Friday, April 29, 2011

एक राज कुमार था , एक राजकुमारी थी .

जाहिर है इस समय मै इन्टरनेट पर खबरे खंगाल रहा हु . सारी दुनिया की दिलचस्पी इस समय ब्रिटेन के युवराज की शादी और और शान शोकत को लेकर है . cnn की वेब साईट ने अपने होम पेज को दो भागो मै बांटा हुआ है. एक पर युवराज और युवरानी के मुस्कुराते हुए फोटो है, और दूसरी तरफ अमरीका के अलबामा राज्य मे तूफ़ान से बर्बाद घर के बाहर बिलखती दादी और पोते की तस्वीर है . नब्बे मिनिट की एक फिल्म आपके मन मे भावनाओ का जो तूफ़ान खड़ा कर सकती है , मात्र दस सेकण्ड मे मै वह महसूस कर रहा हू.

Friday, April 15, 2011

अमिताभ बच्चन .....

बीबीसी ने जब अमिताभ को अपने सर्वेक्षण में सदी का महा नायक चुना था तो किसी को भी अंदाजा नहीं था कि यह विशेषण उन्हें कहाँ ले जाने वाला है . बरसों पहले दिलीप कुमार को पाकिस्तान सरकार ने अपने वतन के सबसे महत्वपूर्ण सम्मान 'निशाँ - ऐ -पाकिस्तान' से नवाजा था . उसके बाद दिलीप कुमार कुछ ख़ास नहीं कर पाए थे . तब यही कयास लगाए गए थे कि'' महानायक '' का सर्टिफिकेट अपनी दिवार पर टांग कर अमिताभ अपनी आत्म कथा लिखेंगे , और ज्यादा से ज्यादा साल दो साल फिल्मे करके सेवा निवृत हो जायेंगे .और यह अनुमान लगाने के ठोस कारण थे . बाए हाथ का घूंसा , गुस्से से लाल होती आँखे , एंग्री यंग मेन की छवि सब कुछ बोथरा होने लगा था.

इसी दौर में मशहूर फ्रेंच निर्देशक तृफौत ने उन्हें विशेषण दिया ' वन मेन इंडस्ट्री ' का , और यह सही भी था उस समय अमिताभ एक नंबर से लेकर दस नंबर तक कब्जा जमाये हुए थे . भावना सोमाया अपनी पुस्तक ' अमिताभ बच्चन - द लेजेंड में लिखती है '' गोर से देखे आपको एक अभिनेता दिखेगा जिसके हाथों में अपनी नियति का नियंत्रण है'' . रोलर कोस्टर की तरह रोमांचक उनके करीअर की कहानी को बयान करते यह शब्द सही लगते है .
आकाशवाणी से खारिज हो चुकी आवाज को सबसे पहले नेशनल अवार्ड जीत चुके फिल्मकार मृणाल सेन ने पहचाना और सात हिन्दुस्तानी से भी पहले मौका दिया अपनी फिल्म'' भुवन शोम ''में . गूंजने वाली इस आवाज का उपयोग फिर हर महान फिल्मकार ने बरसो बाद सिर्फ इस लिए किया कि उनके पास अमिताभ के लिए उपयुक्त रोल नहीं था परन्तु वे उन्हें किसी न किसी तरह अपनी फिल्म का हिस्सा बनाना चाहते थे , उल्लेखनीय है , सत्यजित रे - शतरंज के खिलाड़ी , ऋषिकेश मुखर्जी - बावर्ची .
''टु बी आर नॉट टु बी '' में जया बच्चन लिखती है '' वे एक रहस्य मयी पहेली कि तरह है ' जितने लोकप्रिय वे यहाँ है उतने ही दुनिया के दुसरे कोने में भी है . फ्रांस के डयूविले शहर कि मानद नागरिकता जया की इस बात को रेखांकित करती है . इंग्लॅण्ड की रानी और अन्तरिक्ष यात्री युरी गागरिन ऐसे मात्र दो लोग है जिन्हें यह सम्मान अमिताभ के पूर्व मिला है .
एक समय मीडिया को पास न फटकने देने वाले अंतर्मुखी अमिताभ पिछले तीन सालों से मुखर हो उठे है . बिला नागा अपने मन कि बात ब्लॉग पर लिख कर उन्होंने साहित्य की नई विधा इजाद की है . पिछले हफ्ते पोलैंड सरकार ने डॉ . हरिवंश रॉय बच्चन के नाम पर हिंदी लायब्रेरी शुरू करते हुए अमिताभ को शहर की चावी सौपी और उनके हाथों की छाप संरक्षित की. एक भारतीय के लिए यह गर्व की बात है . यह सम्मान हमारे किसी राजनेता को भी नसीब नहीं हुआ है .
लगे हाथ - रितुपर्णो घोष की फिल्म '' द लास्ट लियर '' अमिताभ की पहली अंग्रेजी भाषा में बनी फिल्म है . उत्पल दत्त द्वारा लिखी कहानी पर बनी इस फिल्म में काम करने के लिए अमिताभ ने स्वयं आगे आकर पहल की थी , वजह सिर्फ इतनी थी की उत्पल दत्त उनकी पहली फिल्म सात हिन्दुस्तानी के सह कलाकार थे .

Friday, April 1, 2011

आज भी सपने में मिलती है मिस चमको .


( सन्दर्भ :- फिल्म चश्मे बद्दूर के रीमेक की खबर) देखा जाए तो हर साल अपने में कुछ ख़ास लिए होता है .1981 का साल भी कुछ इसी तरह का था . अमिताभ बच्चन का शिखर समय चल रहा था . उनकी दो सुपर हिट फिल्मे ' लावारिस ' और 'नसीब ' धूम मचा रही थी . जीतेन्द्र को दक्षिण भारत का सहारा मिल चुका था . अगली क्लास के दर्शक उनकी' मवाली ' 'तोहफा ' और 'हिम्मतवाला ' के गानों को गुनगुना कर थिरक रहे थे . अपर्णा सेन'' 36 चोरंगी लेन'' के जरिये भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम दिला रही थी , ऐसे में अजीबोगरीब नाम वाली एक फिल्म ने सिनेमा घरो में दस्तक दी . इस फिल्म का नाम था चश्मे -बद्दूर . यह दौर अमिताभ की एक्शन और श्री देवी -जीतेन्द्र के ता - थैया टाइप के नाच गानों का था .इसी दौरान जुबली कुमार (राजेंद्र कुमार ) '' लव स्टोरी '' से देश को एक युवा और ताजगी भरी भरा चेहरा कुमार गौरव के रूप में दे चुके थे . चश्मे -बद्दूर के साथ एक ही प्लस पॉइंट था , इसकी निर्देशिका सई परांजपे का नाम . सई इसके पूर्व नेशनल अवार्ड जीत चुकी फिल्म '' स्पर्श '' को निर्देशित कर अपनी पहचान बना चुकी थी .
दूरदर्शन की प्रोडूसर और डायरेक्टर रही साईं स्वयं एक अच्छी लेखिका रही है . बच्चो के लिए लिखी उनकी छे से ज्यादा किताबे राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरूस्कार से सराही गई है . चश्मे बद्दूर की कहानी स्वयं सई ने ही लिखी थी .
रोमांटिक कहानी में कामेडी का तड़का नई बात नहीं थी . परन्तु सई की प्रस्तुति में ताजगी थी . राकेश बेदी , फारुख शेख , रवि बासवानी , सईद जाफरी और दीप्ती नवल .कुल मिलकर पूरी कास्ट उर्जावान और बेहतरीन थी . कहानी कहने का ढंग और अभिनय दोनों ही उम्दा स्तर का था . शायद यही कारण है की आज तीस साल बाद भी फिल्म और उसके पात्र हमारे आस पास के ,अपने से लगते है और फिल्म --एक दम ताज़ी .
चूँकि कहानी और डायरेक्शन दोनों पर सई की पकड़ थी, लिहाजा कुछ सीन यादगार बन गए थे . ख़ास तौर पर रवि बासवानी का फ्लेश बेक में जाने वाला सीन , फारुक और दीप्ति की पहली मुलाक़ात का सीन , . राकेश बेदी के साथ दीप्ती के नौका विहार का द्रश्य और नदी में भेंसों के नहाने वाला सीन ,..

मेने शुरुआत में कुछ फिल्मो और हस्तियों के नामो जिक्र किया था .ख़ास वजह थी सिर्फ यह रेखांकित करना कि आज तीस बरस बाद भी चश्मे बद्दूर एक पूरी पीडी की यादों में ताजा है . जबकि इस लम्बे अरसे में कई बड़ी फिल्मे आई और गुमनामी में खो गई . माना की चश्मे -बद्दूर क्लासिक्स की श्रेणी में नहीं आती परन्तु जिसके बारे में सोंच कर ही आपके चेहरे पर मुस्कान आजाये उस फिल्म में कुछ ख़ास तो होगा.
चश्मे बद्दूर के रिमेक का बीड़ा डेविड धवन ने उठाया है. वेसे साल भर पहले भी इसके रिमेक और अधिकार वियोकाम 18 के खरीदने और ओनिर के निर्देशन की बात चली थी .डेविड ने गोविंदा के साथ कामेडी फिल्मो की झड़ी लगाईं है परन्तु सई के लेवल पर पहुचना उनके बस में नहीं है . हांलाकि बरसो पहले डेविड सई की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म में सहायक रह चुके है .
भले ही फिल्म रोमांटिक कामेडी थी ,परन्तु संगीत और गीत आज भी लोगो की जुबान पर है . . राजकमल का संगीत और यशुदास की आवाज भुलाए न भुलाई जा सकती है . '' काली घोड़ी द्वार खड़ी....'' '' कहाँ से आये बदरा ''.....आज भी बारिश के दिनों में अपने आप याद आजाता है . '' इस नदी को तुम मेरा आइना मान लो ''...बेमिसाल है . रेडिओ पर सुनते वक्त यह गीत रोमेंटिक लगता है और देखते वक्त कामेडी . डेविड के निर्देशन पर कोई शक नहीं है , परन्तु वेसा अबोध हास्य आज के दौर में बहुत ही मुश्किल है . फिलहाल फिल्म की स्टार कास्ट तय नहीं हुई है , परन्तु दीप्ती नवल और फारुख शेख इस फिल्म में छोटा सा रोल अवश्य करेंगे .
लगे हाथ ---चश्मे बद्दूर में रेखा और अमिताभ ने एक छोटी सी रोमांटिक भूमिका की थी .




Friday, March 25, 2011

क्या आप हमारी तरफ देखेंगे मि. टेड टर्नर ...

मुझे आश्चर्य है कि टेड टर्नर को भारत में अपनी -सिर्फ क्लासिक 'ब्लेक एंड व्हाइट फिल्म दिखने वाली चेनल TNT के भारतीय संस्करण को लांच करने का ख्याल अभी तक क्यों नहीं आया ? टेड टर्नर 'टाइम वार्नर इंक' CNN न्यूज चेनल, और 'वार्नर ब्रदर ' के भी मालिक है. यूँ तो TNT पिछले पंद्रह सालो से भारत में(अमेरिकन क्लासिक)फिल्मे प्रसारित कर रहा है, परन्तु जिस तरह से उन्होंने TNT के 'स्पेनिश ' और 'तुर्की' संस्करण जारी किये है और कई यूरोपीयन संस्करणों पर काम जारी है वेसी ही गुंजाइश भारत में भी है .
भारत में प्रति वर्ष एक हजार से ज्यादा फिल्मे बनती है और पहली बोलती फिल्म आलम -आरा से लेकर 'ब्लेक एंड व्हाइट फिल्मो के पुरे दौर में बेहतरीन क्लासिक और यादगार फिल्मे बनी है.परन्तु उचित रख रखाव के आभाव में अधिकाँश फिल्मो के प्रिंट नष्ट होने का कगार पर है. फिल्मो के प्रिंट की अधिकतम उम्र 70 -80 बरस होती है, गर उन्हें दो डिग्री सेल्सियस और चोवीस डिग्री आन्द्रता में संरक्षित किया जाए तब .
दूसरी तरफ पुराने संगीत को संरक्षित करने में ज्यादा प्रयास नहीं करना पड़े है. यह काम कम खर्च में बगेर कोई आन्दोलन किये संपन्न हो रहा है. इसे सहेजने में राष्ट्रीय रेडियो स्टेशन के अलावा निजी स्टूडियो ने भी विशेष रूचि दिखाई और समय समय पर ओल्ड -इस -गोल्ड नाम से संगीत जारी कर काफी धन कमाया है .
इस तथ्य से इनकार नहीं है कि पुरानी और क्लासिक फिल्मो के प्रिंट को डिजिटल करने का काम काफी खर्चीला है , परन्तु टेड टर्नर जेसे मीडिया सम्राट के लिए यह काम आसान है.उन्होंने अमेरिका में 1939 से लेकर ब्लेक एंड व्हाईट दौर कि अधिकाँश फिल्मो को सहेज कर अपने टेलीविजन पर प्रसारित किया है और कुछ फिल्मो को रंगीन करने की आलोचना भी झेली है.
हमारे देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों ने भी पिछले कुछ समय से फिल्मो को व्यापार के रूप में लेना शुरू किया है . अनिल अम्बानी ग्रुप , सन टीवी , आदि विशेष रूप से सक्रिय है , परन्तु इनका भी रुझान फिल्म निर्माण और फिल्मो के लिए वित्त उपलब्ध करने तक ही है .कुछ लोग अवश्य टेलीविजन चेनल शुरू कर चुके है परन्तु वे मनोरंजक चेनल और न्यूज चेनल पर ही अटके हुए है
भारत के फिल्म प्रेमी दुआ ही कर सकते है कि टेड टर्नर का ध्यान इस तरफ जाए ..या हमारे अनिल अम्बानी , सुभास चन्द्रा या दयानिधि मारन को कुछ नया करने का जूनून आये .
(टेड टर्नर की मशहूर अभिनेत्री पत्नी जेन फोंडा ने अस्सी के दशक में योग के माध्यम से अपना 'काया-कल्प ' किया था. अपना फिटनेस विडियो जारी करने वाली वे पहली स्टार थी. भारत में उनका अनुसरण कर निख़रने वाली सर्वप्रथम अभिनेत्री रेखा थी )

Tuesday, March 22, 2011

साथी हाथ बढाना .

सोशल नेटवर्किंग साईट कितनी गहराई तक आम जन को प्रभावित कर रही है , इसका सर्वोत्तम उदाहरण है प्रयोगधर्मी फिल्मकार ओनिर की 22 अप्रेल को रीलिज होने वाली फिल्म आई एम् . ओनिर मूलतः भूटान के रहने वाले है . 26 \11 के आतंकवादी हमले के ठीक एक दिन बाद उनकी फिल्म सॉरी भाई देश के अचानक बदले हालत के चलते बॉक्स ऑफिस पर पानी भी नहीं मांग सकी थी . इस फिल्म की नाकामयाबी ने ओनिर को एकदम घर बेठा दिया था . फिल्म नगरी में एक जुमला हमेशा चर्चा में रहता है '' शुक्रवार का दिन नया सूरज उगता है और कोई सितारा अस्त हो जाता है '' विदित हो कि माया नगरी में सारी नयी फिल्मे शुक्रवार को ही रिलीज होती है . वेसे इस रिवाज को तोड़ने का बीड़ा घोर अन्धविश्वासी एकता कपूर ने उठाया है . एक समय'' क'' नाम से अपनी टीवी सोप और फिल्मे शुरू करने वाली एकता अपनी नयी फिल्मे गुरुवार को रिलीज करने जारही है . बहरहाल !
बात चल रही थी ओनिर की...बर्बादी के छोर पर खड़े ओनिर को किसी दोस्त ने सुझाया कि इस तरह सर पर हाथ रख कर मातम मनाने के बजाये कुछ नया किया जाए . और मंथन के बाद जो विचार सामने आया वह आई एम् है . ओनीर ने फेसबुक के माध्यम से अपने दोस्तों से पैसा एकत्र किया . उन्होंने सभी दोस्तों से आग्रह किया था कि वे एक हजार या उससे ज्यादा की राशि देकर फिल्म का हिस्सा बने . कुछ दोस्तों ने अपनी कार भेज दी, कुछ ने फिल्म की यूनिट के भोजन की व्यवस्था की . इस तरह देश के छयालिस शहरो से सेकड़ो लोगो ने फिल्म के लिए तीन करोड़ रूपये जुटाए . इतना ही नहीं, फिल्म के सभी एक्टर - संजय सूरी , मनीषा कोइराला , राहुल बोस , अभिनव कश्यप , जूही चावला आदि ने मुफ्त में काम किया है .
फिल्म का हश्र चाहे जो पर ओनिर की जीवटता , दोस्तों का सहयोग और फेसबुक की भूमिका हमेशा मिसाल बनी रहेगी .
लगे हाथ - फ़िल्मी दुनिया में बिता हफ्ता कही ख़ुशी कही गम वाला रहा . नविन निशचल, और बोब क्रिस्टो का अवसान हो गया . दूसरी तरफ बच्चन परिवार ने इनकम टेक्स के रूप में 37 .55 करोड़ रूपये जमा किये . 'धोबी घाट' को मिली सफलता के चलते आमिर खान ने किरण राव को BMW सिरीज की कार उपहार में दी .

Monday, March 14, 2011

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा .....


अपने समय की 'मीना कुमारी ' के नाम से प्रसिद्ध मनीषा कोइराला एक लम्बे अरसे बाद परदे पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने वाली है . प्रयोगधर्मी डायरेक्टर ओनिर की 22 अप्रेल को रिलीज होने वाली फिल्म 'आई ऍम ' में दो अभिनेत्रिया , जूही चावला , व मनीषा कोइराला लम्बे अवकाश के बाद फिल्मो में वापसी के लिए कोशिश करेगी . उगते सूरज को नमन करने वाले और उतरते को उपेक्षित करने वाले इस उद्योग की निर्ममता का शिकार हरेक एक्टर को होना पड़ा है . बावजूद इसके - बोलीवूड को जाने वाले देश के हरेक रास्ते पर हमेशा रेलम - पेल मची रहती है .
69 फिल्म पुरानी मनीषा, फिलहाल नेपाल के उद्योगपति 'सम्राट दहल ' से शादी कर आराम की जिन्दगी बसर कर रही है . परन्तु फिल्मो से चाह कर भी दूर नहीं हो पा रही है . और हो भी केसे ? मनीषा जब भी अपने दो दशक पुराने फ़िल्मी सफ़र पर नजर डालती है उन्हें अपनी सफल फिल्मो की कतार बेचेन कर डालती है . आर्क लाईट का यह आकर्षण एक्टर को ढंग से सोने भी नहीं देता है. दर्शक फिल्मो को नकार - नकार कहता है की भाई अब हम आपको नही देखना चाहते है . परन्तु एक्टर का दिल नहीं मानता . सबसे बढिया उदाहरण गोविंदा है . अपने करियर की ढलान पर खड़े गोविंदा आज स्वयं अपना ही केरीकेचर बन गए है .
बात हो रही थी मनीषा कोइराला की !! इस लाजवाब सुन्दरी ने अपने फ़िल्मी सफ़र को तीन फिल्म फेयर और तीन अन्य पुरुस्कारों से संवारा है . संजय लीला भंसाली के निर्देशकीय करियर की पहली फिल्म ' ख़ामोशी ' भले ही बॉक्स ऑफिस पर कमाल नहीं कर पाई थी परन्तु मनीषा के बेजोड़ अभिनय के लिए हमेशा याद की जायेगी . ' अकेले -हम अकेले -तुम ' और इन्द्र कुमार की' मन' ने दर्शको को बाल्टी भर आंसू बहाने के लिए मजबूर किया था.
विधु विनोद चोपड़ा की स्वतंत्रता संग्राम की प्रष्टभूमि पर लिखी काल्पनिक कहानी ' 1942 ए लव स्टोरी ' विधु विनोद चोपड़ा और मनीषा दोनों के करियर में महत्व पूर्ण स्थान रखती है. इस फिल्म के लिए भी मनीषा को फिल्म फेयर अवार्ड के लिए नामांकित किया गया था . इस फिल्म के लिए जावेद अख्तर का लिखा गीत ' एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा ..' आज बीस साल बाद भी पुराना नहीं लगता है .
सफलता की झोंक में हर सितारा लडखडाता है . शीर्ष पर मनीषा ने भी अपने करियर को कुछ लापरवाहियों और कुछ अपनी आदतों से तबाह किया . शादी शुदा नाना पाटेकर से रोमांस ,सन 2001 में आस्ट्रेलियाई राजदूत से रिश्तो की अफवाह, अमरीकी सीनेट के स्पीकर क्रिस्टोफर डोरिस से जुड़ने की अटकले , खुले आम सिगरेट और शराब के सेवन ने मनीषा की मासूम शक्ल से मिली सहानुभति को धो कर रख दिया था .
इसके अलावा फिल्म निर्माण में अमरीका से किया डिप्लोमा और उस अधूरे ज्ञान से फिल्म प्रोडूस करने का निर्णय भी आर्थिक रूप से भारी पड़ा था . ओनिर की फिल्म' आइ एम् ' के अलावा मनीषा की एक और फिल्म प्रदर्शित होने वाली है . दीप्ती नवल निर्देशित '' दो पेसे की धुप चार आने की बारिश '' फिल्म का प्रदर्शन उपयुक्त डिस्ट्री बयूटर न मिलने के कारण अटका हुआ है .
लगे हाथ ---मनीषा ने अपने पति सम्राट दहल को फेसबुक के माध्यम से खोजा था

Monday, March 7, 2011

:पल दो पल का शायर ....



''मसरूफ जमाना मेरे लिए क्यू वक्त अपना बर्बाद करे '' अपनी मृत्यु से तीन साल पहले शायद विधाता ने यह शब्द साहिर लुधियानवी से कहलवा दिए थे . स्वयं साहिर को भी समाज की संवेदन शुन्यता का अंदाजा नहीं होगा कि देश उनके योगदान को इस तरह बिसार देगा. लुधियाना ,जहां उनका जन्म हुआ और बचपन बीता और जो सारी उम्र उनके नाम से पहचान पाता रहा , ने भी साहिर की याद को जिन्दा रखने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई . आज लुधियाना में साहिर के नाम पर कोई स्मारक नहीं है न ही कोई सड़क उनका नाम पाकर धन्य हुई है . जबकि अपनी नज्मो , गीतों , से साहिर ने देश का नाम सरहदों के पार तक रोशन किया .
प्रेम की पराकाष्टा से दुनिया को परिचित कराने वाले इस गीतकार के लिए यह फक्र की बात है कि एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरता है जब रेडिओ श्रोता साहिर के लिखे गीत की फरमाइश न करते हो .
मात्र उन्नीस बरस की उम्र में साहिर लुधियानवी ने मुग़ल सम्राट शाहजहाँ को कटाक्ष करते हुए नज्म लिखी थी '' एक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर हम गरीबों का उड़ाया है मजाक '' इस बात का प्रतिक थी की इस शायर के पास कहने को बहुत कुछ है .
प्रेम की बात करने वाले साहिर के जीवन की विडम्बना थी कि वे प्रेम में असफल रहे थे . उनका पहला प्रेम गायिका सुधा मल्होत्रा से हुआ था जो ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया . फिर उनके जीवन में अमृता प्रीतम आई जो उनसे अंतिम समय तक जुडी रही. अमृता -साहिर ने अपने रिश्ते को कभी नाम देने की कोशिश नहीं की . ऐसा कई बार होता था जब वे लोग आमने सामने होकर भी बगेर एक शब्द कहे जुदा हो जाते थे . साहिर के प्रेम में गहराई थी .इसके उलट अमृता उतनी ही मुखर थी . अमृता ने अपनी किताबो , साक्षात्कारों में खुल कर साहिर के प्रति अपने प्रेम को स्वीकारा, बावजूद इसके दोनों के बीच कोई अद्रश्य बाधा रही थी कि साहिर ता -उम्र अविवाहित ही रहे .
आठ मार्च को हम साहिर का जन्म दिन मना रहे है ....इस विडम्बना के साथ कि 25 अक्टूबर 1980 को साहिर कि मृत्यु के बाद जुहू कि जिस कब्रिस्तान में साहिर को दफ़न किया गया था उस कब्र को 2010 में पुनर्निर्माण के नाम पर हटा दिया गया है . ( मधुबाला की कब्र के साथभी इसी तरह का हादसा हो चुका है )अब साहिर के प्रशंशक उनकी कब्र पर फूल भी नहीं चडा सकते है .
लगे हाथ ---लोकप्रियता के चरम पर ''नया दौर '' फिल्म के गीतों के लिए साहिर ने लता मंगेशकर के मेहनताने से एक रुपया ज्यादा माँगा था . यह बड़ी गुस्ताफी थी .परन्तु साहिर के उस समय के कद के हिसाब से निर्माता को यह मांग पूरी करना पड़ी थी . और यह साहिर ही थे जिनके दबाव के चलते आल इंडिया रेडिओ ने गायक के साथ गीतकार और संगीतकार का नाम उदघोषित करना शुरू किया .

दिस इस नॉट अ पोलिटिकल पोस्ट

शेयर बाजार की उथल पुथल में सबसे ज्यादा नुकसान अपने  मुकेश सेठ को हुआ है। अरबपतियों की फेहरिस्त में अब वे इक्कीसवे नंबर पर चले गए है। यद्ध...