Wednesday, February 20, 2019

गर फिरदौस बर रुए जमीं अस्त ..!



पुलवामा की घटना के बाद माहौल में है -  शोक ! निराशा !  नाराजगी ! और स्तब्धता ! यह मान लिया गया था कि सब कुछ ठीक है। सुरक्षाबलों की नियमित चलने वाली  कार्रवाई से ढाई सौ दशहत गर्दों को परलोक रवाना कर दिया गया था। कश्मीर शांत लगने लगा था। परन्तु यह तूफ़ान के पहले की शांति थी। एक ऐसी पटकथा लिखी जा रही थी जिसके जख्म जल्दी नहीं भरने थे। लगभग ऐसा ही हुआ जैसा आतंक के रहनुमाओ ने सोंचा था। कश्मीर की फ़िज़ाए हमेशा की तरह मनभावन थी। वातावरण में कोहरा और पार्श्व में आसमान छूते चिनार के दरख़्त। कोई और समय होता तो इस पल ली हुई सेल्फी जीवन भर अलबम के साथ यादों में दर्ज रहती। परन्तु ऐसा बिलकुल नहीं था। यह एक स्वप्न के टूटने की तरह था। जिस वाहन में जवान थे वह विस्फोट के बाद स्टील  की टूटी फ्रेम के ढेर में बदल चूका था। चवालीस बदन बिखर चुके थे। जिस किसी ने भी इस दृश्य को अपने टेलीविज़न  स्क्रीन पर देखा है उसके मानस में यह पल एक दुःस्वप्न की तरह टंक गया है। 
सोशल मीडिया और मुख्यधारा के मीडिया पर इस नृशंस नरसंहार के विरोध में गुस्सा महसूस किया जा सकता है । देश का साधारण नागरिक भी अपने सुझाव इस उम्मीद से सरकार की तरफ  सरका रहा है कि कैसे
करके भी इस समस्या का समाधान होना चाहिए। इस समाधान के लिए कुछ अलग तरह की सोंच और कड़े कदम उठाये जाने चाहिए। हम मानकर चलते है कि आतंक की सभी घटनाओ में  पाकिस्तान का अदृश्य हाथ मौजूद रहा है । हमें यह भी मान लेना चाहिए कि पाकिस्तान कभी भी अपनी प्रवृति नहीं बदलने वाला है। भले ही आप कितनी ही सदाशयता दिखालो वह अपना स्वभाव नहीं  बदलने वाला। हमें इसी बिंदु से अपनी रणनीति की शुरुआत करनी होगी। 
लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ' गेम ऑफ़ थ्रोन ' की कई समानांतर कहानियों में से एक कहानी की नायिका सांसा स्टार्क नेत्रहीन है।  एक दृश्य में खलनायिका सांसा को लकड़ियों से पीटती है। निरीह सांसा उससे जान की भीख मांगते हुए कहती है - कम से कम मेरे अंधेपन पर तो रहम करो , में अपना बचाव भी नहीं कर सकती। खलनायिका वास्प का जवाब होता है ' तुम्हारा अंधापन तुम्हारी समस्या है ! मेरी नहीं ! पाकिस्तान तो अपने मंसूबे हर हाल में पुरे करेगा ही , हमें ही  सजग रहकर उसकी चाल को निष्फल करना है। 
हमें याद रखना चाहिए कि एक जमाने में पंजाब भी कुछ इसी तरह से आतंक के चुंगल में था। उसका समाधान पंजाब में ही तलाशा गया था।  हमेशा की तरह सरहद पार से खालिस्तानियों को दाना पानी मिलता रहा था। जब भारत अफगानिस्तान में तालिबान से बातचीत के अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों को समर्थन देता है तो भारत सरकार कश्मीर पर बात करने से क्यों घबराती है। भारत सरकार को उतरी आयरलैण्ड से सबक लेना चाहिए जिसने हिंसक हो जाने की हदे पार करदी थी। ब्रिटेन सरकार ने इस समस्या को सौहाद्रपूर्ण तरीके से ही सुलझाया था। कश्मीर समस्या का हल कश्मीर से ही निकलेगा।वहां हुर्रियत जैसा राजनीतिक समूह और
मजबूत सिविल सोसाइटी के लोग भी है जिन्होंने इस विवाद पर शांतिपूर्ण पहल की है।  अब तक की समस्त  सरकारों ने मान लिया था कि आतंक को खत्म करने के लिए आतंकियों का सफाया जरुरी है। इस नीति ने आतंकियों को तो कम किया परन्तु भारतीय फौज का भी काफी  नुक़सान किया लेकिन  नए हथियार उठाने वालों को हतोत्साहित नहीं कर पाये।   
कश्मीर चुनावी समस्या नहीं है जिसे चुनाव बाद हाशिये पर रख दिया जाए। न ही इसे किसी युद्ध से सुलझाने की जोखिम ली जा सकती है। भारत पाकिस्तान दोनों का ही परमाणु संपन्न होना युद्ध को किस विस्फोटक अंत की और ले जा सकता है , सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। मोस्ट फेवर्ड नेशन ' का दर्जा पाकिस्तान से वापस लेकर भारत ने देर से ही सही, एक सही दिशा में कदम उठाया है। अब इसे आतंकवादी राष्ट्र घोषित करने का साहस और कर लेना चाहिए। यह न हो सके तो  कम से कम सिंधु जल संधि को ही निरस्त कर देना चाहिए। जब तक आप अपनी ताकत नहीं दिखाएंगे तब तक कमजोर ही समझे जायेगे।  
भारत के नेताओ को एक बात और समझ लेनी चाहिए कि ' शी जिनपिंग ' को झूला झुलाने , नवाज शरीफ के पारिवारिक विवाह में बिन बुलाये  शामिल  होने या डोनाल्ड ट्रंप से गले मिलना  उन्हें ख़बरों में तो ला देता है परन्तु कूटनीतिक बढ़त नहीं दिलाता है। 
सनद रहे ! 1989 से 2018 तक 47000 लोग कश्मीर में आतंकवाद का शिकार हो चुके है। गायब हुए या पलायन कर गए लोगों की संख्या इसमें शामिल नहीं है। मानवाधिकार संगठन इस संख्या को तिगुनी बताते है। नरक बन चुके इस राज्य को मुख्यधारा में लाने के लिए कड़े कदम उठाने ही होंगे।
  बहादुर शाह जफ़र ने कश्मीर के लिए  कभी फ़ारसी में  यु ही नहीं कहा था ' गर फिरदौस बर रुए जमीं अस्त , हमीं अस्त ओ हमीं अस्त ओ ! ( धरती पर कही स्वर्ग है तो वह यही है यही है ) अपनी जन्नत में आग लगाने वालों को हम माफ नही करेंगे । अपने सुरक्षाबलों के जीवन की रक्षा के लिए हर मुमकिन ताकत का इस्तेमाल करेंगे !   यह संकल्प सरकार का भी है और इस देश के आम नागरिक का भी ! 

Wednesday, February 13, 2019

अभिनय की आधी सदी : अमिताभ बच्चन

तारीखों के साथ घटनाएं न जुडी हो तो वे सिर्फ कोरी  तारीख ही रहती है। किसी प्रसंग के जुड़ने से तारीखे  इतिहास बन जाया करती है। 15 फरवरी एक ऐसी ही तारीख है जिसने अमिताभ बच्चन की जिंदगी तय कर दी थी। अमिताभ अपनी अच्छी भली नौकरी छोड़ ख्वाजा अहमद अब्बास के दर पर इस उम्मीद से पहुंचे थे कि यहाँ जरूर काम मिल जाएगा।  परन्तु इतना आसान नहीं था। ख्वाजा साहब ने उन्हें यह कह कर लौटा दिया कि साहबजादे ! पहले अपने वालिद से फिल्मों में काम करने के लिए  लिखित अनुमति की चिट्ठी लेकर आओ। चिट्ठी आई और अमिताभ नाम मात्र की फीस पर ' सात हिन्दुस्तानी ' के लिए अनुबंधित कर लिए गए। तारीख थी 15 फ़रवरी 1969 ! महानायक 15 फ़रवरी 2019 को फिल्मोद्योग में अपनी अभिनय यात्रा के  पचास वर्ष पूर्ण कर रहे है।  
परदे पर आने से  पहले मृणाल सेन उनकी आवाज भुवन शोम ' में उपयोग कर चुके थे । यह वही आवाज थी जिसे आल इंडिया रेडियो ने खारिज कर दिया था । यहां अमीन सयानी ने अमिताभ को पीछे छोड़ कर एनाउंसर की नॉकरी हासिल की थी । ' जुरासिक पार्क ' में सैम निल एक जगह कहते हैं ' जिंदगी अपना रास्ता ढूंढ लेती है ' अमिताभ के संदर्भ में आज हम कह सकते हैं कि नियति अपना रास्ता तलाश लेती है ।  उस दौर की परिस्थितियों का  अगर आज आकलन किया जाय तो समझ आता है कि कायनात उन्हें सफल और लोकप्रिय  होते देखना चाहती थी ! 
' सात हिन्दुस्तानी ' शुरुआत थी एक बड़े सफर की जिसमे आगे कई उतार चढ़ाव आना थे। अगली ही फिल्म में वे उन लोगों के साथ काम कर रहे थे जो उस दौर के बड़े नाम थे।  वहीदा रहमान की सुंदरता पर मोहित अमिताभ को ' रेशमा और शेरा ' में अपनी चहेती  नायिका के साथ एक ही फ्रेम में आना पुरूस्कार से कम नहीं था। आज भी जब  उनसे दुनिया की सबसे सुंदर महिला का नाम पूछा जाता है तो वे आदर के साथ वहीदा रहमान का ही जिक्र करते है।
 ' आनंद ' का घटना इस लिहाज से भी  महत्वपूर्ण था कि यह  ऋषिकेश मुखर्जी जैसे निर्देशक के साथ नये रिश्ते की नींव रखने की शुरुआत थी जिसकी वजह से अमिताभ की कुछ कालजयी फिल्मे इस दौर में सामने आई। साथ ही सामने आया अमिताभ का भावप्रणय अभिनय। वक्त के कई मुकाम ऐसे भी आये जब अमिताभ अपनी राह से भटकने लगे या यह कहे कि ' एंग्री यंग ' के मुखोटे ने उनकी ' इंटेंस एक्टिंग ' पर ग्रहण लगा दिया तब तब उनके लिए दुआ की जाने लगी कि उन्हें ऋषि दा जैसे निर्देशक के यहाँ हाथ जोड़कर काम माँगना चाहिए। ऋषिकेश मुखर्जी इकलौते निर्देशक थे जिन्होंने बच्चन जी को दस फिल्मों में निर्देशित किया था। इन सभी फिल्मों की विशेषता थी शानदार कहानी , लाजवाब अभिनय और मीनिंगफुल माधुर्य से सजे गीत। उनकी लोकप्रिय ब्लॉकबस्टर से उलट इन फिल्मों में  वे  किसी खलनायक की कुटाई पिटाई करते नजर नहीं आते। समय के बहाव और उनकी मेहनत से  गढ़ी छवि ने बाद के वर्षों में अभिनय की इस रेंज को लील लिया। यधपि उनके इंटेंस अभिनय के शेड  रह रहकर सामने आते रहे है , फिर चाहे  वे ' ब्लैक ' के देवराज सहाय के रूप में हो या ' पा ' के आरो के रूप में  या ' सरकार ' के सुभाष नागरे के रूप में।शुक्र है !  जब जब सितारा अमिताभ उन पर हावी होने लगता है तब तब अभिनेता अमिताभ उन्हें आलोचना से बचाने सामने आ जाता है। 
सलीम खान ने ' जंजीर ' लिखी थी और क्रेडिट्स में जावेद अख्तर का नाम दिया । इस लेखक जोड़ी ने राजेश खन्ना की ' हाथी मेरे साथी ' भी लिखी थी। समय का यह ऐसा दौर था जब राजेश खन्ना खुद  को भगवान मान चुके थे और  निसंदेह वे लोकप्रियता के आसमान पर थे । उनके अहं की कोई इंतेहाँ नहीं थी। काका के अहंकार ने सबसे पहले सलीम जावेद को आहत किया था। इस घटना के बाद इन दोनों ने तय कर लिया कि वे बच्चन को खन्ना से बड़ा स्टार बनायेगे। समस्या यह थी कि सत्तर के दशक का कोई भी अभिनेता इस फिल्म को करने को राजी नहीं था धरमजी , देव साहब , राजकुमार तो दूर नवीन निश्चल जैसे एक्टर भी इस कहानी का हिस्सा बनने को तैयार नहीं थे। चरित्र अभिनेता प्राण और ओमप्रकाश की सिफारिश पर अनमने मन से प्रकाश मेहरा ने ' जंजीर ' बनाई।  बस उसके बाद का इतिहास बताने की जरुरत नहीं है। 


 सलीम जावेद की जोड़ी ने अमिताभ बच्चन के लिए अपनी पार्टनरशिप शुरू की थी और उनके लिए ही लिखी स्क्रिप्ट को लेकर मतभेद के चलते उसे ख़त्म किया। ' मि इंडिया ' की पटकथा अमिताभ को ध्यान में रखकर लिखी गई थी परन्तु उनके इनकार के बाद पनपी  गलतफहमियों ने इस सुपरहिट जोड़ी को अलग कर दिया।
  हरेक उतार के बाद जिस तरह अमिताभ ने वापसी की है यह उनके  सहज व्यक्तित्व की उपलब्धि रही है। लोग हमेशा जानने को उत्सुक रहे है कि क्या चीज है जो उन्हें अमिताभ बच्चन बनाती है। टूटकर भी न बिखरना उनके डी एन ए में ही घुला हुआ है संभवतः। डॉ हरिवंशराय बच्चन ने एक साक्षात्कार में अपने पुत्र के व्यक्तित्व को कुछ इस तरह परिभाषित किया था कि अमिताभ चीजों को गहराई तक उतर कर समझने की कोशिश करते है फिर वह चाहे आधुनिक कविता हो या जिंदगी , शायद इसीलिए वे हार नहीं मानते। यही समझ उन्हें उस समय और  परिपक्व बना देती है जब वे शादीशुदा होते हुए प्रेम करने का दुस्साहस कर बैठते है और बात बिगड़े उससे पूर्व अपने घर लौट आते है। 
अमिताभ के प्रशंसकों को अक्सर इस बात का गिला रहा है कि उनका इतना प्रभाव और पहुँच होने के बाद भी उन्होंने भारतीय सिनेमा के  ख्यातनाम निर्देशकों के साथ काम नहीं किया। यधपि उन्होंने अब तक दो सौ से अधिक फिल्मों में काम किया है परन्तु बिमल रॉय , बासु चटर्जी , राजकपूर , सत्यजीत रे एवं गुलजार   के साथ उनकी एक भी फिल्म नहीं है। गुलजार साहब ने तो कोशिश भी की थी परन्तु पटकथा से आगे बात नहीं बढ़ पाई। सत्यजीत रे उनके लिए फिल्म बनाना चाहते थे परन्तु संकोच के चलते पहल नहीं कर पाए। उन्होंने जया बच्चन को अपनी हिचकिचाहट कुछ इस तरह बताई थी कि ' में जमाई बाबू को लेकर एक फिल्म बनाना चाहता हु परन्तु उनकी मार्केट प्राइस अदा करने की मेरी हैसियत नहीं है !
 फोर्ब्स पत्रिका के धनाढ्यों की सूची में टॉप टेन में रहे अमिताभ अपनी सिनेमाई छवि में 'अभिजात्य विरोधी ' भूमिकाओं में ज्यादा सराहे गए। मेगा स्टार , मिलेनियम स्टार जैसे विशेषणों के बावजूद उनके पैर हमेशा  जमीन पर नजर आये है। के बी सी में सामान्य से प्रतियोगी को विशिष्ट होने का अहसास दिलाती उनकी ' बॉडी लैंग्वेज ' हो  या फिर उनके ब्लॉग पर आने वाले पाठकों को सहजता से  जवाब देने की शैली , उन्हें देश विदेश के आमजन में ऐसे ही लोकप्रिय नहीं बनाती। इन सबसे जुदा एक गुण जो उन्हें अपने समकालीन अभिनेताओं से अलग खड़ा करता है वह है अनुशासन ! काम के प्रति समर्पण ! फिल्मों से इतर जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी उनके इस गुण को सराहा अपनाया जाता है।  जनमानस में इतनी लोकप्रियता और स्नेह अन्य सितारों के लिए अब भी एक स्वप्न से कम नहीं है।
उनके लाखों प्रशंसकों की यही कामना है कि अपने हॉलीवुड के समकालीनों मॉर्गन फ्रीमेन , जैक निकोलसन , क्लिंट ईस्टवूड और रोबर्ट रेडफोर्ड की तरह वे नए चरित्रों में उतर कर सिनेमाई माध्यम को पचास साला सफर के बाद भी रोशन करते रहे। 

Saturday, February 9, 2019

बेगानी शादी का ऑस्कर


कई दशकों तक हम फिल्मे देखने वालों को ' ऑस्कर ' से लगाव नहीं था।  हम हमारे ' फिल्म फेयर ' से खुश थे। परन्तु 2001 में ' लगान ' का ऑस्कर की विदेशी भाषा श्रेणी में चयन होना हमारी महत्वकांक्षाओ को पंख लगा गया। यद्धपि ' लगान ' पिछड़ गई परन्तु हमारे फिल्मकारों को एक सुनहरा सपना दिखा गई। न सिर्फ फिल्मकार वरन आम दर्शक भी यही चाहने लगा कि लॉस एंजेलेस के कोडक थिएटर के रेड कार्पेट पर भारतीय अभिनेताओं को चहल कदमी करता देखे। इस दिवा स्वप्न के आकार लेने की एकमात्र वजह थी भारतीय फिल्मों को वैश्विक स्वीकार्यता मिलती देखने की लालसा क्योंकि भारत आज भी हर वर्ष  दुनिया भर में बनने वाली कुल फिल्मों की संख्या की आधी फिल्मे बनाता है। अगर संख्या के आधार पर ही ऑस्कर मिलता तो हम निश्चित रूप से सबसे आगे होते , बदकिस्मती से ऐसा संभव नहीं है। 
हमारे लिए यह जानना जरुरी है कि ' ऑस्कर ' सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी फिल्मों के लिए है। 1929 से आरम्भ हुए इस  फ़िल्मी पुरूस्कार में विदेशी भाषा की फिल्मों को शामिल करने की शुरुआत 1956 में हुई थी।  ठीक इसी के आसपास भारत में फिल्म फेयर अवार्ड्स शुरू हुए थे। 1958 में ' मदर इंडिया ' पहली भारतीय फिल्म बनी जिसे विदेशी भाषा श्रेणी में पुरुस्कृत होने का गौरव मिला था।  चूँकि नब्बे के दशक के आते आते टेलीविज़न ने सेटेलाइट के जरिये  अपना दायरा फैलाना आरम्भ कर दिया था तो ऑस्कर समारोह का प्रसारण अमरीकी महाद्वीप से निकलकर खुद ब खुद पूरी दुनिया को मोहित करने लगा था। भव्यता , अनूठापन , ताजगी और चकाचौंध से लबरेज यह समारोह दुनिया के साथ भारत को भी अपने आकर्षण में बाँध चूका था। देश में ऑस्कर को लेकर जूनून बढ़ने की एक वजह यह भी थी कि  नब्बे के दशक आते आते ' फिल्म फेयर ' अपनी साख गंवाने लगे थे। नए टीवी चैनल खुद अपने ही अवार्ड्स बांटने लगे थे। प्रतिभा और गुणवत्ता की जगह चमक धमक शीर्ष पर आगई थी। रेवड़ियों की तरह बटने वाले पुरुस्कारों ने फ़िल्मी पुरुस्कारों की विश्वसनीयता को धरातल पर ला दिया था। फिल्म फेयर की साख 1993 में उस समय रसातल में चली गई थी जब स्टेज पर  डिम्पल कपाड़िया ने बगैर लिफाफा खोले अनिल कपूर को बेस्ट एक्टर घोषित कर दिया था जबकि कयास आमिर खान के लगाए जा रहे थे।
   यद्धपि हालात आज भी ज्यादा नहीं बदले है। आज भी इन पुरुस्कारों को इतनी गंभीरता से नहीं लिया जाता जितनी उत्सुकता से ऑस्कर का इंतजार किया जाता है। भारत की और से अभी तक 50  फिल्मे इस समारोह में हिस्सा ले चुकी है। 2019 के लिए भारत की और से भेजी गई असमी भाषा की फिल्म ' विलेज रॉकस्टार ' इस क्रम में इक्क्यावनवी फिल्म थी जो अगले राउंड में जाने के लिए उपयुक्त वोट हासिल न कर सकी और बाहर हो गई। भारत की और से इस श्रेणी में भेजी जाने वाली फिल्मों का चयन भी उनके फ़ाइनल में न पहुँचने की बड़ी वजह रहा है। पक्षपात और अपनों को  उपकृत करने के खेल ने कई अच्छी फिल्मों को ऑस्कर नहीं पहुँचने दिया है। 
ऑस्कर के लिए भारत से भेजी जाने वाली फिल्मों का चयन फिल्म फेडरेशन ऑफ़ इंडिया द्वारा नियुक्त एक स्वतंत्र जूरी करती है जिसमे ग्यारह सदस्य है। यह जूरी कब फिल्मे देखती है और कब उनका चयन करती है यह बहुत बड़ा रहस्य है। क्योंकि फ़िल्मी दुनिया के वरिष्ठ और धाकड़ लोगों को भी ठीक ठीक पता नहीं है कि इस जूरी में कौन कौन लोग है। अतीत में जिस तरह की फिल्मे ऑस्कर के लिए भेजी गई है उससे इस चयन प्रक्रिया पर ही सवाल उठते रहे है। 1996 में इंडियन ' 1998 में ऐश्वर्या अभिनीत ' जींस ' 2007 में ' एकलव्य ' 2012 में ' बर्फी ' जैसे कुछ उदहारण है जो बताते है कि राजनीति और भाई भतीजावाद की भांग यहाँ भी घुली  हुई है। 
आगामी 24 फ़रवरी को जब समारोह पूर्वक ये पुरूस्कार वितरित किये जाएंगे तब हम सिने प्रेमी ' बेगानी शादी ' में ताकझांक करते शख्स की तरह टीवी पर नजरे गढ़ाए आहे भर रहे होंगे। हम और कर भी क्या सकते है ! 

Thursday, January 31, 2019

हथेली से फिसलती रेत को समेटती माधुरी



कुछ सौन्दर्य की देवियां ऐसी होती है जिनकी सुंदरता गुजरते समय के साथ और बढ़ती जाती है। सुंदरता का जिक्र होते ही सबसे पहले जो नाम जेहन में आता है वह सौम्य मधुबाला और शालीन स्मिता पाटिल का ही आता है।  हालांकि हरेक सिने  प्रशंसक के अपने अलग पैमाने होते है जिसके अनुसार वे अपनी पसंदीदा नायिकाओ को क्रम देते रहते है।  यधपि ये दोनों ही अभिनेत्रियां अरसा पहले इस दुनिया से अलविदा कह चुकी है परन्तु पहले सेलुलॉइड और अब डिजिटल स्वरुप  में अंकित होकर ये  अमर हो गई है। सुंदरता की आइकोनिक छवियों के चलते  इनकी फिल्मे देखते वक्त दर्शक एकबारगी तो इनके सौन्दर्य से अभिभूत हुए बगैर नहीं रहता। 
 नब्बे के दशक में अपनी शुरूआती असफल फिल्मों के बाद ' तेज़ाब ' से लाइम लाइट में आकर माधुरी दीक्षित ने अपना अलग ही मुकाम बनाना आरंभ कर दिया था। ऐसा भी नहीं है कि उन्हें एकदम खुला मैदान मिल गया था। उस दौर में चुलबुली जूही चावला , डिंपल गर्ल प्रिटी जिंटा , बार्बी डॉल का इंडियन अवतार ऐश्वर्या   अल्हड काजोल , निश्छल सौन्दर्य की मूर्ति मनीषा कोइराला , किसी भी हद तक जाने को तैयार ममता कुलकर्णी जैसी नायिकाएँ लगातार सफल फिल्मे देकर हिंदी भाषी दर्शकों के दिलों दिमाग पर अपनी जगह बना चुकी थी। तेज़ाब ' में उनपर फिल्माए गीत ' एक दो तीन चार  ने रातों रात उन्हें सफलता की कई  पायदान एक साथ फलाँगने में मदद की। फिल्म दर फिल्म माधुरी नृत्य , अभिनय और सौंदर्य की मिसाल बनती गई। फिल्म समीक्षकों ने उनमे मधुबाला और स्मिता पाटिल का मोहक कॉम्बिनेशन देखना आरंभ कर दिया। यह सच भी था। उनकी मुस्कान को भुवन मोहिनी मुस्कान कहा जाने लगा। उनके लावण्य का सुरूर सिर्फ दर्शकों को ही सम्मोहित नहीं कर रहा था वरन विश्वविख्यात चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन भी उन पर इस कदर आसक्त हुए कि वे उनकी कई पेंटिंग्स पर उकेरी गई।  हुसैन साहब यही नहीं रुके माधुरी को केंद्र में रखकर उन्होंने फिल्म ' गजगामिनी ' बना डाली। रंगों , नृत्य और ध्वनि की मोहक जुगलबंदी के बावजूद यह फिल्म सामान्य दर्शक के सर पर से निकल गई। 
 माधुरी के साथ शुरूआती दौर में एक और सुखद संयोग हुआ। तेज़ाब के सह नायक अनिल कपूर के साथ उनकी केमिस्ट्री इस कदर रंग लाई कि इस जोड़ी को सफलता का पर्याय मान लिया गया। इन दोनों को  पंद्रह फिल्मों में दोहराया गया । फिल्मफेयर पुरुस्कारों के लिए वे सोलह बार नामांकित हुई जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है। 
माधुरी न सिर्फ खुद शीर्ष सिंहांसन पर बैठने में सफल हुई वरन कई नायकों के लड़खड़ाते करियर को संवारने में भी उनकी मदद ली गई थी । महानायक अमिताभ   बच्चन की ' बड़े मियां छोटे मियां ' को सहारा देने के लिए माधुरी का  एक गीत विशेष रूप से फिल्म में जोड़ा गया था ,  कुमार गौरव की फिल्म ' फूल ' के लिए राजेंद्र कुमार ने माधुरी की कितनी मिन्नतें की थी , अनिल कपूर के छोटे भाई संजय कपूर के साथ फिल्म ' राजा ' की  नायिका बनने जैसे कई और उदहारण है जो अब फ़िल्मी इतिहास का हिस्सा हो चुके है। 
लाइम लाइट में रह चुके लोगों को अक्सर एक तकलीफ से गुजरना होता है। अतीत में वे जिस मुकाम पर थे अपनी वापसी पर उस जगह किसी और को बैठा पाते है। इसके बाद पुनः उनका नए सिरे से संघर्ष आरंभ हो जाता है। क्योंकि तब तक उनका प्रशंसक वर्ग किसी अन्य नायिका को सर माथे बिठा चूका होता है।  सफल वैवाहिक जीवन व्यतीत कर रही यह नायिका अमेरिका की चकाचौंध के बावजूद ' आर्क लाइट ' के दायरे को भूल नहीं पाई और शादी के सात वर्ष बाद ही सपरिवार मुंबई लौट आई। अपनी वापसी पर उन्होंने कुछ फिल्मे , कुछ टीवी शोज भी किये परन्तु बावजूद उनके परिपक्व सौंदर्य के वह जादू नदारद था जिसने एक समय उन्हें आसमान पर बैठा दिया था। 
उनकी कुछ सफल फिल्मों के निर्माता इंद्र कुमार ने ' धमाल ' सीरीज की तीसरी शीघ्र रिलीज़ होने वाली कॉमेडी  फिल्म ' टोटल धमाल ' में अनिल कपूर के साथ इस उम्मीद में पेश किया है कि शायद कोई चमत्कार हो जाए परन्तु ट्रेलर देखकर ही कई समीक्षकों ने इस संभावना को ख़ारिज कर दिया है।मान लिया जाना  चाहिए कि  माधुरी दीक्षित के लिए समय गुजर चूका है। 
सफल लोगों के मानस में गुजरे सुनहरे समय की स्मृतियाँ आसमानी बिजली की तरह रह रह कर कौंधती है। अतीत की तालियां और उनकी एक झलक के लिए लोगों की भीड़ की यादें न मालुम उनकी कितनी राते नींद के इंतजार में जाया करती होंगी उसका हिसाब उनसे बेहतर दूसरा नहीं रख सकता। सुखद स्मृतियों के दंश जब सामान्य मनुष्य को विचलित कर देते है तो शीर्ष से उतरे नायक की मनोस्थिति का कयास ही लगाया जा सकता है। छिटक चुके लम्हों को फिर से पकड़ने की उत्कंठा उन्हें कई लेवल नीचे जाकर काम करने को मजबूर कर देती है। बकवास फिल्म  का हिस्सा  बनने की माधुरी की मज़बूरी को इसी संदर्भ  में देखा जा सकता है।  

Monday, January 21, 2019

नजरअंदाज कलाकार

हालिया रिलीज़ फिल्म ' द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर  ' ने उन तमाम उम्मीदों पर पानी फेर दिया जिसकी आशंका जताई जा रही थी। सिनेमैटिक उत्कृष्टता के लिहाज से भले ही  फिल्म उस मुकाम पर नहीं पहुंची परन्तु शुरूआती उत्सुकता की वजह से इसने ने इतना मुनाफा अवश्य कमा लिया है कि निर्माता इसे सफल मान सकते है। लेकिन  सबसे ज्यादा नुकसान सिनेमाई  इतिहास का हुआ है जो एक अच्छे कथानकीय दस्तावेज से वंचित रह गया। फिर भी इस फिल्म के लिए  हमें इतना भी उदास होने की जरुरत नहीं है । हर विध्वंस में एक सकारात्मक बात अवश्य निकाली जा सकती है।  वैसे ही ' द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर '  के साथ भी एक उपलब्धि चस्पा हो गई है।   इस फिल्म को अपनी कास्टिंग , कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग एवं मेकअप के लिए सराहना मिली है। 
किसी भी फिल्म के ये कुछ ऐसे  पहलु होते है जिनपर अमूमन सामान्य दर्शक का ध्यान नहीं जाता है। इन पहलुओं को साधने वाले लोग इतने भी लोकप्रिय नहीं होते कि उनकी फोटो देखकर आम दर्शक उनसे तादतम्य स्थापित कर सके। आमतौर पर सफल फिल्म की प्रशंसा में ही इन लोगों की प्रशंसा छुपी होती है। द एक्सीडेंटल के मेकअप आर्टिस्ट श्रीकांत देसाई सतरह वर्षों से फिल्म इंडस्ट्री में काम कर रहे है। उनके उल्लेखनीय कामों में ' गैंग्स ऑफ़ वासेपुर (2012) कोर्ट (2014) मसान (2015) बॉम्बे वेलवेट (2015) राजी (2018) विशेष सराहनीय है। देसाई स्वयं को सटीकता का तरफ़दार बताते है।  उनका मानना है कि किसी ऐतिहासिक पात्र को स्क्रीन पर उतारने में सटीकता ही एकमात्र विकल्प है क्योंकि दर्शक के सामने अभिनेता , अभिनेता नहीं रह जाता पात्र जीवंत हो जाता है। देसाई बताते है कि डॉ मनमोहन सिंह के अवतार में आने के लिए अनुपम खेर को रोजाना एक घंटे मेकअप करना पड़ता था। इसी तरह जर्मन अभिनेत्री सूजन बेर्नेट  को सोनिया गांधी में बदलना कम चुनौती भरा काम नहीं था। छतीस वर्षीया इस अभिनेत्री को इकहत्तर वर्ष की महिला के किरदार के लिए चुना गया था। मेकअप ने उम्र के इस अन्तर को पाटने में चमत्कार कर दिखाया। 
हर वर्ष होने वाले  दर्जन भर सिनेमाई पुरुस्कारों में मेकअप आर्टिस्टों को पुरुस्कृत करने की पहल  फिलहाल भारत में आरंभ नहीं हुई है। ऑस्कर ने ' बेस्ट मेकअप एंड हेयर स्टाइल ' केटेगरी में पुरूस्कार देने की शुरुआत 1981 में ही कर दी थी। इससे पहले उनकी उपलब्धियों का सिर्फ  जिक्र ही हो पाता था। साधारण अभिनेता को कहानी के चरित्र में बदलदेने के हुनर का  महत्व हमारे फिल्मकार समझते तो है परन्तु उनके प्रोत्साहन के लिए कोई ठोस जतन  नहीं किया जाता है।  हाल ही में हॉलीवुड के वरिष्ठ मेक उप आर्टिस्ट डैन स्ट्रिपेक का निधन हुआ।  उनकी उपलब्धियों में तीन बार ऑस्कर के लिए नामांकित होना दर्ज हो चूका है। इसके अलावा टॉम हैंक्स की चर्चित सोलह फिल्मे  और टॉम क्रूज की ' मिशन इम्पॉसिबल ' सीरीज में उनका काम काफी सराहा गया था। 
 

Thursday, January 10, 2019

आभासी दुनिया के अँधेरे !

मनोवैज्ञानिकों  के मुताबिक सेल्फियों  फेसबुक , ट्विटर और व्हाट्सप्प  पर लगातार सम्पर्क में रहने वालों ने एक तरह से खुद अपना जीवन आवेगपूर्ण मुहाने पर ला खड़ा कर दिया है। यह जीवन का वह मुकाम बन गया है जहाँ मानसिक शांति की कोई जगह नहीं है। एक तरह से हरेक व्यक्ति अपने साथ अपना खुद का लेटर बॉक्स साथ लिए घूम रहा है।
 'पहुँचते ही खत लिखना या अपनी खेर खबर देते रहना या खतो किताबत करते रहा करो जैसे वाक्य अब कोई नहीं बोलता। नई पीढ़ी को तो यह भी नहीं मालुम है कि इन शब्दों में कितनी आत्मीयता और आग्रह छुपा हुआ होता था। कुछ लिखकर उसके जवाब का  इन्तजार कितना रोमांचकारी होता था , अब बयान नहीं किया जा सकता। तकनीक ने कई ऐसी चीजों को बाहर कर दिया है जो आत्मिक लगाव की पहचान हुआ करती थी। प्रेमियों के बीच होने वाले पत्राचार ने कई लोगों को साहित्यकार बना दिया था। अपने जज्बात कागज़ पर उंडेलकर उसे प्रेमी तक पहुंचाने का रोमांच आज महसूस नहीं किया जा सकता। मिर्जा ग़ालिब ने लिखा था ' कासिद के आते आते  खत इक और लिख रखु , में जानता हु वो जो लिखेंगे जवाब में ' या फ़िल्मी गीतों में प्रमुखता से नजर आई   ' लिखे जो खत  तुझे वो तेरी याद में ' या मेरा प्रेम पत्र पढ़कर तुम नाराज ना होना ' या ' फूल तुम्हे भेजा है खत में , फूल नहीं मेरा दिल है - जैसी भावनाए आज न समझाई जा सकती न उनके समझने की उम्मीद की जा सकती है। 
 कई खूबियों वाले स्मार्ट फ़ोन ने  सबसे नकारात्मक असर जो समाज को दिया है वह है आत्म मुग्ध और आत्म केंद्रित स्वभाव।खुद की फोटो निकलना और उसे निहारना एक ऐसा जूनून बन चूका है जिसने व्यक्ति को आत्म केंद्रित बना दिया है।  यहाँ मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए हुई दुर्घटनाओं की बात भी बेमानी है। अकेले मोबाइल फ़ोन की वजह से हुई दुर्घटनाओं के इतने  वाकये हो चुके है कि उन्हें अब सामान्य मान लिया गया है।
 अब स्मार्टफोन की वजह से हुए सामाजिक  प्रभावों पर गौर करना जरुरी हो गया है। वह समय गया जब पूरा मोहल्ला व्यक्ति के संपर्क में रहता था परन्तु चंद लाइक और कुछ कमैंट्स की चाहत ने उसे अकेलेपन की और धकेल दिया है।  आभासी दुनिया के मित्र उसकी दुनिया बन गई है। बड़ी मित्र संख्या का दम भरने वाले अधिकांश लोगों के समक्ष इस तरह की हास्यास्पद स्थिति निर्मित होती रही है जब उनकी पोस्ट पर बिला नागा टिपण्णी करने वाले लोग उनके सामने से बगैर मुस्कुराए गुजर जाते है।   व्यक्ति क्षणे क्षणे  समाज से कटता जा रहा है परन्तु उसे इस वक्त एहसास नहीं हो रहा है। प्रदर्शन प्रियता हरेक मनुष्य की जन्मजात सहज प्रवृति रही है। सोशल साइट्स ने इसे विस्फोटक स्तर पर ला खड़ा किया है। नितांत निजी पलों को भी लोग बेखौफ इन साइट्स पर शेयर करने  से नहीं हिचकिचाते भले ही लोग उनके इस कृत्य  पर मजाक बनाते हो।  किसी अवसर विशेष पर कही और से आये संदेशों को फॉरवर्ड करते समय भी  महसूस ही नहीं होता कि इन उधार  की पंक्तियों में स्नेह और प्रेम की रिक्तता है।  उम्मीद थी कि स्मार्ट फोन दूरिया घटाने में मदद करेंगे परन्तु उनका  उल्टा ही असर होते दिख रहा है।  औपचारिकता ने  सहजता को बेदखल कर दिया है। जन्मदिन हो या और कोई विशेष अवसर अब लोग पहले से कही ज्यादा बधाइयाँ भेजते है परन्तु यह काम भी केवल इसलिए किया जाता है ताकि सामने वाले को जताया जा सके कि हमें उसकी फिक्र है। सोशल मीडिया ने हमारे लिए  इतने सारे इमोजी और स्टिकर विकसित कर दिये है कि हमें दिमाग को तकलीफ देने की जरुरत नहीं पड़ती। हर अवसर के लिए हमारे पास रेडीमेड शुभकामनाओ का भण्डार है। 
 जरुरत से व्यसन बन चुके मोबाइल फ़ोन का जीवंत  उदहारण देखना हो तो किसी रेल या  बस यात्रा को देखिये। पिछले माह भोपाल से हैदराबद की लम्बी रेल यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ था तो स्मृतियों में दो  दशक पूर्व इसी तरह दक्षिण भारत प्रवास की झलकियां स्मरण हो आई। उस दौरान हरेक यात्री के पास एक किताब जरूर होती थी।   महज एक दशक पहले तक  सफर में यात्री कुछ न कुछ पढ़ते नजर आते थे। अब बिरला ही कोई ऐसा शख्स दीखता है जिसके पास किताब हो। अब  हर झुकी  गर्दन सिर्फ अपने मोबाइल में गुम नजर आती है। ट्रैन के बाहर बदलता परिदृश्य और प्रकृति किसी को भी नहीं लुभाती। कई अध्यनो और शोध में इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि आँखों के सामने से गुजरने वाले शब्द मस्तिष्क में चित्रों का निर्माण करते है , यह काम मस्तिष्क के विकास के लिए बेहद अहम् है।  दूसरी और नन्ही स्क्रीन पर नाचते चित्र सिर्फ आँखों को थकाने के अलावा कोई सकारात्मक काम नहीं करते ,कम से कम  मस्तिष्क की सक्रियता के लिए तो कुछ भी नहीं !
   कोई माने या न माने परन्तु एक दिलचस्प  जापानी हास्य  कहावत को अमल में लाने का समय आ गया लगता  है -  ' मोबाइल फ़ोन ने आपके कैमरे को बाहर किया , आपके म्यूजिक सिस्टम को बाहर किया , आपकी किताबों को बाहर किया , आपकी अलार्म घडी को बाहर किया ! प्लीज अब  उसे आपके परिवार और मित्रों को बाहर न करने देवे ! 

Wednesday, January 2, 2019

शिल्पों की नगरी में फिल्मे : खजुराहो फिल्मोत्सव

धीरे धीरे आकार ले रहे ' अंतराष्ट्रीय खजुराहो फिल्म फेस्टिवल ' ने इस वर्ष चौथे वर्ष में प्रवेश किया है। विश्व हेरिटेज साइट खजुराहो  पर होने वाला यह अपनी तरह का पहला फिल्म समारोह है। हर वर्ष दिसंबर माह में होने वाले इस महोत्सव की निरंतरता अभिनेता निर्माता एवं सामजिक कार्यकर्ता राजा बुंदेला के अथक प्रयासों से संभव हुई है। मध्य प्रदेश जैसे केंद्र में स्थित राज्य में फिल्म निर्माण की असीम सम्भावनाओ को तलाशने का भागीरथी प्रयास है खजुराहो फिल्म महोत्सव। यह फिल्मोत्सव इस लिहाज से भी अनूठा है कि यह सीधे आम लोगों तक पहुँचने का प्रयास करता है , उनकी रोजमर्रा की समस्याओ के हल ढूंढते हुए सामजिक जनचेतना जगाने का प्रयास करता है। सात दिनों तक चले इस फिल्मोत्सव में शार्ट फिल्मो के अलावा हिंदी की लोकप्रिय फिल्मे और विदेशी फिल्मो का प्रदर्शन अस्थायी टपरा टाकिजों में आम दर्शकों के लिए निशुल्क किया गया।

   ' टपरा टाकीज़ ' एक ऐसी ही पहल है जो साधनहीन दर्शक को सीधे सिनेमा से जोड़ने का प्रयास करता है। दक्षिण भारत में लोकप्रिय इस तरह के टाकीज़ सिनेमा को समाज के आखरी छोर पर बैठे दर्शक के पास ले जाता है। प्राकृतिक संसाधनों और दृश्यावली से संपन्न बुंदेलखंड विकास की बाट जोह रहा है। राजा बुंदेला सिनेमा के रास्ते इस क्षेत्र को मुख्य धारा में जोड़ने की कोशिश कर रहे है।  एक साक्षात्कार में  बात करते हुए उन्होंने इस बात पर अफ़सोस व्यक्त किया कि  पर्यटन की असीम संभावना के बावजूद सरकारों ने इसे रेल एवं  हवाई मार्ग से उस तरह से नहीं जोड़ा है जैसी की आवश्यकता है।
यद्धपि  राजा बुंदेला अपने संपर्कों और संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से इस हेरिटेज साइट को जनचर्चा में शामिल करने में सफल रहे है। एक अन्य प्रश्न के जवाब में वे बताते है कि सिनेमा को सिंगल स्क्रीन की और लौटना ही होगा क्योंकि देश का एक बड़ा दर्शक वर्ग मल्टीप्लेक्स के टिकिट नहीं खरीद सकता है। एक   सवाल के जवाब में उन्होंने बताया कि सिनेमा से गाँव लगभग लुप्त हो चुके है , वे अपने  प्रयासों से सिनेमा को फिर से गाँवों की और ले जाना चाहते है। 
नेटफ्लिक्स और अमेज़न प्राइम जैसी वीडियो स्ट्रीमिंग साइट के बढ़ते स्वरुप को वे समय की मांग बताते है। परन्तु इन साइट्स पर बढ़ती यौनिकता और गाली गलौज की भाषा के लिए भी चिंता जाहिर करते है। भारतीय समाज के दोहरे मापदंडों पर बात करते हुए वे कहते है कि हमने सेक्स को वर्जित बनाकर रख दिया है जिसकी वजह से यह अंतिम समय तक दिमाग में हलचल मचाये रखता है जबकि पश्चिम के लोग पच्चीस की उम्र में ही इससे ऊपर उठ जाते है यही वजह है कि नेटफ्लिक्स जैसे पोर्टल इस बात का फायदा उठाकर इसे धड़्डले से बेचते रहते है। 
  वे इस बात पर उत्साहित है कि खजुराहो फिल्मोत्सव कई शौकिया फिल्मकारों की नर्सरी बन रहा है। विदित हो कि इस फिल्मोत्सव में एक दर्जन से ज्यादा फिल्मे स्थानीय कलाकारों ने अपनी फिल्मों का प्रदर्शन किया है । इन फिल्मकारों का उत्साह वर्धन करने के लिए उन्हें  फिल्म के प्रदर्शन के बाद स्टेज पर सम्मानित भी किया गया । 
सात दिवसीय  चकाचौंध भरे इस आयोजन के समापन  में कई नामचीन लोगों की उपस्थिति रही।  विशेष रूप से  अभिनेता अनुपम खेर , राजनीतिज्ञ अमर सिंह , केंद्रीय मंत्री सुदर्शन और फिल्मकार बंसी कौल आदि ने फिल्मो को लेकर अपने अनुभव साझा किये। 
 इस महोत्सव की उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि सभी फिल्मकार लोगों से सहजता से मिल रहे थे। आयोजकों को पुलिस प्रशासन की मदद नहीं लेना पड़ी। दो डिग्री तापमान के बावजूद पर्यटकों और स्थानीय लोगों की उत्साहपूर्वक  उपस्तिथि बताती है कि खजुराहो फिल्मोत्सव अपने उद्देश्य में  सफल रहा। 

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...