
( सन्दर्भ :- फिल्म चश्मे बद्दूर के रीमेक की खबर) देखा जाए तो हर साल अपने में कुछ ख़ास लिए होता है .1981 का साल भी कुछ इसी तरह का था . अमिताभ बच्चन का शिखर समय चल रहा था . उनकी दो सुपर हिट फिल्मे ' लावारिस ' और 'नसीब ' धूम मचा रही थी . जीतेन्द्र को दक्षिण भारत का सहारा मिल चुका था . अगली क्लास के दर्शक उनकी' मवाली ' 'तोहफा ' और 'हिम्मतवाला ' के गानों को गुनगुना कर थिरक रहे थे . अपर्णा सेन'' 36 चोरंगी लेन'' के जरिये भारत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नाम दिला रही थी , ऐसे में अजीबोगरीब नाम वाली एक फिल्म ने सिनेमा घरो में दस्तक दी . इस फिल्म का नाम था चश्मे -बद्दूर . यह दौर अमिताभ की एक्शन और श्री देवी -जीतेन्द्र के ता - थैया टाइप के नाच गानों का था .इसी दौरान जुबली कुमार (राजेंद्र कुमार ) '' लव स्टोरी '' से देश को एक युवा और ताजगी भरी भरा चेहरा कुमार गौरव के रूप में दे चुके थे . चश्मे -बद्दूर के साथ एक ही प्लस पॉइंट था , इसकी निर्देशिका सई परांजपे का नाम . सई इसके पूर्व नेशनल अवार्ड जीत चुकी फिल्म '' स्पर्श '' को निर्देशित कर अपनी पहचान बना चुकी थी .
दूरदर्शन की प्रोडूसर और डायरेक्टर रही साईं स्वयं एक अच्छी लेखिका रही है . बच्चो के लिए लिखी उनकी छे से ज्यादा किताबे राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरूस्कार से सराही गई है . चश्मे बद्दूर की कहानी स्वयं सई ने ही लिखी थी .

चूँकि कहानी और डायरेक्शन दोनों पर सई की पकड़ थी, लिहाजा कुछ सीन यादगार बन गए थे . ख़ास तौर पर रवि बासवानी का फ्लेश बेक में जाने वाला सीन , फारुक और दीप्ति की पहली मुलाक़ात का सीन , . राकेश बेदी के साथ दीप्ती के नौका विहार का द्रश्य और नदी में भेंसों के नहाने वाला सीन ,..

चश्मे बद्दूर के रिमेक का बीड़ा डेविड धवन ने उठाया है. वेसे साल भर पहले भी इसके रिमेक और अधिकार वियोकाम 18 के खरीदने और ओनिर के निर्देशन की बात चली थी .डेविड ने गोविंदा के साथ कामेडी फिल्मो की झड़ी लगाईं है परन्तु सई के लेवल पर पहुचना उनके बस में नहीं है . हांलाकि बरसो पहले डेविड सई की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म में सहायक रह चुके है .

लगे हाथ ---चश्मे बद्दूर में रेखा और अमिताभ ने एक छोटी सी रोमांटिक भूमिका की थी .
bahut shandar prastuti.aisee jankari vala ek matr aapka hi blog ab taq meri jankari me hai.aur ye bahut achchha lagta hai.photo bhi bahut hi sundar lagaye hain.
ReplyDeleteगुजरा वक्त याद दिलाने के लिये धन्यवाद इसका रीमेक बनाना आज के फ़िल्मकारो के बस मे नही और वे दर्शक भी कहां है निश्छल हसी और समय की अबाध्यता आज संभव नही दर्शक पूरा फ़ल नही विटामिन की गोलियां खाना चाहता है ।
ReplyDeleteपुराने दौर की फिल्मों का मजा ही कुछ और है।
ReplyDeleteहां रिमेक बनाने में मिर्च मसाले डाल देने से मजा जरूर किरकिरा हो जाता है लेकिन उस दौर की फिल्मों की कहानी, विषयवस्तु का मुकाबला नही।
गाने तो खैर पुराने दौर के लाजवाब होते ही हैं।