Wednesday, August 28, 2019

सनी लियॉन कल आज और कल !



यह लगातार तीसरा वर्ष है जब सनी लियोन गूगल सर्च के टॉप ट्रेंड में शीर्ष पर रही है। अगस्त माह के आरंभ में गूगल ने अपने सर्च इंजिन से दुनिया भर के इंटरनेट यूसर्स के साल भर के सर्च  ट्रेंड के डेटा सार्वजनिक किये है। गूगल एनालिटिक्स के आंकड़े शोधकर्ताओं और बड़ी कम्पनियों को यह समझने में मदद करते है कि लोगों की पसंद और उनकी खरीददारी का रुझान किन चीजों से प्रभावित हो रहा है। लोग किस सेलिब्रिटी से सम्मोहित हो रहे है। सबसे चौकाने वाला तथ्य यह है कि सर्च पैटर्न में भारत के प्रधानमंत्री और बॉलीवुड के सुपर सितारे सनी लियोन से काफी पीछे चल रहे है। और यह भी तब जबकि सनी अपने पोर्न करियर को 2013 में ही समेट चुकी है।
 करनजीत कौर वोहरा ( सनी लियोन ) भारतीय मूल की है और कनाडा के छोटे से कस्बे ' सार्निया ' की रहने वाली है। पोर्न इंडस्ट्री  में आने से पूर्व उन्होंने स्वयं ही अपना नया नामकरण किया।  लियोन  शब्द उन्होंने  इतालवी फिल्म निर्माता के नाम में से लिया है और सनी शब्द अपने भाई से। 
2012 से बॉलीवुड में शुरुआत करने के बाद से अब तक उनकी तेरह फिल्मे आ चुकी है। कुछ फिल्मों ने जबरदस्त व्यवसाय किया और कुछ कब आई कब गई पता नहीं चला। इसी तरह कन्नड़ और तमिल की कुछ फिल्मों में भी  उन्होंने गेस्ट भूमिकाए की परंतु इन सभी में उनके शरीर की नुमाइश ही थी। उनके अभिनय को लेकर कही भी कोई चर्चा नहीं हुई।
यूँ तो सनी का जीवन खुली किताब है परन्तु इंटरनेट पर उन्हें लेकर जो तीव्र उत्सुकता है उसके पीछे अतीत में उनपर फिल्माए गए वीडिओ के अलावा उनकी व्यक्तिगत जिंदगी के बारे में भी जान लेने की उत्कंठा भी शामिल है। आज सनी एक बड़ी शख्सियत बन चुकी है। लोग उनके पास जाना चाहते है। उनके साथ सेल्फी और ऑटोग्राफ चाहते है।  उनके किसी भी कार्यक्रम को सिर्फ उनका नाम ही ' हाउस फूल ' बना देता है। सनी इस तथ्य को भली भाँति महसूस करती है।  उन्हें मालुम है कि उनकी सबसे बड़ी पूँजी उनकी देह है इसलिए वे अपनी शर्तो पर काम करती। अब तक उन्होंने जितनी भी हिंदी या कन्नड़ फिल्मों में अपनी झलक दिखलाई है उनसे अमेरिकन डॉलर में पारिश्रमिक वसूला है।अब तक  वे इस सच  को भी स्वीकार चुकी है कि उनके पीछे दौड़ने वाली भीड़ उन्हें कभी भी चरित्र भूमिकाओं या केंद्रीय भूमिका में स्वीकार नहीं करेगी लिहाजा उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस स्थापित कर दिया है।  पोर्न बिजनेस में कमाई के मामले में वे दुनियाभर में सातवे स्थान पर आती है ( 2. 5 मिलियन डॉलर पोर्न एक्टर के रूप में उनकी सालाना आमदनी थी। ) . 
 ' केवल भगवान् ही न्याय करेंगे - जिंदगी बहुत छोटी है और इसका जी भर आनंद लिया जाना  चाहिए ' ट्विटर पर उनका स्टेटस उनकी व्यवहारिक सोंच को दर्शाता है। सनी के जीवन पर विस्तार से रौशनी डालती डॉक्यूमेंट्री ' मोस्टली सनी ' 2016 में प्रदर्शित हो चुकी है जिसे दिलीप मेहता ने निर्देशित किया था।  दिलीप मेहता पूर्व में वृंदावन की विधवाओं की दारुण स्थिति पर ' फॉर्गोटन वुमन ' डॉक्यूमेंट्री बनाकर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके है। भारत को छोड़कर सारी  दुनिया में नेटफ्लिक्स द्वारा प्रदर्शित इस डॉक्यूमेंट्री में सनी लियॉन बेबाकी से अपने बचपन , जीवन और सपनो के बारे में बात करती है। वे बताती है कि उनका बचपन सुखद था। उनके माता पिता ने सिख धर्म की परम्पराओ का सम्मान करते हुए उन्हें बड़ा किया। पोर्न बिजनेस में जाने का फैसला उन्होंने सोंच समझ कर लिया था। उन्हें ऐसा करने के लिए किसी ने बाध्य नहीं किया था। आधुनिक कनाडा में रहने के बावजूद भी उनके माता पिता इस फैसले के खिलाफ थे। सनी स्वीकार करती है कि उनके पालकों की नाराजगी को ' पेंटहाउस ' मैगज़ीन की तरफ से मिला एक लाख डॉलर का चेक भी कम नहीं कर सका था। आज स्थिति यह है कि उनके रिश्तेदार और भारतीय समुदाय के लोग उन्हें भारतीय समुदाय के लिए कलंक मानते है ! बॉलीवुड स्टार बन चुकी सनी के भाई और पति डेनियल वेबर  के अलावा उनका कोई नजदीकी रिश्तेदार उनसे रिश्ता नहीं रखता है। 

 सनी इस डॉक्यूमेंट्री में एक पोर्न स्टार नहीं वरन  ' बिज़नस वुमन ' की तरह बात करती है। वे एक एक डॉलर और एक एक रूपये को सोच  समझ कर नए बिजनेस में इंवेस्ट कर रही है।  पिछले दिनों दुबई में उन्होंने अपनी परफ्यूम रेंज ' लस्ट ' लांच की है और जल्द ही  कॉस्मेटिक रेंज भी ला रही है। इंटरनेट पर उनके नाम से जो ट्रैफिक चल रहा है सनी उसे भी भुना रही है।  कई डायरेक्टर उन्हें सिर्फ इस बात के पैसे दे रहे है ताकि वे अपने ट्विटर अकाउंट से उनकी फिल्मो का जिक्र भर कर दे। एक वेब साइट उन्हें इरोटिक  शार्ट स्टोरी लिखने के लिए पैसा दे रही है।
दो देशों कनाडा और अमेरिका की नागरिक सनी ने भारत की नागरिकता नहीं ली है। वे यहाँ आज भी वर्क वीसा पर रह रही है परंतु भारतीय परम्पराओ और संस्कृति को उन्होंने तेजी से अपनाना आरम्भ कर दिया है। एक गोद  ली हुई बेटी और सरोगेसी से उत्पन्न दो जुड़वाँ बेटों के साथ सभी त्यौहार मनाते सनी के पारिवारिक फोटो समय समय पर इंटरनेट पर ध्यान आकर्षित करते रहे है।
अतीत की पोर्न स्टार , वर्तमान में  बॉलीवुड अभिनेत्री और बिजनेस वुमन सनी को बीबीसी ने सौ प्रभावशाली महिलाओ की सूची में शामिल कर सम्मान दिया है परंतु भारत पाकिस्तान और दक्षिण एशियाइ देशों के इंटरनेट यूजर उन्हें आज भी ' कामुक ' नजरों से निहार रहे है। उनका कल आज भी उनका पीछा कर रहा है ! 

Friday, August 23, 2019

रजनीगंधा सी महकती एक अभिनेत्री : विद्या सिन्हा

हर कलाकार  का पहला  सपना होता है कि उसकी भूमिका को लोग याद रखे। इस सपने को पूरा करने के लिए वे जीतोड़ प्रयास भी करते है।  भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में ऐसे बहुतेरे अभिनेता अभिनेत्री हुए है जिन्होंने भरपूर पैसा कमाया और अपना शेष जीवन सुखद अतीत की यादों की जुगाली करते हुए बिताया। परंतु कुछ लोग ऐसे भी रहे है जिन्होंने अपने स्वर्णिम समय में पैसा तो नहीं कमाया लेकिन  चुनिंदा भूमिकाए कर पीढ़ियों की स्मृतियों में दर्ज हो गए। ऐसी ही एक अभिनेत्री थी विद्या सिन्हा।
सत्तर से अस्सी के दशक में हमेशा की तरह बड़े सितारों की फिल्मों का बोलबाला था। सुपर स्टार राजेश खन्ना का जलवा  था ( अमर प्रेम , बाबर्ची )   इसी समय एक कालजयी फिल्म ' आनंद ' में अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना एक दूसरे के सामने ख़म ठोंक रहे थे। देव आनद ( हरे रामा हरे कृष्णा )  एक अनूठे विषय को उठाकर छा चुके थे। जया भादुड़ी गुड्डी , अभिमान से अपनी आमद दर्ज करा रही थी। 'मेरा नाम जोकर ' में झुलस चुके राजकपूर ' बॉबी ' से दो नए सितारों ( डिम्पल , ऋषिकपूर ) को जन्म दे चुके थे। श्याम बेनेगल  'अंकुर' और ' निशांत'  से शबाना आजमी को निखार चुके थे। समय के इसी दौर ने एक सपने को ' पाकीजा ' के रूप में रजत पटल पर साकार होते देखा। कमाल अमरोही का जूनून और मीना कुमारी का अपनी बीमारी के बावजूद शानदार अभिनय आज न सिर्फ सिनेमाई इतिहास है वरन शोध का विषय भी है।
इन्ही बड़े नामों और फिल्मों के बीच 1974 में  दक्षिण मुंबई में स्थित आकाशवाणी के थिएटर में एक फिल्म रिलीज़ हुई। नाम था ' रजनीगंधा ' और  निर्देशक थे ख्यातनाम  बासु चटर्जी। नायक अमोल पालेकर , दिनेश ठाकुर और नायिका विद्या सिन्हा के बारे में इससे पहले कभी सुना नहीं गया था। सिर्फ एक प्रिंट से प्रदर्शित इस फिल्म की पब्लिसिटी भी कुछ खास नहीं हो पाई थी। इंदौर की लेखिका मन्नू भंडारी के डायरी की शक्ल में लिखे उपन्यास ' यही सच है ' पर आधारित 'रजनीगंधा ' सिर्फ माउथ पब्लिसिटी के भरोसे सुपर हिट होने जा रही थी। दो प्रेमियों में से किसे जीवन साथी बनाऊ ? की दुविधा में उलझी शहरी मध्यमवर्गीय नायिका की
भूमिका को विद्या सिन्हा ने सहजता से जीवंत  किया था। पड़ोस में रहने वाली लड़की की तरह दिखने वाली विधा की छवि इस फिल्म की वजह से बरसों तक सिने दर्शकों के दिलों दिमाग पर अमिट रहने वाली थी। ऐसा हुआ भी। छप्पर फाड़ सफलता के बावजूद विधा ने अपनी सौम्य और शालीन छवि को बरकरार रखा। दो लाख रूपये के बजट में बनी ' रजनीगंधा ' विद्या सिन्हा  को उस मुकाम पर ले गई जहाँ के लिए नायिकाएँ कल्पना ही करती रह जाती है।  महज सोलह वर्ष की उम्र में ' मिस बॉम्बे ' का खिताब जीत लेने वाली विद्या ने अपनी सफलता के दौर में राजकपूर की फिल्म ठुकरा कर सनसनी फैला दी थी। ' सत्यम शिवम् सुंदरम ' के लिए राजकपूर की पहली पसंद विद्या ही थी परंतु कम कपड़ों में अधढकी नायिका की भूमिका उनके गले नहीं उतरी। इस समय तक नायिकाएँ तंग शर्ट्स और बेलबॉटम में नजर आने लगी थी। लेकिन  विद्या सिन्हा ने इस दौर में भी अपने को शिफॉन और जॉर्जेट की साड़ियों में संजोये रखा। अपने कैरियर में मात्र तीस फिल्मे करने वाली इस अभिनेत्री ने ऐसे  समय फिल्म संसार को अलविदा कह दिया था जब वे उस दौर के शीर्ष नायकों ( संजीव कुमार , शशि कपूर , विनोद खन्ना , शत्रुघ्न सिन्हा आदि ) के साथ फिल्मे कर रही थी। वजह सिर्फ इतनी थी कि वे मातृत्व  सुख को महसूस करना चाहती थी। अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो कर इस अभिनेत्री ने दूरदर्शन के लिए दो यादगार धारावाहिक (सिंहासन बत्तीसी , दरार )  निर्मित किये साथ ही दो सफल क्षेत्रीय फिल्मों ( बिजली - मराठी एवं जीवो रबारा - गुजराती ) की निर्माता भी बनी।
कई बार यूँ भी देखा है , ये जो मन की सीमारेखा है , मन तोड़ने लगता है ' या  ' रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके जीवन में ' या ' तुम्हे देखती हु तो लगता है जैसे युगो से तुम्हे जानती हु ' या ' न जाने क्यूँ होता है जिंदगी के साथ  -  गीत न सिर्फ मुकेश और लता मंगेशकर की वजह अमर हुए है वरन स्क्रीन पर विद्या की 'ग्रेसफुल भाव अभिव्यक्ति ने भी उन्हें अविस्मरणीय बना दिया है।
 यह विचित्र संयोग है कि देश की आजादी के साल (1947) जन्मी इस अभिनेत्री ने एन  आजादी की वर्षगांठ ( 15 अगस्त) पर दुनिया को अलविदा कहा।  

Saturday, August 10, 2019

मानवीय गलतियों से उपजा सिनेमा !

 गलतियां इंसान से ही होती है। इस कहावत में गलतियों के लिए माफ़ कर देने का भाव छुपा हुआ है। एलेग्जेंडर पोप के एक लेख में इस कहावत का पूरा भावार्थ स्पस्ट किया है कि बावजूद गलतियों के मनुष्य को क्षमा कर दिया जाना चाहिए। लेकिन मनुष्य की कुछ गलतिया ऐसी होती है जो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए जख्म बन जाया करती है। उन्हें चाहकर भी माफ़ नहीं किया जा सकता। 
बीसवीं सदी मनुष्य के मशीनी  विकास को रफ़्तार देने वाली सदी मानी जाती है। इस सदी में मानव जाति ने अकल्पनीय आविष्कारों की मदद से मनुष्य के जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया है। इस सदी ने मशीनों पर मनुष्य की निर्भरता को बढ़ावा दिया फलस्वरूप मानवीय भूलों की वजह से हुए मशीनी हादसों में किसी प्राकृतिक प्रकोप के बनिस्बत कही अधिक लोग हताहत हुए। बीसवीं सदी की शुरुआत में ही ' टाइटेनिक ' जहाज के डूब जाने की वजह से एक साथ पंद्रह सौ से ज्यादा लोग काल के ग्रास बन गए थे। काफी बाद में जांच से यह निष्कर्ष सामने आया कि जहाज को जिस स्टील की चद्दरों से ढंका गया था उनमे लगे रिबेट  निहायत ही हलके किस्म के थे। इस दुर्घटना के बाद अमेरिका के प्रकाशन उद्योग में जबरदस्त उछाल आया। इस हादसे पर  सैंकड़ों किताबे लिखी गई जिसमे हरेक लेखक ने इस ढंग से वर्णन किया  मानो वह इस दुर्घटना का प्रत्यक्ष गवाह रहा था। हादसे के पिच्चासी बरस बाद जेम्स कैमरून ने इस दुर्घटना में प्रेम कहानी मिलाकर प्रभावशाली फिल्म ' टाइटेनिक ' (1997) का निर्माण किया।
  जिम्मेदारों की लापरवाही और शीर्ष पर बैठे प्रभावशाली लोगों की लोलुपता के चलते  घटित हुए हादसों में भोपाल गैस त्रासदी ऐसा हादसा है  जिसने दुनिया को औद्योगिक सुरक्षा के प्रति बरती जाने वाली ढिलाई से अवगत कराया था। यह  मानव जनित हादसा था जिसके निशान भोपाल की मौजूदा पीढ़ी पर आज भी दिखाई दे रहे है। इस दुर्घटना पर कई डॉक्यूमेंट्री और फिल्मे बनी है। उल्लेखनीय फिल्म ' ए प्रेयर फॉर रेन (2014 ) है जिसमे एक रिक्शा चालक के नजरिये से पुरे घटना क्रम को देखा गया है। ' भोपाल एक्सप्रेस (1999 ) भी प्रभावशाली फिल्म थी जिसमे एक नव दम्पति को केंद्र में रखकर हादसे को दर्शाया गया था। वास्तविकता को एकदम नजदीक से टटोलती बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ' वन नाईट इन भोपाल (2004) हरेक पीड़ित के हाल बयां करती है। 
भोपाल हादसे के महज दो बरस बाद ही दो मानवीय गलतियों से उपजे हादसों ने विश्व की दोनों ही महशक्तियों रूस और अमेरिका को अंदर तक हिला दिया था। 1986 की गर्मियों में अविभाजित रूस के प्रिप्याट शहर से सटे चेर्नोबिल परमाणु प्लांट में हुए विस्फोट ने पूरी मानव जाति को विनाश के  कगार पर ला खड़ा किया था। बाद की जांच में स्पस्ट हुआ कि प्लांट सुपरवाइजर अपने प्रमोशन के लिए किसी को बताये बिना कुछ टेस्ट कर रहे थे। इस तरह के हादसों से निपटने में सभी देश की सरकारे एक ही नीति अपनाती है - हादसों को छुपाना। सोवियत सरकार ने भी यही किया।  पांच लाख की आबादी वाला प्रिप्याट  भुताह शहर हो गया है परन्तु सरकारी आंकड़े आज भी महज इकतीस मौत पर अटके हुए है। हाल ही में इस हादसे के एक हफ्ते के घटनाक्रम को केंद्र में रखकर डोक्यू ड्रामा ' चेर्नोबिल ' का प्रसारण एच बी ओ टेलीविज़न पर हुआ है। पांच किस्तों में प्रसारित इस टीवी शो ने तत्कालीन सोवियत रूस के आम जीवन , साम्यवादी पार्टी की कार्यशैली और गुप्तचर संस्था केजीबी की जीवन के हरक्षेत्र में घुसपैंठ को परत दर परत उजागर किया है। इस हादसे पर बनी डॉक्यूमेंट्री ' द बैटल ऑफ़ चेर्नोबिल ' सबसे विश्वसनीय मानी जाती है। 
1986 की ही सर्दियों में अमेरिका का स्पेस शटल चैलेंजर उड़ान के महज 73 सेकण्ड बाद ही आकाश में फट गया। इस घटना में सातों अंतरिक्ष यात्री मारे गए क्योंकि उनके बच निकलने का कोई रास्ता नहीं सोंचा गया था। स्पेस एजेंसी नासा के लिए यह हादसा एक काला अध्याय है। इस घटना में मानवीय भूल का पक्ष यह था कि ठंडे तापमान के आंकड़े नहीं जुटाए गए थे लिहाजा शून्य से नीचे तापमान में उड़ान भरने से उत्पन्न समस्याओ पर कंप्यूटर गौर नहीं कर पाया परिणाम स्वरुप करोडो डॉलर और कीमती जिंदगियां पल में खाक हो गई। 1990 और 2013 में इस विषय पर दो काल्पनिक फिल्मे बन चुकी है।  नासा ने इस पुरे घटनाक्रम की वास्तविकता को दर्शाने के लिए ' द चैलेंजर डिजास्टर (2019) को तकनीकी और तथ्यात्मक मदद उपलब्ध कराई है। 
जब तक मनुष्य है तब तक उससे गलतियाँ होती रहेगी। गलतियों से सीखकर ही मानव जाति अगली पीढ़ी के लिए बेहतर दुनिया बनाने का प्रयास करेगी। 

Sunday, July 21, 2019

( खल) नायक का उदय !

पिछले दिनों एक तेलुगु फिल्म के हिंदी रीमेक ने महज आठ दिनों में दो सौ करोड़ कमाई का रिकॉर्ड बना दिया। नशाखोरी ,महिला पात्र के प्रति अपमानजनक व्यवहार और अशालीन भाषा व् दृश्यों के बावजूद फिल्म को मिला  दर्शकों का समर्थन न सिर्फ चौंकाता है वरन चिंता भी पैदा करता है। क्या हम ऐसे समय की और बद रहे है जहाँ ' एंटी हीरो ' की भूमिका समाज में बगैर किसी किन्यु परन्तु के आत्मसात कर ली गई है ? फिल्म को मिले नेगेटिव रिव्यु के बावजूद थोक में दर्शक मिलना जताता है कि ' नकारात्मकता ' सामाजिक रूप से स्वीकारली गई है। लोगों को अपने नायक को गलत करते देखना अब कचोटता नहीं है।
हिंदी सिनेमा के कद्रदानों को भली भांति स्मरण होगा कि इस तरह की नकारात्मक भूमिका महान अभिनेता दादा मुनि अशोक कुमार ने काफी पहले पहली बार बुराइयों से भरे नायक के रूप में फिल्म ' किस्मत (1943) में निभाई थी। वे हिंदी फिल्मों के पहले ' एंटी हीरो ' माने जाते है। एंटी हीरो ' वह नायक होता है जिसमे परंपरागत प्रशंसनीय गुणों का सर्वथा अभाव होता है। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि हमारे माता पिता के दौर के नायक नायिकाओ से ये ठीक उलट होते है। उनके समय के नायक आदर्शवादी , मेहनत कश , नैतिक  मूल्यों और परम्पराओ का पालन करने वाले हुआ करते थे। बुरे कामों के लिए खल पात्र होता ही था।
सिनेमा और विज्ञापन की दुनिया प्रायः ' मिरर इमेज थ्योरी ' पर काम करती है। जो वर्तमान में  हो रहा है उसे कोई विषय बनाकर सिनेमा में प्रस्तुत कर दिया जाता है या फिल्म में दिखाए कथानक को  देखकर लोग उसे अनुसरण करने लगते है। हमारे मौजूदा समय में तलाक , बिखरते परिवार , आदर्शो का पिघलते जाना , भ्रष्टाचार   के प्रति संवेदनशून्यता जैसे माहौल ने यह महसूस कराना आरंभ कर दिया है कि कोई भी पूर्ण नहीं है। इसी विचार ने हमें चारित्रिक कमियों वाले नायको को पसंद करने के लिए प्रेरित किया है। यह भी उल्लेखनीय है कि जितने भी नायकों ने परम्परागत बायक के मुखोटे को उतार कर ' एंटी हीरो ' बनने का दुस्साहस किया है उन्हें अप्रत्याशित सफलता मिली है। दादा मुनि के नकारात्मक भूमिका निभाने के 14 बरस बाद सुनील दत्त ने ' मदर इंडिया (1957) में व्यवस्था से उपजे आक्रोश के चलते डकैत की भूमिका निभाई थी। बाद के वर्षों में वे ' मुझे जीने दो (1963) एवं  ' 36 घंटे (1974) में भी घुसर चरित्र निभाते नजर आये। ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार ने अपनी फिल्म ' गंगा जमुना (1961) से दो भाइयों की कहानी का चलन आरंभ किया।  इस तरह की कहानी में एक भाई विरोधी खेमे में खड़ा होकर नायक की राह में रोड़े  अटकाता  है।। एंटी हीरो को ग्लैमर दिया महानायक अमिताभ ने।  सत्तर के दशक में आयी ' शोले (1975) ऐसे नायको को हमसे परिचित  कराती है जिनमे दुर्गुणों की भरमार है। चूँकि वे गाँव की रक्षा करने आये है तो गाँव वालों के साथ दर्शक भी उन्हें सर माथे बिठा लेते है। शोले देखते हुए हमें अचानक से महान जापानी फिल्मकार अकीरो कुरोसावा की क्लासिक ' सेवन समुराई (1955) याद आजाती है जिसमे समाज से बहिष्कृत सात गुंडे गाँव वालों को डाकुओ के प्रकोप से मुक्ति दिलाते है। एंटी हीरो को एक नई ऊंचाई अमिताभ ने अपनी फिल्म ' डॉन (1978) से दी। उनका यह नेगटिव किरदार इतना लोकप्रिय हुआ कि  एक समय उनके घोर आलोचक शाहरुख़ ' डॉन ' के रीमेक में नायक बनकर आये।यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि  शाहरुख़ के कैरियर को गति देने में ग्रे -शेड्स की भूमिकाओं का अहम् योगदान है। उनकी 'डर (1990) बाजीगर (1993) अंजाम (1994 ) जैसी फिल्मों की वजह से ही दर्शकों ने उन्हें पसंद करना शुरू किया है।
सौरभ शुक्ला और अनुराग कश्यप द्वारा लिखी कहानी पर रामगोपाल वर्मा निर्मित ' सत्या (1998) मनोज बाजपेयी को रातो रात सितारा हैसियत दिला देती है। ऐसा ही कुछ सैफ अली के साथ ' ओंकारा (2006) में होता है।  शेक्सपीअर के नाटक ओथेलो पर आधारित इस फिल्म के नायक ' लंगड़ा त्यागी ' को भला कौन भूल सकता है।
नकारात्मक भूमिकाओं से 'लाइम लाइट ' जल्द मिलती है -यह सोंच देसी विदेशी दोनों ही तरफ  के नायक नायिकाओ को लुभाती रही है। कई बुराइयों और खामियों वाले हीरो आम दर्शको को लगातार प्रभावित कर रहे है। पूर्ण कोई नहीं है -यह विचार दर्शक को सीधे अपने नायक से जोड़ देता है लिहाजा  नायक और  उसकी फिल्म दोनों ही चल पड़ते है।  

पिता पुत्र के रिश्तो पर प्रभावशाली फिल्म

 मनोहर श्याम जोशी ने फिल्मों के कथानक की खोज के संबंध में दिलचस्प बात कही थी कि अक्सर कहानियों का जन्म किसी आइडिया से होता है। कोई सवाल दिमाग में लहराता है कि ऐसा होता तो क्या होता ? वे बात को आगे बढ़ाते हुए कहते है कि अक्सर एक आइडिया से दूसरा आईडीया निकलता है। और कभी कभी दो आइडिया जोड़ देने पर तीसरा आइडिया निकल आता है। कभी  किसी आइडिया को उलट देने पर भी कोई नया आइडिया निकल आता है। 
                          अपनी युवा अवस्था में ' मदर इंडिया ' देखते हुए निर्माता निर्देशक रमेश सिप्पी को विचार सुझा कि जिस तरह मदर इंडिया ' माँ बेटो के संबंधों पर आधारित आदर्शवादी फिल्म थी उसी प्रकार आदर्शवादी पिता और उसके गुमराह बेटे के कथानक पर आधारित फिल्म बनाई जानी चाहिए। समय के प्रवाह के साथ यह विचार उनके मानस में बना रहा। उनकी निर्देशित  ' शोले ' की घनघोर सफलता के बाद और ' शान ' की नाकामयाबी के साथ उस विचार ने एक बार फिर जोर मारना आरंभ किया।  अब तक उनके पास सिर्फ आइडिया था कहानी नहीं थी। इसी दौरान तमिल महानायक ' शिवाजी गणेशन की एक फिल्म ने उन्हें प्रभावित किया और उस फिल्म के अधिकार खरीद लिए गए। लेखक जोड़ी ' सलीम जावेद ' ने भी फिल्म को देखा लेकिन  उन्हें सिर्फ उसका अंत प्रभावित कर पाया जहाँ  एक आदर्शवादी पिता अपने अपराधी पुत्र को जान से मार देता है ! इसी एक लाइन को पकड़ कर कहानी लिखी गई जिसने 1982 की सर्दियों में सिनेमाघर का मुंह देखा। फिल्म थी ' शक्ति ' ! समय के गलियारों में गुम हो जाने के बाद भी कुछ फिल्मे कुछ विशेष कारणों से दर्शकों की स्मृतियों में बनी रहती है। ' शक्ति ' को याद रखने की भी ऐसी ही वजहें है। हिंदी फिल्मों के इतिहास में यह दूसरी बार हुआ था जब बुजुर्ग होती पीढ़ी का पसंदीदा नायक और युवा पीढ़ी का लोकप्रिय नायक एक साथ नजर आये थे। दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन इस फिल्म में पहली और आखरी बार साथ काम कर रहे थे। पहली बार इसी तरह का संयोग ' मुगले आजम ' में बना था जब पृथ्वीराज कपूर और दिलीप कुमार पिता पुत्र के रूप में आमने सामने आये थे। 
इस फिल्म को इस लिहाज से भी याद किया जाता है कि भारतीय सिनेमा  के  लिए झकझोर देने वाले कथानक लिखने वाली सफल  लेखक जोड़ी ' सलीम जावेद ' शक्ति के बाद जुदा हो गए थे। 
निर्देशक रमेश सिप्पी  इस फिल्म को एक अलग ही स्तर पर ले जाना चाहते थे लिहाजा इसकी कास्टिंग में ही चौकाने वाले तत्व डाले गए। शान ' के खलनायक कुलभूषण खरबंदा इस फिल्म में अमिताभ पर स्नेह लुटाते नजर आये वही ' कभी कभी ' में अमिताभ की प्रेमिका बनी राखी यहाँ उनकी माँ के किरदार में थी। यह तथ्य भी दिलचस्प है कि अमिताभ की लोकप्रियता को देखते हुए उनके इस फिल्म में होने की कल्पना भी नहीं की गई थी। संपूर्ण फिल्म दिलीप कुमार के चरित्र को ध्यान में रखकर लिखी गई थी और उनका रोल वजनदार भी था। राजबब्बर ने स्क्रीन टेस्ट दिया परंतु वे फ़ैल हो गए।  जब यह खबर अमिताभ तक पहुंची तो उन्होंने खुद आगे बढ़कर इस फिल्म से जुड़ने की मंशा जाहिर की , जिसे सहर्ष स्वीकार कर लिया गया। 
कथानक को आगे बढ़ाने के लिए शक्ति में सिर्फ चार गाने पिरोये गए थे जिन्हे आनद बक्षी ने शब्द दिए थे। फिल्म का संगीत आर डी बर्मन का था और आवाजे थी लता मंगेशकर , किशोर कुमार  और  महेंद्र कपूर की। चार गीतों में से दो गीत ' हमने सनम को खत लिखा ' एवं  ' जाने कैसे कब कहाँ इकरार हो गया ' आज भी बजते सुनाई देते है। पिता  पुत्र संबंधों पर अनेकों फिल्मे बनी है परंतु इस फिल्म में उनके बीच भावनाओ की तीव्रता बखूबी महसूस की जा सकती है। बॉक्स ऑफिस पर शक्ति का प्रदर्शन उम्मीद भरा नहीं था लेकिन समालोचको से इसे काफी सराहना मिली थी। यह तथ्य फिल्म फेयर अवार्ड्स में भी नजर आया। शक्ति ने चार अवार्ड बटोरे। बेस्ट फिल्म , बेस्ट साउंड  एडिटिंग , बेस्ट एक्टर ( दिलीप कुमार ) एवं बेस्ट स्क्रीनप्ले। यधपि अमिताभ भी बेस्ट एक्टर केटेगरी में नॉमिनेट हुए थे परन्तु उन्हें खाली हाथ घर लौटना पड़ा !
 फिल्म में स्मिता पाटिल और अमरीशपुरी की भी प्रभावशाली भूमिका थी। उल्लेखनीय था अनिल कपूर का छोटा सा रोल जिसमे वे अमिताभ बच्चन के पुत्र के रूप में दिलीपकुमार के साथ स्क्रीन शेयर करते नजर आये थे। तब तक अनिल कपूर की कोई भी हिंदी फिल्म बतौर नायक नहीं आई थी। 
आश्चर्य की बात है कि रीमेक बनाने वालों की नजर इस फिल्म पर आज तक नहीं पड़ी है ! 

Wednesday, April 24, 2019

सांवला सलोना है

बाजार अपना विस्तार कर चूका है। बाजार अब बाजार से  निकलकर हमारे घरों तक आ  पहुंचा है। बाजार अपनी यात्रा में सबसे पहले जिसे कुचलता है वे मानवीय संवेदनाएं ही होती है। घटना उत्तर प्रदेश के एक शहर की है। एक महिला ने अपने से उम्र में दो वर्ष बड़े पति को सिर्फ इस बात के लिए जिंदा जला दिया कि उसका रंग सांवला था ! भारतीयों की  गोरेरंग के प्रति आसक्ति की यह पराकाष्टा है। चुनाव के हल्ले में राष्ट्रिय स्तर के समाचार पत्र में अंतिम पेज पर छपी यह लोहमहर्षक खबर अगर समाज को आंदोलित नहीं करती तो मान लेना चाहिए कि संवेदनाएं शून्य हो चुकी है। 
ऐतिहासिक संदर्भ बताते है कि ' गौरवर्ण ' के लिए हमारा उतावलापन न केवल विदेशियों के हम पर ढाई सौ बरस शासन का परिणाम है वरन हमारे अवचेतन में भी इस तथ्य का गहरे से उतर जाना है कि गौरवर्णीय लोग ज्यादा बुद्धिमान , ज्यादा साहसी और ज्यादा समझदार रहे है। अंग्रेजों की बिदाई के बाद जैसे ही हमारे बाजार विकसित होने लगे हमारे सामने रूसी थे। शासक अंग्रेजों के बाद सहयोगी रुसी भी सुर्ख गोरे थे। जिस ब्रिटिश  शासन और अत्याचारों से हमें नफरत थी उनके रंग से हमें प्यार हो गया था।  बाजार ने यह बात गहरे तक उतार दी है कि सांवला रंग हीन  भावना और समाज के निम्न स्तर का प्रतिनिधित्व करता है। अगर जीवन में कुछ करना है तो वह गोरे  रंग की वजह से ही संभव हो पाएगा। अगर आपका रंग गेहुआ है तो उसे बदले बगैर आप आगे नहीं  बढ़ सकते।  
हमारी इसी कमजोरी को भुनाने के लिए 1978 में बहुराष्ट्रीय कंपनी यूनि लीवर ने एक प्रोडक्ट बाजार में उतारा जिसका नाम था  ' फेयर एंड लवली ' .  गुजरे चालीस वर्षों से यह क्रीम गोरेपन को बेच रही है। इसका उपयोग कर कितने सांवले गोरे हुए इसका स्पस्ट आंकड़ा कंपनी के पास भी नहीं है। सत्ताईस अरब का व्यवसाय करने वाली यह क्रीम प्रतिवर्ष अठारह प्रतिशत की वृद्धि के साथ हिन्दुस्तानियो को गोरे रंग के सपने बेच रही है। भारत में हर वर्ष 233 टन त्वचा को गोरा बनाने वाली क्रीम की खपत होती है। कोक और पेप्सी से कही ज्यादा खर्च हिन्दुस्तानी अपने चेहरे के लिए कर रहे है !
 देश के अधिकांश अखबारों में रविवार को प्रकाशित होने वाले वैवाहिकी विज्ञापन हमारे अवचेतन में जमी लालसा का ही विस्तार नजर आते है। कोई भी विज्ञापन उठा लीजिए सभी विवाह योग्य लडकियां श्वेतवर्ण की ही होती है वही वधु चाहने वाले सारे वर ' फेयर कॉम्प्लेक्शन ' को ही वरीयता देते नजर आते है। ऐसे में उत्तर प्रदेश जैसी घटना की पुनरावर्ती हो जाए तो उसे क्षम्य नहीं माना जाना चाहिए ? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाहरी रंग और  आवरण से ज्यादा  व्यक्ति का चरित्र और स्वभाव महत्वपूर्ण होता है। शक्ल सूरत से  ज्यादा टिकाऊ सीरत रही है। 
 बहुसंख्यक समाज की  मानसिकता को बदल देने में बाजार की  शक्तियां किसी भी हद तक जा सकती है। मौजूदा समय में फ़िल्मी सितारे और नामचीन क्रिकेटर भी इस तरह के प्रोडक्ट के लिए विज्ञापन करते नजर आ रहे है। अधिकांश विज्ञापनों का  संदेश स्पस्ट होता है कि इसे आजमा कर उनका आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे हर नामुमकिन काम कर सकेंगे। यकीन नहीं होता है कि कोई खुलेआम भ्रम बेच रहा है और समझदार उसे खरीद भी रहे है। 
देश में चल  रंगभेद पर सबसे पहले फिल्मकार अभिनेत्री नंदिता दास ने आवाज उठाई थी। उन्होंने बाकायदा एक अभियान ' सांवला सलोना है ' ( द डार्क इस ब्यूटीफुल ) के माध्यम से त्वचा के आधार पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ आरम्भ किया था। सांवले रंग के लोगों को नीचा दिखाने और उन्हें कमतर साबित करने वाले विज्ञापनों के विरुद्ध इस अभियान ने ' एडवरटाइजिंग स्टैण्डर्ड कॉउंसिल ' को अपनी आपत्ति भी दर्ज कराई। जवाब में कॉउन्सिल ने  विज्ञापनों के लिए एक गाइड लाइन जारी कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली । भ्रामक और नस्लभेदी विज्ञापन आज भी बदस्तूर जारी है । 
यद्यपि चुनिदा ही सही कुछ सितारे इस विषय की गंभीरता को समझ कर और लुभावनी रकम ठुकरा कर गोरा बनाने वाली क्रीम का विज्ञापन करने से इंकार कर चुके है । उल्लेखनीय सितारों मैं रणवीर कपूर , रणदीप हुड्डा , कंगना राणावत और अनुष्का शर्मा प्रमुख नाम है । 
निसंदेह गोरे रंग का प्रचार करने में फिल्मो की अहम भूमिका रही है । हिंदी फिल्मों के अधिकांश गीत गोरे रंग का ही महिमा मंडन करते रहे है ।आर्क लाइट में दमकते नायिका के सौंदर्य ने देश की नवयुवतियों को वैसा ही बनने के लिए प्रेरित किया है । परंतु एक अपवाद भी है । गोरे रंग के हल्ले के बावजूद  1963 में बनी ' बंदिनी ' के एक गीत ' मोरा गोरा रंग लेइले , मोहे श्याम रंग दयीदे ' गा कर सांवली हो जाने की गुजारिश करती महान नूतन इकलौती नायिका नजर आती है। 

Thursday, April 11, 2019

सीमेंट की दरारों में उगा पीपल

जीवन सरल है या वजन है ? यह हमारी सोंच से तय होता है। सकारात्मक सोंच हमारी जीवन यात्रा की लय बदल सकती है। यधपि जीवन अनिश्चित है परन्तु यह पूरी तरह हम पर निर्भर है कि इसकी  बिखरी लड़ियों को समेट कर इसे संगीत की स्वरलिपि बनाये या डरावने सिस्मिक ग्राफ की शक्ल देवे। लेखक और साहित्यकार सरदार  खुशवंत सिंह ने सफल  जीवन जीने के कुछ सूत्र अपने अनुभव से विकसित किये थे। उनके सूत्रों में उल्लेखनीय थे -बचत की आदत डालना , गुस्सा नहीं होना , जीवन में समझदार जीवन साथी या दोस्त का हमेशा होना , जो आगे निकल गए उनसे ईर्ष्या नहीं करना और मन रमाने के लिए एक शौक जरूर होना। बेबाक बाते कहने के लिए मशहूर खुशवंत सिंह के जीवन में ये सारी बाते स्पस्ट झलकती थी। दुनिया में  कभी पहले या दूसरे नंबर के अमीर रहे विख्यात निवेशक वारेन बफे का मूलमंत्र था ' कभी क्रेडिट कार्ड का उपयोग मत करो ' महज तेरह  वर्ष की उम्र में स्टॉक मार्केट का रुख करने वाले बफे आज भी अपने पुश्तैनी घर में ही रहते है। बगैर तड़क भड़क के जीवन जीना भी एक मिसाल हो सकता है यह वारेन बफे से सीखा जा सकता है। पैसा साधन है साध्य नहीं , यह बात भी वारेन बफे और बिल गेट्स ने अपनी सम्पति का बड़ा हिस्सा परमार्थ में लगाकर दुनिया को दिखाई।    
जीवन को अलग नजरिए से देखना भी एक कला है जिसे थोड़े से प्रयास से आत्मसात किया जा सकता है। सिनेमाई इतिहास की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक ' फारेस्ट गंप ' का नायक आम लोगों से थोड़ा ' धीमा ' है। वह
मानसिक रूप से कमजोर है परन्तु अपने आसपास के लोगों के सिर्फ सकारात्मक पहलुओं को ही देखता है। वह उनके बाहरी रूप पर कोई राय नहीं बनाता , वे जैसे है उसी रूप में उन्हें स्वीकारता है।  वह चाहता है कि दुनिया में कोई किसी का शोषण न करे ! 
स्टीव जॉब ने जिन विकट परिस्तिथियों में अपने कैरियर की शुरुआत की थी वैसे हालात लगभग  सभी की जिंदगी में आते है। कुछ लोग धैर्य बनाये रखते हुए अपने व्यवहार को संतुलित रखते है परंतु कुछ झुँझला जाते है। झुंझलाहट दरअसल अधीरता की निशानी है जिसके बढ़ने का मतलब है कि वह व्यक्ति अपनी सरलता को खोता जा रहा है। एक बार यह चक्र आरंभ हुआ तो आप नैसर्गिकता से दूर होते जाते है जो  सफल जीवन की अनिवार्यता है। 
                 सरल और सकारात्मक दृष्टिकोण  से ही रोजमर्रा के जीवन में खुशियां आती है। हमें यह बात मानकर चलना चाहिए कि खुशियां यु ही रास्ते में पड़ी हुई नहीं मिलती, या तो उन्हें कमाना पड़ता है या फिर उनके लिए कुछ  कीमत अदा करनी होती है। हमने सीमेंट की दरारों में पीपल को पनपते देखा है। विपरीत परिस्तिथियों में खुद को थामे रखना आसान नहीं है। परंतु जो ऐसा कर जाते है वे ही जीवन की सुंदरता का आनंद ले पाते है।  एक और कालजयी फिल्म ' परसुइट ऑफ़ हैप्पीनेस ' का  नायक क्रिस गार्डनर अकल्पनीय मुश्किल स्थितियों के बावजूद जिस तरह संयत रहता है वह प्रेरणादायी है। पत्नी उसे इसलिए छोड़ देती है कि उसका जॉब अच्छा नहीं है।पत्नी के साथ ही घर और कार भी चली जाती है।  छे वर्ष के बेटे की जिम्मेदारी के साथ उसे  काम भी तलाशना है  और रात को सोने के लिए आसरा भी ढूँढना है लेकिन क्रिस हार  नहीं मानता उसे दुनिया से ज्यादा खुद पर विश्वास है। अपनी छोटी छोटी सफलता को वह उत्सव की तरह मनाता है।   वास्तविक कथानक पर आधारित यह फिल्म जीवन के कई सबक एक साथ दे जाती है। भविष्य अनिश्चित है , नयी शुरुआत करने की कोई निश्चित उम्र नहीं है , जब तक आप प्रयास करना नहीं छोड़ते उम्मीद आपका दामन थामे रहती है - इन सबसे गुजरकर जो भाव हमें महसूस होता है वही सफल जीवन है , वही खुशियां है , यह वही है जिसकी सबको तलाश है। 

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...