडीज़ के किसी मानसिक अस्पताल में अपने अतीत की दुस्साहसिकता पर प्रायश्चित कर रही है। गुजरते समय और धुंधलाती प्रसिद्धि के साथ गुरु शिष्या के तथाकथित प्रेम की परते भी उधड़ गई !
            प्रेम सिर्फ प्रेम होता है जो हर हाल में साथ खड़े होकर अपना संपूर्ण न्योछावर इस शर्त पर करता है कि उसकी( प्रेमी की ) निजता पर कोई आंच नहीं आती। किसी उद्देश्य के लिए किया हुआ प्रेम कभी प्रेम हो ही नहीं सकता। न ही उसके होने का ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता होती है। प्रेमियों के लिए बिना वैचारिकता , बिना संवेदनशीलता और बिना विवेक के अनदेखे रास्तों पर चल पड़ना प्रायः दुखद ही रहा है।
बुद्ध , प्लेटो , बर्टेंड रसेल ,  सात्र ,सिमोन द बुवा जैसे कई शताब्दियों और पीढ़ियों पर अपने प्रभाव छोड़ने वाले विचारको ने रोमांटिक प्रेम के  आधुनिक आदर्शो  को कैसे आकार दिया और कैसे इसकी मौलिक खामियों को आदर्श के अनुरूप दुरुस्त करने का मार्ग सुझाया है - की समझ  हरेक काल में प्रासंगिक है। कम से कम प्रेम के रास्ते पर चल पड़े और चलने का मन बना रहे लोगों के लिए तो बेहद जरुरी है !  

Monday, March 16, 2020

कोरोना के सामने बेबस जेम्स बांड !

कोरोना का आतंक धीमे धीमे दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। दुनिया के प्रमुख स्टॉक मार्केट अनिश्चित भविष्य की आशंका में लगातार लड़खड़ा रहे है। भारत में ही एक दिन में निवेशकों के सात लाख करोड़ रूपये स्वाह हो चुके है। चीन में जहाँ से इस वायरस ने अपना मौत का सफर आरंभ किया है , अर्थव्यवस्था डगमगा गई है। अमेरिका के बाद सर्वाधिक सिनेमा हाल वाले इस देश में आधे सिनेमा हाल ( तकरीबन बीस हजार ) सुरक्षात्मक कारणों से बंद कर दिए गए है। तठस्थ मीडिया संस्थान बीबीसी का मानना है कि इस शुरूआती हड़कंप से ही चाइना बॉक्स ऑफिस को पांच अरब डॉलर का नुकसान हो चूका है।
 सिने प्रेमियों के लिए दूसरी बुरी खबर ब्रिटेन से आई है।  जेम्स बांड सीरीज की पच्चीसवी फिल्म ' नो टाइम टू डाई ' का रॉयल अल्बर्ट हॉल लंदन में होने वाला 31 मार्च का  वर्ल्ड प्रीमियर नवंवर तक के लिए टाल दिया गया है। यह फिल्म डेनियल क्रैग की बतौर जेम्स बांड आखरी फिल्म है।  इसके बाद कोई नया अभिनेता जेम्स के रूप में सामने आएगा। 3 अप्रैल को यह फिल्म पूरी दुनिया में प्रदर्शित होने वाली थी परंतु कोरोना के आतंक के चलते फ़िलहाल इसे सात  माह के लिए टाल दिया गया है।  गौरतलब है कि फ़िलहाल ब्रिटिश सरकार ने किसी भी तरह के  सार्वजनिक आयोजन पर कोई रोक नहीं लगाईं है।  फिल्म की रिलीज़ को आगे बढ़ाने का निर्णय निर्माता कंपनी ने अपने विवेक से लिया है। यधपि फ्रांस सरकार ने ऐसे किसी भी आयोजन पर रोक लगा दी है जहाँ पांच हजार लोगों के इकट्ठे होने की संभावना हो सकती है।  स्विट्ज़रलैंड ने इस सीमा को एक हजार पर सीमित कर दिया है। बांड प्रेमियों को इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार था।  बांड श्रंखला की आखरी फिल्म 'स्पेक्टर  ' 2015 में आई थी जिसने वैश्विक बॉक्स ऑफिस पर भारतीय मुद्रा में  सत्तरअरब का व्यवसाय किया था। महज सौ करोड़ के कलेक्शन पर इतरा जाने वाले बॉलीवुड के लिए यह एक ऐसा आंकड़ा  है जिसे छूने की वे कल्पना भी  नहीं कर सकते ! ' नो टाइम टू डाई ' की रिलीज़ का आगे बढ़ना साधारण घटना नहीं मानी जा सकती। 250 मिलियन डॉलर के भीमकाय  बजट वाली  यह फिल्म अन्य स्टूडियोज को भी बाध्य करेगी कि अनिश्चितता और भय के माहौल में वे अपनी फिल्मों को प्रदर्शित करने का  निर्णय सोंच विचार कर ले ! इस फिल्म के ऑफिशियल  ट्रेलर को अकेले यू ट्यूब पर ही ढेड़ करोड़ लोग देख चुके है वही इसके टाइटल ट्रेक को पचास लाख से ज्यादा लोग सुन  चुके है। इस टाइटल ट्रेक को गाने वाली गायिका बिली एलीश महज उन्नीस वर्ष की है।   भारतीय दर्शकों के लिए डेनियल क्रैग की फीस जान लेना भी जरुरी है। 2016 में उन्हें जब यह फिल्म ऑफर हुई थी तब निर्माता कंपनी ने उन्हें एक करोड़ डॉलर की पेशकश की थी परंतु बाद में उसे बढ़ाकर ढेड़ करोड़ डॉलर किया गया ! डेनियल क्रैग की बतौर जेम्स बांड यह पांचवी फिल्म है।
जेम्स बांड श्रंखला की फिल्मे बनाने का सर्वाधिकार इयोन प्रोडक्शन के पास है। 2016 में जब इस फिल्म की परिकल्पना की गई थी तब सबसे पहले डेनी बोएल ( स्लम डॉग मिलेनियर ) को निर्देशन का दायित्व सौंपा गया था। परंतु निर्माता कंपनी से उनकी पटरी नहीं बैठी और उन्होंने फिल्म छोड़ दी। कुछ समय के लिए क्रिस्टोफर नोलन का नाम भी चला अंततः कार्ल जोजी फुकुनगा ने निर्देशन की कमान संभाली। फुकुनगा पहले अमेरिकन है जिन्होंने बांड सीरीज की किसी फिल्म को निर्देशित किया है। इसके पहले यह गौरव सिर्फ ब्रिटिश डायरेक्टर को ही हासिल था।
 हवा में तैरती मौत का भय न सिर्फ फिल्मों के प्रदर्शन पर असर डाल रहा है बल्कि उनके दूसरे महत्वपूर्ण कामकाज पर भी असर कर रहा है। पिछले हफ्ते सोनी पिक्चर एंटरटेनमेंट ने अपने लंदन पेरिस और पोलैंड के ऑफिस बंद  कर दिए।  डिज्नी इस हफ्ते अपनी वीडियो स्ट्रीमिंग सर्विस की ब्रिटैन में शुभारंभ पर एक भव्य आयोजन करने जा रहा था , जिसे निरस्त कर दिया गया है। कोरोना के आतंक के चलते ' नो टाइम टू डाई ' के निर्माता को रिलीज़ डेट नवंबर तक धकेलना महंगा पड़ा है। इस फिल्म की पब्लिसिटी और प्रमोशन के लिए अब तक 30 मिलियन डॉलर खर्च किये जा चुके है जो फिलवक्त निरर्थक हो गए है।

Friday, September 13, 2019

आर्थिक मंदी और सिनेमा !

यह सिर्फ संयोग है या किसी अनहोनी के संकेत कि भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी की खबरे सितंबर माह में  हवा से भी तेज चलने लगी है। नब्बे बरस पहले ( 4 सितंबर 1929 ) वैश्विक मंदी की शुरुआत अमेरिका से ही हुई थी। इसका पहला लक्षण शेयर बाजार के बुरी तरह धराशायी होने के रूप में सामने आया था। अगले क्रम में बैंको को  ताश के पत्तों की तरह बिखरते देखा गया। इसीके साथ आम जनता की क्रय शक्ति ख़त्म हो गईऔर भरपूर उत्पादन का ढेर खड़ा हो गया लेकिन ग्राहक बाजार से नदारद थे । परिणाम स्वरुप बड़े पैमाने पर लोगों को नौकरियों से निकाला जाने लगा।  इस मंदी को ' ग्रेट डिप्रेशन ' का नाम दिया गया। मंदी का पहला शिकार उच्च वर्ग हुआ बाद में मध्यम वर्ग की बारी आई और अंत में निम्न वर्ग और किसान  इसकी चपेट में आये।
अगले पंद्रह साल चलने वाली त्रासदी की यह शुरुआत थी जो पच्चीस प्रतिशत अमरीकियों को बेरोजगार बनाने वाली थी। रातों रात सड़क पर आये संपन्न वर्ग को अपमान के साथ जीवित रहना सीखना था। लेकिन  इस काले असहनीय अध्याय का एक उजला पक्ष भी सामने आने वाला था। एक बड़ी आबादी के लिए  वर्तमान की कठोर वास्तविकता से क्षणिक छुटकारा पाने  के लिए सिनेमा एकमात्र विकल्प बचा था। संयोग से यह घटना  हॉलीवुड के  ' गोल्डन ऐज ' से गुजरने के दौरान हुई थी  जिसकी शुरुआत 1915 मे हो चुकी थी।
' ग्रेट डिप्रेशन '  के  दौरान अगर किसी को फायदा हुआ तो सिर्फ फिल्मों और उससे जुड़े लोगों को। बेकारी से जूझते लोगों के पास थिएटर का रुख करने के अलावा कोई चारा भी नहीं था। टिकिट दरे न्यूनतम हुआ करती थी। परंतु  यह भी आम आदमी को भारी पड़ती थी।  सिर्फ एक ' निकल ' ( एक डॉलर का बीसवाँ भाग ) में अगर दर्शक अपने वर्तमान से दूर  तीन घंटे हँसते मुस्कुराते गुजार सके इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता था। ऐतिहासिक तथ्य बताते है कि इन वर्षों में औसतन  6 करोड़  अमरीकी हर हफ्ते सिनेमा देखने जाया करते थे जबकि उस समय अमेरिका की जनसँख्या 9 करोड़ हुआ करती थी। मंदी के  पहले पांच वर्षों में अर्थव्यवस्था पचास प्रतिशत सिकुड़ चुकी थी फलस्वरूप 690 बैंक बंद हो गए और हजारों कंपनिया दिवालिया हो गई।
लेकिन हॉलीवुड इस विपरीत परिस्तिथि में भी फलता फूलता रहा। यधपि मंदी का असर बड़े स्टूडियो पर भी हुआ और उनका मुनाफा चौथाई रह गया। बड़े नामों में ट्वेंटीथ सेंचुरी फॉक्स, एमजीएम , वार्नर ब्रदर , पैरामाउंट , वाल्ट डिज्नी जैसे स्टूडियो ही इस मंदी में टिके रहे अन्यथा बंद होने वाले स्टूडियो की संख्या इससे कही अधिक थी। चलचित्रो के संचालकों ने अपने यहाँ भीड़ बनाये रखने के लिए नए तरीके ईजाद कर लिए थे। एक बड़ी फिल्म के साथ एक शार्ट फिल्म बोनस के रूप में दिखाई जाती थी ,  एक टिकिट को दो बार उपयोग किया जा सकता था , या फिल्म को ऐसी जगह रोक दिया जाता था जहाँ से दर्शक की उत्सुकता उफान पर आ चुकी हो , शेष हिस्सा देखने के लिए उसे अगले हफ्ते आना जरुरी हो जाता था।  इस तरह के प्रयोग ' बी- ग्रेड ' फिल्मों या अनजान अभिनेताओं अभिनेत्रियों की फिल्मों के साथ अक्सर किये जाते थे।
  इस समय तक फिल्मों की श्रेणियाँ अस्तित्व में नहीं आई थी। लेकिन इस बारे में विचार बनना आरंभ हो गए थे  अधिकांश फिल्मे कॉमेडी , गैंगस्टर , डाकू  मारधाड़ , म्यूजिकल , हॉरर , थ्रिलर जैसे विषयों पर आधारित थी। इसी दौर में अधिकांश फिल्म निर्माता ' साइलेंट फिल्मों ' से सवाक फिल्मों की और रुख करते नजर आ रहे थे। यहाँ भी विडंबना हो रही थी।  साइलेंट फिल्मों में सितारा हैसियत पा चुके अभिनेता ' बोलती ' फिल्मों में खुद को एडजस्ट नहीं कर पा रहे थे। बदलती टेक्नोलॉजी कई लोगों को अकारण बेरोजगार बना रही थी तो कइयों को अवसर दे रही थी। चार्ली चैप्लिन की व्यवस्था और मशीन पर तंज करती कॉमेडी ' मॉडर्न टाइम ' इस अंधियारे समय की वजह से ही संभव हुई। वाल्ट डिज्नी की सफलता की शुरुआत भी लगभग इस समय हुई।
उनकी कार्टून फिल्म ' द थ्री लिटिल पिग ' और ' विज़ार्ड ऑफ़ ओज़ ' ने अमरीकियों को जो छूट गया उसे भुला कर नई शुरुआत करने करने के लिए प्रेरित किया।  ' विज़ार्ड ऑफ़ ओज़ ' का गीत ' हु इज अफ्रेड ऑफ़ द बिग बेड वुल्फ '  लोकप्रिय होकर देशभर में डूबते आत्मविश्वास को संजोये रखने में सहायता  कर रहा था।

आर्थिक विपन्नता से जूझ रहा जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा  सिनेमा के परदे पर चुनचुनाती रौशनी में जीवन के मायने तलाश रहा था। सिनेमा न सिर्फ पलायन की वजह बना वरन नई राहे तलाशने में  भी मदद कर  रहा था। फिल्मों में उन चीजों पर ज्यादा फोकस किया जा रहा था जो लोगों से छूट गई थी या जिसे पाने की कल्पना वे कर रहे थे। ग्रेट डिप्रेशन के दर्शक इस तरह फिल्मों से खुद को जोड़कर देख रहे थे।
इस मंदी से निकलने में अमरीका को पच्चीस बरस लगे। ध्वस्त शेयर बाजार और बैंक दूसरे विश्व युद्ध के बाद ही  संभल पाये। पहले विश्व युद्ध से आरंभ हुआ हॉलीवुड का गोल्डन एरा  साठ के दशक तक चला। इस कालावधि में हॉलीवुड मे  अनगिनत ' क्लासिक ' रचे गए  , दर्जनों अभिनेताओं को अपनी प्रतिभा से ' लीजेंड ' बनने  का अवसर मिला । मानवीय गलतियों से आई आर्थिक विपन्नता ने भले ही एक पीढ़ी का जीवन नारकीय बना दिया हो परंतु उसी अवधि में कालातीत साहित्य और सिनेमा भी रचा गया । बीसवीं सदी  के कई विरोधाभासो में ' ग्रेट डिप्रेशन और सिनेमा ' शीर्ष पर रहेगा।   

Wednesday, August 28, 2019

सनी लियॉन कल आज और कल !



यह लगातार तीसरा वर्ष है जब सनी लियोन गूगल सर्च के टॉप ट्रेंड में शीर्ष पर रही है। अगस्त माह के आरंभ में गूगल ने अपने सर्च इंजिन से दुनिया भर के इंटरनेट यूसर्स के साल भर के सर्च  ट्रेंड के डेटा सार्वजनिक किये है। गूगल एनालिटिक्स के आंकड़े शोधकर्ताओं और बड़ी कम्पनियों को यह समझने में मदद करते है कि लोगों की पसंद और उनकी खरीददारी का रुझान किन चीजों से प्रभावित हो रहा है। लोग किस सेलिब्रिटी से सम्मोहित हो रहे है। सबसे चौकाने वाला तथ्य यह है कि सर्च पैटर्न में भारत के प्रधानमंत्री और बॉलीवुड के सुपर सितारे सनी लियोन से काफी पीछे चल रहे है। और यह भी तब जबकि सनी अपने पोर्न करियर को 2013 में ही समेट चुकी है।
 करनजीत कौर वोहरा ( सनी लियोन ) भारतीय मूल की है और कनाडा के छोटे से कस्बे ' सार्निया ' की रहने वाली है। पोर्न इंडस्ट्री  में आने से पूर्व उन्होंने स्वयं ही अपना नया नामकरण किया।  लियोन  शब्द उन्होंने  इतालवी फिल्म निर्माता के नाम में से लिया है और सनी शब्द अपने भाई से। 
2012 से बॉलीवुड में शुरुआत करने के बाद से अब तक उनकी तेरह फिल्मे आ चुकी है। कुछ फिल्मों ने जबरदस्त व्यवसाय किया और कुछ कब आई कब गई पता नहीं चला। इसी तरह कन्नड़ और तमिल की कुछ फिल्मों में भी  उन्होंने गेस्ट भूमिकाए की परंतु इन सभी में उनके शरीर की नुमाइश ही थी। उनके अभिनय को लेकर कही भी कोई चर्चा नहीं हुई।
यूँ तो सनी का जीवन खुली किताब है परन्तु इंटरनेट पर उन्हें लेकर जो तीव्र उत्सुकता है उसके पीछे अतीत में उनपर फिल्माए गए वीडिओ के अलावा उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में भी जान लेने की उत्कंठा भी शामिल है। आज सनी एक बड़ी शख्सियत बन चुकी है। लोग उनके पास जाना चाहते है। उनके साथ सेल्फी और ऑटोग्राफ चाहते है।  उनके किसी भी कार्यक्रम को सिर्फ उनका नाम ही ' हाउस फूल ' बना देता है। सनी इस तथ्य को भली भाँति महसूस करती है।  उन्हें मालुम है कि उनकी सबसे बड़ी पूँजी उनकी देह है इसलिए वे अपनी शर्तो पर काम करती। अब तक उन्होंने जितनी भी हिंदी या कन्नड़ फिल्मों में अपनी झलक दिखलाई है उनसे अमेरिकन डॉलर में पारिश्रमिक वसूला है।अब तक  वे इस सच  को भी स्वीकार चुकी है कि उनके पीछे दौड़ने वाली भीड़ उन्हें कभी भी चरित्र भूमिकाओं या केंद्रीय भूमिका में स्वीकार नहीं करेगी लिहाजा उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस स्थापित कर दिया है।  पोर्न बिजनेस में कमाई के मामले में वे दुनियाभर में सातवे स्थान पर आती है ( 2. 5 मिलियन डॉलर पोर्न एक्टर के रूप में उनकी सालाना आमदनी थी। ) . 
 ' केवल भगवान् ही न्याय करेंगे - जिंदगी बहुत छोटी है और इसका जी भर आनंद लिया जाना  चाहिए ' ट्विटर पर उनका स्टेटस उनकी व्यवहारिक सोंच को दर्शाता है। सनी के जीवन पर विस्तार से रौशनी डालती डॉक्यूमेंट्री ' मोस्टली सनी ' 2016 में प्रदर्शित हो चुकी है जिसे दिलीप मेहता ने निर्देशित किया था।  दिलीप मेहता पूर्व में वृंदावन की विधवाओं की दारुण स्थिति पर ' फॉर्गोटन वुमन ' डॉक्यूमेंट्री बनाकर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके है। भारत को छोड़कर सारी  दुनिया में नेटफ्लिक्स द्वारा प्रदर्शित इस डॉक्यूमेंट्री में सनी लियॉन बेबाकी से अपने बचपन , जीवन और सपनो के बारे में बात करती है। वे बताती है कि उनका बचपन सुखद था। उनके माता पिता ने सिख धर्म की परम्पराओ का सम्मान करते हुए उन्हें बड़ा किया। पोर्न बिजनेस में जाने का फैसला उन्होंने सोंच समझ कर लिया था। उन्हें ऐसा करने के लिए किसी ने बाध्य नहीं किया था। आधुनिक कनाडा में रहने के बावजूद भी उनके माता पिता इस फैसले के खिलाफ थे। सनी स्वीकार करती है कि उनके पालकों की नाराजगी को ' पेंटहाउस ' मैगज़ीन की तरफ से मिला एक लाख डॉलर का चेक भी कम नहीं कर सका था। आज स्थिति यह है कि उनके रिश्तेदार और भारतीय समुदाय के लोग उन्हें भारतीय समुदाय के लिए कलंक मानते है ! बॉलीवुड स्टार बन चुकी सनी के भाई और पति डेनियल वेबर  के अलावा उनका कोई नजदीकी रिश्तेदार उनसे रिश्ता नहीं रखता है। 

 सनी इस डॉक्यूमेंट्री में एक पोर्न स्टार नहीं वरन  ' बिज़नस वुमन ' की तरह बात करती है। वे एक एक डॉलर और एक एक रूपये को सोच  समझ कर नए बिजनेस में इंवेस्ट कर रही है।  पिछले दिनों दुबई में उन्होंने अपनी परफ्यूम रेंज ' लस्ट ' लांच की है और जल्द ही  कॉस्मेटिक रेंज भी ला रही है। इंटरनेट पर उनके नाम से जो ट्रैफिक चल रहा है सनी उसे भी भुना रही है।  कई डायरेक्टर उन्हें सिर्फ इस बात के पैसे दे रहे है ताकि वे अपने ट्विटर अकाउंट से उनकी फिल्मो का जिक्र भर कर दे। एक वेब साइट उन्हें इरोटिक  शार्ट स्टोरी लिखने के लिए पैसा दे रही है।
दो देशों कनाडा और अमेरिका की नागरिक सनी ने भारत की नागरिकता नहीं ली है। वे यहाँ आज भी वर्क वीसा पर रह रही है परंतु भारतीय परम्पराओ और संस्कृति को उन्होंने तेजी से अपनाना आरम्भ कर दिया है। एक गोद  ली हुई बेटी और सरोगेसी से उत्पन्न दो जुड़वाँ बेटों के साथ सभी त्यौहार मनाते सनी के पारिवारिक फोटो समय समय पर इंटरनेट पर ध्यान आकर्षित करते रहे है।
अतीत की पोर्न स्टार , वर्तमान में  बॉलीवुड अभिनेत्री और बिजनेस वुमन सनी को बीबीसी ने सौ प्रभावशाली महिलाओ की सूची में शामिल कर सम्मान दिया है परंतु भारत पाकिस्तान और दक्षिण एशियाइ देशों के इंटरनेट यूजर उन्हें आज भी ' कामुक ' नजरों से निहार रहे है। उनका कल आज भी उनका पीछा कर रहा है ! 

Friday, August 23, 2019

रजनीगंधा सी महकती एक अभिनेत्री : विद्या सिन्हा

हर कलाकार  का पहला  सपना होता है कि उसकी भूमिका को लोग याद रखे। इस सपने को पूरा करने के लिए वे जीतोड़ प्रयास भी करते है।  भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे बहुतेरे अभिनेता अभिनेत्री हुए है जिन्होंने भरपूर पैसा कमाया और अपना शेष जीवन सुखद अतीत की यादों की जुगाली करते हुए बिताया। परंतु कुछ लोग ऐसे भी रहे है जिन्होंने अपने स्वर्णिम समय में पैसा तो नहीं कमाया लेकिन  चुनिंदा भूमिकाए कर पीढ़ियों की स्मृतियों में दर्ज हो गए। ऐसी ही एक अभिनेत्री थी विद्या सिन्हा।
सत्तर से अस्सी के दशक में हमेशा की तरह बड़े सितारों की फिल्मों का बोलबाला था। सुपर स्टार राजेश खन्ना का जलवा  था ( अमर प्रेम , बाबर्ची )   इसी समय एक कालजयी फिल्म ' आनंद ' में अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना एक दूसरे के सामने ख़म ठोंक रहे थे। देव आनद ( हरे रामा हरे कृष्णा )  एक अनूठे विषय को उठाकर छा चुके थे। जया भादुड़ी गुड्डी , अभिमान से अपनी आमद दर्ज करा रही थी। 'मेरा नाम जोकर ' में झुलस चुके राजकपूर ' बॉबी ' से दो नए सितारों ( डिम्पल , ऋषिकपूर ) को जन्म दे चुके थे। श्याम बेनेगल  'अंकुर' और ' निशांत'  से शबाना आजमी को निखार चुके थे। समय के इसी दौर ने एक सपने को ' पाकीजा ' के रूप में रजत पटल पर साकार होते देखा। कमाल अमरोही का जूनून और मीना कुमारी का अपनी बीमारी के बावजूद शानदार अभिनय आज न सिर्फ सिनेमाई इतिहास है वरन शोध का विषय भी है।
इन्ही बड़े नामों और फिल्मों के बीच 1974 में  दक्षिण मुंबई में स्थित आकाशवाणी के थिएटर में एक फिल्म रिलीज़ हुई। नाम था ' रजनीगंधा ' और  निर्देशक थे ख्यातनाम  बासु चटर्जी। नायक अमोल पालेकर , दिनेश ठाकुर और नायिका विद्या सिन्हा के बारे में इससे पहले कभी सुना नहीं गया था। सिर्फ एक प्रिंट से प्रदर्शित इस फिल्म की पब्लिसिटी भी कुछ खास नहीं हो पाई थी। इंदौर की लेखिका मन्नू भंडारी के डायरी की शक्ल में लिखे उपन्यास ' यही सच है ' पर आधारित 'रजनीगंधा ' सिर्फ माउथ पब्लिसिटी के भरोसे सुपर हिट होने जा रही थी। दो प्रेमियों में से किसे जीवन साथी बनाऊ ? की दुविधा में उलझी शहरी मध्यमवर्गीय नायिका की
भूमिका को विद्या सिन्हा ने सहजता से जीवंत  किया था। पड़ोस में रहने वाली लड़की की तरह दिखने वाली विधा की छवि इस फिल्म की वजह से बरसों तक सिने दर्शकों के दिलों दिमाग पर अमिट रहने वाली थी। ऐसा हुआ भी। छप्पर फाड़ सफलता के बावजूद विधा ने अपनी सौम्य और शालीन छवि को बरकरार रखा। दो लाख रूपये के बजट में बनी ' रजनीगंधा ' विद्या सिन्हा  को उस मुकाम पर ले गई जहाँ के लिए नायिकाएँ कल्पना ही करती रह जाती है।  महज सोलह वर्ष की उम्र में ' मिस बॉम्बे ' का खिताब जीत लेने वाली विद्या ने अपनी सफलता के दौर में राजकपूर की फिल्म ठुकरा कर सनसनी फैला दी थी। ' सत्यम शिवम् सुंदरम ' के लिए राजकपूर की पहली पसंद विद्या ही थी परंतु कम कपड़ों में अधढकी नायिका की भूमिका उनके गले नहीं उतरी। इस समय तक नायिकाएँ तंग शर्ट्स और बेलबॉटम में नजर आने लगी थी। लेकिन  विद्या सिन्हा ने इस दौर में भी अपने को शिफॉन और जॉर्जेट की साड़ियों में संजोये रखा। अपने कैरियर में मात्र तीस फिल्मे करने वाली इस अभिनेत्री ने ऐसे  समय फिल्म संसार को अलविदा कह दिया था जब वे उस दौर के शीर्ष नायकों ( संजीव कुमार , शशि कपूर , विनोद खन्ना , शत्रुघ्न सिन्हा आदि ) के साथ फिल्मे कर रही थी। वजह सिर्फ इतनी थी कि वे मातृत्व  सुख को महसूस करना चाहती थी। अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो कर इस अभिनेत्री ने दूरदर्शन के लिए दो यादगार धारावाहिक (सिंहासन बत्तीसी , दरार )  निर्मित किये साथ ही दो सफल क्षेत्रीय फिल्मों ( बिजली - मराठी एवं जीवो रबारा - गुजराती ) की निर्माता भी बनी।
कई बार यूँ भी देखा है , ये जो मन की सीमारेखा है , मन तोड़ने लगता है ' या  ' रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके जीवन में ' या ' तुम्हे देखती हु तो लगता है जैसे युगो से तुम्हे जानती हु ' या ' न जाने क्यूँ होता है जिंदगी के साथ  -  गीत न सिर्फ मुकेश और लता मंगेशकर की वजह अमर हुए है वरन स्क्रीन पर विद्या की 'ग्रेसफुल भाव अभिव्यक्ति ने भी उन्हें अविस्मरणीय बना दिया है।
 यह विचित्र संयोग है कि देश की आजादी के साल (1947) जन्मी इस अभिनेत्री ने एन  आजादी की वर्षगांठ ( 15 अगस्त) पर दुनिया को अलविदा कहा।  

Saturday, August 10, 2019

मानवीय गलतियों से उपजा सिनेमा !

 गलतियां इंसान से ही होती है। इस कहावत में गलतियों के लिए माफ़ कर देने का भाव छुपा हुआ है। एलेग्जेंडर पोप के एक लेख में इस कहावत का पूरा भावार्थ स्पस्ट किया है कि बावजूद गलतियों के मनुष्य को क्षमा कर दिया जाना चाहिए। लेकिन मनुष्य की कुछ गलतिया ऐसी होती है जो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए जख्म बन जाया करती है। उन्हें चाहकर भी माफ़ नहीं किया जा सकता। 
बीसवीं सदी मनुष्य के मशीनी  विकास को रफ़्तार देने वाली सदी मानी जाती है। इस सदी में मानव जाति ने अकल्पनीय आविष्कारों की मदद से मनुष्य के जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया है। इस सदी ने मशीनों पर मनुष्य की निर्भरता को बढ़ावा दिया फलस्वरूप मानवीय भूलों की वजह से हुए मशीनी हादसों में किसी प्राकृतिक प्रकोप के बनिस्बत कही अधिक लोग हताहत हुए। बीसवीं सदी की शुरुआत में ही ' टाइटेनिक ' जहाज के डूब जाने की वजह से एक साथ पंद्रह सौ से ज्यादा लोग काल के ग्रास बन गए थे। काफी बाद में जांच से यह निष्कर्ष सामने आया कि जहाज को जिस स्टील की चद्दरों से ढंका गया था उनमे लगे रिबेट  निहायत ही हलके किस्म के थे। इस दुर्घटना के बाद अमेरिका के प्रकाशन उद्योग में जबरदस्त उछाल आया। इस हादसे पर  सैंकड़ों किताबे लिखी गई जिसमे हरेक लेखक ने इस ढंग से वर्णन किया  मानो वह इस दुर्घटना का प्रत्यक्ष गवाह रहा था। हादसे के पिच्चासी बरस बाद जेम्स कैमरून ने इस दुर्घटना में प्रेम कहानी मिलाकर प्रभावशाली फिल्म ' टाइटेनिक ' (1997) का निर्माण किया।
  जिम्मेदारों की लापरवाही और शीर्ष पर बैठे प्रभावशाली लोगों की लोलुपता के चलते  घटित हुए हादसों में भोपाल गैस त्रासदी ऐसा हादसा है  जिसने दुनिया को औद्योगिक सुरक्षा के प्रति बरती जाने वाली ढिलाई से अवगत कराया था। यह  मानव जनित हादसा था जिसके निशान भोपाल की मौजूदा पीढ़ी पर आज भी दिखाई दे रहे है। इस दुर्घटना पर कई डॉक्यूमेंट्री और फिल्मे बनी है। उल्लेखनीय फिल्म ' ए प्रेयर फॉर रेन (2014 ) है जिसमे एक रिक्शा चालक के नजरिये से पुरे घटना क्रम को देखा गया है। ' भोपाल एक्सप्रेस (1999 ) भी प्रभावशाली फिल्म थी जिसमे एक नव दम्पति को केंद्र में रखकर हादसे को दर्शाया गया था। वास्तविकता को एकदम नजदीक से टटोलती बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ' वन नाईट इन भोपाल (2004) हरेक पीड़ित के हाल बयां करती है। 
भोपाल हादसे के महज दो बरस बाद ही दो मानवीय गलतियों से उपजे हादसों ने विश्व की दोनों ही महशक्तियों रूस और अमेरिका को अंदर तक हिला दिया था। 1986 की गर्मियों में अविभाजित रूस के प्रिप्याट शहर से सटे चेर्नोबिल परमाणु प्लांट में हुए विस्फोट ने पूरी मानव जाति को विनाश के  कगार पर ला खड़ा किया था। बाद की जांच में स्पस्ट हुआ कि प्लांट सुपरवाइजर अपने प्रमोशन के लिए किसी को बताये बिना कुछ टेस्ट कर रहे थे। इस तरह के हादसों से निपटने में सभी देश की सरकारे एक ही नीति अपनाती है - हादसों को छुपाना। सोवियत सरकार ने भी यही किया।  पांच लाख की आबादी वाला प्रिप्याट  भुताह शहर हो गया है परन्तु सरकारी आंकड़े आज भी महज इकतीस मौत पर अटके हुए है। हाल ही में इस हादसे के एक हफ्ते के घटनाक्रम को केंद्र में रखकर डोक्यू ड्रामा ' चेर्नोबिल ' का प्रसारण एच बी ओ टेलीविज़न पर हुआ है। पांच किस्तों में प्रसारित इस टीवी शो ने तत्कालीन सोवियत रूस के आम जीवन , साम्यवादी पार्टी की कार्यशैली और गुप्तचर संस्था केजीबी की जीवन के हरक्षेत्र में घुसपैंठ को परत दर परत उजागर किया है। इस हादसे पर बनी डॉक्यूमेंट्री ' द बैटल ऑफ़ चेर्नोबिल ' सबसे विश्वसनीय मानी जाती है। 
1986 की ही सर्दियों में अमेरिका का स्पेस शटल चैलेंजर उड़ान के महज 73 सेकण्ड बाद ही आकाश में फट गया। इस घटना में सातों अंतरिक्ष यात्री मारे गए क्योंकि उनके बच निकलने का कोई रास्ता नहीं सोंचा गया था। स्पेस एजेंसी नासा के लिए यह हादसा एक काला अध्याय है। इस घटना में मानवीय भूल का पक्ष यह था कि ठंडे तापमान के आंकड़े नहीं जुटाए गए थे लिहाजा शून्य से नीचे तापमान में उड़ान भरने से उत्पन्न समस्याओ पर कंप्यूटर गौर नहीं कर पाया परिणाम स्वरुप करोडो डॉलर और कीमती जिंदगियां पल में खाक हो गई। 1990 और 2013 में इस विषय पर दो काल्पनिक फिल्मे बन चुकी है।  नासा ने इस पुरे घटनाक्रम की वास्तविकता को दर्शाने के लिए ' द चैलेंजर डिजास्टर (2019) को तकनीकी और तथ्यात्मक मदद उपलब्ध कराई है। 
जब तक मनुष्य है तब तक उससे गलतियाँ होती रहेगी। गलतियों से सीखकर ही मानव जाति अगली पीढ़ी के लिए बेहतर दुनिया बनाने का प्रयास करेगी। 

Sunday, July 21, 2019

( खल) नायक का उदय !

पिछले दिनों एक तेलुगु फिल्म के हिंदी रीमेक ने महज आठ दिनों में दो सौ करोड़ कमाई का रिकॉर्ड बना दिया। नशाखोरी ,महिला पात्र के प्रति अपमानजनक व्यवहार और अशालीन भाषा व् दृश्यों के बावजूद फिल्म को मिला  दर्शकों का समर्थन न सिर्फ चौंकाता है वरन चिंता भी पैदा करता है। क्या हम ऐसे समय की और बद रहे है जहाँ ' एंटी हीरो ' की भूमिका समाज में बगैर किसी किन्यु परन्तु के आत्मसात कर ली गई है ? फिल्म को मिले नेगेटिव रिव्यु के बावजूद थोक में दर्शक मिलना जताता है कि ' नकारात्मकता ' सामाजिक रूप से स्वीकारली गई है। लोगों को अपने नायक को गलत करते देखना अब कचोटता नहीं है।
हिंदी सिनेमा के कद्रदानों को भली भांति स्मरण होगा कि इस तरह की नकारात्मक भूमिका महान अभिनेता दादा मुनि अशोक कुमार ने काफी पहले पहली बार बुराइयों से भरे नायक के रूप में फिल्म ' किस्मत (1943) में निभाई थी। वे हिंदी फिल्मों के पहले ' एंटी हीरो ' माने जाते है। एंटी हीरो ' वह नायक होता है जिसमे परंपरागत प्रशंसनीय गुणों का सर्वथा अभाव होता है। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि हमारे माता पिता के दौर के नायक नायिकाओ से ये ठीक उलट होते है। उनके समय के नायक आदर्शवादी , मेहनत कश , नैतिक  मूल्यों और परम्पराओ का पालन करने वाले हुआ करते थे। बुरे कामों के लिए खल पात्र होता ही था।
सिनेमा और विज्ञापन की दुनिया प्रायः ' मिरर इमेज थ्योरी ' पर काम करती है। जो वर्तमान में  हो रहा है उसे कोई विषय बनाकर सिनेमा में प्रस्तुत कर दिया जाता है या फिल्म में दिखाए कथानक को  देखकर लोग उसे अनुसरण करने लगते है। हमारे मौजूदा समय में तलाक , बिखरते परिवार , आदर्शो का पिघलते जाना , भ्रष्टाचार   के प्रति संवेदनशून्यता जैसे माहौल ने यह महसूस कराना आरंभ कर दिया है कि कोई भी पूर्ण नहीं है। इसी विचार ने हमें चारित्रिक कमियों वाले नायको को पसंद करने के लिए प्रेरित किया है। यह भी उल्लेखनीय है कि जितने भी नायकों ने परम्परागत बायक के मुखोटे को उतार कर ' एंटी हीरो ' बनने का दुस्साहस किया है उन्हें अप्रत्याशित सफलता मिली है। दादा मुनि के नकारात्मक भूमिका निभाने के 14 बरस बाद सुनील दत्त ने ' मदर इंडिया (1957) में व्यवस्था से उपजे आक्रोश के चलते डकैत की भूमिका निभाई थी। बाद के वर्षों में वे ' मुझे जीने दो (1963) एवं  ' 36 घंटे (1974) में भी घुसर चरित्र निभाते नजर आये। ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार ने अपनी फिल्म ' गंगा जमुना (1961) से दो भाइयों की कहानी का चलन आरंभ किया।  इस तरह की कहानी में एक भाई विरोधी खेमे में खड़ा होकर नायक की राह में रोड़े  अटकाता  है।। एंटी हीरो को ग्लैमर दिया महानायक अमिताभ ने।  सत्तर के दशक में आयी ' शोले (1975) ऐसे नायको को हमसे परिचित  कराती है जिनमे दुर्गुणों की भरमार है। चूँकि वे गाँव की रक्षा करने आये है तो गाँव वालों के साथ दर्शक भी उन्हें सर माथे बिठा लेते है। शोले देखते हुए हमें अचानक से महान जापानी फिल्मकार अकीरो कुरोसावा की क्लासिक ' सेवन समुराई (1955) याद आजाती है जिसमे समाज से बहिष्कृत सात गुंडे गाँव वालों को डाकुओ के प्रकोप से मुक्ति दिलाते है। एंटी हीरो को एक नई ऊंचाई अमिताभ ने अपनी फिल्म ' डॉन (1978) से दी। उनका यह नेगटिव किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि  एक समय उनके घोर आलोचक शाहरुख़ ' डॉन ' के रीमेक में नायक बनकर आये।यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि  शाहरुख़ के कैरियर को गति देने में ग्रे -शेड्स की भूमिकाओं का अहम् योगदान है। उनकी 'डर (1990) बाजीगर (1993) अंजाम (1994 ) जैसी फिल्मों की वजह से ही दर्शकों ने उन्हें पसंद करना शुरू किया है।
सौरभ शुक्ला और अनुराग कश्यप द्वारा लिखी कहानी पर रामगोपाल वर्मा निर्मित ' सत्या (1998) मनोज बाजपेयी को रातो रात सितारा हैसियत दिला देती है। ऐसा ही कुछ सैफ अली के साथ ' ओंकारा (2006) में होता है।  शेक्सपीअर के नाटक ओथेलो पर आधारित इस फिल्म के नायक ' लंगड़ा त्यागी ' को भला कौन भूल सकता है।
नकारात्मक भूमिकाओं से 'लाइम लाइट ' जल्द मिलती है -यह सोंच देसी विदेशी दोनों ही तरफ  के नायक नायिकाओ को लुभाती रही है। कई बुराइयों और खामियों वाले हीरो आम दर्शको को लगातार प्रभावित कर रहे है। पूर्ण कोई नहीं है -यह विचार दर्शक को सीधे अपने नायक से जोड़ देता है लिहाजा  नायक और  उसकी फिल्म दोनों ही चल पड़ते है।  

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...