Friday, December 29, 2017

कोई देख रहा है !

ताकझांक करना स्वाभाविक मानवीय कमजोरी है। किसी पर नजर रखना रोमांचक होता है। परन्तु दूसरों की जिंदगी में झांकना एक अशिष्ट आचरण माना जाता है। आवरण के पीछे का सच जानना कौतुहल पैदा करता है।  किसी के निजी पलों की तहकीकात करने का स्वभाव लगभग हर तीसरे व्यक्ति की आदत होती है। शिक्षा , संस्कृति ,और भौगोलिक विभिन्नताओं के बावजूद यह मनोविकार हर आयु वर्ग के लोगों में पाया जाता है।  कही थोड़ा - कही ज्यादा। रियलिटी टीवी शोज ने दर्शक के मन में खींची निजता लांघने की लक्ष्मण रेखा को विलीन कर दिया है। यह अब सहज स्वीकार्य संस्कृति बन चुकी है। हिंदी अंग्रेजी के प्रमुख अख़बारों ने एक नए चलन की शुरुआत की है। फ़िल्मी गपशप के साथ ये अखबार अब सेलिब्रिटी के एयरपोर्ट पर आने जाने के फोटो प्रकाशित करने लगे है। सुचना और समाचार का कौनसा उद्देश्य इस निजता के उल्लंघन से सार्थक हो रहा है ? शायद वे ही इसका बेहतर जवाब दे सकते है। लोकप्रिय और प्रसिद्ध व्यक्ति के छुप कर लिए फोटो अखबार के पाठक के अवचेतन में सुप्त पड़े ताका झांकी के भाव को हवा देने का ही काम करते है।  हॉलीवुड ने इस मानवीय कमजोरी को अवसर में बदलने का काम किया है। ताकझांक ने टेलीविज़न और वेबसाइट के पोर्टल्स को एक नए बाजार से परिचित कराया है। अमेरिका का टी एम् जी टीवी चैनल सिर्फ ताकझांक और गॉसिप के बल पर इस विधा का सिरमौर बना हुआ है। पॉप स्टार माइकल जैकसन की मृत्यु की खबर सबसे पहले इसी ने प्रसारित कर दुनिया में हंगामा मचा दिया था। 
1949 में ब्रिटिश लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने अपने राजनैतिक उपन्यास '1984  ' ( नाइनटीन एटी फोर ) में एक ऐसे देश का व्यंगात्मक वर्णन किया था जहाँ शासक अपनी अवाम की हरेक गतिविधि पर नजर रखता है। शासक को लोग ' बिग ब्रदर ' के नाम से जानते है। देश का कोई भी व्यक्ति अपने तय शुदा व्यवहार से भटकता है तो उसके साथी उसे सचेत करते है '' सावधान ! बिग ब्रदर तुम्हे देख रहा है ' . इस उपन्यास से प्रेरित होकर अमेरिकी टीवी चैनल सी बी एस ने सन 2000 में पहला रियलिटी टीवी शो ' बिग ब्रदर ' प्रसारित किया था। शो के प्रतियोगियों को एक घर में रखा जाता है। इस घर में अखबार , टीवी , इंटरनेट और फ़ोन जैसी सुविधाए नहीं होती। घर के हरेक हिस्से को हाई रिजोलुशन केमेरे की जद में ला दिया जाता है। प्रतियोगियों की समस्त हरकत - चीखना चिल्लाना , गाली , गुस्सा ,साजिश कैमरे पर रेकॉर्ड होती रहती है जिसे बाद में टीवी पर प्रसारित कर दिया जाता है। ' बिग ब्रदर ' सत्रह वर्षों में उन्नीस बार टेलीविज़न पर दिखाया जा चूका है।  इसका 20 वां सीजन 2018 में आरम्भ होगा। बिग ब्रदर की प्रेरणा से भारत में ' बिग बॉस ' अस्तित्व में आया है। बिग बॉस की लोकप्रियता में समय समय पर उतार चढ़ाव आते रहे है। वर्तमान में इसका ग्यारवां सीजन ' कलर टीवी ' पर चल रहा है। मौजूदा समय में ' नकारात्मकता ' की मांग कुछ इस कदर बढ़ रही है कि बिग बॉस को क्षेत्रीय भाषाओ में भी बनाया जा रहा है। यह अकेला ऐसा शो है जहाँ प्रतियोगी जितनी घटिया और निम्न स्तरीय हरकत करते है उतना ज्यादा बिग बॉस की लोकप्रियता में  उछाल आता है !
ताकझांक को केंद्र में रखकर ' मास्टर ऑफ़ सस्पेंस ' अल्फ्रेड हिचकॉक ने एक मास्टरपीस फिल्म ' रियर विंडो ' बनाई थी।  1954 में बनी इस टेक्नीकलर फिल्म का नायक जेफ़ ( जेम्स स्टुअर्ट )  प्रोफेशनल फोटोग्राफर है। एक दुर्घटना में वह अपनी टांग तुड़वा बैठा है। फिलवक्त प्लास्टर बंधा होने से वह अपने अपार्टमेंट में कैद है। जेफ़ की सुंदर प्रेमिका लिसा ( ग्रेस केली ) उससे अक्सर मिलने आती है। जेफ़ खाली वक्त में अपने कैमरे से सामने वाले अपार्टमेंट में ताकझांक करता रहता है। रोज रोज यही करते हुए वह एक अपराध के होने की संभावना भांप लेता है। 1942 में एक जासूसी पत्रिका में छपी इस कहानी ने हिचकॉक को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इसके लेखक को ढूंढकर पंद्रह हजार डॉलर में कहानी खरीद ली। 
'रियर विंडो ' आज भी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ 100 फिल्मों में 42 वे क्रम पर आती है। 
भले ही सभ्य समाज में ताका झांकी अब भी निम्न स्तरीय आदत मानी जाती हो परन्तु इस तथ्य को भी स्वीकारना ही पड़ेगा कि इसकी वजह से सिनेमा , साहित्य और टेलीविज़न को एक अनूठा विषय मिला है। 




Saturday, December 23, 2017

वक्त ने किया क्या हसी सितम

फिल्म ' शोले ' के मशहूर फिल्म निर्माता रमेश सिप्पी ने एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि बड़ी सफलता बड़ा मानसिक दबाव भी लेकर आती है।  कभी कभी यह सफलता इतनी जबरदस्त होती है कि फ़िल्मकार के लिए सहज रह पाना आसान नहीं होता।  सफलता उसकी रचनात्मकता का मानक तय कर देती है। . चाहे कुछ भी हो जाए अगली बार उसे उस मानक तक तो पहुंचना ही है , अन्यथा उसकी सफलता को महज संयोग मान लिया जाएगा।  यद्धपि प्रदर्शन को आंकने का यह तरीका जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी लागू होता है। परन्तु चूँकि फिल्मे सबसे ज्यादा सार्वजनिक आकर्षण के केंद्र में होती है तो दर्शक की ' एक्सरे ' नजरों से उन्हें ही गुजरना होता है। स्वयं रमेश सिप्पी शोले से पूर्व ' सीता और गीता ' के रूप में बड़ी हिट दे चुके थे। परन्तु उसके बाद की उनकी फिल्मे शोले की तराजू में ही तोली गई। टेलीविज़न के शुरूआती दौर में देश के बंटवारे की पृष्ठभूमि पर बना सिप्पी का धारावाहिक ' बुनियाद ' आज  ' एन एस डी ' और पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट में पढ़ाया जाता है परन्तु बावजूद इस उपलब्धि के उनका जिक्र सिर्फ और सिर्फ ' शोले ' के लिए ही होता है। 
सिनेमाई विशेषणों ' ग्रेट ' फाइनेस्ट ' क्लासिक  से सजी ' मुग़ले आजम ' के लिए के आसिफ ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित काल्पनिक कहानी में इतिहास के अलावा हरेक बिंदु सर्वश्रेष्ठ था। भारतीय सिनेमा के इतिहास की बात मुग़ले आजम के बगैर अधूरी रहेगी। मुग़ले आजम के बाद के आसिफ ने गुरुदत्त और निम्मी के साथ ' लव एंड गॉड ' आरम्भ की परन्तु गुरुदत्त के अवसान से फिल्म अटक गई।  बाद में संजीव कुमार को लेकर पुनः शूट की गई।  फिल्म मुकाम पर पहुँचती उसके पहले आसिफ साहब का इंतेक़ाल हो गया। आधी अधूरी फिल्म को 1986 में जैसे तैसे रिलीज किया गया परन्तु इसमें आसिफ का वह जादुई स्पर्श नहीं था जिसने मुग़ले आजम ' को शीर्ष पर पहुँचाया था। 
कभी कभी फिल्मकार ही फ़ैल नहीं होते दर्शक भी फ़ैल हो जाता है। गुरुदत्त कितने महान निर्देशक थे यह बताने की आवश्यकता नहीं है। उनकी बाजी (1951 ) जाल (1952) आरपार (1954 ) मि एंड मिसेस 55 (1955 ) प्यासा (1957) आज भी शिद्दत से देखि जाती है। सिनेमा की बारीक समझ विकसित करने वालों के लिए गुरुदत्त की फिल्मे एक यूनिवर्सिटी की तरह है। अफ़सोस इस महान फिल्मकार की अंतिम फिल्म ' कागज के फूल '(1959) की असफलता ने गुरुदत्त को अंदर से तोड़ दिया। दर्शको को बाद में समझ आया कि गुरुदत्त असफल नहीं हुए थे वरन वे खुद ही उस फिल्म को समझने में चूक गए थे। फिल्म आज क्लासिक का दर्जा हासिल कर चुकी है।  
शाहजहां ने अपनी पत्नी के लिए ताज महल बनाया था कमाल अमरोही ने अपनी पत्नी के लिए ' पाकीजा ' बनायी - 14 वर्ष में पूर्ण हुई इस कालजयी फिल्म को मीना कुमारी की अंतिम फिल्म कहा जाता है। कमाल अमरोही ने इस फिल्म को ब्लैक एंड वाइट के जमाने में शूट करना आरम्भ किया था और हर बार  नई  तकनीक के साथ री शूट करते रहे। कास्टिंग , एडिटिंग , सेट्स , मधुर गीत -संगीत , फोटोग्राफी के पैमाने पर सौ प्रतिशत देती पाकीजा ' कल्ट क्लासिक ' बन गई है। अमरोही साहब ने ' रजिया सुलतान (1983) में खुद को दोहराने का प्रयास किया परन्तु बात नहीं बनी। उस दौर की सदाबहार जोड़ी धरम / हेमा के बावजूद फिल्म डूब गई। ' ऐ दिल नादान - लता का गाया यह गीत ही इस फिल्म का नाम याद दिला देता है अन्यथा दर्शक कब का इसे बिसार चुके होते। 
सुभाष घई एक्टर बनने मुंबई आए थे।  बन न सके , और निर्देशक बन गए।  सुभाष घई ने कोई महान फिल्म बनाने का प्रयास नहीं किया ,उन्होंने दर्शकों के टेस्ट के मुताबिक़ सिनेमा रचा।  कालीचरण ' 1976'  कर्ज 1980 '  हीरो 1983 ' कर्मा 1986 ' रामलखन 1989 ' सौदागर 1991 ' खलनायक 1993 ' जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मे घई को सफलतम निर्देशक की लीग में शामिल करती है। परन्तु घई का जादू ' खलनायक ' के बाद चूक गया।  परदेस (1993 ) ' ताल (1997 ) आते आते वे पूरी तरह से निष्प्रभावी हो गए। ऋतिक रोशन करीना स्टारर ' यादें ' उनकी घोर असफल फलम मानी जाती है।  इस हादसे ने घई का आत्मविश्वास इतनी बुरी तरह हिलाया कि उसके बाद उन्होंने किसी नई फिल्म को हाथ नहीं लगाया।  
ऐसी इंडस्ट्री जहां शुक्रवार का दिन तय करता है कि कोनसा सितारा कहाँ बैठेगा , कौन और कितनी ऊपर जाएगा , किस का समय समाप्त होने वाला है।यक़ीनन  कहानी बनाने वालों की भी अपनी कहानी होती है और सभी की बात करने के लिए यह कॉलम बहुत छोटा है।

Thursday, December 21, 2017

चकाचौंध रोशनी के पीछे का अंधेरा !

इंडीसेंट प्रपोजल ' 1993 की इस हॉलीवुड फिल्म ने अपनी लागत का सात गुना मुनाफा कमाया था। नायक नायिका शादी कर चुके है और  बचपन के मित्र है। नायक (वुडी हर्रेलसन ) का सपना है अपनी खुद की रियल स्टेट कंपनी खोलना।  अपनी सारी जमा पूंजी लेकर वे लास वेगास इस उम्मीद से पहुँचते है कि जुए में धन कमा कर अपना सपना पूरा कर सकेंगे।  दुर्भाग्य से ऐसा होता नहीं।  रोलेट की टेबल पर वे अपनी सारी जमा पूंजी गंवा बैठते है। नायिका ( डेमी मूर ) बेहद खूबसूरत है। एक अरबपती व्यवसायी ( रोबर्ट रेडफ़ोर्ट ) यह देख उनके सामने प्रस्ताव रखता है कि अगर नायिका उसके साथ एक रात गुजार लेगी तो वह उन्हें एक मिलियन डॉलर दे सकता है । इस तरह के अप्रिय प्रस्ताव आमतौर पर संघर्षशील अभिनेत्रियों , कामकाजी , मजबूर महिलाओं को मिलते रहते हैं ।
 किसी फेवर के बदले सेक्स !! पुरुषों का यह मनोविकार लगभग जीवन के हरेक व्यावसायिक क्षेत्र में पाया जाता है। यद्धपि इसकी शिकायत कोई नहीं करता परंतु यह सर्वविदित है कि भाषाओ , कल्चर  और भोगोलिक सीमाओ के परे यह बिमारी दुनिया के हरेक देश  में मौजूद है। आमजन और सिने जगत की ख़बरों में दिलचस्पी रखने वाले इसे ''कास्टिंग काउच '' के नाम से जानते है। आमतौर पर इसकी शिकार शिकायत दर्ज नहीं करती , जब तक कि वह किसी प्रभावशाली बैकग्राउंड से न हो।
फिल्मों में एक छोटा सा रोल पाने के लिए नवोदित अभिनेत्रियों की भीड़ निर्माताओं और फिल्मी स्टूडियो के इर्द गिर्द मंडराती रहती है । स्ट्रगल के दौर में महज एक ब्रेक के लिए इनकी मानसिक हालात ऐसी हो जाती है कि ये स्थापित एक्टर से लेकर फाइनेन्सर तक की लोलुपता की शिकार बनती है । हिंदी फिल्मों की दर्जन भर अभिनेत्रियों इस नरक को भुगत कर अपनी आपबीती दुनिया के सामने ला चुकी है । दो माह पूर्व हॉलीवुड के प्रभाशाली और ' मीरामैक्स  ' स्टूडियो के सह संस्थापक हार्वे विन्स्टीन के बारे में न्यूयोर्क टाइम्स ने एक सनसनीखेज खुलासा किया । अखबार ने बताया कि अकादमी पुरस्कार से सम्मानित इस प्रोड्यूसर ने पचास से अधिक महिलाओं का यौन उत्पीड़न किया है । 
उन्मुक्त जीवन के आदी अमेरिकी समाज के लिए भी यह खबर आघात की तरह थी । इस घटना ने ट्वीटर पर एक हैशटैग आंदोलन me too की शुरुआत की जो तुरंत ही सारी दुनिया में फ़ैल गया । इसकी शुरुआत सिने जगत से हुई परन्तु शीघ्र ही इसकी जद में संगीत , राजनीति, और शिक्षामें पसरे यौन शोषण के मामलों की ओर ध्यान आकर्षित करना आरंभ कर दिया । इस हैशटैग ने अपने क्षेत्र की स्थापित और सामान्य महिलाओं को एक ऐसा प्लेटफार्म दिया जहां वे अपने कड़वे अनुभव सारी दुनिया से साझा कर सकती है , अपने उत्पीड़क को उजागर कर सकती है . भारत में इस दुष्चक्र को रोकने के लिए एक छोटी से पहल बॉलीवुड स्टार ' अन्ना ' सुनील शेट्टी ने की है। सुनील शेट्टी ने अपने कास्टिंग डॉयरेक्टर मित्र मुकेश छाबड़ा के साथ मिलकर ' ऍफ़ द कास्टिंग ' नाम की कंपनी आरम्भ की है । इस पोर्टल पर नवोदित अभिनेत्री अपने वीडियो पोस्ट कर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकती है । इस तरह के ऑनलाइन ऑडिशन अन्य बड़े निर्माता निर्देशक भी अपना रहे है । मुम्बई से दूर शहरों और कस्बो की युवतियां इस पहल से कास्टिंग काउच की शिकार होने से बच सकती है । यद्धपि सिर्फ एक दो लोगों के प्रयास करने से इस बीमारी के पूरी तरह समाप्त होने की आशा करना थोड़ा जल्दबाजी होगा । कास्टिंग काउच की जड़े कितनी गहरी है इसका अंदाजा गुजरे समय की शीर्ष अभिनेत्री रेखा के कथन से लगाया जा सकता है ।रेखा से पूछा गया था कि ' स्टारडम का शार्टकट  क्या है ?  बिंदास रेखा का जवाब था ' यहाँ महिलाओं के लिए सफलता का रास्ता बेडरूम से होकर जाता है !!  समस्या पुरुष मानसिकता की है जो हरदम शिकार की तलाश में रहती है । इंडीसेंट प्रपोजल को सिरे से नकार देना हरेक महिला का पहला अधिकार है और इस तरह के प्रस्ताव को रखने वाला नफरत के साथ प्रताड़ना का पात्र है । 


Saturday, December 9, 2017

यह फ़िल्म सत्य घटना पर आधारित है

सच्ची घटनाओ पर आधारित फिल्मों का अपना अलग आकर्षण रहा है। इस श्रेणी की अधिकांश फिल्मे पर्याप्त दर्शक जुटा ही लेती है।  जहाँ दर्शक के मुँह फेरने की आशंका होती है वहाँ सयाना निर्देशक कोई विवादित संवाद या सीन लीक कर उसे जनचर्चा का हिस्सा बना देता है। बीते दो तीन दशकों में इस श्रेणी में बनने वाली फिल्मों में खासी वृद्धि देखने को मिली है। 1937 में प्रदर्शित ' अछूत कन्या ' ( अशोक कुमार , देविका रानी ) यूँ तो काल्पनिक थी परन्तु पहली बार किसी फिल्म ने तात्कालीन सामाजिक  समस्या , छुआछूत को परदे पर उतारने का साहस किया था। कायदे से सच घटना पर बनने वाली पहली फिल्म ' डॉ कोटनिस की अमर कहानी ( 1946 )  को माना जाना चाहिए। द्वितीय विश्व युद्ध में एक भारतीय डॉ द्वारकानाथ चीनी सैनिकों का इलाज करने चीन गए थे। उनकी मुलाक़ात वहां एक चीनी युवती चिन लिंग से हुई और वे विवाह बंधन में बंध  गए। डॉ कोटनिस चीनियों को प्लेग से बचाते हुए स्वयं प्लेग का शिकार हुए। ख्वाजा अहमद अब्बास की लिखी कहानी पर वी शांताराम ने इस कालजयी फिल्म का निर्देशन किया।  इस फिल्म का दिलचस्प पहलु यह भी है कि डॉ कोटनिस की भूमिका स्वयं वी शांताराम और चीनी लड़की की भूमिका उनकी धर्मपत्नि जयश्री ने निभाई थी। 
अस्सी के दशक के पूर्व मध्यप्रदेश के अंचल के कुछ क्षेत्रों में महिलाओ की खरीद फरोख्त की दबी छुपी बाते उजागर हुई थी। इस कुप्रथा को सही साबित करने के लिए 'इंडियन एक्सप्रेस ' के खोजी पत्रकार अश्विनी सरीन ने एक भील युवती को बीस हजार रूपये में खरीद कर मीडिया के सामने प्रस्तुत कर दिया था। इस सच घटना पर लिखे विजय तेंदुलकर के नाटक पर भारतीय अमेरिकन डॉयरेक्टर जग मुंधरा ने ' कमला ' ( 1985 ) बनाई। नायिका  दीप्ती नवल ने भील युवती के चरित्र को जीवंत किया था। नायक थे अनूठी हेयर स्टाइल रखने वाले मार्क जुबेर। उस दौर की तमाम सिने पत्रिकाओं और प्रमुख समाचार पत्रों ने इस फिल्म के नारी पात्रों  (दिप्ती नवल , शबाना आजमी , सुलभा देशपांडे ) कीमुक्त कंठ से सराहना की थी। यह फिल्म ऐसा यथार्थ दिखा रही थी जो तथाकथित सभ्य समाज के माथे पर कलंक था। 
हिंदी फिल्मों की लायब्रेरी में सत्य घटनाओ पर बनी फिल्मे तलाशने जाए तो अच्छी फिल्मों की संख्या पचास पचपन से आगे नहीं जाती।  इसमें भी ज्यादातर फिल्मे अपराध और अपराधियों के जीवन पर बनाई गई है। कुछ बेहतरीन फिल्मों में - ' भाग मिल्खा भाग ' ' गांधी ' परजानिया ' मांझी द मॉउंटेनमेन ' सरकार ' प्रमुख है। यद्धपि अक्षय कुमार अभिनीत ' रुस्तम ' और ' एयरलिफ्ट ' भी सत्य घटना पर आधारित थी परन्तु नायक को श्रेष्ठ बताने के फेर में वास्तविकता की अतिश्योक्ति हो गई थी। 
विकसित देशों खासतौर अमेरिका में भी इस श्रेणी की फिल्मों और डॉक्यूमेंट्री के प्रति जबरदस्त रुझान रहा है। यहां डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का प्रदर्शन भी सिनेमा घरों में किया जाता है। हाल ही में अमेरिका के प्रमुख मनोरंजन टीवी चैनल एच बी ओ ने भारत के अब तक अनसुलझे आरुषि -हेमराज हत्याकांड पर चार घंटे की विचारोत्तेजक  डॉक्यूमेंट्री का प्रसारण किया है। समाचार चैनलों में भी मनोरंजन तलाशने वाले भारतीय दर्शकों का एक बड़ा वर्ग शायद ही इस संजीदा डॉक्यूमेंट्री को डाइजेस्ट कर पाया होगा। हालांकि हॉलीवुड इस क्षेत्र में भी हमारा सीनियर है। 9 /11 हादसे के बाद डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर माइकेल मूर निर्मित '' फेरेनहीट 9 /11'' ट्विन टावर हादसे की इतनी गहराई से पड़ताल करती नजर आती है कि दर्शक सहम जाता है। हॉलीवुड की सत्य घटनाओ पर बनी फिल्मों की सूचि ज्यादा लम्बी है। फिर भी उल्लेखनीय फिल्मों में ' शिंडलर्स लिस्ट ' कैच मी इफ यू कैन 'ट्वेल्व ईयर अ स्लेव 'लिकन ' आर्गो ' पर्ल हार्बर ' आती है। इसी श्रेणी की दुनिया की सर्वश्रेष्ठ अमेरिकन फिल्म '' जे एफ के '' मानी जाती है। अमेरिका के अब तक के सबसे लुभावने और लोकप्रिय राष्ट्रपति जॉन ऍफ़ केनेडी के जीवन और हत्या के घटनाक्रम पर आधारित इस फिल्म को महानतम फिल्म माना जाता है। 
हड़बड़ी में बकवास फिल्मे बनाकर उन्हें पीरियड फिल्म का नाम देने वाले बॉलीवुड निर्माताओं को सर रिचर्ड एटेनबरो की रिसर्च और मेहनत से सबक लेना चाहिए। ' गाँधी ' फिल्म के लिए तथ्य जुटाने में उन्होंने बीस वर्ष लगाये थे और भारत की दर्जनों यात्राए की थी। निसंदेह वास्तविक घटनाओ और व्यक्तियों पर बनी फिल्मे बहुत सारा धन , बहुत धैर्य और बहुत शोध मांगती है। 




Thursday, November 16, 2017

ऑस्कर की तलाश में न्यूटन

अमूमन हर वर्ष लगभग सितम्बर माह के अंतिम हफ्ते में भारत की और से  ऑस्कर समारोह में हिस्सा लेने के लिए एक भारतीय  भाषाई फिल्म का चयन किया जाता रहा है।  यह पुरूस्कार  समारोह आगामी  मार्च में संपन्न होता रहा है। जैसे जैसे उत्तर भारत का तापमान गिरने लगता है वैसे वैसे देश में ' ऑस्कर ' को लेकर गर्माहट बढ़ने लगती है। प्रबुद्ध  सिने प्रेमी उम्मीद से भरने लगते है कि शायद इस बरस दशकों से चला आरहा ऑस्कर का सूखा ख़त्म हो जाए ! पंद्रह बरस पहले (2002 ) यह सुनहरी ट्रॉफी भारत के हाथ से छिटक गई थी जब ' नो मेन्स लैंड ' ने ' लगान ' को शिकस्त देकर कई सपनो को ध्वस्त कर दिया था। हिंदी और क्षेत्रीय  फिल्मों की दाल रोटी खाने वाला बॉलीवुड हॉलीवुड के  सपने देखना बंद नहीं करता। बात चाहे विज्ञान फंतासियों की हो या फिर मानवीय रिश्तो पर बनी फिल्मों की , बॉलीवुड  अधिकतर  प्रेरणाए आयात करने के ज्यादा पक्ष में रहा है। ऑस्कर के सपनो का रंग इतना गाढ़ा होता कि फ़िल्मी दुनिया की अलसुबह तक चलने वाली पार्टिया हो या पेज थ्री पर दिखने वाली हस्तियां हो इस रंग में सरोबार दिखती है। सिर्फ फ़िल्मी सामग्री के भरोसे चलने वाले टेलीविज़न चैनल अपने तयशुदा कार्यक्रमों को परे रख हॉलीवुड को फोकस में ले आते है। कौनसी तारिका रेड कारपेट पर किस डिज़ाइनर का गाउन पहन कर किस पुरुष मित्र के साथ छटा बिखेरेगी , अमेरिकन और ब्रिटिश सट्टा बाजार किस फिल्म और किस सितारे पर दांव लगा रहे है जैसी अटकलों पर कीमती एयरटाइम खपाने लग जाते है। 
ऑस्कर के लिए बॉलीवुड के जूनून को गैरजरूरी मानकर ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता। यद्धपि ये पुरस्कार  ( विदेशी भाषा श्रेणी को छोड़कर ) सिर्फ और सिर्फ  अमेरिकन फिल्मों के लिए ही है। परन्तु  चकाचौंध और व्यापक प्रसारण के लिहाज से ये वैश्विक दर्जा हासिल कर चुके है। इस बार विदेशी भाषा श्रेणी में 92 देशों की फिल्मे टॉप फोर में आने के लिए संघर्ष करेंगी। जो की एक रिकॉर्ड है। 
इस बार का ऑस्कर समारोह ( क्रम के हिसाब से 90 वां ) भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। हाल ही में पहली बार ऑस्कर अकादमी ने अपने मौजूदा  6688 सदस्यों में भारत के चुनिंदा सितारों और फिल्मकारों को शामिल कर  सम्मानित किया है। आमिर खान , अमिताभ , ऐश्वर्या , प्रियंका , दीपिका , सलमान और इरफ़ान खान ,बुद्धदेब दास  गुप्ता , मृणाल सेन आदि उन भारतीयों में से है जो   इस बार  फिल्मों की सभी  श्रेष्ठ श्रेणियों  के लिए वोट करेंगे। वैसे तीन दशक पहले (1987 ) दक्षिण भारतीय सितारे चिरंजीवी बाकायदा ऑस्कर समारोह में निमंत्रित होने का गौरव हासिल कर चुके है।  
इस वर्ष भारत का प्रतिनिधित्व प्रतिभावान अभिनेता राजकुमार राव की फिल्म ' न्यूटन ' करेगी। 2010 में एकता कपूर निर्मित ' लव सेक्स और धोखा ' से अपने करियर का आगाज करने वाले राजकुमार फिल्म- दर- फिल्म '' कोई पो चे ' (2013 ) ' शाहिद ' (2013 राष्ट्रीय पुरूस्कार ) ' सिटी लाइट '( 2014 ) ' ट्रैप्ड ' ( 2017 )  से अपने अभिनय की विभिन्नताओं की छाप छोड़ते जा रहे है। महज चुनिंदा फिल्मों के सहारे राजकुमार ने दर्शकों में विशेष जगह बना ली है। दर्शकों का एक बड़ा वर्ग सिर्फ उनका नाम देखकर टिकिट खरीदने लगा है। 
' न्यूटन ' टॉप फोर का सफर तय कर पाती है या नहीं इस बात में संशय है। ऑस्कर की हिमालयीन चढाई सिनेमाई गुणवत्ता , वैश्विक अपील और तटस्थ जूरी जैसे सँकरे रास्तो से होकर गुजरती है। एक्सपीरीमेंटल राजकुमार राव का सराहनीय न्यूटन क्या इतनी दूर जा पायेगा ? देखना दिलचस्प होगा। शुभकामनाएं।  

Sunday, November 5, 2017

एक थी पद्मावती

पद्मिनी -यह नाम जेहन में आते ही एक ऐसी राजकुमारी का अक्स दिमाग में बनने लगता है जो बला की सुन्दर थी। उसके बराबर की सुंदरता सिर्फ हेलन ऑफ़ ट्रॉय या मिस्र की क्लिओपेट्रा में ही मिलने की संभावना मानी जाती रही है। यद्धपि इन तीनो ही नारियों को इनकी सुंदरता के साथ इनके बुद्धि कौशल के लिए भी याद किया जाता है। दुनिया को पद्मिनी का पता सबसे पहले मलिक मोहम्मद जायसी के काव्य ग्रन्थ '' पद्मावत ' से मिला था। एक ऐसी सुंदर युवती जिसने अपने और अपने पति के  मान सम्मान के लिए जौहर का रास्ता चुना था। 
इतिहास के गलियारों में पद्मिनी की खोज हमें सन 1303 तक ले जाती है।  इस बरस दिल्ली के सबसे ताकतवर सुल्तान अलाउद्दीन  खिलजी ने चितोड़ पर आक्रमण किया था। अफ़्रीकी यात्री और विद्वान् ' इब्ने बतूता ' ने अपने संस्मरणों में खिलजी का जिक्र करते हुए उसे शानदार सुल्तान के रूप में दर्ज किया है जबकि अन्य समकालीन विद्वानों की राय उनसे जुदा है। भारत का सिलसिलेवार इतिहास लिखने का प्रयास करने वाले स्कॉटिश मूल के ब्रिटिश नागरिक जेम्स टॉड की नजरों में खिलजी एक क्रूर और विस्तार वादी सुलतान था। विंसेंट स्मिथ के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी की दो पत्निया थी जो हमेशा आपस में लड़ा करती थी। दिल्ली पर शासन करने वाले सुलतान का जोर अपनी बीबीयों पर नहीं चलता था। एक अन्य ब्रिटिश लेखक केविन रुश्बी  ने हाल ही अपने शोध ' चैसिंग माउंटेन लाइफ ' में सुल्तान खिलजी को ' रोमांस रहित ' रूखे स्वभाव का ' जोरू का गुलाम ' कह कर चित्रित किया है।  
ताज्जुब की बात है कि खिलजी से राज्याश्रय प्राप्त विख्यात हिंदी और फारसी के कवि आमिर खुसरों ने अपने किसी ग्रन्थ में पद्मावती का कही जिक्र नहीं किया है। खुसरो का लेखन आज हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर है। खुसरो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भाषा को ' हिंदवी ' नाम दिया था जो कालांतर में हिंदी हुआ। श्रृंगार ,दर्शन और प्रेम की चाशनी में भीगी खुसरो की रुबाइयों में अपने सुलतान की प्रेयसी का जिक्र न होना पद्मावती के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगाता है। बहुत से लोगों को इस बात से झटका लग सकता है कि उस दौर के साहित्यकारों और इतिहास लेखकों के ग्रंथों में इस अनुपम सुंदर रानी का कही जिक्र नहीं है। 
पद्मावती एक ऐसी नायिका है जिसका जन्म खिलजी की मृत्यु के दो सौ साल बाद सूफी परंपरा के कवि ' मालिक मोहम्मद जायसी ' के काव्य संग्रह ' पद्मावत ' में हुआ है। प्रेम की साधना का संदेश देते पद्मावत ने एक काल्पनिक नारी का इतना सजीव चित्रण किया की वह हाड़मांस की लगने लगी। सुराहीदार गर्दन , पतली कमर , गुलाबी रंग , अप्रितम सौंदर्य ,जैसे जायसी के  शब्द चित्रों ने जन मानस में कल्पना और हकीकत के बीच की बारीक लकीर को मिटा दिया। पद्मिनी देश के अवचेतन में गहरे उतर ' मिथ ' होने के बावजूद  ऐतिहासिक महिला मान सराही और पूजी  गई।
   ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब पद्मावती को सिनेमा स्क्रीन पर लाया जा रहा है। न ही संजय लीला भंसाली का  यह प्रथम प्रयास है। 2008 में  संजय की महत्वाकांक्षी फिल्म ' सांवरिया ' के फ्लॉप होने के बाद उन्होंने मशहूर फ्रेंच ओपेरा थिएटर दू चेटलेट के लिए अल्बर्ट रोसोले रचित 1923 के बेले ' पद्मावती ' को डायरेक्ट किया था। इस ओपेरा ने संजय की असफलता को धो कर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मंच पर शाबासी दिलवाई थी। सिनेमा के आरंभिक साइलेंट युग में ' पद्मावती ' अंग्रेजी शीर्षक से बनी फिल्म ' फ्लेम ऑफ़ फ़्लैश ' में नजर आई थी दुर्भाग्य से इस फिल्म का प्रिंट अब नष्ट हो चूका है। इस फिल्म के बरसों बाद तमिल सिनेमा के सुपर स्टार ' शिवाजी गणेशन और वैजयंती माला 1963 में बनी ' चित्तूर रानी पद्मावती ' में नजर आये।  इस फिल्म में  वैजयंतीमाला पर फिल्माये दर्जन भर गानो की वजह से कहानी का कचूमर बना दिया था। एक किंवदंती का इतना बुरा चित्रण दर्शकों से बरदाश्त नहीं हुआ और उन्होंने इस फिल्म को शिवाजी गणेशन की लोकप्रियता के बावजूद नकार दिया। 1964 में जयराज , अनीता गुहा , लक्ष्मी छाया , हेलन और सज्जन अभिनीत ' महारानी पद्मावती ' अपेक्षाकृत सफल रही थी।  यह पहली फिल्म थी जिस पर जायसी के ' पद्मावत ' की स्पस्ट छाप थी। आम धारणा के विपरीत इस फिल्म का अंत चौकाने वाला था।  कलिंग युद्ध के बाद जिस तरह अशोक ने प्रायश्चित किया था ठीक उसी तरह अलाउद्दीन खिलजी इस फिल्म में आंसू बहाता नजर आया था। 
पिछली शताब्दियों में ऐसे बहुत से पात्र कथा साहित्य से निकल कर इतिहास की सरहद में प्रवेश कर गए है। अनारकली , जोधाबाई , रानी पद्मावती ऐसे ही नाम है। जनमानस में ये इस कदर पैठ बनाये है कि इन्हे कल्पना कह कर ख़ारिज करना जोखिम का काम है।इन पर बनी फिल्मे सदैव जनचर्चा और विवाद का विषय रही है।  व्यावसायिक फिल्मों में तर्क ढूँढना कोरी कवायद ही मानी जायेगी। निर्देशक अपनी कल्पना को मनचाहा आकाश देने के लिए स्वतंत्र है ,परन्तु उसे अपनी जिम्मेदारियों का भी अहसास होना चाहिए।  कल्पना की दहलीज लांघते चरित्रों का चित्रण परिपक्व मानसिकता और सावधानी की अपेक्षा करता है।यह सुकून की बात है कि  फिल्म को फ्लॉप या फ्लोट करने का आखरी निर्णय दर्शक के हाथ में तो सुरक्षित है ही। 



परछाइयों की आत्मकथा

आत्मकथा - किताबो की एक ऐसी श्रेणी है जिसके तलबगार कम है परंतु कोई आत्मकथा अगर हंगामा बरपा दे तो सभी का ध्यान उसकी और चला जाता हैं । विवाद की एक चिंगारी लेखक और प्रकाशक को मालामाल कर देती हैं । यद्यपि बहुत कम आत्मकथाएँ  इतने नसीब वाली होती है जिन्हें पाठक सर माथे पर बिठाते है अन्यथा वे कब आती है और कब चली जाती है , पता नही चलता । डॉ कलाम या स्टीव जॉब्स ऐसे लोग है जिनके बारे मे लोग हमेशा पढ़ना चाहते है । सफलता के अनजान अंधेरे रास्तो  पर इन किताबो ने कईयों के जीवन मे लाइट हाउस की भूमिका निभाई है । 
सिने प्रेमियों को अभिनेताओं की आत्मकथा सदैव लुभाती है । राजनेताओं की आत्मकथाओं की तरह यह  भी पढ़ने वालों में खासी दिलचस्पी जगातीहै । इन आत्मकथाओं में काफी अनसुना ,अनदेखा मिलने की संभावना बनी रहती हैं । गुजरे समय मे कुछ आत्मकथाओ ने अपने आने से पहले काफी उम्मीद जगायी थी । दिलीप कुमार की उदय तारा नायर लिखित आत्मकथा ' द सब्सटेंस एंड शैडो ' ऐसी ही थी जो ट्रेजेडी किंग के प्रशंसकों को निराश कर गई ।दिलीप कुमार की नायिकाये , समकालीन अभिनेताओं से उनकी होड़ , राजकपूर , देव आनंद से  पेशेवर गैर पेशेवर संबंध। मधुबाला से प्रेम फिर विवाह की मनुहार और अदालत में संबंधों का पटाक्षेप जैसी ढेर सारी  बाते है जो सर्वविदित है परन्तु उनके प्रशंसक उनकी ही जुबानी सुनना चाहते थे लेकिन दिलीप की बहु प्रतीक्षित आत्मकथा से नदारद थी।  फ़िल्म  ' शायद ' से अपने कैरियर की सुरुआत करने वाले ओम पुरी की आत्मकथा उनकी दूसरी पत्नी ने इस विवादास्पद ढंग से लिखी कि इस महान एक्टर को कोर्ट की शरण लेना पड़ी ।  '' द
अनलाइकली हीरो '' नाम से ही आभास दिलाती है कि इस किताब में ओमपुरी के उन लम्हों की दास्तान है जो वे कभी सामने नहीं लाने वाले थे। साल में एक दो बार कोई न कोई पत्रकार अमिताभ बच्चन से पूछ ही बैठता है कि सर आप कब अपने संस्मरण लिख रहे है ? हमेशा की तरह महानायक विनम्र होकर बात घुमा देते है।   सिने प्रेमियों की स्मृति में जुम्मे जुम्मे जगह बनाने वाले नवाजुद्दीन सिद्दीकी की हालिया आत्मकथा कुछ जल्दी ही आगई । नवाज की स्क्रीन परफॉर्मेंस की जितनी तारीफ की जाए , कम है। इस धुरंधर अभिनेता ने ऋतुपर्णो चटर्जी लिखित अपनी आत्मकथा में अपनी सहाभिनेत्रियो पर इतनी हल्की टिप्पणियों कर दी कि बवाल हो गया । अच्छा एक्टर अच्छा इंसान भी हो इस बात पर प्रश्नचिन्ह लग गया । नवाज की आत्मकथा बाजार से हटा ली गई है । 
मोजूदा दौर व्यक्तित्व के विखंडन का दौर है । जो खरा दिखता है जरूरी नहीं खरा हो भी । बाजार ने नैतिकता की हदें तय कर दी है । दर्शक और सिनेमा के तलबगारों के लिए अपने आदर्श निश्चित करने से पहले तोल मोल करना जरूरी हो गया है।

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

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